हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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आरक्षण के लिए क्या महज यह कह देना ही काफी है कि इस तबका का शोषण हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में आरक्षण पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था— यह तबका 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना झेल रहा है। एससी-एसटी पहले से ही पिछड़े हैं इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए अलग से किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है।
कमाल का तर्क है न कि प्रोन्न​ति में आरक्षण देने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है? यानी जाति काफी है! कैसे भी वोट लेना है तो कैसे भी आरक्षण दे देना है। अब सही बात तो कोर्ट में सरकार नहीं कह सकती न कि दलितों का एकमुश्त वोट वह आरक्षण देकर खरीद रही है? यह सच तो न अभी की सरकार कह सकती है, न पिछली इसलिए हर सरकार के पास यही तर्क है— 1000 वर्षों का शोषण! एससीएसटी एक्ट के पीछे भी शोषण से अधिक यही वोट बैंक की राजनीति है और आरक्षण या प्रोन्नति में आरक्षण के पीछे भी।
क्या कोई सरकार इस तरह बेशर्मी से कह सकती है कि आंकड़े की जरूरत ही नहीं है? माने मायावती दलित हैं, वह 1000 वर्षों से शोषित हैं, उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए? माने राम विलास पासवान दबे—कुचले हैं? उनके सुपुत्रों का आरक्षण मिलना चाहिए? माने जिस देश का दलित राष्ट्रपति है, उस देश में यह तर्क कि यह समाज 1000 वर्षों से प्रताड़ना झेल रहा है? माने जो तबका प्रताड़ना झेल रहा है, उस तबके का व्यक्ति राष्ट्रपति है? यह कैसा तर्क है? यह कैसी प्रताड़ना है?
सरकार यदि यह स्पष्ट नहीं कर सकती कि इस समाज को आरक्षण में प्रोन्नति देना क्यों आवश्यक है तो क्या यही स्पष्ट कर सकती है कि 1000 वर्षों तक इस समाज का शोषण किसने किया है? अभी तो 4 वर्षों से खुद यही सरकार है जो दुहाई दे रही है 1000 वर्षों से प्रताड़ित किए जाने का तो क्या मानें कि 1000 वर्षों में इन चार वर्षों में भी यह तबका प्रताड़ना ही झेलता रहा है? कमाल है कि देश को 1947 में आजादी मिल गई थी और इस दौरान 73 वर्षों तक इस तबका का शोषण होता रहा! शोषण की यह कहानी सुना—सुनाकर कब तक कुछ जातियों को सिरमौर और बाकियों को कुचलने का प्रयास चलता रहेगा? इसी शोषण की कहानी की बुनियाद पर आजाद भारत के संविधान में एससीएसटी समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया लेकिन क्या 10 बरस बीते नहीं? 7 बार 10 बरस बीत जाने के बाद क्या लक्ष्य की पूर्ति नहीं हुई? नहीं हुई तो क्यों? क्या इसके लिए भी सवर्ण जिम्मेदार हैं?
जाहिर है कि 1000 वर्षों में आजादी के साल भी शामिल हैं और इस लिहाज से सरकार यह नहीं कह सकती कि आजाद भारत में उसने भी इस तबका का शोषण किया है तो इसका सीधा मतलब है कि शोषण अगड़ी जातियां करती रही हैं। यानी, अपराधी सरकार नहीं, अगड़ी जातियां हैं। इसीलिए एससीएसटी एक्ट के जरिये कथित अगड़ी जातियों पर आपातकाल लागू करने में सरकार ने जरा भी विचार नहीं किया क्योंकि वह पहले से विचार कर चुकी है कि यह जातियां शोषक हैं। मगर इतिहास में इन जातियों ने कब एससीएसटी समाज का शोषण किया, क्या इसका कोई आंकड़ा है? या बस 1000 वर्षों तक के शोषण की गढ़ी गई कहानी से ही आगे भी यह देश चलता रहेगा? यह सरकार सबकुछ तय करती रहेगी?
शोषण तो कोई शासक ही कर सकता है न या उसके जैसा ही कोई अन्य ताकतवर? तो क्या कभी इतिहास में जाकर सरकार ने पता भी किया है कि कब अगड़ी जातियां सिर्फ राजा हुआ करती थीं, जब एससीएसटी तबका सिर्फ प्रजा हुआ करता था? आखिर ऐसा कौन—सा कालखंड था जब राजा कोई सवर्ण था और उसने अपनी सारी दलित प्रजा को जेल में डाल दिया था या उससे चक्की पिसवाई थी, उसका राशन—पानी बंद कर दिया था…। 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना का मतलब है 1018 से अब तक। यदि इतिहास पर नजर डालें तो इस दौरान मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक का शासन रहा। क्या मुगलों ने एससीएसटी समाज को अलग छांटकर उस पर जुल्म ढाया? क्या अंग्रेजों ने अलग से एससीएसटी समाज की पहचान कराई और उनपर अलग से अत्याचार किया? जिन शासकों ने भी जुल्म ढाया, भारतवासियों पर ढाया लेकिन प्रताड़ना का इतिहास सिर्फ इसी जाति का क्यों है? यदि एससीएसटी समाज के साथ ही यह सभी जातियां भी इस कालखंड में प्रताड़ित होती रही हैं तो यह झूठ क्यों रचा गया है? और इस झूठ के आधार पर कुछ जातियों को आगे बढ़ाने और अन्य सभी को प्रताड़ित करने के लिए सरकारी योजनाएं कब तक चलाई जाती रहेंगी? कब तक देशहित नहीं, कुछ जाति हित को ध्यान में रखकर सत्ता काम करती रहेगी?
1000 वर्षों का शोषण रटने वाली सरकार ने इतिहास पढ़ा ही नहीं है, ऐसा तो हो नहीं सकता तो यह तर्क एक साजिश ही तो है कि इस तबका का शोषण हुआ है इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण मिलना चाहिए?

