हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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यूं दबाइए नोटा कि माथा पकड़ बोलें जातिवादी नेता… ले लोटा!

नोटा बेकार कतई नहीं है।
यह बताता है कि मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई और विपक्ष तो यह भरोसा तक जगाने में नाकाम रहा कि उसे सत्ता सौंपी गई तो वह कुछ सार्थक कर पाएगा।
यदि आपको इस भाव का अहसास है, खुद के छले जाने का अहसास है तो आपके लिए नोटा सबसे बेहतर विकल्प है। यह बेकार कतई नहीं है।
बूथ पर जाने का अर्थ किसी न किसी को वोट देकर आना ही नहीं है। बूथ पर जाने का अर्थ यह बताकर आना भी है कि तुम में से कोई भी इस लायक नहीं है कि मेरा वोट पा सके।
नोटा सत्ता पक्ष के लिए एक संदेश है कि देखो हम फिर 5 साल बाद बूथ पर आए हैं लेकिन इस बार तुम्हारी गलतियों के कारण तुम्हें चुनने कतई नहीं आए हैं। ठीक से देख लो! हम वोट दे रहे हैं लेकिन तुम्हारे पक्ष में नहीं, तुम्हारे खिलाफ। तुम्हारी तुष्टीकरण वाली नीतियों के खिलाफ। तुम्हारी जातिवादी राजनीति के खिलाफ। तुम्हारी दुर्भावनाग्रस्त सोच के खिलाफ।
जहां कहीं भी नोटा की संख्या इतनी पहुंच पाती है, जितने से कि सत्तासीन नेता हार जाता है तो समझ लीजिए कि बदला चुकता हो गया। समझ लीजिए कि उसे आपके गुस्से ने ही हराया है और यह बात वह खुद भी ठीक से समझ जाएगा। यह संदेश उसके जरिये सभी नेताओं को जाएगा।
आप आज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए क्योंकि आपका आज इन नेताओं ने पहले ही खराब कर रखा है। आप दूरगामी सोचिए। नोटा दूरगामी परिणाम देगा। अपनी तो जैसे—तैसे कट ही रही, कट ही जाएगी; अभी आने वाली पीढ़ियों के हक की रक्षा के ​लिए खड़े होने का वक्त है। कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर आपसे बच्चे पूछें कि जब एक—एक कर उनके अधिकार छीने जा रहे थे तब आप क्या कर रहे थे तो आपके पास कोई जवाब न हो! शर्म की वह स्थिति आने से पहले चेत जाइए। नोटा ही दबाइए।
यकीन मानिए, एससी—एसटी एक्ट से लेकर आरक्षण तक, सिर्फ धर्म—जाति की राजनीति करने वाले नेताओं के मुंह पर मारने के लिए यदि जूते से भी बेहतर कुछ है तो वह नोटा ही है। न संविधान की प्रतियां जलाइए, न कहीं तोड़—फोड़ कीजिए। राजनीतिक स्वार्थ, वोट बैंक के लिए किए जा रहे धार्मिक—जातीय तुष्टीकरण और देश के संविधान और संसाधनों के हो रहे दुरुपयोग का विरोध भी संवैधानिक तरीके से ही कीजिए। अपने संवैधानिक अधिकार— नोटा का प्रयोग ब्रह्मास्त्र समझकर कीजिए।
यदि आप कभी किसी सरकार को चुनने के लिए बूथ पर नहीं गए हैं तो भी इस बार नहीं चुनने के लिए जाइए। इस बार बूथ पर जरूर जाइए। अपने लिए नहीं, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जाइए। जाइए और सिर्फ नोटा दबाने के लिए जाइए।

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यह सवर्ण 1000 वर्षों का हिसाब चुकाने के लिए तैयार है !

