हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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आरक्षण के लिए क्या महज यह कह देना ही काफी है कि इस तबका का शोषण हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में आरक्षण पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था— यह तबका 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना झेल रहा है। एससी-एसटी पहले से ही पिछड़े हैं इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए अलग से किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है।
कमाल का तर्क है न कि प्रोन्न​ति में आरक्षण देने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है? यानी जाति काफी है! कैसे भी वोट लेना है तो कैसे भी आरक्षण दे देना है। अब सही बात तो कोर्ट में सरकार नहीं कह सकती न कि दलितों का एकमुश्त वोट वह आरक्षण देकर खरीद रही है? यह सच तो न अभी की सरकार कह सकती है, न पिछली इसलिए हर सरकार के पास यही तर्क है— 1000 वर्षों का शोषण! एससीएसटी एक्ट के पीछे भी शोषण से अधिक यही वोट बैंक की राजनीति है और आरक्षण या प्रोन्नति में आरक्षण के पीछे भी।
क्या कोई सरकार इस तरह बेशर्मी से कह सकती है कि आंकड़े की जरूरत ही नहीं है? माने मायावती दलित हैं, वह 1000 वर्षों से शोषित हैं, उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए? माने राम विलास पासवान दबे—कुचले हैं? उनके सुपुत्रों का आरक्षण मिलना चाहिए? माने जिस देश का दलित राष्ट्रपति है, उस देश में यह तर्क कि यह समाज 1000 वर्षों से प्रताड़ना झेल रहा है? माने जो तबका प्रताड़ना झेल रहा है, उस तबके का व्यक्ति राष्ट्रपति है? यह कैसा तर्क है? यह कैसी प्रताड़ना है?
सरकार यदि यह स्पष्ट नहीं कर सकती कि इस समाज को आरक्षण में प्रोन्नति देना क्यों आवश्यक है तो क्या यही स्पष्ट कर सकती है कि 1000 वर्षों तक इस समाज का शोषण किसने किया है? अभी तो 4 वर्षों से खुद यही सरकार है जो दुहाई दे रही है 1000 वर्षों से प्रताड़ित किए जाने का तो क्या मानें कि 1000 वर्षों में इन चार वर्षों में भी यह तबका प्रताड़ना ही झेलता रहा है? कमाल है कि देश को 1947 में आजादी मिल गई थी और इस दौरान 73 वर्षों तक इस तबका का शोषण होता रहा! शोषण की यह कहानी सुना—सुनाकर कब तक कुछ जातियों को सिरमौर और बाकियों को कुचलने का प्रयास चलता रहेगा? इसी शोषण की कहानी की बुनियाद पर आजाद भारत के संविधान में एससीएसटी समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया लेकिन क्या 10 बरस बीते नहीं? 7 बार 10 बरस बीत जाने के बाद क्या लक्ष्य की पूर्ति नहीं हुई? नहीं हुई तो क्यों? क्या इसके लिए भी सवर्ण जिम्मेदार हैं?
जाहिर है कि 1000 वर्षों में आजादी के साल भी शामिल हैं और इस लिहाज से सरकार यह नहीं कह सकती कि आजाद भारत में उसने भी इस तबका का शोषण किया है तो इसका सीधा मतलब है कि शोषण अगड़ी जातियां करती रही हैं। यानी, अपराधी सरकार नहीं, अगड़ी जातियां हैं। इसीलिए एससीएसटी एक्ट के जरिये कथित अगड़ी जातियों पर आपातकाल लागू करने में सरकार ने जरा भी विचार नहीं किया क्योंकि वह पहले से विचार कर चुकी है कि यह जातियां शोषक हैं। मगर इतिहास में इन जातियों ने कब एससीएसटी समाज का शोषण किया, क्या इसका कोई आंकड़ा है? या बस 1000 वर्षों तक के शोषण की गढ़ी गई कहानी से ही आगे भी यह देश चलता रहेगा? यह सरकार सबकुछ तय करती रहेगी?
शोषण तो कोई शासक ही कर सकता है न या उसके जैसा ही कोई अन्य ताकतवर? तो क्या कभी इतिहास में जाकर सरकार ने पता भी किया है कि कब अगड़ी जातियां सिर्फ राजा हुआ करती थीं, जब एससीएसटी तबका सिर्फ प्रजा हुआ करता था? आखिर ऐसा कौन—सा कालखंड था जब राजा कोई सवर्ण था और उसने अपनी सारी दलित प्रजा को जेल में डाल दिया था या उससे चक्की पिसवाई थी, उसका राशन—पानी बंद कर दिया था…। 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना का मतलब है 1018 से अब तक। यदि इतिहास पर नजर डालें तो इस दौरान मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक का शासन रहा। क्या मुगलों ने एससीएसटी समाज को अलग छांटकर उस पर जुल्म ढाया? क्या अंग्रेजों ने अलग से एससीएसटी समाज की पहचान कराई और उनपर अलग से अत्याचार किया? जिन शासकों ने भी जुल्म ढाया, भारतवासियों पर ढाया लेकिन प्रताड़ना का इतिहास सिर्फ इसी जाति का क्यों है? यदि एससीएसटी समाज के साथ ही यह सभी जातियां भी इस कालखंड में प्रताड़ित होती रही हैं तो यह झूठ क्यों रचा गया है? और इस झूठ के आधार पर कुछ जातियों को आगे बढ़ाने और अन्य सभी को प्रताड़ित करने के लिए सरकारी योजनाएं कब तक चलाई जाती रहेंगी? कब तक देशहित नहीं, कुछ जाति हित को ध्यान में रखकर सत्ता काम करती रहेगी?
1000 वर्षों का शोषण रटने वाली सरकार ने इतिहास पढ़ा ही नहीं है, ऐसा तो हो नहीं सकता तो यह तर्क एक साजिश ही तो है कि इस तबका का शोषण हुआ है इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण मिलना चाहिए?

