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आरक्षण के लिए क्या महज यह कह देना ही काफी है कि इस तबका का शोषण हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में आरक्षण पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था— यह तबका 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना झेल रहा है। एससी-एसटी पहले से ही पिछड़े हैं इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए अलग से किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है।
कमाल का तर्क है न कि प्रोन्न​ति में आरक्षण देने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है? यानी जाति काफी है! कैसे भी वोट लेना है तो कैसे भी आरक्षण दे देना है। अब सही बात तो कोर्ट में सरकार नहीं कह सकती न कि दलितों का एकमुश्त वोट वह आरक्षण देकर खरीद रही है? यह सच तो न अभी की सरकार कह सकती है, न पिछली इसलिए हर सरकार के पास यही तर्क है— 1000 वर्षों का शोषण! एससीएसटी एक्ट के पीछे भी शोषण से अधिक यही वोट बैंक की राजनीति है और आरक्षण या प्रोन्नति में आरक्षण के पीछे भी।
क्या कोई सरकार इस तरह बेशर्मी से कह सकती है कि आंकड़े की जरूरत ही नहीं है? माने मायावती दलित हैं, वह 1000 वर्षों से शोषित हैं, उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए? माने राम विलास पासवान दबे—कुचले हैं? उनके सुपुत्रों का आरक्षण मिलना चाहिए? माने जिस देश का दलित राष्ट्रपति है, उस देश में यह तर्क कि यह समाज 1000 वर्षों से प्रताड़ना झेल रहा है? माने जो तबका प्रताड़ना झेल रहा है, उस तबके का व्यक्ति राष्ट्रपति है? यह कैसा तर्क है? यह कैसी प्रताड़ना है?
सरकार यदि यह स्पष्ट नहीं कर सकती कि इस समाज को आरक्षण में प्रोन्नति देना क्यों आवश्यक है तो क्या यही स्पष्ट कर सकती है कि 1000 वर्षों तक इस समाज का शोषण किसने किया है? अभी तो 4 वर्षों से खुद यही सरकार है जो दुहाई दे रही है 1000 वर्षों से प्रताड़ित किए जाने का तो क्या मानें कि 1000 वर्षों में इन चार वर्षों में भी यह तबका प्रताड़ना ही झेलता रहा है? कमाल है कि देश को 1947 में आजादी मिल गई थी और इस दौरान 73 वर्षों तक इस तबका का शोषण होता रहा! शोषण की यह कहानी सुना—सुनाकर कब तक कुछ जातियों को सिरमौर और बाकियों को कुचलने का प्रयास चलता रहेगा? इसी शोषण की कहानी की बुनियाद पर आजाद भारत के संविधान में एससीएसटी समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया लेकिन क्या 10 बरस बीते नहीं? 7 बार 10 बरस बीत जाने के बाद क्या लक्ष्य की पूर्ति नहीं हुई? नहीं हुई तो क्यों? क्या इसके लिए भी सवर्ण जिम्मेदार हैं?
जाहिर है कि 1000 वर्षों में आजादी के साल भी शामिल हैं और इस लिहाज से सरकार यह नहीं कह सकती कि आजाद भारत में उसने भी इस तबका का शोषण किया है तो इसका सीधा मतलब है कि शोषण अगड़ी जातियां करती रही हैं। यानी, अपराधी सरकार नहीं, अगड़ी जातियां हैं। इसीलिए एससीएसटी एक्ट के जरिये कथित अगड़ी जातियों पर आपातकाल लागू करने में सरकार ने जरा भी विचार नहीं किया क्योंकि वह पहले से विचार कर चुकी है कि यह जातियां शोषक हैं। मगर इतिहास में इन जातियों ने कब एससीएसटी समाज का शोषण किया, क्या इसका कोई आंकड़ा है? या बस 1000 वर्षों तक के शोषण की गढ़ी गई कहानी से ही आगे भी यह देश चलता रहेगा? यह सरकार सबकुछ तय करती रहेगी?
