हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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आरक्षण के लिए क्या महज यह कह देना ही काफी है कि इस तबका का शोषण हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में आरक्षण पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था— यह तबका 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना झेल रहा है। एससी-एसटी पहले से ही पिछड़े हैं इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए अलग से किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है।
कमाल का तर्क है न कि प्रोन्न​ति में आरक्षण देने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है? यानी जाति काफी है! कैसे भी वोट लेना है तो कैसे भी आरक्षण दे देना है। अब सही बात तो कोर्ट में सरकार नहीं कह सकती न कि दलितों का एकमुश्त वोट वह आरक्षण देकर खरीद रही है? यह सच तो न अभी की सरकार कह सकती है, न पिछली इसलिए हर सरकार के पास यही तर्क है— 1000 वर्षों का शोषण! एससीएसटी एक्ट के पीछे भी शोषण से अधिक यही वोट बैंक की राजनीति है और आरक्षण या प्रोन्नति में आरक्षण के पीछे भी।
क्या कोई सरकार इस तरह बेशर्मी से कह सकती है कि आंकड़े की जरूरत ही नहीं है? माने मायावती दलित हैं, वह 1000 वर्षों से शोषित हैं, उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए? माने राम विलास पासवान दबे—कुचले हैं? उनके सुपुत्रों का आरक्षण मिलना चाहिए? माने जिस देश का दलित राष्ट्रपति है, उस देश में यह तर्क कि यह समाज 1000 वर्षों से प्रताड़ना झेल रहा है? माने जो तबका प्रताड़ना झेल रहा है, उस तबके का व्यक्ति राष्ट्रपति है? यह कैसा तर्क है? यह कैसी प्रताड़ना है?
सरकार यदि यह स्पष्ट नहीं कर सकती कि इस समाज को आरक्षण में प्रोन्नति देना क्यों आवश्यक है तो क्या यही स्पष्ट कर सकती है कि 1000 वर्षों तक इस समाज का शोषण किसने किया है? अभी तो 4 वर्षों से खुद यही सरकार है जो दुहाई दे रही है 1000 वर्षों से प्रताड़ित किए जाने का तो क्या मानें कि 1000 वर्षों में इन चार वर्षों में भी यह तबका प्रताड़ना ही झेलता रहा है? कमाल है कि देश को 1947 में आजादी मिल गई थी और इस दौरान 73 वर्षों तक इस तबका का शोषण होता रहा! शोषण की यह कहानी सुना—सुनाकर कब तक कुछ जातियों को सिरमौर और बाकियों को कुचलने का प्रयास चलता रहेगा? इसी शोषण की कहानी की बुनियाद पर आजाद भारत के संविधान में एससीएसटी समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया लेकिन क्या 10 बरस बीते नहीं? 7 बार 10 बरस बीत जाने के बाद क्या लक्ष्य की पूर्ति नहीं हुई? नहीं हुई तो क्यों? क्या इसके लिए भी सवर्ण जिम्मेदार हैं?
जाहिर है कि 1000 वर्षों में आजादी के साल भी शामिल हैं और इस लिहाज से सरकार यह नहीं कह सकती कि आजाद भारत में उसने भी इस तबका का शोषण किया है तो इसका सीधा मतलब है कि शोषण अगड़ी जातियां करती रही हैं। यानी, अपराधी सरकार नहीं, अगड़ी जातियां हैं। इसीलिए एससीएसटी एक्ट के जरिये कथित अगड़ी जातियों पर आपातकाल लागू करने में सरकार ने जरा भी विचार नहीं किया क्योंकि वह पहले से विचार कर चुकी है कि यह जातियां शोषक हैं। मगर इतिहास में इन जातियों ने कब एससीएसटी समाज का शोषण किया, क्या इसका कोई आंकड़ा है? या बस 1000 वर्षों तक के शोषण की गढ़ी गई कहानी से ही आगे भी यह देश चलता रहेगा? यह सरकार सबकुछ तय करती रहेगी?
शोषण तो कोई शासक ही कर सकता है न या उसके जैसा ही कोई अन्य ताकतवर? तो क्या कभी इतिहास में जाकर सरकार ने पता भी किया है कि कब अगड़ी जातियां सिर्फ राजा हुआ करती थीं, जब एससीएसटी तबका सिर्फ प्रजा हुआ करता था? आखिर ऐसा कौन—सा कालखंड था जब राजा कोई सवर्ण था और उसने अपनी सारी दलित प्रजा को जेल में डाल दिया था या उससे चक्की पिसवाई थी, उसका राशन—पानी बंद कर दिया था…। 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना का मतलब है 1018 से अब तक। यदि इतिहास पर नजर डालें तो इस दौरान मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक का शासन रहा। क्या मुगलों ने एससीएसटी समाज को अलग छांटकर उस पर जुल्म ढाया? क्या अंग्रेजों ने अलग से एससीएसटी समाज की पहचान कराई और उनपर अलग से अत्याचार किया? जिन शासकों ने भी जुल्म ढाया, भारतवासियों पर ढाया लेकिन प्रताड़ना का इतिहास सिर्फ इसी जाति का क्यों है? यदि एससीएसटी समाज के साथ ही यह सभी जातियां भी इस कालखंड में प्रताड़ित होती रही हैं तो यह झूठ क्यों रचा गया है? और इस झूठ के आधार पर कुछ जातियों को आगे बढ़ाने और अन्य सभी को प्रताड़ित करने के लिए सरकारी योजनाएं कब तक चलाई जाती रहेंगी? कब तक देशहित नहीं, कुछ जाति हित को ध्यान में रखकर सत्ता काम करती रहेगी?
1000 वर्षों का शोषण रटने वाली सरकार ने इतिहास पढ़ा ही नहीं है, ऐसा तो हो नहीं सकता तो यह तर्क एक साजिश ही तो है कि इस तबका का शोषण हुआ है इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण मिलना चाहिए?