सरकार के पास जब प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए यही तर्क है कि एससीएसटी समाज का 1000 वर्षों तक शोषण हुआ है और बाकी जातियों पर एससीएसटी एक्ट थोपने की पृष्ठभूमि भी शायद यही है तो हमें भी यह समझ लेना जरूरी हो गया है कि 1000 वर्षों में कब, किन ब्राह्मणों, राजपूतों, बनियों, कायस्थों, भूमिहारों या अन्य जातियों ने इस तबका को प्रताड़ित किया था। अब उन सभी के लिए 1000 वर्षों का इतिहास पढ़ना जरूरी हो गया है, जो इसी आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
1000 वर्ष यानी अब से 1018 तक। 1001 में महमूद गजनी ने भारत पर पहली बार आक्रमण किया था और पंजाब के शासक जयपाल को हराया। 1025 में उसने सोमनाथ मंदिर को विध्‍वंस कर दिया। आज शोषक समझकर हर अधिकार से वंचित की जा रहीं जातियां यदि उस समय इतनी सबल थीं कि एससीएसटी समाज का शोषण कर रही थीं तो यह जातियां मंदिर को विध्वंस होता क्यों ​देखती रहीं? क्या तब सनातन धर्म नहीं था? भगवा ध्वज नहीं था? क्या तब ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं थे? आज जो जातियां हैं, वह सभी तब भी थीं। आज जो भक्ति ईश्वर के प्रति है, वह तब भी थी लेकिन इन सबके बावजूद यदि प्रभु का घर मंदिर विध्वंस होता रहा तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि यह जातियां गजनी का सामना करने की स्थि​ति में नहीं थीं। यदि होतीं तो गजनी तभी गाज फेंक चुका होता। यह जातियां बाहर से आए आक्रमणकारियों का गुलाम न बन जातीं। कोई शौक नहीं था किसी को गुलाम बनने का। न तब, न अब।
1191 में तराई का पहला युद्ध हुआ। 92 में दूसरा युद्ध हुआ। 1206 में दिल्‍ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्‍याभिषेक हो गया। 1221 में भारत पर चंगेज खान ने हमला किया। 1236 में दिल्‍ली की गद्दी पर रजिया सुल्‍तान का राज्‍याभिषेक कर दिया गया। 1296 में अलाउद्दीन खिलजी का हमला हुआ। 1325 में मोहम्‍मद तुगलक का राज्‍याभिषेक हुआ। 1351 में फिरोजशाह का राज्‍याभिषेक किया गया। 1398 में तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया…
अभी जो सरकार खुद इतिहासकार भी बनी बैठी है, वह बताए तो सही कि इनमें से कौन ब्राह्मण था, राजपूत था, मनुवादी था? जिसके द्वारा शोषण किए जाने का आधार बनाकर देश में जाति के आधार पर आरक्षण से लेकर कानून तक पारित किया जा रहा है। बताइए न कि तब कहां थीं वह हिंदू जातियां, जो शोषण कर रही थीं? और कहां था वह तबका भी जो शोषित हो रहा था। देश को तो बाहरी आक्रांता लूटते जा रहे थे और देश का हर तबका देखता जा रहा था…।
1494 में फरघाना में बाबर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई हुई। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया। मुगल शासन की स्‍थापना की। 1527 में खानवा की लड़ाई हुई। बाबर ने राणा सांगा को हराया। 1530 में हुमायूं का राज्‍याभिषेक हुआ। 1539 में शेरशाह सूरी ने हुमायूं का हराया और भारत का सम्राट बना। 1540 में कन्‍नौज की लड़ाई लड़ी गई। 1555 में हुमायूं ने दिल्‍ली की गद्दी को फिर से हथिया लिया। 1556 में पानीपत की दूसरी लड़ाई लड़ी गई। 1565 में तालीकोट की लड़ाई हुई। 1576 में हल्‍दीघाटी की लड़ाई हुई। राणा प्रताप ने अकबर को हराया…।
हां! अब राणा प्रताप को मनुवादी कहा जा सकता है क्योंकि दलित या मनुवादी—सवर्ण—शोषक सबकुछ कहे जाने का आधार जाति है लेकिन गौर कीजिए कि राणा प्रताप ने भी एससीएसटी समाज को नहीं हराया, एक मुस्लिम शासक को हराया था। फिर शोषण कब, किसका, किसने किया?
1597 में राणा प्रताप की मृत्‍यु हो गई। 1600 में ईस्‍ट इंडिया कंपनी की स्‍थापना हुई। 1605 में अकबर की मृत्‍यु के बाद जहाँगीर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1627 में जहांगीर की मृत्‍यु हो गई। 1628 में शाहजहां भारत का सम्राट बना। 1659 में औरंगजेब का राज्‍याभिषेक हुआ। 1665 में औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया। शिवाजी इतने मजबूत होते तो कैद क्यों हो गए? और यदि हो गए तो प्रताड़ित तो शिवाजी हुए न? यह सारी लड़ाइयां जब लड़ी जा रही थीं तब वह समाज कहां था जो अभी स्वयं को मूल निवासी बता रहा है और बाकियों को बाहर से आया हुआ? यदि इन कथित मूल निवासी के अलावा सभी बाहरी थे तो बाहरी ही बाहरी से क्यों लड़ रहे थे? सभी बाहरियों को मिलकर तो मूल निवासियों पर शासन करना चाहिए था न?
1739 में नादिरशाह ने भारत पर हमला किया। 1757 में प्‍लासी की लड़ाई हुई। लॉर्ड क्‍लाइव के हाथों भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक शासन की स्‍थापना की गई। कमाल है कि सारी जातियां एससीएसटी समाज पर जुल्म ढ़ाने में इतनी व्यस्त थी कि वे खुद गुलाम होती चली गईं।
1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। शाहआलम द्वितीय भारत का सम्राट बना। 1764 में बक्‍सर की लड़ाई, 1767-69 में पहला मैसूर युद्ध, 1780-84 में दूसरा मैसूर युद्ध हुआ। 1799 में चौथा मैसूर युद्ध हुआ। टीपू सुल्‍तान की मृत्‍यु हो गई। 1839-42 में पहला अफगान युद्ध हुआ। 1845-46 में पहला अंग्रेज-सिक्‍ख युद्ध हुआ। 1852 में दूसरा अंग्रेज-बर्मा युद्ध हुआ।
इस दौरान कब कौन सवर्ण राजा था, जिसने दलितों पर जुल्म किया? इतिहास देखकर बताए वह सरकार जो 1000 वर्षों के प्रताड़ना का तर्क दे रही है। यदि इस ​इतिहास में प्रताड़ना नहीं हुआ तो वह इतिहास हमें भी पढ़ाए जिसमें उसने पढ़ा है कि 1000 वर्षों से एससीएसटी समाज का शोषण होता रहा है और अन्य समाज शोषक बना रहा है…। आखिर, आपकी सारी योजनाओं का आधार यही तो है?
1857 में स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम लड़ा गया। पता है क्रांतिकारी कौन था? मंगल पांडेय? जी हां, ब्राह्मण, सवर्ण, मनुवादी कहकर आरोप इन पर भी लगाया जा सकता है कि दलितों का शोषण किया लेकिन इतिहास की हकीकत यह है कि इन्होंने एससीएसटी समाज ही नहीं, समस्त देश को बचाने के लिए अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी। ब्राह्मण ही नहीं, देश की हर जाति अंग्रेजों को हटाने के लिए लड़ रही थी लेकिन हैरानी है कि देश में कहीं एससीएसटी समाज अंग्रेजों से लड़ नहीं रहा था बल्कि इन जातियों के शोषण का शिकार हो रहा था…।
1911 में दिल्‍ली भारत की राजधानी बनी। 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने लखनऊ समझौते पर हस्‍‍ताक्षर किया। 1919 में अमृतसर में जालियाँवाला बाग हत्‍याकांड हुआ। जालियांवाला बाग में मरने वाले एससीएसटी न थे, मारने वाले सवर्ण न थे…। सभी में जुनून देश को बचाने के लिए था, न कि एससीएसटी समाज को प्रताड़ित करने का।
