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… क्योंकि योग्य भारत चाहिए, न कि आरक्षित भारत

बिहार में जदयू ने कहा है कि सवर्णों को भी आरक्षण मिले। इसके पहले लोजपा के राम विलास पासवान यह बात कह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती भी बोल चुकी हैं। और तो और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भी 10% का झांसा दे रही थी…।

दरअसल इन नेताओं-दलों के पास आरक्षण के अलावा देने को कुछ है भी नहीं। यह कभी जाति के नाम पर एक्ट देंगे, कभी आरक्षण। कभी धर्म के नाम पर भड़काएंगे, कभी जाति के नाम पर देश की एकता को आग लगाएंगे। दलित सड़क पर आएगा तो उसे जातिवादी एक्ट का लॉलीपॉप थमाएँगे और जब सवर्ण इसके खिलाफ खड़ा होगा तो उसे आरक्षण देने की बात कहकर भरमाएँगे।

गजब का संविधान है, लोकतंत्र है और शासन है। किसी में कोई तालमेल नहीं। संविधान में दिए धर्म निरपेक्षता, समानता, मौलिक अधिकारों को मजाक बना दिया है इन नेताओं ने। संविधान में सब समान लेकिन हकीकत में दलित से ब्राह्मण तक, हिन्दू से मुस्लिम तक … सिर्फ धर्म-जाति की ही बात। देश के नागरिकों की योग्यता गई तेल लेने। यह गजब का विरोधाभास है कि देश में योग्य युवाओं के लिए किसी दल, सरकार के पास कुछ नहीं है और ख्वाब देश को पुनः विश्व गुरु बनाने का है। हर नेता, दल, सरकार के पास बस कुछ खास धर्म-जातियों के लिए योजनाएं (साजिश) हैं…।

चेतने का यही समय है। वोट के लिए देश और देशवासियों के हित से खेलने का यह खेल अब बन्द होना चाहिए। धर्म-जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण, कानून, सहूलियत हर चीज का विरोध होना चाहिए। यह जातिगत आरक्षण इस समय का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है जो हर क्षेत्र में योग्य युवाओं के रहते हुए भी अयोग्य को मौका देता है और समस्त देश को अयोग्य के हाथ में सौंपता है, उसे कमजोर बनाता है…। इसी तरह एससी-एसटी जैसा जातिवादी एक्ट कुछ खास जातियों को प्रश्रय देता है और बाकी जातियों के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार को कुचलता है…।

इस तरह के धार्मिक-जातिगत तुष्टीकरण, राजनीति, कानून सभी के खिलाफ नोटा को हर वह व्यक्ति हथियार बनाए जो एक डिजर्व इंडिया चाहता है, न कि रिजर्व। नोटा से यह संदेश दीजिए कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब धर्म-जाति का तुष्टीकरण और बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक के नाम पर देश हित से खिलवाड़ और नहीं। एक देश-एक संविधान-एक नियम-कानून से कम कुछ नहीं।

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यह राहुल का दलित प्रेम है या सवर्ण घृणा…?