सरकार के पास जब प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए यही तर्क है कि एससीएसटी समाज का 1000 वर्षों तक शोषण हुआ है और बाकी जातियों पर एससीएसटी एक्ट थोपने की पृष्ठभूमि भी शायद यही है तो हमें भी यह समझ लेना जरूरी हो गया है कि 1000 वर्षों में कब, किन ब्राह्मणों, राजपूतों, बनियों, कायस्थों, भूमिहारों या अन्य जातियों ने इस तबका को प्रताड़ित किया था। अब उन सभी के लिए 1000 वर्षों का इतिहास पढ़ना जरूरी हो गया है, जो इसी आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
1000 वर्ष यानी अब से 1018 तक। 1001 में महमूद गजनी ने भारत पर पहली बार आक्रमण किया था और पंजाब के शासक जयपाल को हराया। 1025 में उसने सोमनाथ मंदिर को विध्‍वंस कर दिया। आज शोषक समझकर हर अधिकार से वंचित की जा रहीं जातियां यदि उस समय इतनी सबल थीं कि एससीएसटी समाज का शोषण कर रही थीं तो यह जातियां मंदिर को विध्वंस होता क्यों ​देखती रहीं? क्या तब सनातन धर्म नहीं था? भगवा ध्वज नहीं था? क्या तब ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं थे? आज जो जातियां हैं, वह सभी तब भी थीं। आज जो भक्ति ईश्वर के प्रति है, वह तब भी थी लेकिन इन सबके बावजूद यदि प्रभु का घर मंदिर विध्वंस होता रहा तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि यह जातियां गजनी का सामना करने की स्थि​ति में नहीं थीं। यदि होतीं तो गजनी तभी गाज फेंक चुका होता। यह जातियां बाहर से आए आक्रमणकारियों का गुलाम न बन जातीं। कोई शौक नहीं था किसी को गुलाम बनने का। न तब, न अब।
1191 में तराई का पहला युद्ध हुआ। 92 में दूसरा युद्ध हुआ। 1206 में दिल्‍ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्‍याभिषेक हो गया। 1221 में भारत पर चंगेज खान ने हमला किया। 1236 में दिल्‍ली की गद्दी पर रजिया सुल्‍तान का राज्‍याभिषेक कर दिया गया। 1296 में अलाउद्दीन खिलजी का हमला हुआ। 1325 में मोहम्‍मद तुगलक का राज्‍याभिषेक हुआ। 1351 में फिरोजशाह का राज्‍याभिषेक किया गया। 1398 में तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया…
अभी जो सरकार खुद इतिहासकार भी बनी बैठी है, वह बताए तो सही कि इनमें से कौन ब्राह्मण था, राजपूत था, मनुवादी था? जिसके द्वारा शोषण किए जाने का आधार बनाकर देश में जाति के आधार पर आरक्षण से लेकर कानून तक पारित किया जा रहा है। बताइए न कि तब कहां थीं वह हिंदू जातियां, जो शोषण कर रही थीं? और कहां था वह तबका भी जो शोषित हो रहा था। देश को तो बाहरी आक्रांता लूटते जा रहे थे और देश का हर तबका देखता जा रहा था…।
1494 में फरघाना में बाबर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई हुई। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया। मुगल शासन की स्‍थापना की। 1527 में खानवा की लड़ाई हुई। बाबर ने राणा सांगा को हराया। 1530 में हुमायूं का राज्‍याभिषेक हुआ। 1539 में शेरशाह सूरी ने हुमायूं का हराया और भारत का सम्राट बना। 1540 में कन्‍नौज की लड़ाई लड़ी गई। 1555 में हुमायूं ने दिल्‍ली की गद्दी को फिर से हथिया लिया। 1556 में पानीपत की दूसरी लड़ाई लड़ी गई। 1565 में तालीकोट की लड़ाई हुई। 1576 में हल्‍दीघाटी की लड़ाई हुई। राणा प्रताप ने अकबर को हराया…।
हां! अब राणा प्रताप को मनुवादी कहा जा सकता है क्योंकि दलित या मनुवादी—सवर्ण—शोषक सबकुछ कहे जाने का आधार जाति है लेकिन गौर कीजिए कि राणा प्रताप ने भी एससीएसटी समाज को नहीं हराया, एक मुस्लिम शासक को हराया था। फिर शोषण कब, किसका, किसने किया?
1597 में राणा प्रताप की मृत्‍यु हो गई। 1600 में ईस्‍ट इंडिया कंपनी की स्‍थापना हुई। 1605 में अकबर की मृत्‍यु के बाद जहाँगीर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1627 में जहांगीर की मृत्‍यु हो गई। 1628 में शाहजहां भारत का सम्राट बना। 1659 में औरंगजेब का राज्‍याभिषेक हुआ। 1665 में औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया। शिवाजी इतने मजबूत होते तो कैद क्यों हो गए? और यदि हो गए तो प्रताड़ित तो शिवाजी हुए न? यह सारी लड़ाइयां जब लड़ी जा रही थीं तब वह समाज कहां था जो अभी स्वयं को मूल निवासी बता रहा है और बाकियों को बाहर से आया हुआ? यदि इन कथित मूल निवासी के अलावा सभी बाहरी थे तो बाहरी ही बाहरी से क्यों लड़ रहे थे? सभी बाहरियों को मिलकर तो मूल निवासियों पर शासन करना चाहिए था न?
1739 में नादिरशाह ने भारत पर हमला किया। 1757 में प्‍लासी की लड़ाई हुई। लॉर्ड क्‍लाइव के हाथों भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक शासन की स्‍थापना की गई। कमाल है कि सारी जातियां एससीएसटी समाज पर जुल्म ढ़ाने में इतनी व्यस्त थी कि वे खुद गुलाम होती चली गईं।
1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। शाहआलम द्वितीय भारत का सम्राट बना। 1764 में बक्‍सर की लड़ाई, 1767-69 में पहला मैसूर युद्ध, 1780-84 में दूसरा मैसूर युद्ध हुआ। 1799 में चौथा मैसूर युद्ध हुआ। टीपू सुल्‍तान की मृत्‍यु हो गई। 1839-42 में पहला अफगान युद्ध हुआ। 1845-46 में पहला अंग्रेज-सिक्‍ख युद्ध हुआ। 1852 में दूसरा अंग्रेज-बर्मा युद्ध हुआ।
इस दौरान कब कौन सवर्ण राजा था, जिसने दलितों पर जुल्म किया? इतिहास देखकर बताए वह सरकार जो 1000 वर्षों के प्रताड़ना का तर्क दे रही है। यदि इस ​इतिहास में प्रताड़ना नहीं हुआ तो वह इतिहास हमें भी पढ़ाए जिसमें उसने पढ़ा है कि 1000 वर्षों से एससीएसटी समाज का शोषण होता रहा है और अन्य समाज शोषक बना रहा है…। आखिर, आपकी सारी योजनाओं का आधार यही तो है?
1857 में स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम लड़ा गया। पता है क्रांतिकारी कौन था? मंगल पांडेय? जी हां, ब्राह्मण, सवर्ण, मनुवादी कहकर आरोप इन पर भी लगाया जा सकता है कि दलितों का शोषण किया लेकिन इतिहास की हकीकत यह है कि इन्होंने एससीएसटी समाज ही नहीं, समस्त देश को बचाने के लिए अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी। ब्राह्मण ही नहीं, देश की हर जाति अंग्रेजों को हटाने के लिए लड़ रही थी लेकिन हैरानी है कि देश में कहीं एससीएसटी समाज अंग्रेजों से लड़ नहीं रहा था बल्कि इन जातियों के शोषण का शिकार हो रहा था…।
1911 में दिल्‍ली भारत की राजधानी बनी। 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने लखनऊ समझौते पर हस्‍‍ताक्षर किया। 1919 में अमृतसर में जालियाँवाला बाग हत्‍याकांड हुआ। जालियांवाला बाग में मरने वाले एससीएसटी न थे, मारने वाले सवर्ण न थे…। सभी में जुनून देश को बचाने के लिए था, न कि एससीएसटी समाज को प्रताड़ित करने का।