शोषण तो कोई शासक ही कर सकता है न या उसके जैसा ही कोई अन्य ताकतवर? तो क्या कभी इतिहास में जाकर सरकार ने पता भी किया है कि कब अगड़ी जातियां सिर्फ राजा हुआ करती थीं, जब एससीएसटी तबका सिर्फ प्रजा हुआ करता था? आखिर ऐसा कौन—सा कालखंड था जब राजा कोई सवर्ण था और उसने अपनी सारी दलित प्रजा को जेल में डाल दिया था या उससे चक्की पिसवाई थी, उसका राशन—पानी बंद कर दिया था…। 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना का मतलब है 1018 से अब तक। यदि इतिहास पर नजर डालें तो इस दौरान मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक का शासन रहा। क्या मुगलों ने एससीएसटी समाज को अलग छांटकर उस पर जुल्म ढाया? क्या अंग्रेजों ने अलग से एससीएसटी समाज की पहचान कराई और उनपर अलग से अत्याचार किया? जिन शासकों ने भी जुल्म ढाया, भारतवासियों पर ढाया लेकिन प्रताड़ना का इतिहास सिर्फ इसी जाति का क्यों है? यदि एससीएसटी समाज के साथ ही यह सभी जातियां भी इस कालखंड में प्रताड़ित होती रही हैं तो यह झूठ क्यों रचा गया है? और इस झूठ के आधार पर कुछ जातियों को आगे बढ़ाने और अन्य सभी को प्रताड़ित करने के लिए सरकारी योजनाएं कब तक चलाई जाती रहेंगी? कब तक देशहित नहीं, कुछ जाति हित को ध्यान में रखकर सत्ता काम करती रहेगी?
1000 वर्षों का शोषण रटने वाली सरकार ने इतिहास पढ़ा ही नहीं है, ऐसा तो हो नहीं सकता तो यह तर्क एक साजिश ही तो है कि इस तबका का शोषण हुआ है इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण मिलना चाहिए?

सरकार के पास जब प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए यही तर्क है कि एससीएसटी समाज का 1000 वर्षों तक शोषण हुआ है और बाकी जातियों पर एससीएसटी एक्ट थोपने की पृष्ठभूमि भी शायद यही है तो हमें भी यह समझ लेना जरूरी हो गया है कि 1000 वर्षों में कब, किन ब्राह्मणों, राजपूतों, बनियों, कायस्थों, भूमिहारों या अन्य जातियों ने इस तबका को प्रताड़ित किया था। अब उन सभी के लिए 1000 वर्षों का इतिहास पढ़ना जरूरी हो गया है, जो इसी आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
1000 वर्ष यानी अब से 1018 तक। 1001 में महमूद गजनी ने भारत पर पहली बार आक्रमण किया था और पंजाब के शासक जयपाल को हराया। 1025 में उसने सोमनाथ मंदिर को विध्‍वंस कर दिया। आज शोषक समझकर हर अधिकार से वंचित की जा रहीं जातियां यदि उस समय इतनी सबल थीं कि एससीएसटी समाज का शोषण कर रही थीं तो यह जातियां मंदिर को विध्वंस होता क्यों ​देखती रहीं? क्या तब सनातन धर्म नहीं था? भगवा ध्वज नहीं था? क्या तब ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं थे? आज जो जातियां हैं, वह सभी तब भी थीं। आज जो भक्ति ईश्वर के प्रति है, वह तब भी थी लेकिन इन सबके बावजूद यदि प्रभु का घर मंदिर विध्वंस होता रहा तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि यह जातियां गजनी का सामना करने की स्थि​ति में नहीं थीं। यदि होतीं तो गजनी तभी गाज फेंक चुका होता। यह जातियां बाहर से आए आक्रमणकारियों का गुलाम न बन जातीं। कोई शौक नहीं था किसी को गुलाम बनने का। न तब, न अब।