सरकार के पास जब प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए यही तर्क है कि एससीएसटी समाज का 1000 वर्षों तक शोषण हुआ है और बाकी जातियों पर एससीएसटी एक्ट थोपने की पृष्ठभूमि भी शायद यही है तो हमें भी यह समझ लेना जरूरी हो गया है कि 1000 वर्षों में कब, किन ब्राह्मणों, राजपूतों, बनियों, कायस्थों, भूमिहारों या अन्य जातियों ने इस तबका को प्रताड़ित किया था। अब उन सभी के लिए 1000 वर्षों का इतिहास पढ़ना जरूरी हो गया है, जो इसी आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
1000 वर्ष यानी अब से 1018 तक। 1001 में महमूद गजनी ने भारत पर पहली बार आक्रमण किया था और पंजाब के शासक जयपाल को हराया। 1025 में उसने सोमनाथ मंदिर को विध्‍वंस कर दिया। आज शोषक समझकर हर अधिकार से वंचित की जा रहीं जातियां यदि उस समय इतनी सबल थीं कि एससीएसटी समाज का शोषण कर रही थीं तो यह जातियां मंदिर को विध्वंस होता क्यों ​देखती रहीं? क्या तब सनातन धर्म नहीं था? भगवा ध्वज नहीं था? क्या तब ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं थे? आज जो जातियां हैं, वह सभी तब भी थीं। आज जो भक्ति ईश्वर के प्रति है, वह तब भी थी लेकिन इन सबके बावजूद यदि प्रभु का घर मंदिर विध्वंस होता रहा तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि यह जातियां गजनी का सामना करने की स्थि​ति में नहीं थीं। यदि होतीं तो गजनी तभी गाज फेंक चुका होता। यह जातियां बाहर से आए आक्रमणकारियों का गुलाम न बन जातीं। कोई शौक नहीं था किसी को गुलाम बनने का। न तब, न अब।
1191 में तराई का पहला युद्ध हुआ। 92 में दूसरा युद्ध हुआ। 1206 में दिल्‍ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्‍याभिषेक हो गया। 1221 में भारत पर चंगेज खान ने हमला किया। 1236 में दिल्‍ली की गद्दी पर रजिया सुल्‍तान का राज्‍याभिषेक कर दिया गया। 1296 में अलाउद्दीन खिलजी का हमला हुआ। 1325 में मोहम्‍मद तुगलक का राज्‍याभिषेक हुआ। 1351 में फिरोजशाह का राज्‍याभिषेक किया गया। 1398 में तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया…
अभी जो सरकार खुद इतिहासकार भी बनी बैठी है, वह बताए तो सही कि इनमें से कौन ब्राह्मण था, राजपूत था, मनुवादी था? जिसके द्वारा शोषण किए जाने का आधार बनाकर देश में जाति के आधार पर आरक्षण से लेकर कानून तक पारित किया जा रहा है। बताइए न कि तब कहां थीं वह हिंदू जातियां, जो शोषण कर रही थीं? और कहां था वह तबका भी जो शोषित हो रहा था। देश को तो बाहरी आक्रांता लूटते जा रहे थे और देश का हर तबका देखता जा रहा था…।
1494 में फरघाना में बाबर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई हुई। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया। मुगल शासन की स्‍थापना की। 1527 में खानवा की लड़ाई हुई। बाबर ने राणा सांगा को हराया। 1530 में हुमायूं का राज्‍याभिषेक हुआ। 1539 में शेरशाह सूरी ने हुमायूं का हराया और भारत का सम्राट बना। 1540 में कन्‍नौज की लड़ाई लड़ी गई। 1555 में हुमायूं ने दिल्‍ली की गद्दी को फिर से हथिया लिया। 1556 में पानीपत की दूसरी लड़ाई लड़ी गई। 1565 में तालीकोट की लड़ाई हुई। 1576 में हल्‍दीघाटी की लड़ाई हुई। राणा प्रताप ने अकबर को हराया…।
हां! अब राणा प्रताप को मनुवादी कहा जा सकता है क्योंकि दलित या मनुवादी—सवर्ण—शोषक सबकुछ कहे जाने का आधार जाति है लेकिन गौर कीजिए कि राणा प्रताप ने भी एससीएसटी समाज को नहीं हराया, एक मुस्लिम शासक को हराया था। फिर शोषण कब, किसका, किसने किया?
1597 में राणा प्रताप की मृत्‍यु हो गई। 1600 में ईस्‍ट इंडिया कंपनी की स्‍थापना हुई। 1605 में अकबर की मृत्‍यु के बाद जहाँगीर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1627 में जहांगीर की मृत्‍यु हो गई। 1628 में शाहजहां भारत का सम्राट बना। 1659 में औरंगजेब का राज्‍याभिषेक हुआ। 1665 में औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया। शिवाजी इतने मजबूत होते तो कैद क्यों हो गए? और यदि हो गए तो प्रताड़ित तो शिवाजी हुए न? यह सारी लड़ाइयां जब लड़ी जा रही थीं तब वह समाज कहां था जो अभी स्वयं को मूल निवासी बता रहा है और बाकियों को बाहर से आया हुआ? यदि इन कथित मूल निवासी के अलावा सभी बाहरी थे तो बाहरी ही बाहरी से क्यों लड़ रहे थे? सभी बाहरियों को मिलकर तो मूल निवासियों पर शासन करना चाहिए था न?
1739 में नादिरशाह ने भारत पर हमला किया। 1757 में प्‍लासी की लड़ाई हुई। लॉर्ड क्‍लाइव के हाथों भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक शासन की स्‍थापना की गई। कमाल है कि सारी जातियां एससीएसटी समाज पर जुल्म ढ़ाने में इतनी व्यस्त थी कि वे खुद गुलाम होती चली गईं।
1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। शाहआलम द्वितीय भारत का सम्राट बना। 1764 में बक्‍सर की लड़ाई, 1767-69 में पहला मैसूर युद्ध, 1780-84 में दूसरा मैसूर युद्ध हुआ। 1799 में चौथा मैसूर युद्ध हुआ। टीपू सुल्‍तान की मृत्‍यु हो गई। 1839-42 में पहला अफगान युद्ध हुआ। 1845-46 में पहला अंग्रेज-सिक्‍ख युद्ध हुआ। 1852 में दूसरा अंग्रेज-बर्मा युद्ध हुआ।
इस दौरान कब कौन सवर्ण राजा था, जिसने दलितों पर जुल्म किया? इतिहास देखकर बताए वह सरकार जो 1000 वर्षों के प्रताड़ना का तर्क दे रही है। यदि इस ​इतिहास में प्रताड़ना नहीं हुआ तो वह इतिहास हमें भी पढ़ाए जिसमें उसने पढ़ा है कि 1000 वर्षों से एससीएसटी समाज का शोषण होता रहा है और अन्य समाज शोषक बना रहा है…। आखिर, आपकी सारी योजनाओं का आधार यही तो है?
1857 में स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम लड़ा गया। पता है क्रांतिकारी कौन था? मंगल पांडेय? जी हां, ब्राह्मण, सवर्ण, मनुवादी कहकर आरोप इन पर भी लगाया जा सकता है कि दलितों का शोषण किया लेकिन इतिहास की हकीकत यह है कि इन्होंने एससीएसटी समाज ही नहीं, समस्त देश को बचाने के लिए अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी। ब्राह्मण ही नहीं, देश की हर जाति अंग्रेजों को हटाने के लिए लड़ रही थी लेकिन हैरानी है कि देश में कहीं एससीएसटी समाज अंग्रेजों से लड़ नहीं रहा था बल्कि इन जातियों के शोषण का शिकार हो रहा था…।
1911 में दिल्‍ली भारत की राजधानी बनी। 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने लखनऊ समझौते पर हस्‍‍ताक्षर किया। 1919 में अमृतसर में जालियाँवाला बाग हत्‍याकांड हुआ। जालियांवाला बाग में मरने वाले एससीएसटी न थे, मारने वाले सवर्ण न थे…। सभी में जुनून देश को बचाने के लिए था, न कि एससीएसटी समाज को प्रताड़ित करने का।
1920 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई। 1927 में साइमन कमीशन का बहिष्‍कार हुआ। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई। 1931 में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। अब महात्मा गांधी को भी जाति के आधार पर सवर्ण— शोषक कहा जा सकता है लेकिन सिर्फ थेथरई से, इतिहास में ऐसा गांधीजी ने नहीं किया बल्कि हरिजन कहकर सम्मानित ही किया।
1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। अगस्त क्रांति में देश का अधिकतर हिस्सा शामिल हो गया लेकिन एससीएसटी समाज तब भी कहीं प्रताड़ित हो रहा था…।
1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की भारत यात्रा हुई। केंद्र में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। 1947 में भारत का विभाजन हुआ और स्वतंत्रता मिली। विभाजन के समय सभी हिंदू—मुस्लिम प्रताड़ित हुए। दंगे—फसाद हुए। प्रताड़ित तो हुए सभी मगर प्रताड़ना का इतिहास बना सिर्फ एससीएसटी समाज का।
15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली। गौर कीजिए सरकार, देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली क्योंकि शासक अंग्रेज थे, न कि वह जातियां जिन पर जुल्म ढहाने का आरोप है। और जब आजादी मिली तो सिर्फ इन्हीं जातियों को नहीं मिली, एससी—एसटी समाज को भी मिली। जब गुलाम रहे, तब भी सभी गुलाम रहे और जब आजाद हुए तब भी सभी आजाद हुए लेकिन सरकार के पास 1000 वर्षों के शोषण का इतिहास सिर्फ इसी समाज का न जाने कहां से आया है। खैर…
1948 में 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई। 1950 में 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू हुआ। इस संविधान में इस समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन, आज तक किसी सरकार ने गिनने की कोशिश नहीं की है कि कितने वर्ष हो गए आरक्षण देते? इतने वर्षों तक आरक्षण देने के बाद अब इस समाज की क्या स्थिति है? क्या यह जानना जरूरी नहीं है? बस आरक्षण या एक्ट देते रहना जरूरी है? क्यों कोई आंकड़ा नहीं है? जब सर्वोच्च न्यायालय आंकड़े मांग रहा है तो वह क्यों नहीं मिल रहा? बस थेथरई? गालगोद? इसी से चलता रहेगा देश?
15 अगस्‍त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पं. जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे। नाम में पंडित होने के कारण इन्हें भी मनुवादी कहा जा सकता है लेकिन दलितों का शोषण किया ऐसा तो नहीं कह सकते न?
27 मई, 1964 से 9 जून, 1964 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। एक महीने के कार्यकाल में यह तो चाहते तो भी किसी तबका का शोषण नहीं कर पाते।
9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल रहा। नाम में शास्त्री उपनाम लगे होने से यदि कोई पूर्वाग्रह से पीड़ित न हो जाए तो शोषण का आरोप इनपर भी नहीं लगाया जा सकता।
11 जनवरी, 1966 से 24 जनवरी, 1966 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। अब इनसे भी ऐसी आशंका जाहिर नहीं कर सकते कि इन्होंने शोषण किया होगा।
24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री रहीं। आपातकाल लागू भी कीं तो पूरे देश पर, न कि सिर्फ एससीएसटी पर जिस तरह कि आज चुनकर एससीएसटी एक्ट का आपातकाल जातियों पर लागू किया गया है। इंदिरा गांधी के आपातकाल के समय अग्रिम जमानत की व्यवस्था हटा दी गई थी, इस एक्ट में भी अग्रिम जमानत नहीं दी जाती… अंतर बस इतना है कि तब आपातकाल देश पर लगा था, आज जातियों को चुनकर आपातकाल थोपा गया है।
24 मार्च, 1977 से 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई रहे। इनका भी इतिहास पढ़ लीजिए। कहीं, कभी किसी समाज का शोषण नहीं किया।
28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे। अब यदि आपको उ​​​पनाम सिंह के चलते इनसे द्वेष न हो तो इन्होंने भी कभी दलितों की हानि नहीं सोची।
14 जनवरी, 1980 से 31 अक्‍तूबर, 1984 तक इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री रहीं। पहले कार्यकाल में यदि दलितों का शोषण न किया तो दूसरे में भी नहीं ही की होंगी और की होतीं तो जरूर इसका इतिहास होता।
31 अक्‍तूबर, 1984 से 2 दिसम्‍बर, 1989 तक राजीव गांधी ने देश का नेतृत्व किया। इसके बाद 2 दिसम्‍बर, 1989 से 10 नवम्‍बर, 1990 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह। 10 नवम्‍बर, 1990 से 21 जून, 1991 तक चंद्रशेखर। अब फिर वही बात है कि यदि नाम में सिंह होने से ही सारी दिक्कत है तो चंद्रशेखर पर भी शोषण का आरोप लगाया जा सकता है और यदि आज होते तो एससीएसटी एक्ट भी लेकिन यदि बात सच की करें तो इनमें से किसी भी प्रधानमंत्री को दलितों से कभी कोई दिक्कत न थी, ​बल्कि हमेशा दलित ही सरकार और उसकी योजनाओं के केंद्र में रहे।
21 जून, 1991 से 16 मई, 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव और 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे। अब अटलजी पर भी दलितों के शोषण का आरोप सिर्फ ब्राह्मण, मनुवादी की दुर्भावना से ही लगाया जा सकता है, वरना हकीकत सिर्फ यही है कि इस व्यक्ति ने समस्त देश को सबल बनाने की कोशिश की और उसमें एससीएसटी समाज भी शामिल रहा।
1 जून, 1996 से 21 अप्रैल, 1997 तक एच. डी. देवेगौड़ा, 21 अप्रैल, 1997 से 19 मार्च, 1998 तक इंद्र कुमार गुजराल रहे। पुन: 19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही। वही अटलजी जिनके जाने पर पूरा देश रोया। रोने वालों में एससीएसटी समाज का कोई नहीं होगा, ऐसा नहीं कह सकते। तो ऐसे जनप्रिय नेता पर तो इस तबका के शोषण का आरोप बिल्कुल नहीं लगा सकते।
22 मई, 2004 से 26 मई, 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस वैसे भी मुस्लिम से लेकर दलित तुष्टीकरण तक में देश की अन्य पार्टियों से बेहतर पार्टी समझी जाती है तो इस सरकार में तो इसकी आशंका भी जाहिर नहीं की जानी चाहिए।
अब बारी इस सरकार की, जिसका तर्क है 1000 वर्षों के शोषण का। 2014 में जब यह भाजपा सरकार बनी तबसे भी जितनी भी योजनाएं बनीं, अधिकतर का आधार जाति ही रही। यही एससीएसटी जाति। हां, कभी ओबीसी भी। जाति के आधार पर योजना, जाति के आधार पर आयोग, जाति के आधार पर कानून, जाति के आधार पर आरक्षण और अब जाति के आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण की बात…। और इन सभी का आधार सिर्फ एक— 1000 वर्षों का वह शोषण जो कभी, किसी ने किया ही नहीं।