1920 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई। 1927 में साइमन कमीशन का बहिष्‍कार हुआ। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई। 1931 में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। अब महात्मा गांधी को भी जाति के आधार पर सवर्ण— शोषक कहा जा सकता है लेकिन सिर्फ थेथरई से, इतिहास में ऐसा गांधीजी ने नहीं किया बल्कि हरिजन कहकर सम्मानित ही किया।
1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। अगस्त क्रांति में देश का अधिकतर हिस्सा शामिल हो गया लेकिन एससीएसटी समाज तब भी कहीं प्रताड़ित हो रहा था…।
1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की भारत यात्रा हुई। केंद्र में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। 1947 में भारत का विभाजन हुआ और स्वतंत्रता मिली। विभाजन के समय सभी हिंदू—मुस्लिम प्रताड़ित हुए। दंगे—फसाद हुए। प्रताड़ित तो हुए सभी मगर प्रताड़ना का इतिहास बना सिर्फ एससीएसटी समाज का।
15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली। गौर कीजिए सरकार, देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली क्योंकि शासक अंग्रेज थे, न कि वह जातियां जिन पर जुल्म ढहाने का आरोप है। और जब आजादी मिली तो सिर्फ इन्हीं जातियों को नहीं मिली, एससी—एसटी समाज को भी मिली। जब गुलाम रहे, तब भी सभी गुलाम रहे और जब आजाद हुए तब भी सभी आजाद हुए लेकिन सरकार के पास 1000 वर्षों के शोषण का इतिहास सिर्फ इसी समाज का न जाने कहां से आया है। खैर…
1948 में 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई। 1950 में 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू हुआ। इस संविधान में इस समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन, आज तक किसी सरकार ने गिनने की कोशिश नहीं की है कि कितने वर्ष हो गए आरक्षण देते? इतने वर्षों तक आरक्षण देने के बाद अब इस समाज की क्या स्थिति है? क्या यह जानना जरूरी नहीं है? बस आरक्षण या एक्ट देते रहना जरूरी है? क्यों कोई आंकड़ा नहीं है? जब सर्वोच्च न्यायालय आंकड़े मांग रहा है तो वह क्यों नहीं मिल रहा? बस थेथरई? गालगोद? इसी से चलता रहेगा देश?
15 अगस्‍त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पं. जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे। नाम में पंडित होने के कारण इन्हें भी मनुवादी कहा जा सकता है लेकिन दलितों का शोषण किया ऐसा तो नहीं कह सकते न?
27 मई, 1964 से 9 जून, 1964 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। एक महीने के कार्यकाल में यह तो चाहते तो भी किसी तबका का शोषण नहीं कर पाते।
9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल रहा। नाम में शास्त्री उपनाम लगे होने से यदि कोई पूर्वाग्रह से पीड़ित न हो जाए तो शोषण का आरोप इनपर भी नहीं लगाया जा सकता।
11 जनवरी, 1966 से 24 जनवरी, 1966 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। अब इनसे भी ऐसी आशंका जाहिर नहीं कर सकते कि इन्होंने शोषण किया होगा।
24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री रहीं। आपातकाल लागू भी कीं तो पूरे देश पर, न कि सिर्फ एससीएसटी पर जिस तरह कि आज चुनकर एससीएसटी एक्ट का आपातकाल जातियों पर लागू किया गया है। इंदिरा गांधी के आपातकाल के समय अग्रिम जमानत की व्यवस्था हटा दी गई थी, इस एक्ट में भी अग्रिम जमानत नहीं दी जाती… अंतर बस इतना है कि तब आपातकाल देश पर लगा था, आज जातियों को चुनकर आपातकाल थोपा गया है।
24 मार्च, 1977 से 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई रहे। इनका भी इतिहास पढ़ लीजिए। कहीं, कभी किसी समाज का शोषण नहीं किया।
28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे। अब यदि आपको उ​​​पनाम सिंह के चलते इनसे द्वेष न हो तो इन्होंने भी कभी दलितों की हानि नहीं सोची।
14 जनवरी, 1980 से 31 अक्‍तूबर, 1984 तक इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री रहीं। पहले कार्यकाल में यदि दलितों का शोषण न किया तो दूसरे में भी नहीं ही की होंगी और की होतीं तो जरूर इसका इतिहास होता।
31 अक्‍तूबर, 1984 से 2 दिसम्‍बर, 1989 तक राजीव गांधी ने देश का नेतृत्व किया। इसके बाद 2 दिसम्‍बर, 1989 से 10 नवम्‍बर, 1990 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह। 10 नवम्‍बर, 1990 से 21 जून, 1991 तक चंद्रशेखर। अब फिर वही बात है कि यदि नाम में सिंह होने से ही सारी दिक्कत है तो चंद्रशेखर पर भी शोषण का आरोप लगाया जा सकता है और यदि आज होते तो एससीएसटी एक्ट भी लेकिन यदि बात सच की करें तो इनमें से किसी भी प्रधानमंत्री को दलितों से कभी कोई दिक्कत न थी, ​बल्कि हमेशा दलित ही सरकार और उसकी योजनाओं के केंद्र में रहे।
21 जून, 1991 से 16 मई, 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव और 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे। अब अटलजी पर भी दलितों के शोषण का आरोप सिर्फ ब्राह्मण, मनुवादी की दुर्भावना से ही लगाया जा सकता है, वरना हकीकत सिर्फ यही है कि इस व्यक्ति ने समस्त देश को सबल बनाने की कोशिश की और उसमें एससीएसटी समाज भी शामिल रहा।
1 जून, 1996 से 21 अप्रैल, 1997 तक एच. डी. देवेगौड़ा, 21 अप्रैल, 1997 से 19 मार्च, 1998 तक इंद्र कुमार गुजराल रहे। पुन: 19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही। वही अटलजी जिनके जाने पर पूरा देश रोया। रोने वालों में एससीएसटी समाज का कोई नहीं होगा, ऐसा नहीं कह सकते। तो ऐसे जनप्रिय नेता पर तो इस तबका के शोषण का आरोप बिल्कुल नहीं लगा सकते।
22 मई, 2004 से 26 मई, 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस वैसे भी मुस्लिम से लेकर दलित तुष्टीकरण तक में देश की अन्य पार्टियों से बेहतर पार्टी समझी जाती है तो इस सरकार में तो इसकी आशंका भी जाहिर नहीं की जानी चाहिए।
अब बारी इस सरकार की, जिसका तर्क है 1000 वर्षों के शोषण का। 2014 में जब यह भाजपा सरकार बनी तबसे भी जितनी भी योजनाएं बनीं, अधिकतर का आधार जाति ही रही। यही एससीएसटी जाति। हां, कभी ओबीसी भी। जाति के आधार पर योजना, जाति के आधार पर आयोग, जाति के आधार पर कानून, जाति के आधार पर आरक्षण और अब जाति के आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण की बात…। और इन सभी का आधार सिर्फ एक— 1000 वर्षों का वह शोषण जो कभी, किसी ने किया ही नहीं।