इस समय देश में दलित राजनीति की बयार बह रही है। कभी—कभी तो ऐसा लगता है कि मानो देश में कोई और वर्ग रहता ही न हो। बस दलित—दलित—दलित। आज राहुल गांधी भावुक भी हो गए। हमें तो लगा कि कथित दलितों का कथित दर्द देखकर कहीं रो ही न पड़े। इतने मासूम हैं कि बिना जांच ही सवर्णों की गिरफ्तारी का कानून बनने के बाद भी डरे हुए हैं कि कहीं दलितों का शोषण न हो जाए। इनके हिसाब से यह एक्ट अभी उतना प्रभावी नहीं है। शायद, इसमें फांसी का प्रावधान चाह रहे हों! खैर…।
राहुल गांधी की राजनीतिक सोच और समझ कितनी है, इस पर तो किसी बहस की गुंजाइश ही नहीं रह गई है लेकिन इनकी मंशा क्या है, इस पर चर्चा जरूरी है। खासकर तब जबकि इन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर रखा है। ऐसे में जरूरी है जानना कि विपक्ष में होकर भी जो व्यक्ति समस्त देश की चिंता नहीं कर पा रहा; किसी एक खास वर्ग, खास जाति पर ही फिदा हुआ जा रहा है वह प्रधानमंत्री बना तो क्या करेगा!
देश के प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है कि वह हर नागरिक को वैसे ही एक समान समझे जैसे कि कोई पिता अपने सभी बच्चों को समझता है। वह आगे बढ़ने वाले बच्चे को प्रोत्साहित करे, गलत करने वाले को डांटे, कमजोर बच्चे को बल प्रदान करे। वह सबको स्कूल भेजे, सबको उसकी क्षमता के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने और उसे प्राप्त करने में मदद करे। प्रधानमंत्री ऐसा हो जो नागरिकों की धर्म—जाति न देखे। उन्हें एक जैसा समझे। खैर…।
राहुल गांधी कल जंतर मंतर पर दलितों और जनजातीय समुदाय द्वारा आयोजित एक रैली में बोल रहे थे। कहा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस न्यायाधीश को दोबारा नौकरी देकर सरकार की दलित विरोधी मानसिकता पर मुहर लगा दी है जिन्होंने दलितों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के प्रावधान वाले अधिनियम को कमजोर करने के आदेश पारित किए थे। मोदी दलित विरोधी हैं…।
बस यह बयान काफी है राहुल गांधी की मंशा जाहिर करने के लिए। यदि राहुल गांधी दलितों के दर्द से आहत थे तो उनकी पीड़ा अब तक दूर हो जानी चाहिए थी क्योंकि एससी—एसटी कानून में बिना जांच ही सवर्ण की गिरफ्तारी का प्रावधान कर दिया गया है। अब इससे अधिक क्या होगा? लेकिन नहीं, उन्हें दलितों को आकर्षित करना है तो इसके लिए इससे भी आगे जाकर शायद सवर्णों से बैर साधना चाह रहे हैं। अब उन्हें वह न्यायमूर्ति तक पसंद नहीं, जिन्होंने इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कही थी। यानी, एक तरह से सवर्णों को कुछ हद तक राहत दी थी।