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एससीएसटी एक्ट समाज के लिए कैंसर तो मीडिया के लिए सेंसर है…

खबर कुछ दिन पुरानी है लेकिन अब एससीएसटी एक्ट के दुरुपयोग वाली ऐसी खबरों की आदत डाल लीजिए। खबर पढ़ने पर आपकी तो सिर्फ सुबह खराब होगी, खबर बनने वाले की जिंदगी खराब होनी तय समझिए। यह आशंका हमने तभी जाहिर की थी कि जब सुप्रीम कोर्ट को दरकिनार कर यह एक्ट लाया गया। हमने कहा था कि अब यह एक्ट कइयों को रोजगार देगा, ब्लैकमेलिंग का बन्द धंधा फिर चल पड़ेगा और यह चल पड़ा है। शिकार आम आदमी से पत्रकार तक हो रहे हैं…।
आप सोचिए तो सही! जो व्यक्ति राजस्थान के बाड़मेर का है, कभी पटना गया ही नहीं उस पर पटना में मारपीट करने का केस दर्ज है। फरियादी खुद कभी राजस्थान नहीं गया लेकिन केस दर्ज हो गया कि उसे वहां ले जाकर काम कराया गया और पैसे नहीं दिए गए। इतना ही नहीं, फरियादी ने खुद केस किया भी नहीं! तो क्या बिना किए केस हो गया? यह तो हो नहीं सकता न! यानी केस किसी तीसरे ने किया। कितना आसान हो गया है न किसी पर भी किसी और के नाम से केस ठोंक देना? और जैसा कि एससीएसटी एक्ट के तहत जांच की जरूरत तो रही नहीं है तो थाने में केस दर्ज हो गया, वारंट जारी हो गया और गिरफ्तारी भी हो गई। जमानत भी नहीं ले सकते, जेल तो जाना ही पड़ेगा। गिरफ्तारी में की गई हड़बड़ी तो देखिए केस दुर्गेश सिंह पर दर्ज हुआ, पुलिस ने उठा लिया दुर्ग सिंह को। जाहिर है कि इस एक्ट में आपके नाम से फर्क नहीं पड़ता, दुर्भावना तो जाति के विरुद्ध है, एक्ट भी तो जातियों के ही विरुद्ध है, खास जातियों पर ही लगेगा तो पुलिस ने भी लिफाफा खोले बिना एक्ट का मजमून भांप लिया है। उठा लाई दुर्ग सिंह को। नाम गलत तो क्या हुआ, नाम में ‘सिंह’ तो लगा ही है! इतना काफी है…।
दुर्ग सिंह बाड़मेर के पत्रकार हैं। उन पर पटना के दीघा में मारपीट करने का आरोप है जबकि उस दिन दुर्ग सिंह बाड़मेर में आयोजित एक कार्यक्रम से एफबी लाइव कर रहे थे। जाहिर है केस रंजिशवश की गई है लेकिन सुनेगा कौन? जांच की आवश्यकता ही कहाँ है? वह तो शुक्र है कि मीडिया ने अपने पत्रकार के लिए इतनी मेहनत की और सच्चाई बाहर लाई लेकिन कितने केस का मीडिया ट्रायल होगा? मीडिया को भी तो कई जिम्मेदारी है तो कुछ तो यूहीं अंदर कर दिए जाएंगे और आपको कानोंकान खबर न होगी…। आप आम आदमी हैं, पत्रकार हैं, सरकारी अधिकारी हैं, किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप बेगुनाह हैं तो भी फर्क नहीं पड़ता; फर्क आपकी जाति से पड़ता है क्योंकि जाति देखकर ही आपकी औकात बताने के लिए यह पूरी व्यवस्था की गई है।
यह एक्ट अब आपके लिए ही कैंसर नहीं है, यह मीडिया के लिए भी सेंसर है। आज आप पत्रकारों पर हो रहे झूठे केस पर चुप रहिए, कल यदि सारे पत्रकार इस तरह झूठे केस में फंसाए जाने के डर से चुप हो गए तो जब आप फंसाए जाएंगे तो आपके लिए आवाज उठाने वाला कोई न होगा इसलिए भी निर्दोष दुर्ग सिंह के लिए आवाज उठाइए। आप चौक-चौराहों पर ही बोलिए क्योंकि जिन्हें सदन में बोलने के लिए आपने भेजा है वे चुप हैं। आप फेसबुक पर ही लिखिए, क्योंकि आप जिन्हें समाज के लिए लिखने वाला समझते हैं वे तरह-तरह के खेमे में कैद हैं, कोई वैचारिक गुलामी का शिकार है तो कोई राजनीतिक, संस्थानिक। आप बोल-लिख नहीं सकते तो दूसरों का लिखा ही शेयर कीजिए… आप कुछ भी कीजिए लेकिन समय रहते इस एक्ट के जरिए हो रहे अत्याचार का लोकतांत्रिक ढंग से विरोध कीजिए अन्यथा बने रहिए आप भी राजनीतिक, वैचारिक तुष्टी के लिए इस एक्ट के हिमायती जब तक कि आप खुद किसी झूठे केस में जेल न पहुंचा दिए जाएँ। और तब यकीन मानिए, जब आप जेल में होंगे तो आज आप जिस पत्रकार के लिए खड़े नहीं हो रहे, वह आपके लिए खड़ा होना भी चाहे तो नहीं हो पाएगा क्योंकि वह तो खुद जेल से अपना केस लड़ रहा होगा…।
कोई मुगालता न पालिए, जेल में जाने की बारी आपकी भी आएगी जब कानून ही ऐसा है, गिरफ्तारी का तरीका ही यही है…।

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इस हालात में नोटा न दबाएं तो क्या करें?

यह कर्नल वीएस चौहान हैं। नोएडा के सेक्टर-29 में रहते हैं। इनके पड़ोस में एक महिला रहती हैं। पति एडीएम हैं बावजूद वह आज भी दलित ही हैं जैसा कि देश में अभी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि जाति देखकर कोई गरीब समझा जाता है और अपराध नहीं जाति देखकर सजा दी जाती है…। खैर!
पड़ोसियों से प्रायः किसी न किसी बात पर कुछ लोगों को दिक्कत रहती ही है तो कर्नल साहब से पड़ोसन को भी थी। बस, हिसाब चुकता करने के लिए पड़ोसन को एक्ट मिल गया और उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल भी किया। कर दीं कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का केस। और साथ में एससीएसटी तो लगना ही है…। और यह एक्ट लगने के बाद कुछ बचत है क्या? अग्रिम जमानत कहाँ मिलनी है? और गिरफ्तारी से पहले जांच की कहाँ जरूरत है? … तो देश की सेवा करने वाले 75 वर्षीय कर्नल साहब जेल भेज दिए गए।
केस दर्ज होने की घटना एक सप्ताह पुरानी है। तब हमने अपने साथियों से इस बात का जिक्र किया था कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी को भी दलित ही समझा जाना चाहिए? सबने कहा कि जब तक आधार जाति है तब तक तो समझना ही पड़ेगा…!
आज Anurag भाई की पोस्ट पढ़ी तो पता चला कि केस झूठा था। सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरे ने पोल खोल दी है। पता चला है कि कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का आरोप लगाने वाली महिला ने खुद ही उनकी पिटाई की थी। बेचारे 75 बरस के हैं, पिट गए। अब वह सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रही है…।
कर्नल साहब तो पूर्व सैनिकों की पैरोकारी और सीसीटीवी के दम पर छूट गए हैं, लेकिन अन्य का क्या होगा? अब यह सबकुछ देखने-जानने के बाद नोटा के अलावा कुछ सूझता है क्या?

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… क्योंकि योग्य भारत चाहिए, न कि आरक्षित भारत

बिहार में जदयू ने कहा है कि सवर्णों को भी आरक्षण मिले। इसके पहले लोजपा के राम विलास पासवान यह बात कह चुके हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती भी बोल चुकी हैं। और तो और पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस भी 10% का झांसा दे रही थी…।

दरअसल इन नेताओं-दलों के पास आरक्षण के अलावा देने को कुछ है भी नहीं। यह कभी जाति के नाम पर एक्ट देंगे, कभी आरक्षण। कभी धर्म के नाम पर भड़काएंगे, कभी जाति के नाम पर देश की एकता को आग लगाएंगे। दलित सड़क पर आएगा तो उसे जातिवादी एक्ट का लॉलीपॉप थमाएँगे और जब सवर्ण इसके खिलाफ खड़ा होगा तो उसे आरक्षण देने की बात कहकर भरमाएँगे।

गजब का संविधान है, लोकतंत्र है और शासन है। किसी में कोई तालमेल नहीं। संविधान में दिए धर्म निरपेक्षता, समानता, मौलिक अधिकारों को मजाक बना दिया है इन नेताओं ने। संविधान में सब समान लेकिन हकीकत में दलित से ब्राह्मण तक, हिन्दू से मुस्लिम तक … सिर्फ धर्म-जाति की ही बात। देश के नागरिकों की योग्यता गई तेल लेने। यह गजब का विरोधाभास है कि देश में योग्य युवाओं के लिए किसी दल, सरकार के पास कुछ नहीं है और ख्वाब देश को पुनः विश्व गुरु बनाने का है। हर नेता, दल, सरकार के पास बस कुछ खास धर्म-जातियों के लिए योजनाएं (साजिश) हैं…।

चेतने का यही समय है। वोट के लिए देश और देशवासियों के हित से खेलने का यह खेल अब बन्द होना चाहिए। धर्म-जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण, कानून, सहूलियत हर चीज का विरोध होना चाहिए। यह जातिगत आरक्षण इस समय का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है जो हर क्षेत्र में योग्य युवाओं के रहते हुए भी अयोग्य को मौका देता है और समस्त देश को अयोग्य के हाथ में सौंपता है, उसे कमजोर बनाता है…। इसी तरह एससी-एसटी जैसा जातिवादी एक्ट कुछ खास जातियों को प्रश्रय देता है और बाकी जातियों के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार को कुचलता है…।