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अभी वोट से भी कीमती नोटा है…

वे जो वर्षों से जातिवादी, भ्रष्टाचारी, अपराधी नेताओं को चुनकर संसद भेजते रहे हैं, उन्हें भी अभी अपने वोट की कीमत समझ आ गई है। सत्ता से लेकर विपक्ष तक के पक्ष में एक आवाज आ रही है कि भाई नोटा न दबाओ, वोट बेकार चला जाएगा। माने फिर से इन्हें जिता दो ताकि ये हमसे अपना ऐतिहासिक बदला (1000 वर्ष) पूरा कर सकें।
भाई लोग, यदि आपको नोटा बेकार लगता है तो हमें आपका वह वोट बेकार लगता है जो बेकार नेताओं को चुन रहा है। देश के तमाम सांसद एससीएसटी एक्ट पर गूंगे हो गए हैं। ऐसे बेजुबानों को सदन भेजकर क्या करना जो बोल ही नहीं सकते? सदन तो बोलने वालों के लिए है न?
भाई, चाहा तो हमने भी हर बार यही कि अपने वोट से एक अच्छी सरकार चुनें। जो वादों और इरादों की पक्की हो। जिसके लिए देशहित सर्वोपरि हो। लेकिन पूरे हुए वादे? और एससीएसटी एक्ट के रूप में सामने तो हैं इरादे! नेक है न यह इरादा? जो कुछ जातियों को तुष्ट करने के लिए देश की अन्य जातियों पर आपातकाल लागू कर दे?
भाई, हमने तो हर बार इन्हें यही सोचकर चुना था कि अब अपनी, आने वाली पीढ़ियों की, देश की तकदीर बेहतर होगी लेकिन हुई? नहीं न! अब इस तरह बार-बार पीठ में छुरा भोंकने वालों को बार-बार चुनकर बार-बार खड्यंत्र के अवसर देने से तो अच्छा है न इस बार का नोटा! यह नोटा बेकार नहीं है। इस समय में वोट की असली कीमत यही है। वोट का मतलब है एक मत और अभी हमारा मत इस बात के लिए है कि एक देश-एक संविधान-विधान हो। जातियों की नहीं, सम्पूर्ण देश की सरकार हो। इसलिए इस बार तो बस नोटा! वह नोटा जो सत्ता को उसकी औकात बताएगा और अन्य सभी दलों को एक सीख, सबक, संदेश दे जाएगा कि अब देश में धार्मिक, जातिवाद का और तुष्टीकरण बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक की गंदी राजनीति और नहीं! अब बस! बस नोटा!

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एससीएसटी एक्ट समाज के लिए कैंसर तो मीडिया के लिए सेंसर है…

खबर कुछ दिन पुरानी है लेकिन अब एससीएसटी एक्ट के दुरुपयोग वाली ऐसी खबरों की आदत डाल लीजिए। खबर पढ़ने पर आपकी तो सिर्फ सुबह खराब होगी, खबर बनने वाले की जिंदगी खराब होनी तय समझिए। यह आशंका हमने तभी जाहिर की थी कि जब सुप्रीम कोर्ट को दरकिनार कर यह एक्ट लाया गया। हमने कहा था कि अब यह एक्ट कइयों को रोजगार देगा, ब्लैकमेलिंग का बन्द धंधा फिर चल पड़ेगा और यह चल पड़ा है। शिकार आम आदमी से पत्रकार तक हो रहे हैं…।
आप सोचिए तो सही! जो व्यक्ति राजस्थान के बाड़मेर का है, कभी पटना गया ही नहीं उस पर पटना में मारपीट करने का केस दर्ज है। फरियादी खुद कभी राजस्थान नहीं गया लेकिन केस दर्ज हो गया कि उसे वहां ले जाकर काम कराया गया और पैसे नहीं दिए गए। इतना ही नहीं, फरियादी ने खुद केस किया भी नहीं! तो क्या बिना किए केस हो गया? यह तो हो नहीं सकता न! यानी केस किसी तीसरे ने किया। कितना आसान हो गया है न किसी पर भी किसी और के नाम से केस ठोंक देना? और जैसा कि एससीएसटी एक्ट के तहत जांच की जरूरत तो रही नहीं है तो थाने में केस दर्ज हो गया, वारंट जारी हो गया और गिरफ्तारी भी हो गई। जमानत भी नहीं ले सकते, जेल तो जाना ही पड़ेगा। गिरफ्तारी में की गई हड़बड़ी तो देखिए केस दुर्गेश सिंह पर दर्ज हुआ, पुलिस ने उठा लिया दुर्ग सिंह को। जाहिर है कि इस एक्ट में आपके नाम से फर्क नहीं पड़ता, दुर्भावना तो जाति के विरुद्ध है, एक्ट भी तो जातियों के ही विरुद्ध है, खास जातियों पर ही लगेगा तो पुलिस ने भी लिफाफा खोले बिना एक्ट का मजमून भांप लिया है। उठा लाई दुर्ग सिंह को। नाम गलत तो क्या हुआ, नाम में ‘सिंह’ तो लगा ही है! इतना काफी है…।
दुर्ग सिंह बाड़मेर के पत्रकार हैं। उन पर पटना के दीघा में मारपीट करने का आरोप है जबकि उस दिन दुर्ग सिंह बाड़मेर में आयोजित एक कार्यक्रम से एफबी लाइव कर रहे थे। जाहिर है केस रंजिशवश की गई है लेकिन सुनेगा कौन? जांच की आवश्यकता ही कहाँ है? वह तो शुक्र है कि मीडिया ने अपने पत्रकार के लिए इतनी मेहनत की और सच्चाई बाहर लाई लेकिन कितने केस का मीडिया ट्रायल होगा? मीडिया को भी तो कई जिम्मेदारी है तो कुछ तो यूहीं अंदर कर दिए जाएंगे और आपको कानोंकान खबर न होगी…। आप आम आदमी हैं, पत्रकार हैं, सरकारी अधिकारी हैं, किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप बेगुनाह हैं तो भी फर्क नहीं पड़ता; फर्क आपकी जाति से पड़ता है क्योंकि जाति देखकर ही आपकी औकात बताने के लिए यह पूरी व्यवस्था की गई है।
यह एक्ट अब आपके लिए ही कैंसर नहीं है, यह मीडिया के लिए भी सेंसर है। आज आप पत्रकारों पर हो रहे झूठे केस पर चुप रहिए, कल यदि सारे पत्रकार इस तरह झूठे केस में फंसाए जाने के डर से चुप हो गए तो जब आप फंसाए जाएंगे तो आपके लिए आवाज उठाने वाला कोई न होगा इसलिए भी निर्दोष दुर्ग सिंह के लिए आवाज उठाइए। आप चौक-चौराहों पर ही बोलिए क्योंकि जिन्हें सदन में बोलने के लिए आपने भेजा है वे चुप हैं। आप फेसबुक पर ही लिखिए, क्योंकि आप जिन्हें समाज के लिए लिखने वाला समझते हैं वे तरह-तरह के खेमे में कैद हैं, कोई वैचारिक गुलामी का शिकार है तो कोई राजनीतिक, संस्थानिक। आप बोल-लिख नहीं सकते तो दूसरों का लिखा ही शेयर कीजिए… आप कुछ भी कीजिए लेकिन समय रहते इस एक्ट के जरिए हो रहे अत्याचार का लोकतांत्रिक ढंग से विरोध कीजिए अन्यथा बने रहिए आप भी राजनीतिक, वैचारिक तुष्टी के लिए इस एक्ट के हिमायती जब तक कि आप खुद किसी झूठे केस में जेल न पहुंचा दिए जाएँ। और तब यकीन मानिए, जब आप जेल में होंगे तो आज आप जिस पत्रकार के लिए खड़े नहीं हो रहे, वह आपके लिए खड़ा होना भी चाहे तो नहीं हो पाएगा क्योंकि वह तो खुद जेल से अपना केस लड़ रहा होगा…।
कोई मुगालता न पालिए, जेल में जाने की बारी आपकी भी आएगी जब कानून ही ऐसा है, गिरफ्तारी का तरीका ही यही है…।

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इस हालात में नोटा न दबाएं तो क्या करें?