1920 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई। 1927 में साइमन कमीशन का बहिष्‍कार हुआ। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई। 1931 में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। अब महात्मा गांधी को भी जाति के आधार पर सवर्ण— शोषक कहा जा सकता है लेकिन सिर्फ थेथरई से, इतिहास में ऐसा गांधीजी ने नहीं किया बल्कि हरिजन कहकर सम्मानित ही किया।
1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। अगस्त क्रांति में देश का अधिकतर हिस्सा शामिल हो गया लेकिन एससीएसटी समाज तब भी कहीं प्रताड़ित हो रहा था…।
1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की भारत यात्रा हुई। केंद्र में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। 1947 में भारत का विभाजन हुआ और स्वतंत्रता मिली। विभाजन के समय सभी हिंदू—मुस्लिम प्रताड़ित हुए। दंगे—फसाद हुए। प्रताड़ित तो हुए सभी मगर प्रताड़ना का इतिहास बना सिर्फ एससीएसटी समाज का।
15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली। गौर कीजिए सरकार, देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली क्योंकि शासक अंग्रेज थे, न कि वह जातियां जिन पर जुल्म ढहाने का आरोप है। और जब आजादी मिली तो सिर्फ इन्हीं जातियों को नहीं मिली, एससी—एसटी समाज को भी मिली। जब गुलाम रहे, तब भी सभी गुलाम रहे और जब आजाद हुए तब भी सभी आजाद हुए लेकिन सरकार के पास 1000 वर्षों के शोषण का इतिहास सिर्फ इसी समाज का न जाने कहां से आया है। खैर…
1948 में 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई। 1950 में 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू हुआ। इस संविधान में इस समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन, आज तक किसी सरकार ने गिनने की कोशिश नहीं की है कि कितने वर्ष हो गए आरक्षण देते? इतने वर्षों तक आरक्षण देने के बाद अब इस समाज की क्या स्थिति है? क्या यह जानना जरूरी नहीं है? बस आरक्षण या एक्ट देते रहना जरूरी है? क्यों कोई आंकड़ा नहीं है? जब सर्वोच्च न्यायालय आंकड़े मांग रहा है तो वह क्यों नहीं मिल रहा? बस थेथरई? गालगोद? इसी से चलता रहेगा देश?
15 अगस्‍त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पं. जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे। नाम में पंडित होने के कारण इन्हें भी मनुवादी कहा जा सकता है लेकिन दलितों का शोषण किया ऐसा तो नहीं कह सकते न?
27 मई, 1964 से 9 जून, 1964 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। एक महीने के कार्यकाल में यह तो चाहते तो भी किसी तबका का शोषण नहीं कर पाते।
9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल रहा। नाम में शास्त्री उपनाम लगे होने से यदि कोई पूर्वाग्रह से पीड़ित न हो जाए तो शोषण का आरोप इनपर भी नहीं लगाया जा सकता।
11 जनवरी, 1966 से 24 जनवरी, 1966 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। अब इनसे भी ऐसी आशंका जाहिर नहीं कर सकते कि इन्होंने शोषण किया होगा।
24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री रहीं। आपातकाल लागू भी कीं तो पूरे देश पर, न कि सिर्फ एससीएसटी पर जिस तरह कि आज चुनकर एससीएसटी एक्ट का आपातकाल जातियों पर लागू किया गया है। इंदिरा गांधी के आपातकाल के समय अग्रिम जमानत की व्यवस्था हटा दी गई थी, इस एक्ट में भी अग्रिम जमानत नहीं दी जाती… अंतर बस इतना है कि तब आपातकाल देश पर लगा था, आज जातियों को चुनकर आपातकाल थोपा गया है।
24 मार्च, 1977 से 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई रहे। इनका भी इतिहास पढ़ लीजिए। कहीं, कभी किसी समाज का शोषण नहीं किया।
28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे। अब यदि आपको उ​​​पनाम सिंह के चलते इनसे द्वेष न हो तो इन्होंने भी कभी दलितों की हानि नहीं सोची।
14 जनवरी, 1980 से 31 अक्‍तूबर, 1984 तक इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री रहीं। पहले कार्यकाल में यदि दलितों का शोषण न किया तो दूसरे में भी नहीं ही की होंगी और की होतीं तो जरूर इसका इतिहास होता।
31 अक्‍तूबर, 1984 से 2 दिसम्‍बर, 1989 तक राजीव गांधी ने देश का नेतृत्व किया। इसके बाद 2 दिसम्‍बर, 1989 से 10 नवम्‍बर, 1990 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह। 10 नवम्‍बर, 1990 से 21 जून, 1991 तक चंद्रशेखर। अब फिर वही बात है कि यदि नाम में सिंह होने से ही सारी दिक्कत है तो चंद्रशेखर पर भी शोषण का आरोप लगाया जा सकता है और यदि आज होते तो एससीएसटी एक्ट भी लेकिन यदि बात सच की करें तो इनमें से किसी भी प्रधानमंत्री को दलितों से कभी कोई दिक्कत न थी, ​बल्कि हमेशा दलित ही सरकार और उसकी योजनाओं के केंद्र में रहे।
21 जून, 1991 से 16 मई, 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव और 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे। अब अटलजी पर भी दलितों के शोषण का आरोप सिर्फ ब्राह्मण, मनुवादी की दुर्भावना से ही लगाया जा सकता है, वरना हकीकत सिर्फ यही है कि इस व्यक्ति ने समस्त देश को सबल बनाने की कोशिश की और उसमें एससीएसटी समाज भी शामिल रहा।
1 जून, 1996 से 21 अप्रैल, 1997 तक एच. डी. देवेगौड़ा, 21 अप्रैल, 1997 से 19 मार्च, 1998 तक इंद्र कुमार गुजराल रहे। पुन: 19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही। वही अटलजी जिनके जाने पर पूरा देश रोया। रोने वालों में एससीएसटी समाज का कोई नहीं होगा, ऐसा नहीं कह सकते। तो ऐसे जनप्रिय नेता पर तो इस तबका के शोषण का आरोप बिल्कुल नहीं लगा सकते।
22 मई, 2004 से 26 मई, 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस वैसे भी मुस्लिम से लेकर दलित तुष्टीकरण तक में देश की अन्य पार्टियों से बेहतर पार्टी समझी जाती है तो इस सरकार में तो इसकी आशंका भी जाहिर नहीं की जानी चाहिए।
अब बारी इस सरकार की, जिसका तर्क है 1000 वर्षों के शोषण का। 2014 में जब यह भाजपा सरकार बनी तबसे भी जितनी भी योजनाएं बनीं, अधिकतर का आधार जाति ही रही। यही एससीएसटी जाति। हां, कभी ओबीसी भी। जाति के आधार पर योजना, जाति के आधार पर आयोग, जाति के आधार पर कानून, जाति के आधार पर आरक्षण और अब जाति के आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण की बात…। और इन सभी का आधार सिर्फ एक— 1000 वर्षों का वह शोषण जो कभी, किसी ने किया ही नहीं।

