रेपिस्तान… फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

यह सही है कि रेप की कुछ घटनाओं के कारण देश वैसे ही रेपिस्तान नहीं कहा जा सकता जिस तरह कुछ ही अच्छी चीजों का उदाहरण प्रस्तुत कर इसे देवलोक नहीं कहा जा सकता, इसे रामराज की संज्ञा नहीं दी जा सकती…। जम्मू-कश्मीर के आइएएस शाह फैजल को रेपिस्तान जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था लेकिन यदि उन्होंने कहा है तो सरकार को भी इतना बुरा नहीं मानना चाहिए जबकि वह रेप की घटनाएं रोकने में ही नहीं, दोषियों को सजा देने तक में विफल है।
फैजल का ट्वीट है- 

“आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने रेपिस्तान पैदा कर दिया है।”

इस ट्वीट में यदि रेपिस्तान शब्द पर आपत्ति को छोड़ दें तो बाकी गलत क्या है, यह मेरी समझ से बाहर है। और यदि यह सारे कारण मिलते हैं तो इनसे रेपिस्तान का निर्माण हो रहा है, तो यह तर्क भी कहां गलत है? हो सकता है कि एक लोकसेवक होने के कारण फैजल को ऐसा ट्वीट नहीं करना चाहिए था लेकिन एक नागरिक के नाते तो वह कर ही सकते हैं न! क्या लोकसेवक एक नागरिक नहीं होता? क्या देश में अभिव्यक्ति की आजादी जैसा कुछ नहीं होता! क्या यह संविधानप्रदत्त अधिकार नहीं है? सरकार ने महज एक ट्वीट पर नोटिस भेज दिया है कि लोकसेवक को यह व्यवहार शोभा नहीं देता पर क्या सरकार को लोकसेवक के प्रति, देश के नागरिक के प्रति यह व्यवहार शोभा देता है? सबसे बड़ी बात तो यह कि फैजल के ट्वीट में कहीं भी सरकार का जिक्र नहीं है। फैजल ने सरकार की निंदा नहीं की है, बल्कि रसातल में जा रहे भारतीय समाज की चिंता की है। फैजल ने रेप के लिए जो कारण दिए हैं, उसके लिए भी सरकार से अधिक समाज ही कठघरे में है। इस तरह यह कहीं से भी सरकारविरोधी ट्वीट नहीं है लेकिन चूंकि सरकार अपनी नाकामियों के कारण हीन भावना से ग्रसित है इसलिए उसे कहीं से भी उठती कोई आवाज अपने विरुद्ध ही प्रतीत हो रही है। यदि सरकार अपना दिल बड़ा करे और रेप रोकने की दिशा में कुछ काम करे तो फैजल ने तो उसकी राह आसान ही की है। रेपमुक्त भारत ही नहीं, अपराधमुक्त भारत बनाने की राह। खुद मेरी नजर में भी रेप या अपराध के बड़े कारणों में सबसे उल्लेखनीय कारण यही हैं जो फैजल ने बताए हैं। इस ट्वीट के लिए फैजल को दंडित करने की बजाय, इनके सुझाए गए कारणों पर चिंतन कर इस दिशा में सरकारी और सामाजिक स्तर पर प्रयत्न किए जाने की जरूरत है।
फैजल ने सबसे पहले आबादी का जिक्र किया है। सोचकर देखिए, बढ़ती आबादी रेप ही नहीं, हर समस्या के लिए जिम्मेदार है; किसी के लिए कम तो किसी के लिए ज्यादा। यदि परिवार में पांच-छह बच्चे हों तो सबपर माता-पिता ठीक से ध्यान नहीं रख पाते, उन्हें शिक्षित, संस्कारित नहीं कर पाते। शिक्षाविहीन, संस्कारहीन नागरिक कैसा होगा? परिवार से आगे निकल यदि हम देश की बात करें तो सरकार खुद भी अक्सर बढ़ती आबादी का रोना रोती रहती है कि ‘इतने बड़े देश में सभी को रोजगार दे पाना मेरी तो क्या, किसी के वश की बात नहीं है।’ अब यदि सरकार के बूते में हर व्यक्ति को रोजगार देना नहीं है तो बेरोजगार आदमी करेगा क्या? अपराध ही तो करेगा?
