हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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अभी वोट से भी कीमती नोटा है…

वे जो वर्षों से जातिवादी, भ्रष्टाचारी, अपराधी नेताओं को चुनकर संसद भेजते रहे हैं, उन्हें भी अभी अपने वोट की कीमत समझ आ गई है। सत्ता से लेकर विपक्ष तक के पक्ष में एक आवाज आ रही है कि भाई नोटा न दबाओ, वोट बेकार चला जाएगा। माने फिर से इन्हें जिता दो ताकि ये हमसे अपना ऐतिहासिक बदला (1000 वर्ष) पूरा कर सकें।
भाई लोग, यदि आपको नोटा बेकार लगता है तो हमें आपका वह वोट बेकार लगता है जो बेकार नेताओं को चुन रहा है। देश के तमाम सांसद एससीएसटी एक्ट पर गूंगे हो गए हैं। ऐसे बेजुबानों को सदन भेजकर क्या करना जो बोल ही नहीं सकते? सदन तो बोलने वालों के लिए है न?
भाई, चाहा तो हमने भी हर बार यही कि अपने वोट से एक अच्छी सरकार चुनें। जो वादों और इरादों की पक्की हो। जिसके लिए देशहित सर्वोपरि हो। लेकिन पूरे हुए वादे? और एससीएसटी एक्ट के रूप में सामने तो हैं इरादे! नेक है न यह इरादा? जो कुछ जातियों को तुष्ट करने के लिए देश की अन्य जातियों पर आपातकाल लागू कर दे?
भाई, हमने तो हर बार इन्हें यही सोचकर चुना था कि अब अपनी, आने वाली पीढ़ियों की, देश की तकदीर बेहतर होगी लेकिन हुई? नहीं न! अब इस तरह बार-बार पीठ में छुरा भोंकने वालों को बार-बार चुनकर बार-बार खड्यंत्र के अवसर देने से तो अच्छा है न इस बार का नोटा! यह नोटा बेकार नहीं है। इस समय में वोट की असली कीमत यही है। वोट का मतलब है एक मत और अभी हमारा मत इस बात के लिए है कि एक देश-एक संविधान-विधान हो। जातियों की नहीं, सम्पूर्ण देश की सरकार हो। इसलिए इस बार तो बस नोटा! वह नोटा जो सत्ता को उसकी औकात बताएगा और अन्य सभी दलों को एक सीख, सबक, संदेश दे जाएगा कि अब देश में धार्मिक, जातिवाद का और तुष्टीकरण बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक की गंदी राजनीति और नहीं! अब बस! बस नोटा!

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इस हालात में नोटा न दबाएं तो क्या करें?

यह कर्नल वीएस चौहान हैं। नोएडा के सेक्टर-29 में रहते हैं। इनके पड़ोस में एक महिला रहती हैं। पति एडीएम हैं बावजूद वह आज भी दलित ही हैं जैसा कि देश में अभी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि जाति देखकर कोई गरीब समझा जाता है और अपराध नहीं जाति देखकर सजा दी जाती है…। खैर!
पड़ोसियों से प्रायः किसी न किसी बात पर कुछ लोगों को दिक्कत रहती ही है तो कर्नल साहब से पड़ोसन को भी थी। बस, हिसाब चुकता करने के लिए पड़ोसन को एक्ट मिल गया और उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल भी किया। कर दीं कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का केस। और साथ में एससीएसटी तो लगना ही है…। और यह एक्ट लगने के बाद कुछ बचत है क्या? अग्रिम जमानत कहाँ मिलनी है? और गिरफ्तारी से पहले जांच की कहाँ जरूरत है? … तो देश की सेवा करने वाले 75 वर्षीय कर्नल साहब जेल भेज दिए गए।
केस दर्ज होने की घटना एक सप्ताह पुरानी है। तब हमने अपने साथियों से इस बात का जिक्र किया था कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी को भी दलित ही समझा जाना चाहिए? सबने कहा कि जब तक आधार जाति है तब तक तो समझना ही पड़ेगा…!
आज Anurag भाई की पोस्ट पढ़ी तो पता चला कि केस झूठा था। सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरे ने पोल खोल दी है। पता चला है कि कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का आरोप लगाने वाली महिला ने खुद ही उनकी पिटाई की थी। बेचारे 75 बरस के हैं, पिट गए। अब वह सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रही है…।
कर्नल साहब तो पूर्व सैनिकों की पैरोकारी और सीसीटीवी के दम पर छूट गए हैं, लेकिन अन्य का क्या होगा? अब यह सबकुछ देखने-जानने के बाद नोटा के अलावा कुछ सूझता है क्या?

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