इस तरह के धार्मिक-जातिगत तुष्टीकरण, राजनीति, कानून सभी के खिलाफ नोटा को हर वह व्यक्ति हथियार बनाए जो एक डिजर्व इंडिया चाहता है, न कि रिजर्व। नोटा से यह संदेश दीजिए कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब धर्म-जाति का तुष्टीकरण और बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक के नाम पर देश हित से खिलवाड़ और नहीं। एक देश-एक संविधान-एक नियम-कानून से कम कुछ नहीं।

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जातिवाद की राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए…

देश में अभी 4900 के करीब सांसद और विधायक हैं। इसमें से सवर्णों के लिए या कहें कि एक देश-एक कानून के लिए आवाज कितनों ने उठाई? बस दो विधायकों ने जातिवादी एससी-एसटी कानून के खिलाफ मुंह खोला। सांसदों ने तो एक भी नहीं…।
इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने देश में कितने सवर्ण सांसद, विधायक चुने हैं। फर्क तो इससे पड़ता है कि कितने मर्द चुने हैं जो आपके लिए, देश के लिए, सही के लिए खड़े हो सकें।
अलोकतांत्रिक कानून एससी-एसटी एक्ट हो या लगातार जातीय आरक्षण देने का मसला, आपही के चुने इन सभी सवर्ण सांसदों-विधायकों की इसमें सहमति रही है।
ऐसा क्यों? क्योंकि आप इन्हें तब भी वोट देते हैं जब ये आपके खिलाफ हो रही साजिशों में शामिल होते हैं।
यकीन कीजिए, इन्हें आपके होने पर भी आपके होने का जरा भी अहसास नहीं है। इन्हें बस देश में अल्पसंख्यकों, दलितों के ही होने का आभास है।
देश में हर दलित नेता दलितों के कथित हक के लिए उनके साथ खड़ा है। यहां तक कि दलित आंदोलन के नाम पर 2 अप्रैल को सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले, दर्जनभर हत्याएं करने वाले ‘निर्दोषों’ को भी मुकदमों से बरी किए जाने की मांग हो रही है। भाजपा के दलित सांसद, विधायक दलितों के लिए नेतृत्व से लड़ रहे हैं लेकिन सवर्णों के साथ कौन है? या कहें कि कौन है ऐसा जो कहें कि नहीं सभी देशवासी बराबर हैं? सवर्णों के साथ हो रही हकमारी पर सवर्ण नेताओं के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकल रहा जैसे मुंह पर टेप चिपका दिए गए हों। अबकी आएं चुनाव में तो जवाब ऐसा दीजिए कि मुंह से कुछ बोल न सकें जैसे कि चुने जाने के बाद न संसद में, न विधानसभा में ही आपके लिए इनकी आवाज निकल रही है…।
जान लीजिए यह सच कि आप देश में होकर भी अब तक अपने होने का आभास तक इन नेताओं को नहीं करा पाए हैं। अब एक बार खुद भी मान लीजिए कि आप देश में नहीं हैं। चूंकि अब तक होकर भी अपने होने का अहसास नहीं करा पाए हैं तो इस बार नहीं होकर अपने अस्तित्व का अहसास दिलाइए। दबाइए नोटा ताकि यह भी देखें कि जब आप इनके साथ नहीं होते हैं तब ये खुद कहाँ होते हैं। आज तक इन्हें चुनने के लिए वोट करते आए हैं, अब अपने लिए एक वोट कीजिए- नोटा! जातिवादी राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए, अपना और देश का अस्तित्व बचाइए।

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यह राहुल का दलित प्रेम है या सवर्ण घृणा…?

इस समय देश में दलित राजनीति की बयार बह रही है। कभी—कभी तो ऐसा लगता है कि मानो देश में कोई और वर्ग रहता ही न हो। बस दलित—दलित—दलित। आज राहुल गांधी भावुक भी हो गए। हमें तो लगा कि कथित दलितों का कथित दर्द देखकर कहीं रो ही न पड़े। इतने मासूम हैं कि बिना जांच ही सवर्णों की गिरफ्तारी का कानून बनने के बाद भी डरे हुए हैं कि कहीं दलितों का शोषण न हो जाए। इनके हिसाब से यह एक्ट अभी उतना प्रभावी नहीं है। शायद, इसमें फांसी का प्रावधान चाह रहे हों! खैर…।
राहुल गांधी की राजनीतिक सोच और समझ कितनी है, इस पर तो किसी बहस की गुंजाइश ही नहीं रह गई है लेकिन इनकी मंशा क्या है, इस पर चर्चा जरूरी है। खासकर तब जबकि इन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर रखा है। ऐसे में जरूरी है जानना कि विपक्ष में होकर भी जो व्यक्ति समस्त देश की चिंता नहीं कर पा रहा; किसी एक खास वर्ग, खास जाति पर ही फिदा हुआ जा रहा है वह प्रधानमंत्री बना तो क्या करेगा!
देश के प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है कि वह हर नागरिक को वैसे ही एक समान समझे जैसे कि कोई पिता अपने सभी बच्चों को समझता है। वह आगे बढ़ने वाले बच्चे को प्रोत्साहित करे, गलत करने वाले को डांटे, कमजोर बच्चे को बल प्रदान करे। वह सबको स्कूल भेजे, सबको उसकी क्षमता के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने और उसे प्राप्त करने में मदद करे। प्रधानमंत्री ऐसा हो जो नागरिकों की धर्म—जाति न देखे। उन्हें एक जैसा समझे। खैर…।
राहुल गांधी कल जंतर मंतर पर दलितों और जनजातीय समुदाय द्वारा आयोजित एक रैली में बोल रहे थे। कहा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस न्यायाधीश को दोबारा नौकरी देकर सरकार की दलित विरोधी मानसिकता पर मुहर लगा दी है जिन्होंने दलितों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के प्रावधान वाले अधिनियम को कमजोर करने के आदेश पारित किए थे। मोदी दलित विरोधी हैं…।
बस यह बयान काफी है राहुल गांधी की मंशा जाहिर करने के लिए। यदि राहुल गांधी दलितों के दर्द से आहत थे तो उनकी पीड़ा अब तक दूर हो जानी चाहिए थी क्योंकि एससी—एसटी कानून में बिना जांच ही सवर्ण की गिरफ्तारी का प्रावधान कर दिया गया है। अब इससे अधिक क्या होगा? लेकिन नहीं, उन्हें दलितों को आकर्षित करना है तो इसके लिए इससे भी आगे जाकर शायद सवर्णों से बैर साधना चाह रहे हैं। अब उन्हें वह न्यायमूर्ति तक पसंद नहीं, जिन्होंने इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कही थी। यानी, एक तरह से सवर्णों को कुछ हद तक राहत दी थी।
न्यायमूर्ति एके गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने 20 मार्च को अपने आदेश में एससी—एसटी एक्ट के राजनीतिक या निजी कारणों के लिए दुरुपयोग किए जाने की बात कही थी जो कि बिल्कुल सत्य थी। दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा था कि आगे से इस अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करनी होगी और अग्रिम जमानत भी दी जा सकेगी। इसी के बाद 2 अप्रैल को देशभर में आंदोलन के नाम पर हिंसा की आग भड़की और इस आग में नेताओं ने जमकर दलित राजनीति की रोटियां सेंकीं। इसी हंगामे के बाद भाजपा सरकार ने एक्ट में संशोधन किया ताकि उसका दलित वोट बैंक न खिसके। अब राहुल इस एक्ट को भी निष्प्रभावी बता रहे हैं ताकि इनका वोट बैंक न खिसके।
बता दें कि न्यायमूर्ति एके गोयल 6 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हो गए और उसी दिन राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के चेयरमैन नियुक्त हुए। राहुल गांधी को इसी से दिक्कत है। यह राहुल का कमाल का दलित प्रेम है कि किसी न्यायाधीश ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बात करते हुए इतना ही कह दिया कि एससी—एसटी एक्ट में बगैर जांच गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए तो वे चाहते हैं कि अब वह भूखो मर जाए, उसे नौकरी से निकाल दी जानी चाहिए या फिर कभी, कहीं नौकरी न दी जाए।
यानी, इनकी चले तो इस देश में सिर्फ सवर्णों की ही नौकरी पर रोक नहीं लगनी चाहिए, बल्कि हर उस शख्स की नौकरी—प्रोन्नति रोक दी जानी चाहिए जो सवर्णों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाए। यह दलित प्रेम है या सवर्णों के प्रति इनकी घृणा? क्या समझें?
राहुल या कोई भी नेता यदि सच में किसी दलित पर हुए जुल्म के खिलाफ खड़ा हो तो स्वागत है। जिस किसी दलित पर कोई भी अत्याचार हो, जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसे जेल भेजा ही जाना चाहिए, इसका स्वागत है। यहां तो यह भी दरियादिली दिखाई गई है कि बिना जांच ही जेल होगी। होना तो यह चाहिए कि धर्म—जाति के आधार पर कानून ही न बने लेकिन वोट बैंक की राजनीति में पड़कर भाजपा ने इतनी दरियादिली दिखा ही दी है तो राहुल की दलितों के प्रति दरियादिली तो इससे आगे बढ़कर सवर्ण घृणा तक पहुंचनी ही चाहिए।
दरअसल, जिस तरह इन नेताओं ने लगातार आरक्षण के जरिये एक समाज को बैसाखी की आदत लगा दी है, ये खुद भी दलितों की बैसाखी के सहारे राजनीति करने के आदी बन चुके हैं। इनकी गंदी राजनीति के चलते विविधताओं का देश, हजारों जातियों का देश, दो-चार जातियों पर सिमट गया है। इस तरह धर्म-जाति के नाम पर देश को बांटने की राजनीति करने वाले राहुल ही नहीं, हर नेता के खिलाफ खड़े होने का वक्त है। चुनाव में बेहतर विकल्प न मिले तो नोटा दबाइए लेकिन किसी जातिवादी नेता के हाथ में देश की तकदीर बिल्कुल न सौंपिए। सबसे पहले राजनीति से जाति को खत्म कीजिए। तभी यह देश भी बचेगा और सम्पूर्ण समाज भी।

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यह सवर्ण 1000 वर्षों का हिसाब चुकाने के लिए तैयार है !

