हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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इस हालात में नोटा न दबाएं तो क्या करें?

यह कर्नल वीएस चौहान हैं। नोएडा के सेक्टर-29 में रहते हैं। इनके पड़ोस में एक महिला रहती हैं। पति एडीएम हैं बावजूद वह आज भी दलित ही हैं जैसा कि देश में अभी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि जाति देखकर कोई गरीब समझा जाता है और अपराध नहीं जाति देखकर सजा दी जाती है…। खैर!
पड़ोसियों से प्रायः किसी न किसी बात पर कुछ लोगों को दिक्कत रहती ही है तो कर्नल साहब से पड़ोसन को भी थी। बस, हिसाब चुकता करने के लिए पड़ोसन को एक्ट मिल गया और उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल भी किया। कर दीं कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का केस। और साथ में एससीएसटी तो लगना ही है…। और यह एक्ट लगने के बाद कुछ बचत है क्या? अग्रिम जमानत कहाँ मिलनी है? और गिरफ्तारी से पहले जांच की कहाँ जरूरत है? … तो देश की सेवा करने वाले 75 वर्षीय कर्नल साहब जेल भेज दिए गए।
केस दर्ज होने की घटना एक सप्ताह पुरानी है। तब हमने अपने साथियों से इस बात का जिक्र किया था कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी को भी दलित ही समझा जाना चाहिए? सबने कहा कि जब तक आधार जाति है तब तक तो समझना ही पड़ेगा…!
आज Anurag भाई की पोस्ट पढ़ी तो पता चला कि केस झूठा था। सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरे ने पोल खोल दी है। पता चला है कि कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का आरोप लगाने वाली महिला ने खुद ही उनकी पिटाई की थी। बेचारे 75 बरस के हैं, पिट गए। अब वह सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रही है…।
कर्नल साहब तो पूर्व सैनिकों की पैरोकारी और सीसीटीवी के दम पर छूट गए हैं, लेकिन अन्य का क्या होगा? अब यह सबकुछ देखने-जानने के बाद नोटा के अलावा कुछ सूझता है क्या?

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… क्योंकि योग्य भारत चाहिए, न कि आरक्षित भारत

बिहार में जदयू ने कहा है कि सवर्णों को भी आरक्षण मिले। इसके पहले लोजपा के राम विलास पासवान यह बात कह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती भी बोल चुकी हैं। और तो और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भी 10% का झांसा दे रही थी…।

दरअसल इन नेताओं-दलों के पास आरक्षण के अलावा देने को कुछ है भी नहीं। यह कभी जाति के नाम पर एक्ट देंगे, कभी आरक्षण। कभी धर्म के नाम पर भड़काएंगे, कभी जाति के नाम पर देश की एकता को आग लगाएंगे। दलित सड़क पर आएगा तो उसे जातिवादी एक्ट का लॉलीपॉप थमाएँगे और जब सवर्ण इसके खिलाफ खड़ा होगा तो उसे आरक्षण देने की बात कहकर भरमाएँगे।

गजब का संविधान है, लोकतंत्र है और शासन है। किसी में कोई तालमेल नहीं। संविधान में दिए धर्म निरपेक्षता, समानता, मौलिक अधिकारों को मजाक बना दिया है इन नेताओं ने। संविधान में सब समान लेकिन हकीकत में दलित से ब्राह्मण तक, हिन्दू से मुस्लिम तक … सिर्फ धर्म-जाति की ही बात। देश के नागरिकों की योग्यता गई तेल लेने। यह गजब का विरोधाभास है कि देश में योग्य युवाओं के लिए किसी दल, सरकार के पास कुछ नहीं है और ख्वाब देश को पुनः विश्व गुरु बनाने का है। हर नेता, दल, सरकार के पास बस कुछ खास धर्म-जातियों के लिए योजनाएं (साजिश) हैं…।

चेतने का यही समय है। वोट के लिए देश और देशवासियों के हित से खेलने का यह खेल अब बन्द होना चाहिए। धर्म-जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण, कानून, सहूलियत हर चीज का विरोध होना चाहिए। यह जातिगत आरक्षण इस समय का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है जो हर क्षेत्र में योग्य युवाओं के रहते हुए भी अयोग्य को मौका देता है और समस्त देश को अयोग्य के हाथ में सौंपता है, उसे कमजोर बनाता है…। इसी तरह एससी-एसटी जैसा जातिवादी एक्ट कुछ खास जातियों को प्रश्रय देता है और बाकी जातियों के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार को कुचलता है…।

इस तरह के धार्मिक-जातिगत तुष्टीकरण, राजनीति, कानून सभी के खिलाफ नोटा को हर वह व्यक्ति हथियार बनाए जो एक डिजर्व इंडिया चाहता है, न कि रिजर्व। नोटा से यह संदेश दीजिए कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब धर्म-जाति का तुष्टीकरण और बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक के नाम पर देश हित से खिलवाड़ और नहीं। एक देश-एक संविधान-एक नियम-कानून से कम कुछ नहीं।

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देश से सवर्णों को मिटाने की राजनीति !