1191 में तराई का पहला युद्ध हुआ। 92 में दूसरा युद्ध हुआ। 1206 में दिल्‍ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्‍याभिषेक हो गया। 1221 में भारत पर चंगेज खान ने हमला किया। 1236 में दिल्‍ली की गद्दी पर रजिया सुल्‍तान का राज्‍याभिषेक कर दिया गया। 1296 में अलाउद्दीन खिलजी का हमला हुआ। 1325 में मोहम्‍मद तुगलक का राज्‍याभिषेक हुआ। 1351 में फिरोजशाह का राज्‍याभिषेक किया गया। 1398 में तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया…
अभी जो सरकार खुद इतिहासकार भी बनी बैठी है, वह बताए तो सही कि इनमें से कौन ब्राह्मण था, राजपूत था, मनुवादी था? जिसके द्वारा शोषण किए जाने का आधार बनाकर देश में जाति के आधार पर आरक्षण से लेकर कानून तक पारित किया जा रहा है। बताइए न कि तब कहां थीं वह हिंदू जातियां, जो शोषण कर रही थीं? और कहां था वह तबका भी जो शोषित हो रहा था। देश को तो बाहरी आक्रांता लूटते जा रहे थे और देश का हर तबका देखता जा रहा था…।
1494 में फरघाना में बाबर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई हुई। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया। मुगल शासन की स्‍थापना की। 1527 में खानवा की लड़ाई हुई। बाबर ने राणा सांगा को हराया। 1530 में हुमायूं का राज्‍याभिषेक हुआ। 1539 में शेरशाह सूरी ने हुमायूं का हराया और भारत का सम्राट बना। 1540 में कन्‍नौज की लड़ाई लड़ी गई। 1555 में हुमायूं ने दिल्‍ली की गद्दी को फिर से हथिया लिया। 1556 में पानीपत की दूसरी लड़ाई लड़ी गई। 1565 में तालीकोट की लड़ाई हुई। 1576 में हल्‍दीघाटी की लड़ाई हुई। राणा प्रताप ने अकबर को हराया…।
हां! अब राणा प्रताप को मनुवादी कहा जा सकता है क्योंकि दलित या मनुवादी—सवर्ण—शोषक सबकुछ कहे जाने का आधार जाति है लेकिन गौर कीजिए कि राणा प्रताप ने भी एससीएसटी समाज को नहीं हराया, एक मुस्लिम शासक को हराया था। फिर शोषण कब, किसका, किसने किया?
1597 में राणा प्रताप की मृत्‍यु हो गई। 1600 में ईस्‍ट इंडिया कंपनी की स्‍थापना हुई। 1605 में अकबर की मृत्‍यु के बाद जहाँगीर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1627 में जहांगीर की मृत्‍यु हो गई। 1628 में शाहजहां भारत का सम्राट बना। 1659 में औरंगजेब का राज्‍याभिषेक हुआ। 1665 में औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया। शिवाजी इतने मजबूत होते तो कैद क्यों हो गए? और यदि हो गए तो प्रताड़ित तो शिवाजी हुए न? यह सारी लड़ाइयां जब लड़ी जा रही थीं तब वह समाज कहां था जो अभी स्वयं को मूल निवासी बता रहा है और बाकियों को बाहर से आया हुआ? यदि इन कथित मूल निवासी के अलावा सभी बाहरी थे तो बाहरी ही बाहरी से क्यों लड़ रहे थे? सभी बाहरियों को मिलकर तो मूल निवासियों पर शासन करना चाहिए था न?