यह कर्नल वीएस चौहान हैं। नोएडा के सेक्टर-29 में रहते हैं। इनके पड़ोस में एक महिला रहती हैं। पति एडीएम हैं बावजूद वह आज भी दलित ही हैं जैसा कि देश में अभी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि जाति देखकर कोई गरीब समझा जाता है और अपराध नहीं जाति देखकर सजा दी जाती है…। खैर!
पड़ोसियों से प्रायः किसी न किसी बात पर कुछ लोगों को दिक्कत रहती ही है तो कर्नल साहब से पड़ोसन को भी थी। बस, हिसाब चुकता करने के लिए पड़ोसन को एक्ट मिल गया और उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल भी किया। कर दीं कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का केस। और साथ में एससीएसटी तो लगना ही है…। और यह एक्ट लगने के बाद कुछ बचत है क्या? अग्रिम जमानत कहाँ मिलनी है? और गिरफ्तारी से पहले जांच की कहाँ जरूरत है? … तो देश की सेवा करने वाले 75 वर्षीय कर्नल साहब जेल भेज दिए गए।
केस दर्ज होने की घटना एक सप्ताह पुरानी है। तब हमने अपने साथियों से इस बात का जिक्र किया था कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी को भी दलित ही समझा जाना चाहिए? सबने कहा कि जब तक आधार जाति है तब तक तो समझना ही पड़ेगा…!
आज Anurag भाई की पोस्ट पढ़ी तो पता चला कि केस झूठा था। सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरे ने पोल खोल दी है। पता चला है कि कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का आरोप लगाने वाली महिला ने खुद ही उनकी पिटाई की थी। बेचारे 75 बरस के हैं, पिट गए। अब वह सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रही है…।
कर्नल साहब तो पूर्व सैनिकों की पैरोकारी और सीसीटीवी के दम पर छूट गए हैं, लेकिन अन्य का क्या होगा? अब यह सबकुछ देखने-जानने के बाद नोटा के अलावा कुछ सूझता है क्या?

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… क्योंकि योग्य भारत चाहिए, न कि आरक्षित भारत

बिहार में जदयू ने कहा है कि सवर्णों को भी आरक्षण मिले। इसके पहले लोजपा के राम विलास पासवान यह बात कह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती भी बोल चुकी हैं। और तो और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भी 10% का झांसा दे रही थी…।

दरअसल इन नेताओं-दलों के पास आरक्षण के अलावा देने को कुछ है भी नहीं। यह कभी जाति के नाम पर एक्ट देंगे, कभी आरक्षण। कभी धर्म के नाम पर भड़काएंगे, कभी जाति के नाम पर देश की एकता को आग लगाएंगे। दलित सड़क पर आएगा तो उसे जातिवादी एक्ट का लॉलीपॉप थमाएँगे और जब सवर्ण इसके खिलाफ खड़ा होगा तो उसे आरक्षण देने की बात कहकर भरमाएँगे।

गजब का संविधान है, लोकतंत्र है और शासन है। किसी में कोई तालमेल नहीं। संविधान में दिए धर्म निरपेक्षता, समानता, मौलिक अधिकारों को मजाक बना दिया है इन नेताओं ने। संविधान में सब समान लेकिन हकीकत में दलित से ब्राह्मण तक, हिन्दू से मुस्लिम तक … सिर्फ धर्म-जाति की ही बात। देश के नागरिकों की योग्यता गई तेल लेने। यह गजब का विरोधाभास है कि देश में योग्य युवाओं के लिए किसी दल, सरकार के पास कुछ नहीं है और ख्वाब देश को पुनः विश्व गुरु बनाने का है। हर नेता, दल, सरकार के पास बस कुछ खास धर्म-जातियों के लिए योजनाएं (साजिश) हैं…।

चेतने का यही समय है। वोट के लिए देश और देशवासियों के हित से खेलने का यह खेल अब बन्द होना चाहिए। धर्म-जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण, कानून, सहूलियत हर चीज का विरोध होना चाहिए। यह जातिगत आरक्षण इस समय का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है जो हर क्षेत्र में योग्य युवाओं के रहते हुए भी अयोग्य को मौका देता है और समस्त देश को अयोग्य के हाथ में सौंपता है, उसे कमजोर बनाता है…। इसी तरह एससी-एसटी जैसा जातिवादी एक्ट कुछ खास जातियों को प्रश्रय देता है और बाकी जातियों के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार को कुचलता है…।

इस तरह के धार्मिक-जातिगत तुष्टीकरण, राजनीति, कानून सभी के खिलाफ नोटा को हर वह व्यक्ति हथियार बनाए जो एक डिजर्व इंडिया चाहता है, न कि रिजर्व। नोटा से यह संदेश दीजिए कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब धर्म-जाति का तुष्टीकरण और बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक के नाम पर देश हित से खिलवाड़ और नहीं। एक देश-एक संविधान-एक नियम-कानून से कम कुछ नहीं।

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जातिवाद की राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए…