उत्तर प्रदेश में मायावती ने नारा दिया था— तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। तिलक माने कि ब्राह्मण। तराजू माने कि बनिया और तलवार यानी कि क्षत्रिय। इन सभी को जूते मारो!
क्या बात है! इतनी नफरत? एक दलित नेता साफ तौर पर सवर्णों को जूते मारने के लिए कह रही है और सभा में दलित तालियां बजा रहे हैं। बजाएं भी क्यों नहीं इन्हें बताया गया है कि 1000 वर्षों तक सवर्णों ने इनका शोषण किया है। कमाल की बात है कि दलितों के मन में सवर्णों के प्रति नफरत भरकर, सवर्णों को जूते मारने की बात कहकर ये नेता कहते हैं कि दोनों एक थाली में क्यों नहीं खाते?
हम मानते हैं कि कभी धर्म की खामियों के कारण दलितों को नुकसान हुआ था, किंतु अब भी यदि सवर्ण और दलित एक थाली में नहीं खा पा रहे तो उसकी असली वजह यह दलित राजनीति ही है…।
अच्छा! कमाल की बात यह भी है कि जो मायावती दलितों की ब्रांडेड नेता हैं, वह सवर्णों को जूते मार सकती हैं। फिर भी दबंग कौन? शोषक कौन जूते खाने वाला सवर्ण ही न! और शोषित कौन? जूते मारने वाली मायावती न!
जिस तरह खुलेआम सवर्णों को जूते मारने की बात की जाती है, यदि दलितों को कह दी जाए तो? बवाल मच जाएगा न? गाली पर ही गिरफ्तारी है, जूते पर क्या होगा? लेकिन, कितना आसान है सवर्णों को जूते मारना…।
यह कुछ जातियों को खुलेआम जूते मारने की बात कहना— क्या इससे बड़ा भी कोई मनुवाद हो सकता है? क्या मायावती से बड़ा कोई मनुवादी है? इसके बाद भी मनुवादी कौन है— सवर्ण! कितनी अजीब बात है कि इस तरह के मनुवादी नेता खुद को ​दलित, शोषित, पिछड़ा बताते हैं और देश का संविधान तक मान लेता है? सिर्फ जाति के कारण। इतनी दुर्भावना! ओह! 1000 वर्षों का शोषित, सताया समाज है, यह तो जूते मार ही सकता है…।
बिहार में लालू प्रसाद ने कहा था— भूरा बाल साफ करो। भू यानी भूमिहार, रा यानी राजपूत, बा यानी ब्राह्मण और ल यानी लाला—कायस्थ। भूरा बाल साफ करो यानी कि सवर्णों को साफ कर दो। इस तरह किसी और जाति को साफ करने की बात कभी किसी नेता ने कही है? कही जा सकती है? कह दे तो? बवाल मच जाएगा न? लेकिन, सवर्णों को साफ करने की बात कोई भी कह सकता है! और गजब की बात है कि फिर भी दबंग कौन है? शोषक कौन है? सवर्ण!
सवर्णों को सीधे साफ करने, मार देने की बातें मंचों से हो रही है लेकिन कहीं कोई एफआईआर नहीं! कोई गिरफ्तारी नहीं! कोई हो-हल्ला नहीं! सवर्ण मारा भी जाए तो कोई बात नहीं क्योंकि यह समाज 1000 वर्षों का ऐतिहासिक शोषक है। सवर्ण तो कहे भी कि उसे किसी ने गाली दी है तो नहीं माना जाएगा। उसे कोई गाली कैसे दे सकता है? और गाली दे भी दे तो उसे लग कैसे सकता है? गाली तो सिर्फ कथित दलित, पिछड़ों को आहत करती है…।
दलित, पिछड़ी राजनीति के नाम पर इस समय देश में सवर्णों के खिलाफ खुलेआम जहर बांटा जा रहा है। कभी सीधे—सीधे सवर्णों को साफ करने की बात कहकर तो कभी दलितों को खुश करने के लिए उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण, नौकरी, प्रोन्नति देकर। देश में सवर्णों को साफ करने की बात ही नहीं कही जा रही, इसके लिए बकायदा इंतजाम किए जा रहे हैं। धीरे—धीरे सबकुछ सवर्णों से छीना जा रहा है। पहचान के लिए बस अब मताधिकार ही रह गया है जो बताता है कि सवर्ण इस देश का नागरिक है। इसके बाद भी उसके लिए कहीं कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि सबको बताया गया है कि सवर्ण 1000 वर्षों का शोषक समाज है।

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पॉलीथिन बिकता रहेगा जब तक नीति और नीयत दोनों सही नहीं होगी…

नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में शपथपूर्वक कहा था कि गलती मुझसे भी हो सकती है लेकिन गलत नीयत से कोई काम नहीं करूंगा…।
दरअसल, यही नहीं हो पाता। सरकारों से गलतियां तो होती ही हैं, गलत नीयत भी खूब होती है। बल्कि, गलतियों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार नेताओं या सरकारों की गलत नीति नहीं, बल्कि गलत नीयत ही होती है। यह बात न तो किसी एक नेता पर लागू होती है और न ही किसी एक दल या सरकार पर; हमाम में सभी नंगे हैं…।
बात अभी उत्तर प्रदेश में पॉलीथिन बैन की हो रही है। सरकारी दावा है कि 15 जुलाई से प्रदेश में पॉलीथिन नजर नहीं आएगा। यह दावा नया नहीं है। योगी आदित्यनाथ से पहले ही यह दावा अखिलेश यादव कर चुके हैं। यूपी में वर्ष 2000 से ही पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है लेकिन चूंकि नीयत नहीं है इसलिए सरकार भले बदल गई लेकिन हालात वही हैं…।
हां, तो कैसे जानें कि किसी सरकार या नेता की नीयत है कि नहीं? है तो क्या है? क्योंकि नीति क्या है, यह तो सरकार खुद ही स्पष्ट कर देती है लेकिन नीयत वह छुपा ले जाती है। सवाल है कि नीयत जानें कैसे? हम बताते हैं…। आप अपनी आंख, कान, दिल, दिमाग को धर्म—जाति—नेता—दल आदि के मोह—माया से मुक्त कर सबसे पहले एक नागरिक बन जाइए। एक नागरिक के रूप में नेता की नीति का अध्ययन कीजिए, आपको उसकी नीयत साफ पता चल जाएगी। आपको पता है? जब कोई संपादक किसी पत्रकार की कॉपी पढ़ता है तो उसे सिर्फ खबर ही पता नहीं चलती है, उस खबर को लिखने का उद्देश्य भी पता चल जाता है, पत्रकार की नीयत भी पता चल जाती है…। आप पाठक तो हैं ही, सरकार की नीतियों का संपादक बन जाइए।​ फिर देखिए, आप बड़े आराम से नेता की नीति के जरिये उसकी नीयत तक पहुंच जाएंगे, जैसे कि संपादक खबर के जरिये उसके उद्देश्य तक पहुंच जाता है…।
हां तो पॉलीथिनमुक्त उत्तर प्रदेश की बात। बिल्कुल संभव है लेकिन तब जब नीयत हो। चूंकि नीयत में खोंट है इसलिए पॉलीथिमुक्त प्रदेश की कल्पना अभी बेमानी है।
ठेले—खोमचे पर पॉलीथिन में सब्जी बेचने वाले से पन्नी छीनी जा रही है और वजन देखकर जुर्माना भी ठोंका जा रहा है। इससे क्या होगा? पब्लिक तो तैयार ही नहीं, अपने घर से बैग ले जाने के लिए, बेचारा वह ठेले वाला क्या करे? क्या ठेले वाला वह गरीब आदमी उस पन्नी को बनाता है? यदि वह पन्नी नहीं बने तो? फिर जहां वह पन्नी बनती है, वह फैक्ट्री ही क्यों नहीं सीज कर दी जाती? यदि कर दी गई तो? फिर तो ठेले तक पॉलीथिन पहुंच ही नहीं पाएगा। फिर? फिर सरकार क्या करेगी? इतने अधिकारी बहाल किए हैं, वे क्या करेंगे? जिन अधिकारियों ने, जिन पुलिस वालों ने मूल वेतन के साथ ऊपरी आमदनी का ख्वाब देखकर सरकारी नौकरी ज्वाइन की है, उनका क्या होगा? भाई! यह सबकुछ यूंही चलता रहे, इसके लिए पॉलीथिन हमेशा बिकता रहेगा और जनता को शासन—प्रशासन का कुछ काम भी दिखता रहे, इसलिए प्रदेश को पॉलीथिनमुक्त किए जाने का कथित प्रयास भी चलता रहेगा।
यह सबकुछ साथ—साथ चलता है…। हर सरकार में चलता है। वैसे ही, जैसे दारू दुकानों को लाइसेंस देने का काम और नशामुक्ति का अभियान साथ—साथ चलता रहता है…। जैसे, रेप पर सख्त कानून बनाने और अपनी सरकार, अपने दल के आरोपियों को बचाने का काम साथ—साथ चलता रहता है…। यह समझ जाइएगा तो नीति और नीयत का अंतर भी समझ जाइएगा। यह नीति और नीयत वही दो पटरियां हैं जो दिखने में तो साथ—साथ चलती हैं लेकिन हकीकत में कहीं मिलती नहीं। इन्हीं पटरियों पर भारतीय राजनीति की रेलगाड़ी दौड़ती है…।
पिछले वर्ष 15 जून तक ही उत्तर-प्रदेश की सड़कों के सभी गढ्ढे भर लिए जाने थे, भरे गए? इसी तरह 15 जुलाई तक पॉलीथिन भी बंद नहीं होगा, आगे भी बिकता रहेगा…। यह सबकुछ यूंही चलता रहेगा… तब तक, जबतक कि सही नीति के साथ सही नीयत न हो …।

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