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अभी वोट से भी कीमती नोटा है…

वे जो वर्षों से जातिवादी, भ्रष्टाचारी, अपराधी नेताओं को चुनकर संसद भेजते रहे हैं, उन्हें भी अभी अपने वोट की कीमत समझ आ गई है। सत्ता से लेकर विपक्ष तक के पक्ष में एक आवाज आ रही है कि भाई नोटा न दबाओ, वोट बेकार चला जाएगा। माने फिर से इन्हें जिता दो ताकि ये हमसे अपना ऐतिहासिक बदला (1000 वर्ष) पूरा कर सकें।
भाई लोग, यदि आपको नोटा बेकार लगता है तो हमें आपका वह वोट बेकार लगता है जो बेकार नेताओं को चुन रहा है। देश के तमाम सांसद एससीएसटी एक्ट पर गूंगे हो गए हैं। ऐसे बेजुबानों को सदन भेजकर क्या करना जो बोल ही नहीं सकते? सदन तो बोलने वालों के लिए है न?
भाई, चाहा तो हमने भी हर बार यही कि अपने वोट से एक अच्छी सरकार चुनें। जो वादों और इरादों की पक्की हो। जिसके लिए देशहित सर्वोपरि हो। लेकिन पूरे हुए वादे? और एससीएसटी एक्ट के रूप में सामने तो हैं इरादे! नेक है न यह इरादा? जो कुछ जातियों को तुष्ट करने के लिए देश की अन्य जातियों पर आपातकाल लागू कर दे?
भाई, हमने तो हर बार इन्हें यही सोचकर चुना था कि अब अपनी, आने वाली पीढ़ियों की, देश की तकदीर बेहतर होगी लेकिन हुई? नहीं न! अब इस तरह बार-बार पीठ में छुरा भोंकने वालों को बार-बार चुनकर बार-बार खड्यंत्र के अवसर देने से तो अच्छा है न इस बार का नोटा! यह नोटा बेकार नहीं है। इस समय में वोट की असली कीमत यही है। वोट का मतलब है एक मत और अभी हमारा मत इस बात के लिए है कि एक देश-एक संविधान-विधान हो। जातियों की नहीं, सम्पूर्ण देश की सरकार हो। इसलिए इस बार तो बस नोटा! वह नोटा जो सत्ता को उसकी औकात बताएगा और अन्य सभी दलों को एक सीख, सबक, संदेश दे जाएगा कि अब देश में धार्मिक, जातिवाद का और तुष्टीकरण बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक की गंदी राजनीति और नहीं! अब बस! बस नोटा!

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स्वार्थ से अटलजी का गुणगान, विरोध दोनों सही नहीं…