देश में अभी 4900 के करीब सांसद और विधायक हैं। इसमें से सवर्णों के लिए या कहें कि एक देश-एक कानून के लिए आवाज कितनों ने उठाई? बस दो विधायकों ने जातिवादी एससी-एसटी कानून के खिलाफ मुंह खोला। सांसदों ने तो एक भी नहीं…।
इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने देश में कितने सवर्ण सांसद, विधायक चुने हैं। फर्क तो इससे पड़ता है कि कितने मर्द चुने हैं जो आपके लिए, देश के लिए, सही के लिए खड़े हो सकें।
अलोकतांत्रिक कानून एससी-एसटी एक्ट हो या लगातार जातीय आरक्षण देने का मसला, आपही के चुने इन सभी सवर्ण सांसदों-विधायकों की इसमें सहमति रही है।
ऐसा क्यों? क्योंकि आप इन्हें तब भी वोट देते हैं जब ये आपके खिलाफ हो रही साजिशों में शामिल होते हैं।
यकीन कीजिए, इन्हें आपके होने पर भी आपके होने का जरा भी अहसास नहीं है। इन्हें बस देश में अल्पसंख्यकों, दलितों के ही होने का आभास है।
देश में हर दलित नेता दलितों के कथित हक के लिए उनके साथ खड़ा है। यहां तक कि दलित आंदोलन के नाम पर 2 अप्रैल को सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले, दर्जनभर हत्याएं करने वाले ‘निर्दोषों’ को भी मुकदमों से बरी किए जाने की मांग हो रही है। भाजपा के दलित सांसद, विधायक दलितों के लिए नेतृत्व से लड़ रहे हैं लेकिन सवर्णों के साथ कौन है? या कहें कि कौन है ऐसा जो कहें कि नहीं सभी देशवासी बराबर हैं? सवर्णों के साथ हो रही हकमारी पर सवर्ण नेताओं के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकल रहा जैसे मुंह पर टेप चिपका दिए गए हों। अबकी आएं चुनाव में तो जवाब ऐसा दीजिए कि मुंह से कुछ बोल न सकें जैसे कि चुने जाने के बाद न संसद में, न विधानसभा में ही आपके लिए इनकी आवाज निकल रही है…।
जान लीजिए यह सच कि आप देश में होकर भी अब तक अपने होने का आभास तक इन नेताओं को नहीं करा पाए हैं। अब एक बार खुद भी मान लीजिए कि आप देश में नहीं हैं। चूंकि अब तक होकर भी अपने होने का अहसास नहीं करा पाए हैं तो इस बार नहीं होकर अपने अस्तित्व का अहसास दिलाइए। दबाइए नोटा ताकि यह भी देखें कि जब आप इनके साथ नहीं होते हैं तब ये खुद कहाँ होते हैं। आज तक इन्हें चुनने के लिए वोट करते आए हैं, अब अपने लिए एक वोट कीजिए- नोटा! जातिवादी राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए, अपना और देश का अस्तित्व बचाइए।

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यूं दबाइए नोटा कि माथा पकड़ बोलें जातिवादी नेता… ले लोटा!

नोटा बेकार कतई नहीं है।
यह बताता है कि मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई और विपक्ष तो यह भरोसा तक जगाने में नाकाम रहा कि उसे सत्ता सौंपी गई तो वह कुछ सार्थक कर पाएगा।
यदि आपको इस भाव का अहसास है, खुद के छले जाने का अहसास है तो आपके लिए नोटा सबसे बेहतर विकल्प है। यह बेकार कतई नहीं है।
बूथ पर जाने का अर्थ किसी न किसी को वोट देकर आना ही नहीं है। बूथ पर जाने का अर्थ यह बताकर आना भी है कि तुम में से कोई भी इस लायक नहीं है कि मेरा वोट पा सके।
नोटा सत्ता पक्ष के लिए एक संदेश है कि देखो हम फिर 5 साल बाद बूथ पर आए हैं लेकिन इस बार तुम्हारी गलतियों के कारण तुम्हें चुनने कतई नहीं आए हैं। ठीक से देख लो! हम वोट दे रहे हैं लेकिन तुम्हारे पक्ष में नहीं, तुम्हारे खिलाफ। तुम्हारी तुष्टीकरण वाली नीतियों के खिलाफ। तुम्हारी जातिवादी राजनीति के खिलाफ। तुम्हारी दुर्भावनाग्रस्त सोच के खिलाफ।
जहां कहीं भी नोटा की संख्या इतनी पहुंच पाती है, जितने से कि सत्तासीन नेता हार जाता है तो समझ लीजिए कि बदला चुकता हो गया। समझ लीजिए कि उसे आपके गुस्से ने ही हराया है और यह बात वह खुद भी ठीक से समझ जाएगा। यह संदेश उसके जरिये सभी नेताओं को जाएगा।
आप आज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए क्योंकि आपका आज इन नेताओं ने पहले ही खराब कर रखा है। आप दूरगामी सोचिए। नोटा दूरगामी परिणाम देगा। अपनी तो जैसे—तैसे कट ही रही, कट ही जाएगी; अभी आने वाली पीढ़ियों के हक की रक्षा के ​लिए खड़े होने का वक्त है। कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर आपसे बच्चे पूछें कि जब एक—एक कर उनके अधिकार छीने जा रहे थे तब आप क्या कर रहे थे तो आपके पास कोई जवाब न हो! शर्म की वह स्थिति आने से पहले चेत जाइए। नोटा ही दबाइए।
यकीन मानिए, एससी—एसटी एक्ट से लेकर आरक्षण तक, सिर्फ धर्म—जाति की राजनीति करने वाले नेताओं के मुंह पर मारने के लिए यदि जूते से भी बेहतर कुछ है तो वह नोटा ही है। न संविधान की प्रतियां जलाइए, न कहीं तोड़—फोड़ कीजिए। राजनीतिक स्वार्थ, वोट बैंक के लिए किए जा रहे धार्मिक—जातीय तुष्टीकरण और देश के संविधान और संसाधनों के हो रहे दुरुपयोग का विरोध भी संवैधानिक तरीके से ही कीजिए। अपने संवैधानिक अधिकार— नोटा का प्रयोग ब्रह्मास्त्र समझकर कीजिए।
यदि आप कभी किसी सरकार को चुनने के लिए बूथ पर नहीं गए हैं तो भी इस बार नहीं चुनने के लिए जाइए। इस बार बूथ पर जरूर जाइए। अपने लिए नहीं, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जाइए। जाइए और सिर्फ नोटा दबाने के लिए जाइए।

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यह राहुल का दलित प्रेम है या सवर्ण घृणा…?