हम जन्म से हिंदू हैं। यह मेरा धर्म है, मेरी संस्कृति है किंतु हमें किसी अन्य के मुस्लिम, इसाई होने से भी कोई दिक्कत नहीं है।
हम ब्राह्मण हैं। यह मेरी जाति है, इससे मेरा संस्कार है​ किंतु हम जातिवादी नहीं हैं। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं कि अन्य किस जाति के हैं। किंतु, क्या इसका कोई अर्थ है? इस भाव के बाद भी मेरी पहचान क्या है? सवर्ण ही न! समाज के लिए भी, संविधान के लिए भी, सरकार के लिए भी!
हमने तो एक चीटी भी नहीं मारी लेकिन इसके बाद भी हमपर 1000 वर्षों के शोषण का इल्जाम आता है तो हम तो बन गए न बैठे—बिठाए गुनहगार! और सवर्ण होने की सजा देखिए- हमारा राशन बंद, स्कॉलरशिप बंद, एडमिशन बंद। नौकरी बंद। प्रोन्नति बंद। और जेल भी भेजा जाना तय! बेगुनाही साबित करने तक का मौका नहीं! माने मानवाधिकार भी गए तेल लेने! इतना जुल्म! क्यों? अच्छा समझे! 1000 वर्षों तक हमने जुल्म जो ढ़ाया है …! सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यदि बेहयाई से यह दलील रख ही दी है कि कुछ जातियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए आंकड़े की जरूरत नहीं है क्योंकि ये 1000 वर्षों से सताए हुए हैं तो क्या आश्चर्य है यदि आगे कभी एससी-एसटी एक्ट पर चर्चा हो तो यह दलील भी प्रस्तुत कर दे कि सवर्णों को सजा देने के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं क्योंकि इनके जुल्म का इतिहास 1000 वर्ष पुराना है? यह एक्ट बना भी तो इसी भाव से है!
…तो यदि सवर्ण का भाव न होकर भी हमारी पहचान यही है और इसी के कारण निर्दोष होकर भी हम दंड के भागी हैं तो कब तक सफाई देते रहेंगे कि हम वैसे सवर्ण नहीं हैं जैसा सरकार बता रही। यदि समाज को एक अच्छा इंसान नहीं चाहिए, देश—सरकार को एक अच्छा नागरिक नहीं चाहिए तो देते हैं न वही, जो चाहिए। सरकार ने तो हमें सवर्ण मान ही लिया है, तो चलो सरकार को हम भी सवर्ण बनकर दिखलाते हैं। इन सरकारों से बहुत चोट खा चुके भाई, अबकी सबक हम भी सिखलाते हैं।
आश्चर्य न कीजिए! हमने तो हमेशा यही चाहा है कि मेरा धर्म, मेरी जाति मेरी निजी आस्था, पहचान तक ही रहे। देश के लिए मेरी पहचान उसके एक नागरिक के रूप में हो। किंतु इस देश को नागरिक चाहिए क्या? सरकार हमें नागरिक मानती है क्या? सरकार ने तो हमें या किसी को भी नागरिक के रूप में कभी देखा ही नहीं। उसने तो हमारे धर्म, जाति को ही हमारी मौलिक पहचान घोषित कर रखी है। हमने तो यही चाहा कि यह वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था धीरे—धीरे समाज से भी खत्म हो, इसका भाव खत्म हो किंतु यदि इसे संविधान से लेकर सरकार तक में जगह मिल गई तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? समाज में जाति व्यवस्था के लिए यदि हम दोषी हैं तो इस जातिवादी संविधान के लिए कौन दोषी है जो सबकी जाति देखता है? इस जातिवादी सरकार के लिए कौन दोषी है, जो हर फैसले जाति देखकर लेती है? यह तो किसी को गरीब भी मानते हैं तो धन नहीं, जाति देखकर। सवर्ण भी मानते हैं, तो कर्म नहीं वर्ण देखकर। इसके लिए दोषी कौन है? क्या इसके लिए भी सवर्ण? हमें तो यह समझ में नहीं आता कि आखिर यह बात इस देश के संविधान, सरकार को किसने बताई कि हम सवर्ण हैं? हम तो सर्टिफिकेट लेकर आए नहीं थे? किसी को दिखाए भी नहीं थे? जातियों का सर्टिफिकेट भी तो संविधान, सरकार ने ही मिलकर बांटा लेकिन दोषी कौन? सवर्ण! इस समय हर जाति के पास उसका सर्टिफिकेट है इसके बाद भी जातिवादी कौन है? सवर्ण! तो चलो न जब यही पहचान गई तो इसी के साथ कुछ वक्त बिताते हैं, सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनकर दिखाते हैं!
संविधान ने सबको एक समान माना है किंतु क्या वह अभी कहीं लागू है? यह बात देश के संविधान और सरकार को किसने बताई कि किन जातियों को गाली दी जाए तो उनकी भावना आहत हो जाती है और किनको दी जाए तो उनका सम्मान बढ़ जाता है? गाली तो गाली है न! फिर, बभना, ठकुरा गाली क्यों नहीं और बाकी गाली क्यों है? यह परिभाषा किसने गढ़ी? कैसे? सरकार की कोई समिति बनी थी? यह एससी—एक्ट बनाने वाली सरकार जातिवादी नहीं है जो जाति देखकर गाली को गाली परिभाषित कर रही है? जाति देखकर जेल भेज रही है? तो जातिवादी कौन है? सवर्ण? यानी, संविधान से लेकर सरकार तक दुर्भावना से ग्रसित किंतु निर्लज्जता ऐसी कि दुर्भावनाग्रस्त भी बताया जाएगा सवर्ण ही!
1000 वर्षों का शोषण है! किसने किया, किससे किया? उसमें जीवित कौन है? यह सब कौन पूछता है? कौन जवाब भी देता है? बस शोषण हुआ है! और इस शोषण का बदला तो लिया जाएगा! यह संविधान, यह सरकार हिसाब चुकता करेगी। किससे बदला लेंगे? कोई तो होना चाहिए? 1000 वर्षों के शोषण का हिसाब सवर्ण चुकाएगा! संविधान, सरकार दोनों ने मान लिया है कि देश का यह वर्ग स्वभाव से आततायी है, जुल्मी है। इसे सजा देनी है, बराबर देनी है। तब तक जब तक कि यह घुटने पर न आ जाए। रेंगने न लग जाए। दोनों ने यह भी मान लिया है कि देश का एक वर्ग शोषित है, उसके साथ सदियों तक शोषण हुआ है। उसे इंसाफ दिलाना है, बराबर दिलाना है। तब तक जब तक कि वह खुद शोषक न बन जाए। इसलिए एक बच्चे के अयोग्य होने पर भी उसे स्कूल में प्रवेश दिलाना है, धनी होते हुए भी स्कॉलरशिप दिलानी है, अयोग्य होते हुए भी नौकरी दिलानी है और प्रोन्नति भी। क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषित है! एक और बच्चा है। वह गरीब है किंतु स्कॉलरशिप नहीं देनी, वह योग्य है किंतु स्कूल में प्रवेश नहीं देना, नौकरी भी नहीं देनी और नौकरी नहीं तो प्रोन्नति कैसी? क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषण करता आ रहा है!
सवाल है कि यह सवर्ण कौन है? इससे इतना डर क्यों है? क्या यह समाज—देश के लिए विलेन है? बॉलीवुड की किसी फिल्म से भी बड़ा? किस निर्देशक ने यह चरित्र गढ़ा है कि संविधान से लेकर सरकार और यहां तक कि समाज तक सभी डरे सहमे हुए हैं? डरना तो होगा क्योंकि निर्देशक ने यह भी बताया है कि सवर्ण जातियों के शोषण का इतिहास 1000 वर्षों का है! और कितने पर्यायवाची, परिभाषाएं भी गढ़े हैं! मनुवादी, जातिवादी, अगड़ी जाति, सवर्ण! क्या गजब का विरोधाभास है कि जिनके साथ सबसे अधिक असामान्य व्यवहार होता है, वह सामान्य जातियां कहलाती हैं— सवर्ण। संविधान, सरकार के लिए जो स्पेशल नहीं है, वह​ जनरल है— सवर्ण। सरकार हर नीचता जिनके साथ करे, वह उंची जातियां हैं— सवर्ण। जो जातियां बैकवर्ड भी हैं तो संविधान में फारवर्ड हैं, वह हैं सवर्ण। लोवर भी हैं तो अपर हैं माने सवर्ण। पिछड़ी भी हैं तो अगड़ी हैं तो सवर्ण। जो अनारक्षित हैं, वह सवर्ण। जो डिज्वर्ड हैं तो भी अनरिजव्र्ड हैं, वह है सवर्ण! अब यदि सवर्ण ठहराने के लिए इतना कुछ गढ़ा है तो मेहनत जाया क्यों जाने दें? यदि सरकार की इतनी जिद है तो क्यों न अपनी भी जिद दिखलाएं। सवर्ण कहलाएं ही क्यों, चलो सवर्ण बन भी जाएं!
सवर्ण! सरकार के लिए वह पुतला जिस पर हर तरह के टेस्ट किए जा सकें। जो खेत में खड़ा होकर फसल की रखवाली करे किंतु उस पर हक न जताए। देश में रहकर राष्ट्रभक्ति से आगे निकल सरकार भक्ति दिखलाए किंतु देश के संसाधनों पर उसका हक न हो। हिन्दू खतरे में तो सवर्ण आगे आए, समाज खतरे में तो सवर्ण आगे आए, राष्ट्र खतरे में तो उसे आवाज दी जाए, बस वह पहरेदार बना रहे हिंदुत्व का, धर्म का, राष्ट्र का… वह संसाधनों की रखवाली करता रहे क्योंकि उसके उपभोग का पहला, दूसरा, तीसरा सारा हक किसी और के पास है। सवर्ण माने कि बिना जांच दोषी मान लिया जाए, गिरफ्तार हो जाए। जो देश में 131 लोकसभा सीटों से सांसद बनने का ख्वाब भी न देख सके, वह सवर्ण। जिसे 1225 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार न हो, वह सवर्ण। जिसे सजा देने के लिए अलग से न्यायालय, थाने खोले जाएं, वह सवर्ण। जो योग्य होकर भी देश के 50 फीसदी सरकारी पदों के लिए कोशिश करने से भी वंचित कर दिया जाए, वह सवर्ण। कुछ राज्यों में तो जो सरकारी नौकरियों से प्रायः पूरी तरह वंचित कर दिया जाए वही सवर्ण!
सवर्ण! सवर्ण! सवर्ण! अब जब हमारी सरकारी पहचान सवर्ण ही है और हिसाब भी 1000 वर्षों का है तो हम हिसाब चुकाने के लिए तैयार हैं! कोई सफाई नहीं, हम सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनने को भी तैयार हैं! अभी तक देश—समाज ने माना है, आज हम स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं! साथ ही यदि इतनी सरकारी प्रताड़ना के बाद भी किसी भाई का कुछ हिसाब रह गया है तो हम चुकता करने के लिए तैयार बैठे हैं। जिस किसी भाई का हमसे सिर्फ इसलिए दुराव है कि हम सवर्ण हैं तो वह अपने दस-बीस पुश्त का इतिहास लेकर सामने आएं और बताएं कि मेरे किस दादा या परदादा ने उनके किस दादा या परदादा से काम कराया लेकिन पारिश्रमिक नहीं दिया। जब पैसे मांगे तब किसने किसको कोड़े बरसाए। किस कुएं में पानी पीने गए थे तो किसने रोक दिया था? पहले हिसाब दें, फिर चुकता करने के लिए भी हम तैयार हैं! हम तैयार हैं उस सरकार, व्यवस्था से भी हिसाब चुकता करने के लिए जो 1000 वर्षों का बदला ले रही है। हम आज, अभी उस चुनाव का बहिष्कार करते हैं जिसके जरिये देश के लिए नहीं, कुछ जातियों के लिए सरकार चुनी जाती है। सरकार ने जिन्हें सवर्ण घोषित किया है, हम उन सभी जातियों के लोगों का भी आवाह्न करते हैं कि स्वयं भी अपने को सवर्ण घोषित करें और उस चुनाव का बहिष्कार कर दें जिसमें आपके लिए कुछ भी नहीं है। आप किसी को भी चुनें लेकिन यदि वह आपसे 1000 वर्षों की दुर्भावना लिए बैठा है तो वह आपके साथ न्याय नहीं कर सकता। चूंकि सब यही करते हैं इसलिए जरूरी है कि एक चुनाव ऐसा जाने दीजिए जिसमें किसी को न चुनिए। बस एक चुनाव शांत हो जाइए, यह शांति तूफान का काम करेगी और बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार कोई भी हो, उसका रवैया सवर्णों के साथ एक जैसा है। ऐसे में कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके वोट न देने से सरकार किसकी बनेगी। हां, जिनकी नहीं बनेगी उन्हें सबक मिलेगा और जिनकी बनेगी उन्हें यह संदेश कि अब और ज्यादती कि तो उनकी भी सरकार जानी तय है। साथ ही चुप न रहें। देश-समाज विरोधी जातिवादी कानून, व्यवस्था, सरकार सबके खिलाफ आवाज उठाएं। लिखें, बोलें, शेयर करें। अंदर के गुस्से को इतना फैलाएं कि वह संसद तक पहुंच पाए। अस्तित्व रक्षा का अब बस यही एक उपाय है! करो या मरो!