इस समय एक पक्ष अटलजी की निंदा में लगा हुआ है तो भाजपा अटलजी को भुनाकर 2019 का चुनाव जीतने के फेर में लगी है। सही बात यह है कि न तो अटलजी की निंदा करने से संघ या भाजपा का कुछ उखड़ जाएगा और न ही उनकी प्रशंसा करने से इनका कुछ बन ही जाएगा। इसलिए राजनीतिक, वैचारिक स्वार्थ सिद्धि से इस महामानव का गुणगान या विरोध दोनों ही सही नहीं है।
    कई वामपंथी, संघ विरोधी, भाजपा विरोधी, हिन्दू विरोधी और यहां तक कि ब्राह्मण, सवर्ण विरोधी… अटलजी को अपने-अपने हिसाब से गालियां दे रहे हैं। वामपंथी है तो संघी समझकर गाली दे रहा है। किसी राजनीतिक दल का अंधभक्त है तो भाजपाई समझकर गरिया रहा है। कोई कट्टर मुस्लिम है तो हिंदूवादी बताकर भला-बुरा कह रहा है। कोई कट्टर हिन्दू है तो सेकुलर कहने में शेखी समझ रहा है। जो दलित चिंतक है वह ब्राह्मण, सवर्ण समझकर रटा-रटाया मनुवादी कहकर ही खुश है…। इनमें से कोई खुद स्वतंत्र नहीं है। सभी वैचारिक, राजनीतिक, धार्मिक, जातीय… किसी न किसी तरह की गुलामी से अभी जकड़े हुए हैं। इस हद तक कि इनके अपने खेमे से कोई हत्यारा भी निकल जाए तो बेगुनाह प्रतीत होता है और सामने वाले खेमे में कोई बेहतर निकल जाए तो कोफ्त से मरे जाते हैं। इनमें से कोई भी अच्छा को अच्छा और बुरा को बुरा कहने के लिए स्वतंत्र नहीं है। ऐसे गुलामों को अब स्वतंत्र होने की सोचना चाहिए और इस तरह की प्रायोजित निंदा से बाज आना चाहिए।
अब स्वार्थवश अटलजी की प्रशंसा की बात। अटलजी को संघी, भाजपाई, ब्राह्मण, सवर्ण आदि-इत्यादि बताकर उनके जरिये इन सभी को महान बताने की होड़ चल रही है। यह भी उतना ही गलत है। अटलजी जो थे, वह बस वही थे। उनका व्यक्तित्व उनकी अपनी कमाई, बनाई पूंजी थी। उसका हिस्सा किसी में नहीं बंट सकता। वे संघ से थे तो क्या सभी संघी उनकी तरह हैं? वे भाजपाई थे तो उनकी तरह अभी कौन है भाजपा में? उन्होंने तो एक वोट से सत्ता गंवा दी लेकिन समझौता न किया। अभी तो वोट बैंक के लिए क्या-क्या नहीं किया जा रहा? कुछ बचा भी है क्या?
    आज मोदी को अटलजी के वारिस के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या कोई राजनीतिक वसीयत लिखी कभी अटलजी ने? और नेता वसीयत से बनता है क्या कोई? मोदीजी के अंतिम यात्रा में पैदल चलने तक को भुनाया जा रहा है। कौन सी नई बात हो गई इसमें? अपनी तो संस्कृति ही यही है। और वैसे भी उस महामानव की अंतिम यात्रा में तो दूर-दराज से आए सैकड़ों छात्र, युवा, बुजुर्ग सभी चल रहे थे जिन्होंने अटलजी के राजनीति से सन्यास लेने के बाद जन्म लिया वे भी, तो कौन सी बड़ी बात हो गई यदि भाजपा सरकार के प्रधानमंत्री चले जिनके लिए अटलजी कमल खिलाकर गए थे। पैदल चले तो मुलायम तक, विपक्षी दलों के भी कई नेता… उनकी कहाँ कोई चर्चा है?
    अटलजी की मौत को एक राजनीतिक अवसर के रूप में बदल देने से यदि भाजपा यह सोचती है कि इससे अटलजी के प्रशंसकों का प्यार उसे भी मिल जाएगा तो गलत सोचती है, उल्टे घृणा हो जाएगी अपने प्रिय नेता की मौत का तमाशा बनता देखकर। इसी तरह यदि वह यह सोच रही है कि अटलजी की अस्थियों से राजनीतिक बज्र बना लेगी और उसका इस्तेमाल चुनाव में विरोधियों पर कर लेगी तो यह भी न भूले कि खराब नीयत से किया मन्त्रजाप भी अनिष्टकारी हो जाता है। अतः यह बज्र कहीं वापस लौटकर उल्टा ही प्रहार न कर दे। अटलजी जिन्होंने राजनीति से काफी पहले संन्यास ले लिया और जो एक दशक तक मरणासन्न स्थिति में रहे, उनकी मृत्यु के बाद उनका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना खेदजनक है।
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सवर्ण जाति के नाम पर एक नहीं तो यह बड़ी खूबी है!