इस समय देश में दलित राजनीति की बयार बह रही है। कभी—कभी तो ऐसा लगता है कि मानो देश में कोई और वर्ग रहता ही न हो। बस दलित—दलित—दलित। आज राहुल गांधी भावुक भी हो गए। हमें तो लगा कि कथित दलितों का कथित दर्द देखकर कहीं रो ही न पड़े। इतने मासूम हैं कि बिना जांच ही सवर्णों की गिरफ्तारी का कानून बनने के बाद भी डरे हुए हैं कि कहीं दलितों का शोषण न हो जाए। इनके हिसाब से यह एक्ट अभी उतना प्रभावी नहीं है। शायद, इसमें फांसी का प्रावधान चाह रहे हों! खैर…।
राहुल गांधी की राजनीतिक सोच और समझ कितनी है, इस पर तो किसी बहस की गुंजाइश ही नहीं रह गई है लेकिन इनकी मंशा क्या है, इस पर चर्चा जरूरी है। खासकर तब जबकि इन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर रखा है। ऐसे में जरूरी है जानना कि विपक्ष में होकर भी जो व्यक्ति समस्त देश की चिंता नहीं कर पा रहा; किसी एक खास वर्ग, खास जाति पर ही फिदा हुआ जा रहा है वह प्रधानमंत्री बना तो क्या करेगा!
देश के प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है कि वह हर नागरिक को वैसे ही एक समान समझे जैसे कि कोई पिता अपने सभी बच्चों को समझता है। वह आगे बढ़ने वाले बच्चे को प्रोत्साहित करे, गलत करने वाले को डांटे, कमजोर बच्चे को बल प्रदान करे। वह सबको स्कूल भेजे, सबको उसकी क्षमता के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने और उसे प्राप्त करने में मदद करे। प्रधानमंत्री ऐसा हो जो नागरिकों की धर्म—जाति न देखे। उन्हें एक जैसा समझे। खैर…।
राहुल गांधी कल जंतर मंतर पर दलितों और जनजातीय समुदाय द्वारा आयोजित एक रैली में बोल रहे थे। कहा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस न्यायाधीश को दोबारा नौकरी देकर सरकार की दलित विरोधी मानसिकता पर मुहर लगा दी है जिन्होंने दलितों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के प्रावधान वाले अधिनियम को कमजोर करने के आदेश पारित किए थे। मोदी दलित विरोधी हैं…।
बस यह बयान काफी है राहुल गांधी की मंशा जाहिर करने के लिए। यदि राहुल गांधी दलितों के दर्द से आहत थे तो उनकी पीड़ा अब तक दूर हो जानी चाहिए थी क्योंकि एससी—एसटी कानून में बिना जांच ही सवर्ण की गिरफ्तारी का प्रावधान कर दिया गया है। अब इससे अधिक क्या होगा? लेकिन नहीं, उन्हें दलितों को आकर्षित करना है तो इसके लिए इससे भी आगे जाकर शायद सवर्णों से बैर साधना चाह रहे हैं। अब उन्हें वह न्यायमूर्ति तक पसंद नहीं, जिन्होंने इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कही थी। यानी, एक तरह से सवर्णों को कुछ हद तक राहत दी थी।
न्यायमूर्ति एके गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने 20 मार्च को अपने आदेश में एससी—एसटी एक्ट के राजनीतिक या निजी कारणों के लिए दुरुपयोग किए जाने की बात कही थी जो कि बिल्कुल सत्य थी। दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा था कि आगे से इस अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करनी होगी और अग्रिम जमानत भी दी जा सकेगी। इसी के बाद 2 अप्रैल को देशभर में आंदोलन के नाम पर हिंसा की आग भड़की और इस आग में नेताओं ने जमकर दलित राजनीति की रोटियां सेंकीं। इसी हंगामे के बाद भाजपा सरकार ने एक्ट में संशोधन किया ताकि उसका दलित वोट बैंक न खिसके। अब राहुल इस एक्ट को भी निष्प्रभावी बता रहे हैं ताकि इनका वोट बैंक न खिसके।
बता दें कि न्यायमूर्ति एके गोयल 6 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हो गए और उसी दिन राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के चेयरमैन नियुक्त हुए। राहुल गांधी को इसी से दिक्कत है। यह राहुल का कमाल का दलित प्रेम है कि किसी न्यायाधीश ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बात करते हुए इतना ही कह दिया कि एससी—एसटी एक्ट में बगैर जांच गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए तो वे चाहते हैं कि अब वह भूखो मर जाए, उसे नौकरी से निकाल दी जानी चाहिए या फिर कभी, कहीं नौकरी न दी जाए।
यानी, इनकी चले तो इस देश में सिर्फ सवर्णों की ही नौकरी पर रोक नहीं लगनी चाहिए, बल्कि हर उस शख्स की नौकरी—प्रोन्नति रोक दी जानी चाहिए जो सवर्णों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाए। यह दलित प्रेम है या सवर्णों के प्रति इनकी घृणा? क्या समझें?
राहुल या कोई भी नेता यदि सच में किसी दलित पर हुए जुल्म के खिलाफ खड़ा हो तो स्वागत है। जिस किसी दलित पर कोई भी अत्याचार हो, जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसे जेल भेजा ही जाना चाहिए, इसका स्वागत है। यहां तो यह भी दरियादिली दिखाई गई है कि बिना जांच ही जेल होगी। होना तो यह चाहिए कि धर्म—जाति के आधार पर कानून ही न बने लेकिन वोट बैंक की राजनीति में पड़कर भाजपा ने इतनी दरियादिली दिखा ही दी है तो राहुल की दलितों के प्रति दरियादिली तो इससे आगे बढ़कर सवर्ण घृणा तक पहुंचनी ही चाहिए।
दरअसल, जिस तरह इन नेताओं ने लगातार आरक्षण के जरिये एक समाज को बैसाखी की आदत लगा दी है, ये खुद भी दलितों की बैसाखी के सहारे राजनीति करने के आदी बन चुके हैं। इनकी गंदी राजनीति के चलते विविधताओं का देश, हजारों जातियों का देश, दो-चार जातियों पर सिमट गया है। इस तरह धर्म-जाति के नाम पर देश को बांटने की राजनीति करने वाले राहुल ही नहीं, हर नेता के खिलाफ खड़े होने का वक्त है। चुनाव में बेहतर विकल्प न मिले तो नोटा दबाइए लेकिन किसी जातिवादी नेता के हाथ में देश की तकदीर बिल्कुल न सौंपिए। सबसे पहले राजनीति से जाति को खत्म कीजिए। तभी यह देश भी बचेगा और सम्पूर्ण समाज भी।

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सवर्ण जाति के नाम पर एक नहीं तो यह बड़ी खूबी है!