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पाकिस्तान में इमरान तो भारत में…?

पाकिस्तान में कल हुए आम चुनाव का आज परिणाम आ रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीति के खिलाड़ी बने इमरान खान की पार्टी तहरीक—ए—इंसाफ (पीटीआई) देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई साफ नजर आ रही है वहीं जेल में बंद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएलएम-एन) दूसरे नंबर पर चल रही है। चुनाव परिणाम इससे थोड़ा ही इधर—उधर होगा। पीटीआई को पूर्ण बहुमत न मिला तो भी गठबंधन कर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो ही जाएंगे…।
यूं तो इमरान पाकिस्तान की जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता हैं लेकिन वह खुद कितने लोकतांत्रिक हैं, इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में, यदि अलोकतांत्रिक विचारों वाले इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत—पाक में शांति वार्ता जैसी कोई चीज रह जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। युद्ध की संभावना न हो तो भी सीमा पर घुसपैठ बढ़नी तय है क्योंकि पाकिस्तान में सेना की सत्ता नहीं होगी तो भी इमरान के रूप में कमोबेश उसका ही नेतृत्व होगा।
अब ऐसे में, 2019 में होने वाले चुनाव में भारत को ऐसा प्रधानमंत्री देना होगा जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देना जानता हो। जो इतना उतावला न हो कि देश को बेमतलब युद्ध की आग में झोंक दे लेकिन इतना कायर भी न हो कि घुसपैठ बर्दाश्त करता रहे, आतंकी गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहे।
भारत में वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के लिए दो ही उम्मीदवार सामने हैं। एक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी।
नरेंद्र मोदी अपने वादे पर काफी हद तक खरे नहीं उतर पाए हैं। आतंक के मुद्दे पर बात करें तो सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही दिखता है। खासकर, कश्मीर मुद्दे पर तो मोदी अपना कोई वादा नहीं निभा पाए। न कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने का और न ही धारा 370 हटाने का। इतना ही नहीं, रमजान में मुस्लिम तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए मोदी सरकार ने ऐसा निर्णय लिया जिससे सैनिकों को बिना लड़े ही मौत के मुंह में समा जाना पड़ा। सरकार ने देशद्रोहियों से केस वापस लिए और जिन पर केस चल रहे हैं, उनमें अधिकतर मामले में अभी तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं करा पाई। राफेल डील में विपक्ष के कुतर्कों को छोड़ दें तो सही सवालों का भी जवाब दे पाने में मोदी असफल रहे हैं। वह नहीं बता पा रहे कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसी कंपनी से करार किया जा रहा, जो अनुभवहीन है। कई मसले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह सरकार देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने में नाकाम है…।
राहुल गांधी की बात करें तो नरेंद्र मोदी से तुलना करने के लिए उनका कोई कार्यकाल तो नहीं है, लेकिन उनके विचार और व्यवहार सामने हैं जिसे देखकर कतई नहीं लगता कि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो आतंक का करारा जवाब दे पाएंगे। यह मोदी सरकार की नाकामी है कि जेएनयू में देशविरोधी नारों की सच्चाई अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है लेकिन देशद्रोह का आरोप लगने के साथ ही आरोपितों के बचाव में उतर जाना बताता है कि राहुल गांधी कभी—कभी किस हद तक गिर सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कठुआ में कुछ लोग दुष्कर्म के आरोपितों के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह सही है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी करार न ​दे दिया जाए, वह दोषी नहीं है लेकिन यदि वह आरोपित भी है तो संदिग्ध तो है ही। ऐसे व्यक्ति का बचाव, उसके गुनाह पर पर्दा डालना ही है। इस तरह आतंकियों, देश द्रोहियों से मुकाबले के मामले में मोदी की अपेक्षा राहुल का व्यवहार अधिक संदिग्ध दिखता है।
बात सच्चाई की करें तो मोदी और राहुल दोनों ही कई बार झूठ बोल चुके हैं। मोदी चुनावी सभाओं में झूठ बोलते हैं लेकिन राहुल ने तो पिछले दिनों राफेल डील मुद्दे पर भरी संसद में ही झूठ बोला, वह भी तब जबकि यह डील कांग्रेस ने ही की थी।
अब बात यदि व्यवहारिक समझ, ज्ञान की करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी मोदी के सामने दूर—दूर तक नहीं टिकते। डिग्री किसकी सही है, यह तो जांच में ही सामने आएगा लेकिन पढ़ार्इ ठीक से नहीं की है राहुल ने यह बार—बार वह खुद साबित कर चुके हैं। मोदी का तो इतिहास ज्ञान ही अनूठा है लेकिन राहुल का व्यवहारिक ज्ञान भी। पिछले दिनों वे नहीं बता पाए कि एनसीसी क्या है? हद है, इस देश में रहकर राहुल एनसीसी नहीं जानते। ऐसा कई बार हुआ है, जब राहुल की अज्ञानता साफ झलकी है और ताज्जुब है कि इसे दूर करने के लिए वह कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। शायद, इसकी उन्हें जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाने वाली उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति है।
अब बात यदि राजनीतिक अनुभव की करें तो कुछ कहना ही नहीं है…। जितनी उम्र है राहुल की, कमोबेश उतना अनुभव है मोदी का। राहुल में यही खूबी हैं कि वह युवा है लेकिन कार्य करने की उर्जा मोदी में उनसे भी अधिक है।
भ्रष्टाचार की बात करें तो न तो स्पष्ट रूप से मोदी के बारे में ही ऐसा कहा जा सकता है और न ही राहुल के बारे में ही लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों पर ही कई आरोप लग चुके हैं। बड़ी बात है कि राहुल गांधी हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं और उसकी सुनवाई चल रही है जबकि मोदी पर अभी तक अधिकतर आरोप, आरोप ही हैं। जिस दंगे के लिए उनकी छवि खराब की गई या जिसकी बदौलत वह इतने बड़े नेता बने, उस मामले में भी वह बरी हो चुके हैं।
इस तरह मेरा निजी विचार है कि 2019 में यदि दोनों में से किसी को न चुनना पड़े तो सबसे अच्छा लेकिन यदि कोई तीसरा चेहरा सामने नहीं आता है, और चुनाव राहुल व मोदी में से ही किसी का करना पड़ता है तो मौका नरेंद्र मोदी को ही देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो हम ऐसी स्थिति में नोटा ही दबाएंगे क्योंकि राहुल से हमें कोई उम्मीद नहीं और मोदी ने उम्मीदों को तोड़ा है।

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जूठा बर्तन धो रहा वीर जवान… न धुलेगा सरकार का यह गुनाह

तस्वीर साभार : नवभारत टाइम्स

यह सतवीर सिंह हैं। लांस नायक सतवीर सिंह। 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दिल्ली से एकमात्र जांबाज, जिनपर दिल्ली ही नहीं; समस्त राष्ट्र को गर्व है किंतु आज यह दूसरों की जूठी प्लेट धो रहे हैं और इस हालात पर सिर्फ दिल्ली ही नहीं, समस्त राष्ट्र को शर्म आनी चाहिए। यह तस्वीर देखने के बाद राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार को तो​ चुल्लूभर पानी के बिना ही शर्म से ही मर जाना चाहिए।