1739 में नादिरशाह ने भारत पर हमला किया। 1757 में प्‍लासी की लड़ाई हुई। लॉर्ड क्‍लाइव के हाथों भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक शासन की स्‍थापना की गई। कमाल है कि सारी जातियां एससीएसटी समाज पर जुल्म ढ़ाने में इतनी व्यस्त थी कि वे खुद गुलाम होती चली गईं।
1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। शाहआलम द्वितीय भारत का सम्राट बना। 1764 में बक्‍सर की लड़ाई, 1767-69 में पहला मैसूर युद्ध, 1780-84 में दूसरा मैसूर युद्ध हुआ। 1799 में चौथा मैसूर युद्ध हुआ। टीपू सुल्‍तान की मृत्‍यु हो गई। 1839-42 में पहला अफगान युद्ध हुआ। 1845-46 में पहला अंग्रेज-सिक्‍ख युद्ध हुआ। 1852 में दूसरा अंग्रेज-बर्मा युद्ध हुआ।
इस दौरान कब कौन सवर्ण राजा था, जिसने दलितों पर जुल्म किया? इतिहास देखकर बताए वह सरकार जो 1000 वर्षों के प्रताड़ना का तर्क दे रही है। यदि इस ​इतिहास में प्रताड़ना नहीं हुआ तो वह इतिहास हमें भी पढ़ाए जिसमें उसने पढ़ा है कि 1000 वर्षों से एससीएसटी समाज का शोषण होता रहा है और अन्य समाज शोषक बना रहा है…। आखिर, आपकी सारी योजनाओं का आधार यही तो है?
1857 में स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम लड़ा गया। पता है क्रांतिकारी कौन था? मंगल पांडेय? जी हां, ब्राह्मण, सवर्ण, मनुवादी कहकर आरोप इन पर भी लगाया जा सकता है कि दलितों का शोषण किया लेकिन इतिहास की हकीकत यह है कि इन्होंने एससीएसटी समाज ही नहीं, समस्त देश को बचाने के लिए अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी। ब्राह्मण ही नहीं, देश की हर जाति अंग्रेजों को हटाने के लिए लड़ रही थी लेकिन हैरानी है कि देश में कहीं एससीएसटी समाज अंग्रेजों से लड़ नहीं रहा था बल्कि इन जातियों के शोषण का शिकार हो रहा था…।
1911 में दिल्‍ली भारत की राजधानी बनी। 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने लखनऊ समझौते पर हस्‍‍ताक्षर किया। 1919 में अमृतसर में जालियाँवाला बाग हत्‍याकांड हुआ। जालियांवाला बाग में मरने वाले एससीएसटी न थे, मारने वाले सवर्ण न थे…। सभी में जुनून देश को बचाने के लिए था, न कि एससीएसटी समाज को प्रताड़ित करने का।
1920 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई। 1927 में साइमन कमीशन का बहिष्‍कार हुआ। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई। 1931 में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। अब महात्मा गांधी को भी जाति के आधार पर सवर्ण— शोषक कहा जा सकता है लेकिन सिर्फ थेथरई से, इतिहास में ऐसा गांधीजी ने नहीं किया बल्कि हरिजन कहकर सम्मानित ही किया।
1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। अगस्त क्रांति में देश का अधिकतर हिस्सा शामिल हो गया लेकिन एससीएसटी समाज तब भी कहीं प्रताड़ित हो रहा था…।
1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की भारत यात्रा हुई। केंद्र में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। 1947 में भारत का विभाजन हुआ और स्वतंत्रता मिली। विभाजन के समय सभी हिंदू—मुस्लिम प्रताड़ित हुए। दंगे—फसाद हुए। प्रताड़ित तो हुए सभी मगर प्रताड़ना का इतिहास बना सिर्फ एससीएसटी समाज का।
15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली। गौर कीजिए सरकार, देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली क्योंकि शासक अंग्रेज थे, न कि वह जातियां जिन पर जुल्म ढहाने का आरोप है। और जब आजादी मिली तो सिर्फ इन्हीं जातियों को नहीं मिली, एससी—एसटी समाज को भी मिली। जब गुलाम रहे, तब भी सभी गुलाम रहे और जब आजाद हुए तब भी सभी आजाद हुए लेकिन सरकार के पास 1000 वर्षों के शोषण का इतिहास सिर्फ इसी समाज का न जाने कहां से आया है। खैर…
1948 में 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई। 1950 में 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू हुआ। इस संविधान में इस समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन, आज तक किसी सरकार ने गिनने की कोशिश नहीं की है कि कितने वर्ष हो गए आरक्षण देते? इतने वर्षों तक आरक्षण देने के बाद अब इस समाज की क्या स्थिति है? क्या यह जानना जरूरी नहीं है? बस आरक्षण या एक्ट देते रहना जरूरी है? क्यों कोई आंकड़ा नहीं है? जब सर्वोच्च न्यायालय आंकड़े मांग रहा है तो वह क्यों नहीं मिल रहा? बस थेथरई? गालगोद? इसी से चलता रहेगा देश?