न्यायमूर्ति एके गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने 20 मार्च को अपने आदेश में एससी—एसटी एक्ट के राजनीतिक या निजी कारणों के लिए दुरुपयोग किए जाने की बात कही थी जो कि बिल्कुल सत्य थी। दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा था कि आगे से इस अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करनी होगी और अग्रिम जमानत भी दी जा सकेगी। इसी के बाद 2 अप्रैल को देशभर में आंदोलन के नाम पर हिंसा की आग भड़की और इस आग में नेताओं ने जमकर दलित राजनीति की रोटियां सेंकीं। इसी हंगामे के बाद भाजपा सरकार ने एक्ट में संशोधन किया ताकि उसका दलित वोट बैंक न खिसके। अब राहुल इस एक्ट को भी निष्प्रभावी बता रहे हैं ताकि इनका वोट बैंक न खिसके।
बता दें कि न्यायमूर्ति एके गोयल 6 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हो गए और उसी दिन राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के चेयरमैन नियुक्त हुए। राहुल गांधी को इसी से दिक्कत है। यह राहुल का कमाल का दलित प्रेम है कि किसी न्यायाधीश ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बात करते हुए इतना ही कह दिया कि एससी—एसटी एक्ट में बगैर जांच गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए तो वे चाहते हैं कि अब वह भूखो मर जाए, उसे नौकरी से निकाल दी जानी चाहिए या फिर कभी, कहीं नौकरी न दी जाए।
यानी, इनकी चले तो इस देश में सिर्फ सवर्णों की ही नौकरी पर रोक नहीं लगनी चाहिए, बल्कि हर उस शख्स की नौकरी—प्रोन्नति रोक दी जानी चाहिए जो सवर्णों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाए। यह दलित प्रेम है या सवर्णों के प्रति इनकी घृणा? क्या समझें?
राहुल या कोई भी नेता यदि सच में किसी दलित पर हुए जुल्म के खिलाफ खड़ा हो तो स्वागत है। जिस किसी दलित पर कोई भी अत्याचार हो, जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसे जेल भेजा ही जाना चाहिए, इसका स्वागत है। यहां तो यह भी दरियादिली दिखाई गई है कि बिना जांच ही जेल होगी। होना तो यह चाहिए कि धर्म—जाति के आधार पर कानून ही न बने लेकिन वोट बैंक की राजनीति में पड़कर भाजपा ने इतनी दरियादिली दिखा ही दी है तो राहुल की दलितों के प्रति दरियादिली तो इससे आगे बढ़कर सवर्ण घृणा तक पहुंचनी ही चाहिए।
दरअसल, जिस तरह इन नेताओं ने लगातार आरक्षण के जरिये एक समाज को बैसाखी की आदत लगा दी है, ये खुद भी दलितों की बैसाखी के सहारे राजनीति करने के आदी बन चुके हैं। इनकी गंदी राजनीति के चलते विविधताओं का देश, हजारों जातियों का देश, दो-चार जातियों पर सिमट गया है। इस तरह धर्म-जाति के नाम पर देश को बांटने की राजनीति करने वाले राहुल ही नहीं, हर नेता के खिलाफ खड़े होने का वक्त है। चुनाव में बेहतर विकल्प न मिले तो नोटा दबाइए लेकिन किसी जातिवादी नेता के हाथ में देश की तकदीर बिल्कुल न सौंपिए। सबसे पहले राजनीति से जाति को खत्म कीजिए। तभी यह देश भी बचेगा और सम्पूर्ण समाज भी।