सरकार दलितों की होगी,
सरकार पिछड़ों की होगी,
सरकार अल्पसंख्यकों की होगी…!
अभी हर नेता यही जुमला दोहरा रहा है। क्या अभी किसी नेता में हिम्मत है जो कहे कि सरकार सवर्णों की होगी? कह दिया तो वह जीत पाएगा? नहीं! हरगिज नहीं!
क्यों? क्योंकि बाकी जातियां उसको नफरत से वोट नहीं करेंगी और उसकी अपनी जाति से भी बहुत कम वोट मिल पाएंगे। ऐसा क्यों? क्या इसलिए क्योंकि सवर्णों में एकता नहीं है? नहीं! ऐसा इसलिए कि सवर्ण समाज अभी भी सबसे उदार, सुलझा समाज है जो जाति पर नहीं मचलता। सवर्ण से वोट लिया जा सकता है विकास के नाम पर, सदाचार के नाम पर, देशभक्ति के नाम पर लेकिन जाति के नाम पर नहीं ! हां, प्रत्याशी सवर्ण हो तो उसे कुछ वोट जाति आधार पर भी मिल सकते हैं किंतु सिर्फ जाति को लेकर चुनाव में खड़ा होगा तो उसकी जमानत जब्त होनी तय है। इस समाज में कुछ जातिवादी उसी तरह हैं जैसे अन्य जातियों में कुछ ही जातिवादी नहीं हैं।
सवर्ण समाज की यह नाकामी बिल्कुल नहीं है कि वह जातिवाद पर रीझ नहीं रहा, जाति के नाम पर एक नहीं हो रहा; यह तो उसकी सबसे बड़ी खूबी है। सवर्ण एक है- राष्ट्र के नाम पर, भले नहीं है जाति के नाम पर। यह बात देश की सियासत भी समझती है। इसलिए सवर्णों से वोट लेने के लिए कोई नेता कभी सवर्ण को नहीं पुकारता है, वह देश को पुकारता है जैसे कि मोदी ने पुकारा था। ओबीसी मोदी को सबसे अधिक वोट सवर्णों ने दिए थे। नेता की सबसे कम जाति यही समाज देखता है इसीलिए तो इस समाज का कोई घोषित नेता नहीं है जबकि अधिकतर जातियां अपनी जाति की पुकार होते ही एकत्र हो जाती हैं इसीलिए इन जातियों के अपने नेता हैं। सवर्ण वोटर तो है पर वोट बैंक नहीं है जिसपर कोई डाका डाल सके। इस देश में यदि सबसे कम जातीय भावना वाला समाज है तो वह सवर्ण ही है लेकिन देखिए कि गजब की ब्रांडिंग की गई है कि सबसे अधिक जातिवादी, मनुवादी भी यही समाज घोषित है।
कामचोर नेताओं की मजबूरी है। नेता चाहते हैं कि वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, लगना ऐसा चाहिए कि दलितों का शोषण किया जा रहा है और सवर्ण ही वह शोषक है। 1000 वर्षों के शोषण की गढ़ी गई और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी के पीछे यही मंशा है। सबको पता है कि सवा अरब की आबादी वाले बड़े देश में सभी वंचितों, गरीबों को राहत देना बड़ा काम है इसलिए नेताओं ने सुविधाजनक काम चुना है- सिर्फ दलितों को ही वंचित घोषित कर सिर्फ इनके लिए ही काम करने का। बावजूद यह काम भी ईमानदारी से नहीं किया। आज भी दलितों का जो वंचित तबका है, वह कमोबेश उसी हाल में है। इन नेताओं की मंशा है कि समाज का एक हिस्सा यूं ही रहे ताकि इससे कभी जाति के नाम पर रिझाकर वोट लिया जा सके तो कभी सवर्णों से डराकर। दलितों का वोट सिर्फ जाति के नाम पर ही हासिल किया जा सके इसके लिए इनका सवर्णों से नफरत करते रहना जरूरी है। यही नेताओं की सोच है, खासकर दलित-पिछड़ों की ही राजनीति करने वाले नेताओं की राजनीति का आधार ही यही है। देश की इसी ओछी राजनीति ने दलितों, पिछड़ों को निरीह और सवर्णों को शैतान के रूप में प्रस्तुत किया है। नेताओं के इस तरह के राजनीतिक षड्यंत्र के बाद भी यदि सवर्ण उतना जातिवादी नहीं हुआ है तो यह अच्छा है। यदि जाति के नाम पर सवर्ण एक नहीं है तो यह इसकी खूबी है, न कि नाकामी। सवर्ण देश के नाम पर एक है। इसी तरह की जागरूकता सभी जातीय समाज में होनी चाहिए।

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भाड़ में जाए संविधान, इस्लाम जिंदाबाद!

संविधान में यह देश धर्मनिरपेक्ष है मगर हकीकत में राजनीतिक दल, मीडिया, बुद्धिजीवी और यहां तक कि सरकार भी एक विशेष धर्म की तरफ साफ लुढ़के हुए नजर आते हैं। ठीक है कि धर्म विशेष को खुश करना है लेकिन कितना? किस कीमत पर? किस हद तक? तुष्टीकरण की भी कोई हद होती है कि नहीं? अरे भाई, जब संविधान नहीं, मजहब देखकर ही देश चलाना है तो धर्मनिरपेक्ष देश का यह ढोंग क्यों? सीधे इस्लामिक कंट्री का ही दर्जा क्यों नहीं दे देते? जो दिक्कत है भी वह तो हिंदू राष्ट्र होने में है ना? इस्लामिक कंट्री होने में कहां कोई दिक्कत है जहां देश का सार्वजनिक से लेकर निजी तंत्र तक मुसलमानों का खुशामद करने में लगा हुआ है? एक अधिकारी कर्तव्यनिष्ठा दिखाता है, नियमों का पालन करता है और मुस्लिम महिला के आवेदन में कमियां पाते हुए सुधार के लिए कहता है तो उसकी नौकरी ले ली जाती है और सारे नियम—कानून ताक पर रखकर उस महिला को पासपोर्ट जारी कर दिया जाता है? क्यों भाई? नियम—कानून धर्म देखकर अप्लाई होने लगा है क्या? यदि ऐसा है तो क्यों न संविधान में एक ही बार संशोधन कर साफ—साफ लिख दिया जाए कि देश का ​कानून फलां धर्म पर ही लागू होगा और फलां धर्म वालों की मनमर्जी ही देश का कानून है। कम से कम नियमों का पालन करने के कारण कोई कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी बलि का बकरा तो नहीं बनेगा। तुष्टीकरण ही करनी है तो खुलकर करो, नियम बना दो, संविधान में संशोधन कर दो। कह दो कि भाड़ में जाए संविधान, अब से इस्लाम जिंदाबाद!

तन्वी उर्फ सादिया के मामले में सुषमा स्वराज द्वारा बिना किसी जांच वरिष्ठ अधीक्षक को हटाना और पासपोर्ट विभाग द्वारा सारे नियमों को ताक पर रखकर पासपोर्ट जारी करना यह बताने के लिए काफी है कि इस समय देश में सिर्फ किसी का मुसलमान होनाभर ही काफी है। उसका महज एक ट्वीट कर देना काफी है कि उसके मुसलमान होने के नाते उससे अन्याय हुआ है। फिर तो वह दोषी भी होगा तो अचानक पीड़ित हो जाएगा। फिर उसे हर नियम से छूट है, वह हर जांच से परे है।

अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं पत्रकार असद अशरफ के मामले को। रविवार रात करीब 9 बजे असद अपने घर जामिया नगर जाने के लिए ओला कैब लिए थे। कैब के ड्राइवर ने उन्हें जामिया नगर से पहले ही उतरने के लिए कह दिया। उन्होंने कारण जानना चाहा तो ड्राइवर ने कहा …. जामिया गन्दी लोकलिटी है। वहां अजीब लोग रहते हैं। गौर कीजिए कि ड्राइवर सुरक्षा के लिहाज से वहां नहीं गया था। लिहाजा, होना यह चाहिए था कि जामिया के हालात बदले जाएं ताकि वहां जाने से किसी को कोई डर न हो लेकिन बदल दिया गया वह ड्राइवर। चूंकि असद पत्रकार हैं तो वह इस नाते अच्छी तरह जानते हैं कि पत्रकार होने से भी बड़ी बात है मुसलमान होना। उन्होंने ओला कम्पनी में शिकायत दर्ज कराई कि मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहने की वजह से उनके साथ यह सब हुआ। बस क्या था? ओला ने असद से माफी मांगी और ड्राइवर अशोक कुमार को बर्खास्त कर दिया। NDtv को भी खुराक मिल गई। ट्विटर पर भी असद को खूब सहानुभूति और ड्राइवर को लानत मिली। खबर का केंद्र हिंदू—मुसलमान हो गया, जामिया की हालत पर कोई चर्चा नहीं हुई…।

हमें याद हैं, जब हम पटना में पढ़ते थे तब की घटना। वहां हम बोरिंग रोड के पीछे शिवपुरी में रहते थे। तब पुनाईचक, राजवंशीनगर, शास्त्रीनगर से सटा शिवपुरी असुरक्षित माना जाता था। रात में उधर बेली रोड और इधर बोरिंग रोड तक तो आने में कभी कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन उसके बाद शिवपुरी में अंदर जाने के लिए हर रिक्शा वाला तैयार नहीं होता था। अलग बात थी कि मेरी इतनी बुद्धि नहीं थी कि हम पूछ सकें कि वह रिक्शा वाला कहीं मुसलमान तो नहीं है? कहीं वह मेरे हिंदू होने के नाते तो ना नहीं कर रहा? खैर, दैनिक जागरण में नौकरी मिल गई तो हम बिहार के छपरा पहुंच गए। हमने रूम की तलाश शुरू की। सोचा, सस्ते में निपट जाए तो अच्छी बात हो। रेलवे ढाला पार प्रभुनाथनगर तरफ कमरे सस्ते मिल रहे थे लेकिन किसी भी रिक्शा वाले से रात में कहते कि चलोगे? तो वह ना कह देता था। इसलिए हम हमेशा नगरपालिका चौक के इर्द—गिर्द ही रह गए। हां, इस दौरान कभी किसी रिक्शे वाले से उसका धर्म नहीं पूछा हमने। अभी यहां दिल्ली—नोएडा में भी हर शहर की तरह कुछ इलाके हैं, जहां की ऐसी ही स्थिति है। आप न अपना धर्म बताइए, न ड्राइवर का धर्म पूछिए लेकिन उससे किसी जगह चलने के लिए कहिए तो तैयार हो जाएगा, किसी जगह चलने के लिए कहिए तो नहीं होगा। जिस जगह के लिए वह ना कर रहा है, इसके पीछे की वजह उससे जरूर जानी जा सकती है। इसके बाद सरकार, प्रशासन, मीडिया सबकी जिम्मेदारी है कि उस जगह को इस लायक बना दे कि कोई ड्राइवर वहां जाने से इनकार न करे लेकिन यह तो बहुत मुश्किल है। आसान तो यही है कि उसके ना की वजह धर्म को बता दिया जाए। हालात बदलने की बजाय, ड्राइवर ही बदल दिया जाए। कभी किसी ने सोचा है कि एक ड्राइवर की नौकरी खा जाने से क्या क्या दूसरे ड्राइवर के लिए हालात बदल जाएंगे? खैर, सोचने की जरूरत ही क्या है? मुसलमान होना ही काफी है…।

पत्रकार असद अशरफ का यह मामला ताजा ही था कि सादिया का मामला आ गया। सादिया ने भी असद का ही फॉर्मूला अपनाया… असद ने आरोप लगाया था कि ड्राइवर ने इसलिए पहले उतार दिया क्योंकि वे मुसलमान बहुल क्षेत्र में रहते हैं, सादिया ने आरोप लगाया कि इसलिए पासपोर्ट नहीं मिला, क्योंकि उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया है, अब वह मुसलमान हैं…। और मुसलमान होना मतलब… देश के संविधान से उपर हो जाना है। भला कोई क्यों न हर बात में कहे खुद को मुसलमान? निर्दोष होने के बाद भी कोई पुलिस से पिट रहा हो तो क्या वह कभी आरोप लगा सकता है कि इसलिए पिट रहा है कि वह हिंदू है? सवर्ण है? ब्राह्मण है? लेकिन, गलत करने पर, गलत होने पर भी बड़े आराम से कहा जा सकता है कि मैं मुसलमान हूं, मैं दलित हूं इसलिए मुझे पुलिस ने पीटा या ‘दबंगों’ ने पीटा। पुलिस की लाठियां धर्म, जाति देखकर नहीं बरसतीं लेकिन कभी किसी अखबार में हेडिंग लगी है— ब्राह्मणों या राजपूतों, कायस्थों को दौड़ा—दौड़ाकर पीटा? ‘दलितों को पीटा’ ऐसी हेडिंग अक्सर लगती है। बलात्कार करने वाले भी भला धर्म, जाति देखते हैं क्या? कभी ‘ब्राह्मण महिला से बलात्कार’ हेडिंग देखी है? लेकिन ‘दलित से बलात्कार’, ‘मुसलमान युवती से बलात्कार’ जैसी हेडिंग अखबारों की पठनीयता पढ़ाती हैं। दलित, मुसलमान हो जाने का मतलब है सत्ता, विपक्ष, बुद्धिजीवी, मीडिया, सरकार सबका केंद्रबिंदु हो जाना। यह फॉर्मूला हिट है, इसलिए इसे हर कोई आजमा रहा है। सादिया ने भी आजमाया। दस्तावेज गलत और अपूर्ण होने पर जब उनका पासपोर्ट न बना तो उन्होंने इसे हिंदू—मुस्लिम का रंग दे डाला। ट्वीट कीं तो सहानुभूतियों की बाढ़ आ गई। सुषमा स्वराज जैसी सुलझी नेत्री भी भाव विह्वल हो गईं। तत्काल नोटिस देकर उस अधिकारी का तबादला कर दिया, जिसने एक मुसलमान महिला से नियम—कायदे पूरा करने की गुस्ताखी कर डाली। कुछ ही देर में अधिकारी के हाथ में तबादले का पत्र था, सादिया के हाथ में पासपोर्ट था…। न एलआईयू जांच, न पुलिस वेरीफिकेशन, न स्थल निरीक्षण, कुछ नहीं। नियम तो यह भी है कि पासपोर्ट सिर्फ डाक से ही भेजा जाता है, लेकिन सादिया को तो हाथों-हाथ मिला। यहां तक कि कुछ दिन पहले जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का पता बदला था तो उन्हें भी नया पासपोर्ट नियमानुसार डाक से ही ​भेजा गया था। यानी, जो नियम सीएम के लिए भी नहीं टूटा था वह सादिया के लिए टूटा…। कह सकते हैं कि मुसलमान होना; पत्रकार ही नहीं, सीएम होने से भी बड़ा होता है…।