15 अगस्‍त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पं. जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे। नाम में पंडित होने के कारण इन्हें भी मनुवादी कहा जा सकता है लेकिन दलितों का शोषण किया ऐसा तो नहीं कह सकते न?
27 मई, 1964 से 9 जून, 1964 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। एक महीने के कार्यकाल में यह तो चाहते तो भी किसी तबका का शोषण नहीं कर पाते।
9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल रहा। नाम में शास्त्री उपनाम लगे होने से यदि कोई पूर्वाग्रह से पीड़ित न हो जाए तो शोषण का आरोप इनपर भी नहीं लगाया जा सकता।
11 जनवरी, 1966 से 24 जनवरी, 1966 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। अब इनसे भी ऐसी आशंका जाहिर नहीं कर सकते कि इन्होंने शोषण किया होगा।
24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री रहीं। आपातकाल लागू भी कीं तो पूरे देश पर, न कि सिर्फ एससीएसटी पर जिस तरह कि आज चुनकर एससीएसटी एक्ट का आपातकाल जातियों पर लागू किया गया है। इंदिरा गांधी के आपातकाल के समय अग्रिम जमानत की व्यवस्था हटा दी गई थी, इस एक्ट में भी अग्रिम जमानत नहीं दी जाती… अंतर बस इतना है कि तब आपातकाल देश पर लगा था, आज जातियों को चुनकर आपातकाल थोपा गया है।
24 मार्च, 1977 से 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई रहे। इनका भी इतिहास पढ़ लीजिए। कहीं, कभी किसी समाज का शोषण नहीं किया।
28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे। अब यदि आपको उ​​​पनाम सिंह के चलते इनसे द्वेष न हो तो इन्होंने भी कभी दलितों की हानि नहीं सोची।
14 जनवरी, 1980 से 31 अक्‍तूबर, 1984 तक इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री रहीं। पहले कार्यकाल में यदि दलितों का शोषण न किया तो दूसरे में भी नहीं ही की होंगी और की होतीं तो जरूर इसका इतिहास होता।
31 अक्‍तूबर, 1984 से 2 दिसम्‍बर, 1989 तक राजीव गांधी ने देश का नेतृत्व किया। इसके बाद 2 दिसम्‍बर, 1989 से 10 नवम्‍बर, 1990 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह। 10 नवम्‍बर, 1990 से 21 जून, 1991 तक चंद्रशेखर। अब फिर वही बात है कि यदि नाम में सिंह होने से ही सारी दिक्कत है तो चंद्रशेखर पर भी शोषण का आरोप लगाया जा सकता है और यदि आज होते तो एससीएसटी एक्ट भी लेकिन यदि बात सच की करें तो इनमें से किसी भी प्रधानमंत्री को दलितों से कभी कोई दिक्कत न थी, ​बल्कि हमेशा दलित ही सरकार और उसकी योजनाओं के केंद्र में रहे।
21 जून, 1991 से 16 मई, 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव और 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे। अब अटलजी पर भी दलितों के शोषण का आरोप सिर्फ ब्राह्मण, मनुवादी की दुर्भावना से ही लगाया जा सकता है, वरना हकीकत सिर्फ यही है कि इस व्यक्ति ने समस्त देश को सबल बनाने की कोशिश की और उसमें एससीएसटी समाज भी शामिल रहा।