सरकार दलितों की होगी,
सरकार पिछड़ों की होगी,
सरकार अल्पसंख्यकों की होगी…!
अभी हर नेता यही जुमला दोहरा रहा है। क्या अभी किसी नेता में हिम्मत है जो कहे कि सरकार सवर्णों की होगी? कह दिया तो वह जीत पाएगा? नहीं! हरगिज नहीं!
क्यों? क्योंकि बाकी जातियां उसको नफरत से वोट नहीं करेंगी और उसकी अपनी जाति से भी बहुत कम वोट मिल पाएंगे। ऐसा क्यों? क्या इसलिए क्योंकि सवर्णों में एकता नहीं है? नहीं! ऐसा इसलिए कि सवर्ण समाज अभी भी सबसे उदार, सुलझा समाज है जो जाति पर नहीं मचलता। सवर्ण से वोट लिया जा सकता है विकास के नाम पर, सदाचार के नाम पर, देशभक्ति के नाम पर लेकिन जाति के नाम पर नहीं ! हां, प्रत्याशी सवर्ण हो तो उसे कुछ वोट जाति आधार पर भी मिल सकते हैं किंतु सिर्फ जाति को लेकर चुनाव में खड़ा होगा तो उसकी जमानत जब्त होनी तय है। इस समाज में कुछ जातिवादी उसी तरह हैं जैसे अन्य जातियों में कुछ ही जातिवादी नहीं हैं।
सवर्ण समाज की यह नाकामी बिल्कुल नहीं है कि वह जातिवाद पर रीझ नहीं रहा, जाति के नाम पर एक नहीं हो रहा; यह तो उसकी सबसे बड़ी खूबी है। सवर्ण एक है- राष्ट्र के नाम पर, भले नहीं है जाति के नाम पर। यह बात देश की सियासत भी समझती है। इसलिए सवर्णों से वोट लेने के लिए कोई नेता कभी सवर्ण को नहीं पुकारता है, वह देश को पुकारता है जैसे कि मोदी ने पुकारा था। ओबीसी मोदी को सबसे अधिक वोट सवर्णों ने दिए थे। नेता की सबसे कम जाति यही समाज देखता है इसीलिए तो इस समाज का कोई घोषित नेता नहीं है जबकि अधिकतर जातियां अपनी जाति की पुकार होते ही एकत्र हो जाती हैं इसीलिए इन जातियों के अपने नेता हैं। सवर्ण वोटर तो है पर वोट बैंक नहीं है जिसपर कोई डाका डाल सके। इस देश में यदि सबसे कम जातीय भावना वाला समाज है तो वह सवर्ण ही है लेकिन देखिए कि गजब की ब्रांडिंग की गई है कि सबसे अधिक जातिवादी, मनुवादी भी यही समाज घोषित है।
कामचोर नेताओं की मजबूरी है। नेता चाहते हैं कि वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, लगना ऐसा चाहिए कि दलितों का शोषण किया जा रहा है और सवर्ण ही वह शोषक है। 1000 वर्षों के शोषण की गढ़ी गई और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी के पीछे यही मंशा है। सबको पता है कि सवा अरब की आबादी वाले बड़े देश में सभी वंचितों, गरीबों को राहत देना बड़ा काम है इसलिए नेताओं ने सुविधाजनक काम चुना है- सिर्फ दलितों को ही वंचित घोषित कर सिर्फ इनके लिए ही काम करने का। बावजूद यह काम भी ईमानदारी से नहीं किया। आज भी दलितों का जो वंचित तबका है, वह कमोबेश उसी हाल में है। इन नेताओं की मंशा है कि समाज का एक हिस्सा यूं ही रहे ताकि इससे कभी जाति के नाम पर रिझाकर वोट लिया जा सके तो कभी सवर्णों से डराकर। दलितों का वोट सिर्फ जाति के नाम पर ही हासिल किया जा सके इसके लिए इनका सवर्णों से नफरत करते रहना जरूरी है। यही नेताओं की सोच है, खासकर दलित-पिछड़ों की ही राजनीति करने वाले नेताओं की राजनीति का आधार ही यही है। देश की इसी ओछी राजनीति ने दलितों, पिछड़ों को निरीह और सवर्णों को शैतान के रूप में प्रस्तुत किया है। नेताओं के इस तरह के राजनीतिक षड्यंत्र के बाद भी यदि सवर्ण उतना जातिवादी नहीं हुआ है तो यह अच्छा है। यदि जाति के नाम पर सवर्ण एक नहीं है तो यह इसकी खूबी है, न कि नाकामी। सवर्ण देश के नाम पर एक है। इसी तरह की जागरूकता सभी जातीय समाज में होनी चाहिए।

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देश से सवर्णों को मिटाने की राजनीति !

उत्तर प्रदेश में मायावती ने नारा दिया था— तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। तिलक माने कि ब्राह्मण। तराजू माने कि बनिया और तलवार यानी कि क्षत्रिय। इन सभी को जूते मारो!
क्या बात है! इतनी नफरत? एक दलित नेता साफ तौर पर सवर्णों को जूते मारने के लिए कह रही है और सभा में दलित तालियां बजा रहे हैं। बजाएं भी क्यों नहीं इन्हें बताया गया है कि 1000 वर्षों तक सवर्णों ने इनका शोषण किया है। कमाल की बात है कि दलितों के मन में सवर्णों के प्रति नफरत भरकर, सवर्णों को जूते मारने की बात कहकर ये नेता कहते हैं कि दोनों एक थाली में क्यों नहीं खाते?
हम मानते हैं कि कभी धर्म की खामियों के कारण दलितों को नुकसान हुआ था, किंतु अब भी यदि सवर्ण और दलित एक थाली में नहीं खा पा रहे तो उसकी असली वजह यह दलित राजनीति ही है…।
अच्छा! कमाल की बात यह भी है कि जो मायावती दलितों की ब्रांडेड नेता हैं, वह सवर्णों को जूते मार सकती हैं। फिर भी दबंग कौन? शोषक कौन जूते खाने वाला सवर्ण ही न! और शोषित कौन? जूते मारने वाली मायावती न!
जिस तरह खुलेआम सवर्णों को जूते मारने की बात की जाती है, यदि दलितों को कह दी जाए तो? बवाल मच जाएगा न? गाली पर ही गिरफ्तारी है, जूते पर क्या होगा? लेकिन, कितना आसान है सवर्णों को जूते मारना…।
यह कुछ जातियों को खुलेआम जूते मारने की बात कहना— क्या इससे बड़ा भी कोई मनुवाद हो सकता है? क्या मायावती से बड़ा कोई मनुवादी है? इसके बाद भी मनुवादी कौन है— सवर्ण! कितनी अजीब बात है कि इस तरह के मनुवादी नेता खुद को ​दलित, शोषित, पिछड़ा बताते हैं और देश का संविधान तक मान लेता है? सिर्फ जाति के कारण। इतनी दुर्भावना! ओह! 1000 वर्षों का शोषित, सताया समाज है, यह तो जूते मार ही सकता है…।
बिहार में लालू प्रसाद ने कहा था— भूरा बाल साफ करो। भू यानी भूमिहार, रा यानी राजपूत, बा यानी ब्राह्मण और ल यानी लाला—कायस्थ। भूरा बाल साफ करो यानी कि सवर्णों को साफ कर दो। इस तरह किसी और जाति को साफ करने की बात कभी किसी नेता ने कही है? कही जा सकती है? कह दे तो? बवाल मच जाएगा न? लेकिन, सवर्णों को साफ करने की बात कोई भी कह सकता है! और गजब की बात है कि फिर भी दबंग कौन है? शोषक कौन है? सवर्ण!
सवर्णों को सीधे साफ करने, मार देने की बातें मंचों से हो रही है लेकिन कहीं कोई एफआईआर नहीं! कोई गिरफ्तारी नहीं! कोई हो-हल्ला नहीं! सवर्ण मारा भी जाए तो कोई बात नहीं क्योंकि यह समाज 1000 वर्षों का ऐतिहासिक शोषक है। सवर्ण तो कहे भी कि उसे किसी ने गाली दी है तो नहीं माना जाएगा। उसे कोई गाली कैसे दे सकता है? और गाली दे भी दे तो उसे लग कैसे सकता है? गाली तो सिर्फ कथित दलित, पिछड़ों को आहत करती है…।
दलित, पिछड़ी राजनीति के नाम पर इस समय देश में सवर्णों के खिलाफ खुलेआम जहर बांटा जा रहा है। कभी सीधे—सीधे सवर्णों को साफ करने की बात कहकर तो कभी दलितों को खुश करने के लिए उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण, नौकरी, प्रोन्नति देकर। देश में सवर्णों को साफ करने की बात ही नहीं कही जा रही, इसके लिए बकायदा इंतजाम किए जा रहे हैं। धीरे—धीरे सबकुछ सवर्णों से छीना जा रहा है। पहचान के लिए बस अब मताधिकार ही रह गया है जो बताता है कि सवर्ण इस देश का नागरिक है। इसके बाद भी उसके लिए कहीं कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि सबको बताया गया है कि सवर्ण 1000 वर्षों का शोषक समाज है।

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