सवाल उठता है कि जब सरकार को भी अच्छी तरह पता है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में वह सबको आवास, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार आदि मुहैया नहीं करा सकती तो वह इस देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए ही क्या प्रयास कर रही है? 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी एक अरब 21 करोड़ है, जो कि चीन से महज 10 करोड़ ही कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व की कुल आबादी में अकेले भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी है, जबकि हमारे पास दुनिया का केवल चार फीसदी पानी और 2.5 फीसदी ही जमीन है। जाहिर है कि सच में इतनी बड़ी आबादी की जरूरतें कैसे पूरी की जा सकती है? और यदि नहीं की जा सकती तो इस आबादी को बढ़ने क्यों दिया जा रहा है? अब जबकि जनसंख्या विस्फोटक स्तर पर पहुंच चुकी है, सरकार “हम दो— हमारे दो” से आगे बढ़कर “हम दो— हमारे एक” का नारा क्यों नहीं देती? नारा छोड़िए, यह अध्यादेश क्यों नहीं लाती कि जिन वर्तमान कपल की एक से अधिक संतान होगी, उन संतानों को हर तरह के सरकारी लाभ से महरूम कर दिया जाएगा? हर साल करोड़ों की आबादी पैदा करने से अच्छा है कि जो देश की आबादी है, उसी के भरण—पोषण का सही इंतजाम हो। यह कब होगा? आबादी को नियंत्रित करने के उपाय करने की बजाय, आबादी को एक समस्या के रूप में सामने रखने वाले आइएएस अधिकारी का उपाय करना कितना सही है? क्या सरकार को यह मिर्ची इसलिए लगी है कि वह बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल है?
पितृसत्तात्मक समाज। यह दूसरा कारण बताया है फैजल ने। क्या गलत कहा है? देश में अभी 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हैं। अभी भी बेटियों की भ्रूण हत्या हो रही है। कोई नहीं चाहता कि उसके घर बेटी हो। हो गई तो बेटे का इंतजार। यूं किसी को एक भी बेटी नहीं चाहिए लेकिन बेटे के इंतजार में दो—चार भी हो जाए तो क्रम नहीं रोका जाता जब​तक कि बेटा न हो जाए। अब बेटे के इंतजार में हुई बेटियों की क्या कद्र होगी? शुरू से ही भेदभाव…। पालन—पोषण से लेकर पढ़ाई तक में। बेटी थोड़ी बड़ी हुई तो परिवार पर उसकी इज्जत बचा लेने की चुनौती। और बड़ी हुई तो शादी की चुनौती। क्या बेटे—बेटी के मोर्चे पर समाज में दोहराव नहीं है? क्या पितृसत्तात्मक समाज नहीं है? और यदि है तो गलत क्या कहा है फैजल ने?
शराब। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सबसे ताज़ा रिपोर्ट (2016) के अनुसार, 95 प्रतिशत अपराधी पीड़िता के जानने वाले होते हैं। मां से, ​बहन से, रिश्तेदार से, बच्ची से, बुजुर्ग से बलात्कार करने वाले अक्सर नशे में ही होते हैं। हवस में डूबा आदमी जब शराब में डूब जाता है तो वह आदमी से आदमखोर बन जाता है, और इसलिए उसे किसी की चीख में भी आनंद मिल रहा होता है। यदि नशे में दुष्कर्म का आंकड़ा जुटाया जाए तो मेरा दावा है कि यह साबित हो जाएगा कि रेप की अधिकतर घटनाएं नशे में अंजाम दी जाती हैं और शराब रेप का एक बड़ा कारण है; यह बात तो साबित हो ही चुकी है कि घरेलू हिंसा का सबसे बड़ा कारण शराब ही है। आप कुछ न कीजिए। आप एक सप्ताह के अखबार से रेप की घटनाएं एकत्रित कीजिए। फिर देखिए कि नशे में कितनी वारदात हुई और होश में कितनी। आंकड़ा सामने होगा। शराब या कोई भी नशा सिर्फ रेप ही नहीं, अधिकतर अपराध की वजह है। जब यह कोई छुपी हुई बात नहीं है तो इसे फैजल ने सार्वजनिक कह दिया तो क्या गलत कह दिया?