1 जून, 1996 से 21 अप्रैल, 1997 तक एच. डी. देवेगौड़ा, 21 अप्रैल, 1997 से 19 मार्च, 1998 तक इंद्र कुमार गुजराल रहे। पुन: 19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही। वही अटलजी जिनके जाने पर पूरा देश रोया। रोने वालों में एससीएसटी समाज का कोई नहीं होगा, ऐसा नहीं कह सकते। तो ऐसे जनप्रिय नेता पर तो इस तबका के शोषण का आरोप बिल्कुल नहीं लगा सकते।
22 मई, 2004 से 26 मई, 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस वैसे भी मुस्लिम से लेकर दलित तुष्टीकरण तक में देश की अन्य पार्टियों से बेहतर पार्टी समझी जाती है तो इस सरकार में तो इसकी आशंका भी जाहिर नहीं की जानी चाहिए।
अब बारी इस सरकार की, जिसका तर्क है 1000 वर्षों के शोषण का। 2014 में जब यह भाजपा सरकार बनी तबसे भी जितनी भी योजनाएं बनीं, अधिकतर का आधार जाति ही रही। यही एससीएसटी जाति। हां, कभी ओबीसी भी। जाति के आधार पर योजना, जाति के आधार पर आयोग, जाति के आधार पर कानून, जाति के आधार पर आरक्षण और अब जाति के आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण की बात…। और इन सभी का आधार सिर्फ एक— 1000 वर्षों का वह शोषण जो कभी, किसी ने किया ही नहीं।

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… क्योंकि योग्य भारत चाहिए, न कि आरक्षित भारत

बिहार में जदयू ने कहा है कि सवर्णों को भी आरक्षण मिले। इसके पहले लोजपा के राम विलास पासवान यह बात कह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती भी बोल चुकी हैं। और तो और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भी 10% का झांसा दे रही थी…।

दरअसल इन नेताओं-दलों के पास आरक्षण के अलावा देने को कुछ है भी नहीं। यह कभी जाति के नाम पर एक्ट देंगे, कभी आरक्षण। कभी धर्म के नाम पर भड़काएंगे, कभी जाति के नाम पर देश की एकता को आग लगाएंगे। दलित सड़क पर आएगा तो उसे जातिवादी एक्ट का लॉलीपॉप थमाएँगे और जब सवर्ण इसके खिलाफ खड़ा होगा तो उसे आरक्षण देने की बात कहकर भरमाएँगे।

गजब का संविधान है, लोकतंत्र है और शासन है। किसी में कोई तालमेल नहीं। संविधान में दिए धर्म निरपेक्षता, समानता, मौलिक अधिकारों को मजाक बना दिया है इन नेताओं ने। संविधान में सब समान लेकिन हकीकत में दलित से ब्राह्मण तक, हिन्दू से मुस्लिम तक … सिर्फ धर्म-जाति की ही बात। देश के नागरिकों की योग्यता गई तेल लेने। यह गजब का विरोधाभास है कि देश में योग्य युवाओं के लिए किसी दल, सरकार के पास कुछ नहीं है और ख्वाब देश को पुनः विश्व गुरु बनाने का है। हर नेता, दल, सरकार के पास बस कुछ खास धर्म-जातियों के लिए योजनाएं (साजिश) हैं…।

चेतने का यही समय है। वोट के लिए देश और देशवासियों के हित से खेलने का यह खेल अब बन्द होना चाहिए। धर्म-जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण, कानून, सहूलियत हर चीज का विरोध होना चाहिए। यह जातिगत आरक्षण इस समय का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है जो हर क्षेत्र में योग्य युवाओं के रहते हुए भी अयोग्य को मौका देता है और समस्त देश को अयोग्य के हाथ में सौंपता है, उसे कमजोर बनाता है…। इसी तरह एससी-एसटी जैसा जातिवादी एक्ट कुछ खास जातियों को प्रश्रय देता है और बाकी जातियों के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार को कुचलता है…।