सादिया और पति मोहम्मद अनस सिदृदीकी नोएडा में रहते हैं और दोनों नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं। सादिया, शादी से पहले तन्वी सेठ थीं। तन्वी सेठ और मोहम्मद अनस सिद्दीकी ने 2007 में शादी कर ली और अब उनकी छह साल की एक बेटी भी है। अनस ने इसी 19 जून को अपने पासपोर्ट रिन्युअल और तन्वी सेठ ने नए पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। बुधवार को दोनों को दस्तावेज के साथ रतन स्क्वायर स्थित पासपोर्ट सेवा केंद्र बुलाया गया था। सादिया ने पासपोर्ट के लिए अपना आवेदन तन्वी सेठ के नाम से दिया था। आवेदन में आवेदक का नाम तन्वी सेठ और पति का नाम मोहम्मद अनस सिदृदीकी पहली बार किसी को भी चौकाएगा। वरिष्ठ अधीक्षक विकास मिश्र ने भी कुछ सवाल पूछ डाले। तन्वी का आरोप है कि विकास ने उनसे नाम बदलने के लिए कहा। राजी नहीं होने पर पति से हिंदू रीति के अनुसार सात फेरे लेने को कहा। कहा कि तभी यह शादी वैध मानी जाएगी और पासपोर्ट बन सकेगा। विकास मिश्र ने तन्वी की फाइल सहायक पासपोर्ट अधिकारी (एपीओ) विजय द्विवेदी के पास भेज दी। इसके बाद तन्वी ने ट्वीट किया और देश में सूनामी आ गई। तुरंत विकास के हाथ में तबादले का लेटर और सादिया के हाथ में पासपोर्ट। न तो विकास को सजा देने के लिए कोई जांच हुई और न ही सादिया को पासपोर्ट देने के लिए। यानी, फॉर्मूला हिट रहा…।

धर्म—जाति की राजनीति करने वालों या किसी खास धर्म के लिए सहानुभूति और अन्य के लिए विद्वेष रखने वालों के लिए यह मामला यहीं खत्म हो गया लेकिन इससे अलग, सही और गलत देखने वाले हम जैसों के लिए कहानी अभी बाकी है…। कहानी में विकास मिश्र का पक्ष क्या जरूरी नहीं है? क्योंकि वह हिंदू हैं? क्योंकि वह ब्राह्मण हैं? क्योंकि वह नियमों का पालन कर रहे थे? सुनना तो होगा, क्योंकि न सुनेंगे, न जानेंगे तो भी सच नहीं बदल जाएगा…। विकास का कहना है कि पहली बात तो यह कि आवेदन में तन्वी सेठ का पता नोएडा का था। इस लिहाज से उन्हें गाजियाबाद पासपोर्ट सेवा केंद्र में अप्लाई करना चाहिए था। दूसरी बात यह कि अंतरजातीय विवाह करने पर पासपोर्ट मैन्युअल 2016 के तहत आवेदक को एक घोषणा पत्र देना होता है जिस पर लिखना होता है कि उसने जिससे शादी की है उसका नाम और पता यह है। तीसरा यह कि पासपोर्ट एक्ट 1967 के तहत नाम बदलने पर पासपोर्ट के आवेदन में एक बॉक्स में सही का निशान लगाकर दूसरा नाम भी जोड़ना पड़ता है। यहां तक कि घर का नाम भी बताया जाता है जिससे एक ही आदमी के अलग-अलग नाम से पासपोर्ट न बन सके। तन्वी के पति का नाम मुस्लिम होने पर विकास ने यह कहा था कि यदि अंतरजातीय विवाह है तो उन्हें दूसरा नाम भी बताना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि तन्वी निकाह के बाद धर्म परिवर्तन कर चुकी हैं। निकाहनामा में उनका नाम सादिया असद है। आवेदन तन्वी नाम से, दस्तावेज सादिया नाम के? पासपोर्ट कैसे जारी कर देते? आवेदन की त्रुटियों पर विचार करने के लिए विकास ने उसे एपीओ विजय के पास भेज दिया। विकास ने कहा कि यदि एपीओ स्वीकृति दे देंगे तो वे आवेदन की प्रक्रिया को इसी तरह मंजूर कर लेंगे। पासपोर्ट अधिकारी पीयूष वर्मा खुद कहते हैं कि विकास मिश्र पर इसके पहले किसी भी पासपोर्ट आवेदक के साथ अभद्रता की शिकायत नहीं है। वहां के कर्मचारी भी किसी अभद्रता से इनकार कर रहे हैं। सभी का यही कहना है कि विकास ने नियम के अनुसार ही पासपोर्ट प्रक्रिया के लिए तन्वी से उनके मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद नए नाम सादिया हसन की जानकारी भी फॉर्म में भरने के लिए कहा था। लेकिन, नियम—कानून भी कुछ होता है क्या? इस देश में मुसलमान होने से भी बड़ा कुछ होता है क्या?

नोट— हम किसी भी धर्म—जाति के खिलाफ नहीं हैं लेकिन धर्म—जाति के नाम पर भेद—भाव करने वालों के खिलाफ हैं। धर्म—जाति के नाम पर किसी को भी विशेष सुविधा देने या किसी को भी प्रताड़ित किए जाने के खिलाफ हैं। हम इसके खिलाफ थे, हैं और हमेशा रहेंगे…।

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