आज विजय दिवस है। कारगिल युद्ध में विजय का दिवस। आॅपरेशन विजय की सफलता ​का दिवस। पाकिस्तान को धूल चटाने का दिवस लेकिन कैसी खुशी? कैसा जश्न? क्या यह तस्वीर किसी राष्ट्रप्रेमी को खुश होने देगी? क्या यह तस्वीर तब से अब तक ​की किसी भी सरकार को माफ करेगी जिन्होंने अपने ही सैनिक को खून के आंसू रुलाए हैं? क्या यह तस्वीर वह आइना नहीं है, जिसमें आज की सत्ता की वास्तविक तस्वीर दिख रही है? सत्ता की इतनी घिनौनी तस्वीर देखने के बाद सिर्फ घृणा हो सकती है, क्रोध आ सकता है; खुशी तो कदापि नहीं हो सकती। नहीं, जब तक यह तस्वीर बदल नहीं जाती, विजय दिवस पर भी विजय का आभास नहीं हो सकता, विजय का आनंद कदापि नहीं हो सकता…।

आजाद देश की सरकार ने सतवीर के साथ कुछ वैसा ही सुलूक किया है, जैसा गुलाम भारत में अंग्रेज भारतीय सैनिकों के साथ किया करते थे। काम निकल गया तो सतवीर को उनके हाल पर छोड़ दिया लेकिन, प्रणाम है सतवीर को कि इतनी उपेक्षाओं के बाद भी इनके देशप्रेम में रत्तीभर भी कमी नहीं आई है। ईमानदारी से अपना कर्म करते हैं। यह देश और सैन्य निष्ठा ही है कि जूठी थाली धोते समय भी इनके सिर पर फौज की टोपी होती है। आखिरकार, सरकार के देश प्रेम और एक नागरिक व सैनिक के देश प्रेम में अंतर जो है। कितनी बड़ी बात है कि 19 साल से पाकिस्तान की एक गोली शरीर में आज भी फंसी हुई है। अफसोस है कि चल—फिर नहीं सकते। बैसाखी ही सहारा है लेकिन हमें भरोसा है कि जब तक सतवीर जैसे वीर हैं, यह देश बेसहारा हरगिज नहीं है। राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकार के स्वार्थप्रेरित कथित राष्ट्रवाद से इतर, देश के एक सच्चे नागरिक, एक सैनिक का यह राष्ट्रवाद ही वास्तविक राष्ट्रवाद है जो अनुकरणीय है, प्रेरणादायक है। आइए, वीर सतवीर सहित उन सभी सैनिकों के शौर्य को याद करें जिन्होंने दुश्मन की गोलियों के लिए अपने शरीर की इंच—इंच जगह दे दी लेकिन देश की जमीन की एक इंच न दी…।

1999 में लाहौर में घोषणा पत्र पर भारत और पाक ने हस्ताक्षर किए थे कि कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करेंगे लेकिन पाकिस्तान के मन में खोंट था। पाक की सेना नियंत्रण रेखा को पार कर भारत में घुस आई। कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को नेस्तनाबूद कर भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाने के मंसूबे से पाकिस्तान ने गुप्त रूप से ऑपरेशन बद्र की शुरुआत कर दी। पहले तो भारत को लगा कि यह छोटी—मोटी घुसपैठ है लेकिन कुछ ही दिनों में समझ में आ गया कि यह तो आक्रमण है, हमला है। बस क्या था, भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय की घोषणा कर दी और करीब 2 लाख जांबाज सैनिकों को युद्ध के मैदान में उतार दिया। राष्ट्रप्रेम के जज्बे से ओत—प्रोत सैनिकों ने पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए। करीब दो महीने तक वीर जवान बॉर्डर पर जमे रहे, जब तक कि पाकिस्तान ने हाथ न खड़े कर दिए। 527 जवानों ने शहादत दी, 1,300 से ज्यादा घायल हुए, कई जीवनभर के लिए अपाहिज हो गए, कई आज भी झूककर चलते हैं किंतु देश न झुकने दिया। इन्हीं में से एक हैं लांस नायक सतबीर सिंह जिनके पैर में दुश्मन की 2 गोलियां लगी थीं। एक तो निकल गई लेकिन दूसरी धंसी रह गई।

तस्वीर साभार : नवभारत टाइम्स

सतवीर बताते हैं, 13 जून 1999 की सुबह कारगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर उनकी ड्यूटी थी। वहां पाकिस्तानी सैनिकों से आमना-सामना हो गया। मात्र 15 मीटर की दूरी पर पाकिस्तान सैनिक थे। सतवीर की 9 सैनिकों की टुकड़ी थी, जिसकी अगुवाई वही कर रहे थे। सतवीर ने हैंड ग्रेनेड फेंका और एक झटके में सात पाकिस्तानी सैनिकों को उपर पहुंचा दिया। लगातार गोलियां चल रही थीं। दो गोलियां उन्हें भी लगीं। 17 घंटे तक पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। काफी खून बह चुका था। 3 बार उन्हें और अन्य घायल सैनिकों को लेने के लिए आर्मी का हेलीकॉप्टर आया लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग के कारण उतर नहीं पा रहा था। आखिरकार भारतीय सैनिक घायल सतवीर तक पहुंचे। एयरबस से उन्हें श्रीनगर ले गए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट किया गया। काफी दिन इलाज चला लेकिन एक गोली नहीं निकल पाई।

26 जुलाई, यानी आज के दिन युद्ध की समाप्ति की घोषणा की गई। सरकार ने घोषणा की कि युद्ध में शहीद जवानों की विधवाओं, घायल सैनिकों के लिए पेट्रोल पंप की व्यवस्था की जाएगी। उन्हें खेती के लिए जमीन मुहैया कराई जाएगी। किंतु, युद्ध के बाद सैनिकों के साथ किए वादे की भी परिणति उसी रूप में दिख रही है, जिस रूप में चुनाव में किए वादे की, उसके बाद दिखती है…। सतवीर को पेट्रोल पंप आज तक नहीं मिल सका। इतना ही नहीं, जीवनयापन के लिए करीब 5 बीघा जमीन दी गई थी। उस पर सतवीर ने मात्र तीन वर्षों तक ही खेती की और वह जमीन उनसे छीन ली गई। सुनकर रोना आ रहा है कि जिस वीर ने देश की रक्षा के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की, उसकी परवाह सरकार ने किस तरह की कि सतवीर के 2 बेटों की पढ़ाई पैसों के अभाव में छूट गई। खर्च के लिए पेंशन कम पड़ी तो सतवीर ने जूस की दुकान खोल ली। अपनी दुकान पर जूठे बर्तन भी सतवीर ही धोते हैं…। हथियार चलाने वाले हाथों से जूठे बर्तन तो फिर भी धूल जाते हैं लेकिन देश चलाने वालों का यह गुनाह धोने से भी धुलने लायक नहीं है…।

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रेपिस्तान… फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

यह सही है कि रेप की कुछ घटनाओं के कारण देश वैसे ही रेपिस्तान नहीं कहा जा सकता जिस तरह कुछ ही अच्छी चीजों का उदाहरण प्रस्तुत कर इसे देवलोक नहीं कहा जा सकता, इसे रामराज की संज्ञा नहीं दी जा सकती…। जम्मू-कश्मीर के आइएएस शाह फैजल को रेपिस्तान जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था लेकिन यदि उन्होंने कहा है तो सरकार को भी इतना बुरा नहीं मानना चाहिए जबकि वह रेप की घटनाएं रोकने में ही नहीं, दोषियों को सजा देने तक में विफल है।
फैजल का ट्वीट है- 

“आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने रेपिस्तान पैदा कर दिया है।”