इस तरह के धार्मिक-जातिगत तुष्टीकरण, राजनीति, कानून सभी के खिलाफ नोटा को हर वह व्यक्ति हथियार बनाए जो एक डिजर्व इंडिया चाहता है, न कि रिजर्व। नोटा से यह संदेश दीजिए कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब धर्म-जाति का तुष्टीकरण और बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक के नाम पर देश हित से खिलवाड़ और नहीं। एक देश-एक संविधान-एक नियम-कानून से कम कुछ नहीं।

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जातिवाद की राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए…

देश में अभी 4900 के करीब सांसद और विधायक हैं। इसमें से सवर्णों के लिए या कहें कि एक देश-एक कानून के लिए आवाज कितनों ने उठाई? बस दो विधायकों ने जातिवादी एससी-एसटी कानून के खिलाफ मुंह खोला। सांसदों ने तो एक भी नहीं…।
इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने देश में कितने सवर्ण सांसद, विधायक चुने हैं। फर्क तो इससे पड़ता है कि कितने मर्द चुने हैं जो आपके लिए, देश के लिए, सही के लिए खड़े हो सकें।
अलोकतांत्रिक कानून एससी-एसटी एक्ट हो या लगातार जातीय आरक्षण देने का मसला, आपही के चुने इन सभी सवर्ण सांसदों-विधायकों की इसमें सहमति रही है।
ऐसा क्यों? क्योंकि आप इन्हें तब भी वोट देते हैं जब ये आपके खिलाफ हो रही साजिशों में शामिल होते हैं।
यकीन कीजिए, इन्हें आपके होने पर भी आपके होने का जरा भी अहसास नहीं है। इन्हें बस देश में अल्पसंख्यकों, दलितों के ही होने का आभास है।
देश में हर दलित नेता दलितों के कथित हक के लिए उनके साथ खड़ा है। यहां तक कि दलित आंदोलन के नाम पर 2 अप्रैल को सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले, दर्जनभर हत्याएं करने वाले ‘निर्दोषों’ को भी मुकदमों से बरी किए जाने की मांग हो रही है। भाजपा के दलित सांसद, विधायक दलितों के लिए नेतृत्व से लड़ रहे हैं लेकिन सवर्णों के साथ कौन है? या कहें कि कौन है ऐसा जो कहें कि नहीं सभी देशवासी बराबर हैं? सवर्णों के साथ हो रही हकमारी पर सवर्ण नेताओं के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकल रहा जैसे मुंह पर टेप चिपका दिए गए हों। अबकी आएं चुनाव में तो जवाब ऐसा दीजिए कि मुंह से कुछ बोल न सकें जैसे कि चुने जाने के बाद न संसद में, न विधानसभा में ही आपके लिए इनकी आवाज निकल रही है…।
जान लीजिए यह सच कि आप देश में होकर भी अब तक अपने होने का आभास तक इन नेताओं को नहीं करा पाए हैं। अब एक बार खुद भी मान लीजिए कि आप देश में नहीं हैं। चूंकि अब तक होकर भी अपने होने का अहसास नहीं करा पाए हैं तो इस बार नहीं होकर अपने अस्तित्व का अहसास दिलाइए। दबाइए नोटा ताकि यह भी देखें कि जब आप इनके साथ नहीं होते हैं तब ये खुद कहाँ होते हैं। आज तक इन्हें चुनने के लिए वोट करते आए हैं, अब अपने लिए एक वोट कीजिए- नोटा! जातिवादी राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए, अपना और देश का अस्तित्व बचाइए।

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