अश्लीलता…। इस पर चर्चा करते ही कथित प्रगतिशील पुरुष और नारियां बिदकने लगते हैं क्योंकि उन्हें डर लगने लगता है कि जिस अश्लीलता को उन्होंने प्रगति का आवरण देकर ढंका है, कहीं वह सामने न आ जाए। वह भी अश्लील ही हैं, कहीं समाज यह भी न जान जाए। अश्लील का मतलब है जो नैतिक व सामाजिक आदर्शों से च्युत है। जो गंदा है। अश्लील बातें हो सकती हैं, अश्लील दृश्य हो सकता है, अश्लील शब्द हो सकते हैं, अश्लील पहनावा हो सकता है, अश्लील आचरण हो सकता है…। अश्लीलता किसी व्यक्ति के अंदर की वह गंदगी है, जो दूसरे व्यक्ति के अंदर की गंदगी को हवा देती है, शह देती है, उसे भड़काती है…। सोचकर भी नहीं बताया जा सकता कि कौन—सा क्षेत्र ऐसा बचा है, जहां अश्लीलता नहीं है, जहां अश्लील लोग नहीं हैं। मीडिया, साहित्य, संगीत, फिल्म, टीवी, राजनीति, सरकार से लेकर समाज तक…। यह अश्लीलता इस हद तक फैल चुकी है कि अब तो कुछ भी अश्लील नहीं लगता। सबकुछ यह कहकर स्वीकार कर लिया जाता है कि अब इतना तो चलता ही है! ऐसे माहौल में जहां अश्लीलता समय की मांग लगने लगी है, अश्लील लोग मॉडर्न और प्रगतिशील समझे जाने लगे हैं, वहां एक और अश्लीलता— रेप और एक और अश्लील— रेपिस्ट की उत्पत्ति पर क्या आश्चर्य है?
तकनीक। यौन इच्छाएं अपनी पूर्ति के लिए हर युग में मौजूद संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करती हैं। जब तकनीक नहीं थी, तब मस्तराम किसने नहीं पढ़ा? जिसने नहीं पढ़ा, उसने रसभरी कहानियां पढ़ लीं। कुछ न मिला तो सरस सलील ही खरीद ली। लेकिन बस। इससे अधिक कुछ भी चारा नहीं था। जिसने छुपकर कुछ अश्लील पढ़ा भी तो यहीं तक, देखा भी तो यहीं तक, सीखा भी तो यहीं तक। और अब? अश्लीलता तक किसकी पहुंच नहीं है? अश्लीलता की कौन—सी हद बाकी है? कोई सीमा है? यह तो पूरी तरह बच्चे के विवेक पर है न कि वह मोबाइल का डाटा क्या देखने, क्या पढ़ने पर खर्च कर रहा है? कोई रोक—टोक है? किसी भी स्तर पर? माहौल का व्यापक असर पड़ता है लेकिन कैसा माहौल है यह? व्यक्ति जो सोचता है, धीरे—धीरे वही बन जाता है लेकिन कौन जानता है कि मोबाइल पर पोर्न देखने वाले किसी बच्चे से लेकर कोई बुजुर्ग तक क्या सोचता है? फेसबुक के जरिये तो किशोरों के आतंकी तक बन जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लगातार रेप के क्लिप देख—देखकर यदि वे रेपिस्ट बन रहे हैं तो क्या आश्चर्य है? इस पर क्या नियंत्रण जरूरी नहीं है? तो क्या गलत कह दिया है फैजल ने?
अराजकता। अभी हाल ही में दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल में अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान पर उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यहां अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं है। जाहिर है कि अराजकता अच्छी बात नहीं है। सवाल है कि अराजकता है क्या? अराजकता से आशय है, देश में सरकार का न होना या होते हुए भी न होने जैसी स्थिति हो जाना। एक ऐसी स्थिति जिसमें कोई व्यवस्था न रह जाए। अनार्की। … तो कुछ हद तक इसमें भी क्या गलत है? रेप हो जाने के बाद किस पीड़िता को किसी व्यवस्था के होने का अहसास होगा? जो सरकार किसी लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती; उसके होने या न होने का क्या मतलब है? क्या यह अराजकता नहीं है? सबसे चर्चित निर्भया मामले में भी अभी तक दोषियों को उनके कुकर्म की सजा सुनाई भर गई है, उस पर अमल नहीं हुआ है। यह कौन—सी स्थिति है? न्याय में देरी भी एक अन्याय है तो क्या अन्याय अराजकता नहीं है? एक लड़की सिर्फ इसलिए सड़कों पर न निकल पाए क्योंकि वह लड़की है तो क्या यह अराजकता नहीं है? ऐसी व्यवस्था जिसमें न तो रेप करने से पहले ही रेपिस्ट डरता है और न ही किसी की इज्जत व जिंदगी छीन लेने के बाद ही उसके कृत्य के अनुरूप उसे सजा हो पाती है, फांसी हो पाती है तो यह कौन—सी स्थिति है? क्या यह अराजकता नहीं है?क्या यह अराजकता रेप के लिए किसी भी हद तक जिम्मेदार नहीं है?
रेपिस्तान। यानी वह दुनिया, जिसकी पहचान ही रेप है। फैजल के अनुसार, वह दुनिया जिसे आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने गढ़ा है। अब जबकि अराजकता ही है तो रेपिस्तान पर भी क्या आपत्ति है? इस देश में जहां हर 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है, यह रेपिस्तान नहीं तो और क्या है? फैजल ने गलत क्या कह दिया है?