इस ट्वीट में यदि रेपिस्तान शब्द पर आपत्ति को छोड़ दें तो बाकी गलत क्या है, यह मेरी समझ से बाहर है। और यदि यह सारे कारण मिलते हैं तो इनसे रेपिस्तान का निर्माण हो रहा है, तो यह तर्क भी कहां गलत है? हो सकता है कि एक लोकसेवक होने के कारण फैजल को ऐसा ट्वीट नहीं करना चाहिए था लेकिन एक नागरिक के नाते तो वह कर ही सकते हैं न! क्या लोकसेवक एक नागरिक नहीं होता? क्या देश में अभिव्यक्ति की आजादी जैसा कुछ नहीं होता! क्या यह संविधानप्रदत्त अधिकार नहीं है? सरकार ने महज एक ट्वीट पर नोटिस भेज दिया है कि लोकसेवक को यह व्यवहार शोभा नहीं देता पर क्या सरकार को लोकसेवक के प्रति, देश के नागरिक के प्रति यह व्यवहार शोभा देता है? सबसे बड़ी बात तो यह कि फैजल के ट्वीट में कहीं भी सरकार का जिक्र नहीं है। फैजल ने सरकार की निंदा नहीं की है, बल्कि रसातल में जा रहे भारतीय समाज की चिंता की है। फैजल ने रेप के लिए जो कारण दिए हैं, उसके लिए भी सरकार से अधिक समाज ही कठघरे में है। इस तरह यह कहीं से भी सरकारविरोधी ट्वीट नहीं है लेकिन चूंकि सरकार अपनी नाकामियों के कारण हीन भावना से ग्रसित है इसलिए उसे कहीं से भी उठती कोई आवाज अपने विरुद्ध ही प्रतीत हो रही है। यदि सरकार अपना दिल बड़ा करे और रेप रोकने की दिशा में कुछ काम करे तो फैजल ने तो उसकी राह आसान ही की है। रेपमुक्त भारत ही नहीं, अपराधमुक्त भारत बनाने की राह। खुद मेरी नजर में भी रेप या अपराध के बड़े कारणों में सबसे उल्लेखनीय कारण यही हैं जो फैजल ने बताए हैं। इस ट्वीट के लिए फैजल को दंडित करने की बजाय, इनके सुझाए गए कारणों पर चिंतन कर इस दिशा में सरकारी और सामाजिक स्तर पर प्रयत्न किए जाने की जरूरत है।
फैजल ने सबसे पहले आबादी का जिक्र किया है। सोचकर देखिए, बढ़ती आबादी रेप ही नहीं, हर समस्या के लिए जिम्मेदार है; किसी के लिए कम तो किसी के लिए ज्यादा। यदि परिवार में पांच-छह बच्चे हों तो सबपर माता-पिता ठीक से ध्यान नहीं रख पाते, उन्हें शिक्षित, संस्कारित नहीं कर पाते। शिक्षाविहीन, संस्कारहीन नागरिक कैसा होगा? परिवार से आगे निकल यदि हम देश की बात करें तो सरकार खुद भी अक्सर बढ़ती आबादी का रोना रोती रहती है कि ‘इतने बड़े देश में सभी को रोजगार दे पाना मेरी तो क्या, किसी के वश की बात नहीं है।’ अब यदि सरकार के बूते में हर व्यक्ति को रोजगार देना नहीं है तो बेरोजगार आदमी करेगा क्या? अपराध ही तो करेगा?
सवाल उठता है कि जब सरकार को भी अच्छी तरह पता है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में वह सबको आवास, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार आदि मुहैया नहीं करा सकती तो वह इस देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए ही क्या प्रयास कर रही है? 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी एक अरब 21 करोड़ है, जो कि चीन से महज 10 करोड़ ही कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व की कुल आबादी में अकेले भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी है, जबकि हमारे पास दुनिया का केवल चार फीसदी पानी और 2.5 फीसदी ही जमीन है। जाहिर है कि सच में इतनी बड़ी आबादी की जरूरतें कैसे पूरी की जा सकती है? और यदि नहीं की जा सकती तो इस आबादी को बढ़ने क्यों दिया जा रहा है? अब जबकि जनसंख्या विस्फोटक स्तर पर पहुंच चुकी है, सरकार “हम दो— हमारे दो” से आगे बढ़कर “हम दो— हमारे एक” का नारा क्यों नहीं देती? नारा छोड़िए, यह अध्यादेश क्यों नहीं लाती कि जिन वर्तमान कपल की एक से अधिक संतान होगी, उन संतानों को हर तरह के सरकारी लाभ से महरूम कर दिया जाएगा? हर साल करोड़ों की आबादी पैदा करने से अच्छा है कि जो देश की आबादी है, उसी के भरण—पोषण का सही इंतजाम हो। यह कब होगा? आबादी को नियंत्रित करने के उपाय करने की बजाय, आबादी को एक समस्या के रूप में सामने रखने वाले आइएएस अधिकारी का उपाय करना कितना सही है? क्या सरकार को यह मिर्ची इसलिए लगी है कि वह बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल है?
पितृसत्तात्मक समाज। यह दूसरा कारण बताया है फैजल ने। क्या गलत कहा है? देश में अभी 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हैं। अभी भी बेटियों की भ्रूण हत्या हो रही है। कोई नहीं चाहता कि उसके घर बेटी हो। हो गई तो बेटे का इंतजार। यूं किसी को एक भी बेटी नहीं चाहिए लेकिन बेटे के इंतजार में दो—चार भी हो जाए तो क्रम नहीं रोका जाता जब​तक कि बेटा न हो जाए। अब बेटे के इंतजार में हुई बेटियों की क्या कद्र होगी? शुरू से ही भेदभाव…। पालन—पोषण से लेकर पढ़ाई तक में। बेटी थोड़ी बड़ी हुई तो परिवार पर उसकी इज्जत बचा लेने की चुनौती। और बड़ी हुई तो शादी की चुनौती। क्या बेटे—बेटी के मोर्चे पर समाज में दोहराव नहीं है? क्या पितृसत्तात्मक समाज नहीं है? और यदि है तो गलत क्या कहा है फैजल ने?
शराब। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सबसे ताज़ा रिपोर्ट (2016) के अनुसार, 95 प्रतिशत अपराधी पीड़िता के जानने वाले होते हैं। मां से, ​बहन से, रिश्तेदार से, बच्ची से, बुजुर्ग से बलात्कार करने वाले अक्सर नशे में ही होते हैं। हवस में डूबा आदमी जब शराब में डूब जाता है तो वह आदमी से आदमखोर बन जाता है, और इसलिए उसे किसी की चीख में भी आनंद मिल रहा होता है। यदि नशे में दुष्कर्म का आंकड़ा जुटाया जाए तो मेरा दावा है कि यह साबित हो जाएगा कि रेप की अधिकतर घटनाएं नशे में अंजाम दी जाती हैं और शराब रेप का एक बड़ा कारण है; यह बात तो साबित हो ही चुकी है कि घरेलू हिंसा का सबसे बड़ा कारण शराब ही है। आप कुछ न कीजिए। आप एक सप्ताह के अखबार से रेप की घटनाएं एकत्रित कीजिए। फिर देखिए कि नशे में कितनी वारदात हुई और होश में कितनी। आंकड़ा सामने होगा। शराब या कोई भी नशा सिर्फ रेप ही नहीं, अधिकतर अपराध की वजह है। जब यह कोई छुपी हुई बात नहीं है तो इसे फैजल ने सार्वजनिक कह दिया तो क्या गलत कह दिया?
अश्लीलता…। इस पर चर्चा करते ही कथित प्रगतिशील पुरुष और नारियां बिदकने लगते हैं क्योंकि उन्हें डर लगने लगता है कि जिस अश्लीलता को उन्होंने प्रगति का आवरण देकर ढंका है, कहीं वह सामने न आ जाए। वह भी अश्लील ही हैं, कहीं समाज यह भी न जान जाए। अश्लील का मतलब है जो नैतिक व सामाजिक आदर्शों से च्युत है। जो गंदा है। अश्लील बातें हो सकती हैं, अश्लील दृश्य हो सकता है, अश्लील शब्द हो सकते हैं, अश्लील पहनावा हो सकता है, अश्लील आचरण हो सकता है…। अश्लीलता किसी व्यक्ति के अंदर की वह गंदगी है, जो दूसरे व्यक्ति के अंदर की गंदगी को हवा देती है, शह देती है, उसे भड़काती है…। सोचकर भी नहीं बताया जा सकता कि कौन—सा क्षेत्र ऐसा बचा है, जहां अश्लीलता नहीं है, जहां अश्लील लोग नहीं हैं। मीडिया, साहित्य, संगीत, फिल्म, टीवी, राजनीति, सरकार से लेकर समाज तक…। यह अश्लीलता इस हद तक फैल चुकी है कि अब तो कुछ भी अश्लील नहीं लगता। सबकुछ यह कहकर स्वीकार कर लिया जाता है कि अब इतना तो चलता ही है! ऐसे माहौल में जहां अश्लीलता समय की मांग लगने लगी है, अश्लील लोग मॉडर्न और प्रगतिशील समझे जाने लगे हैं, वहां एक और अश्लीलता— रेप और एक और अश्लील— रेपिस्ट की उत्पत्ति पर क्या आश्चर्य है?
तकनीक। यौन इच्छाएं अपनी पूर्ति के लिए हर युग में मौजूद संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करती हैं। जब तकनीक नहीं थी, तब मस्तराम किसने नहीं पढ़ा? जिसने नहीं पढ़ा, उसने रसभरी कहानियां पढ़ लीं। कुछ न मिला तो सरस सलील ही खरीद ली। लेकिन बस। इससे अधिक कुछ भी चारा नहीं था। जिसने छुपकर कुछ अश्लील पढ़ा भी तो यहीं तक, देखा भी तो यहीं तक, सीखा भी तो यहीं तक। और अब? अश्लीलता तक किसकी पहुंच नहीं है? अश्लीलता की कौन—सी हद बाकी है? कोई सीमा है? यह तो पूरी तरह बच्चे के विवेक पर है न कि वह मोबाइल का डाटा क्या देखने, क्या पढ़ने पर खर्च कर रहा है? कोई रोक—टोक है? किसी भी स्तर पर? माहौल का व्यापक असर पड़ता है लेकिन कैसा माहौल है यह? व्यक्ति जो सोचता है, धीरे—धीरे वही बन जाता है लेकिन कौन जानता है कि मोबाइल पर पोर्न देखने वाले किसी बच्चे से लेकर कोई बुजुर्ग तक क्या सोचता है? फेसबुक के जरिये तो किशोरों के आतंकी तक बन जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लगातार रेप के क्लिप देख—देखकर यदि वे रेपिस्ट बन रहे हैं तो क्या आश्चर्य है? इस पर क्या नियंत्रण जरूरी नहीं है? तो क्या गलत कह दिया है फैजल ने?
अराजकता। अभी हाल ही में दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल में अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान पर उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यहां अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं है। जाहिर है कि अराजकता अच्छी बात नहीं है। सवाल है कि अराजकता है क्या? अराजकता से आशय है, देश में सरकार का न होना या होते हुए भी न होने जैसी स्थिति हो जाना। एक ऐसी स्थिति जिसमें कोई व्यवस्था न रह जाए। अनार्की। … तो कुछ हद तक इसमें भी क्या गलत है? रेप हो जाने के बाद किस पीड़िता को किसी व्यवस्था के होने का अहसास होगा? जो सरकार किसी लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती; उसके होने या न होने का क्या मतलब है? क्या यह अराजकता नहीं है? सबसे चर्चित निर्भया मामले में भी अभी तक दोषियों को उनके कुकर्म की सजा सुनाई भर गई है, उस पर अमल नहीं हुआ है। यह कौन—सी स्थिति है? न्याय में देरी भी एक अन्याय है तो क्या अन्याय अराजकता नहीं है? एक लड़की सिर्फ इसलिए सड़कों पर न निकल पाए क्योंकि वह लड़की है तो क्या यह अराजकता नहीं है? ऐसी व्यवस्था जिसमें न तो रेप करने से पहले ही रेपिस्ट डरता है और न ही किसी की इज्जत व जिंदगी छीन लेने के बाद ही उसके कृत्य के अनुरूप उसे सजा हो पाती है, फांसी हो पाती है तो यह कौन—सी स्थिति है? क्या यह अराजकता नहीं है?क्या यह अराजकता रेप के लिए किसी भी हद तक जिम्मेदार नहीं है?
रेपिस्तान। यानी वह दुनिया, जिसकी पहचान ही रेप है। फैजल के अनुसार, वह दुनिया जिसे आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने गढ़ा है। अब जबकि अराजकता ही है तो रेपिस्तान पर भी क्या आपत्ति है? इस देश में जहां हर 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है, यह रेपिस्तान नहीं तो और क्या है? फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

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