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पाकिस्तान में इमरान तो भारत में…?

पाकिस्तान में कल हुए आम चुनाव का आज परिणाम आ रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीति के खिलाड़ी बने इमरान खान की पार्टी तहरीक—ए—इंसाफ (पीटीआई) देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई साफ नजर आ रही है वहीं जेल में बंद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएलएम-एन) दूसरे नंबर पर चल रही है। चुनाव परिणाम इससे थोड़ा ही इधर—उधर होगा। पीटीआई को पूर्ण बहुमत न मिला तो भी गठबंधन कर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो ही जाएंगे…।
यूं तो इमरान पाकिस्तान की जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता हैं लेकिन वह खुद कितने लोकतांत्रिक हैं, इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में, यदि अलोकतांत्रिक विचारों वाले इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत—पाक में शांति वार्ता जैसी कोई चीज रह जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। युद्ध की संभावना न हो तो भी सीमा पर घुसपैठ बढ़नी तय है क्योंकि पाकिस्तान में सेना की सत्ता नहीं होगी तो भी इमरान के रूप में कमोबेश उसका ही नेतृत्व होगा।
अब ऐसे में, 2019 में होने वाले चुनाव में भारत को ऐसा प्रधानमंत्री देना होगा जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देना जानता हो। जो इतना उतावला न हो कि देश को बेमतलब युद्ध की आग में झोंक दे लेकिन इतना कायर भी न हो कि घुसपैठ बर्दाश्त करता रहे, आतंकी गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहे।
भारत में वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के लिए दो ही उम्मीदवार सामने हैं। एक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी।
नरेंद्र मोदी अपने वादे पर काफी हद तक खरे नहीं उतर पाए हैं। आतंक के मुद्दे पर बात करें तो सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही दिखता है। खासकर, कश्मीर मुद्दे पर तो मोदी अपना कोई वादा नहीं निभा पाए। न कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने का और न ही धारा 370 हटाने का। इतना ही नहीं, रमजान में मुस्लिम तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए मोदी सरकार ने ऐसा निर्णय लिया जिससे सैनिकों को बिना लड़े ही मौत के मुंह में समा जाना पड़ा। सरकार ने देशद्रोहियों से केस वापस लिए और जिन पर केस चल रहे हैं, उनमें अधिकतर मामले में अभी तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं करा पाई। राफेल डील में विपक्ष के कुतर्कों को छोड़ दें तो सही सवालों का भी जवाब दे पाने में मोदी असफल रहे हैं। वह नहीं बता पा रहे कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसी कंपनी से करार किया जा रहा, जो अनुभवहीन है। कई मसले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह सरकार देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने में नाकाम है…।
राहुल गांधी की बात करें तो नरेंद्र मोदी से तुलना करने के लिए उनका कोई कार्यकाल तो नहीं है, लेकिन उनके विचार और व्यवहार सामने हैं जिसे देखकर कतई नहीं लगता कि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो आतंक का करारा जवाब दे पाएंगे। यह मोदी सरकार की नाकामी है कि जेएनयू में देशविरोधी नारों की सच्चाई अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है लेकिन देशद्रोह का आरोप लगने के साथ ही आरोपितों के बचाव में उतर जाना बताता है कि राहुल गांधी कभी—कभी किस हद तक गिर सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कठुआ में कुछ लोग दुष्कर्म के आरोपितों के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह सही है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी करार न ​दे दिया जाए, वह दोषी नहीं है लेकिन यदि वह आरोपित भी है तो संदिग्ध तो है ही। ऐसे व्यक्ति का बचाव, उसके गुनाह पर पर्दा डालना ही है। इस तरह आतंकियों, देश द्रोहियों से मुकाबले के मामले में मोदी की अपेक्षा राहुल का व्यवहार अधिक संदिग्ध दिखता है।
बात सच्चाई की करें तो मोदी और राहुल दोनों ही कई बार झूठ बोल चुके हैं। मोदी चुनावी सभाओं में झूठ बोलते हैं लेकिन राहुल ने तो पिछले दिनों राफेल डील मुद्दे पर भरी संसद में ही झूठ बोला, वह भी तब जबकि यह डील कांग्रेस ने ही की थी।
अब बात यदि व्यवहारिक समझ, ज्ञान की करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी मोदी के सामने दूर—दूर तक नहीं टिकते। डिग्री किसकी सही है, यह तो जांच में ही सामने आएगा लेकिन पढ़ार्इ ठीक से नहीं की है राहुल ने यह बार—बार वह खुद साबित कर चुके हैं। मोदी का तो इतिहास ज्ञान ही अनूठा है लेकिन राहुल का व्यवहारिक ज्ञान भी। पिछले दिनों वे नहीं बता पाए कि एनसीसी क्या है? हद है, इस देश में रहकर राहुल एनसीसी नहीं जानते। ऐसा कई बार हुआ है, जब राहुल की अज्ञानता साफ झलकी है और ताज्जुब है कि इसे दूर करने के लिए वह कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। शायद, इसकी उन्हें जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाने वाली उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति है।
अब बात यदि राजनीतिक अनुभव की करें तो कुछ कहना ही नहीं है…। जितनी उम्र है राहुल की, कमोबेश उतना अनुभव है मोदी का। राहुल में यही खूबी हैं कि वह युवा है लेकिन कार्य करने की उर्जा मोदी में उनसे भी अधिक है।
भ्रष्टाचार की बात करें तो न तो स्पष्ट रूप से मोदी के बारे में ही ऐसा कहा जा सकता है और न ही राहुल के बारे में ही लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों पर ही कई आरोप लग चुके हैं। बड़ी बात है कि राहुल गांधी हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं और उसकी सुनवाई चल रही है जबकि मोदी पर अभी तक अधिकतर आरोप, आरोप ही हैं। जिस दंगे के लिए उनकी छवि खराब की गई या जिसकी बदौलत वह इतने बड़े नेता बने, उस मामले में भी वह बरी हो चुके हैं।
इस तरह मेरा निजी विचार है कि 2019 में यदि दोनों में से किसी को न चुनना पड़े तो सबसे अच्छा लेकिन यदि कोई तीसरा चेहरा सामने नहीं आता है, और चुनाव राहुल व मोदी में से ही किसी का करना पड़ता है तो मौका नरेंद्र मोदी को ही देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो हम ऐसी स्थिति में नोटा ही दबाएंगे क्योंकि राहुल से हमें कोई उम्मीद नहीं और मोदी ने उम्मीदों को तोड़ा है।

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