हम जन्म से हिंदू हैं। यह मेरा धर्म है, मेरी संस्कृति है किंतु हमें किसी अन्य के मुस्लिम, इसाई होने से भी कोई दिक्कत नहीं है।
हम ब्राह्मण हैं। यह मेरी जाति है, इससे मेरा संस्कार है​ किंतु हम जातिवादी नहीं हैं। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं कि अन्य किस जाति के हैं। किंतु, क्या इसका कोई अर्थ है? इस भाव के बाद भी मेरी पहचान क्या है? सवर्ण ही न! समाज के लिए भी, संविधान के लिए भी, सरकार के लिए भी!
हमने तो एक चीटी भी नहीं मारी लेकिन इसके बाद भी हमपर 1000 वर्षों के शोषण का इल्जाम आता है तो हम तो बन गए न बैठे—बिठाए गुनहगार! और सवर्ण होने की सजा देखिए- हमारा राशन बंद, स्कॉलरशिप बंद, एडमिशन बंद। नौकरी बंद। प्रोन्नति बंद। और जेल भी भेजा जाना तय! बेगुनाही साबित करने तक का मौका नहीं! माने मानवाधिकार भी गए तेल लेने! इतना जुल्म! क्यों? अच्छा समझे! 1000 वर्षों तक हमने जुल्म जो ढ़ाया है …! सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यदि बेहयाई से यह दलील रख ही दी है कि कुछ जातियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए आंकड़े की जरूरत नहीं है क्योंकि ये 1000 वर्षों से सताए हुए हैं तो क्या आश्चर्य है यदि आगे कभी एससी-एसटी एक्ट पर चर्चा हो तो यह दलील भी प्रस्तुत कर दे कि सवर्णों को सजा देने के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं क्योंकि इनके जुल्म का इतिहास 1000 वर्ष पुराना है? यह एक्ट बना भी तो इसी भाव से है!
…तो यदि सवर्ण का भाव न होकर भी हमारी पहचान यही है और इसी के कारण निर्दोष होकर भी हम दंड के भागी हैं तो कब तक सफाई देते रहेंगे कि हम वैसे सवर्ण नहीं हैं जैसा सरकार बता रही। यदि समाज को एक अच्छा इंसान नहीं चाहिए, देश—सरकार को एक अच्छा नागरिक नहीं चाहिए तो देते हैं न वही, जो चाहिए। सरकार ने तो हमें सवर्ण मान ही लिया है, तो चलो सरकार को हम भी सवर्ण बनकर दिखलाते हैं। इन सरकारों से बहुत चोट खा चुके भाई, अबकी सबक हम भी सिखलाते हैं।
आश्चर्य न कीजिए! हमने तो हमेशा यही चाहा है कि मेरा धर्म, मेरी जाति मेरी निजी आस्था, पहचान तक ही रहे। देश के लिए मेरी पहचान उसके एक नागरिक के रूप में हो। किंतु इस देश को नागरिक चाहिए क्या? सरकार हमें नागरिक मानती है क्या? सरकार ने तो हमें या किसी को भी नागरिक के रूप में कभी देखा ही नहीं। उसने तो हमारे धर्म, जाति को ही हमारी मौलिक पहचान घोषित कर रखी है। हमने तो यही चाहा कि यह वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था धीरे—धीरे समाज से भी खत्म हो, इसका भाव खत्म हो किंतु यदि इसे संविधान से लेकर सरकार तक में जगह मिल गई तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? समाज में जाति व्यवस्था के लिए यदि हम दोषी हैं तो इस जातिवादी संविधान के लिए कौन दोषी है जो सबकी जाति देखता है? इस जातिवादी सरकार के लिए कौन दोषी है, जो हर फैसले जाति देखकर लेती है? यह तो किसी को गरीब भी मानते हैं तो धन नहीं, जाति देखकर। सवर्ण भी मानते हैं, तो कर्म नहीं वर्ण देखकर। इसके लिए दोषी कौन है? क्या इसके लिए भी सवर्ण? हमें तो यह समझ में नहीं आता कि आखिर यह बात इस देश के संविधान, सरकार को किसने बताई कि हम सवर्ण हैं? हम तो सर्टिफिकेट लेकर आए नहीं थे? किसी को दिखाए भी नहीं थे? जातियों का सर्टिफिकेट भी तो संविधान, सरकार ने ही मिलकर बांटा लेकिन दोषी कौन? सवर्ण! इस समय हर जाति के पास उसका सर्टिफिकेट है इसके बाद भी जातिवादी कौन है? सवर्ण! तो चलो न जब यही पहचान गई तो इसी के साथ कुछ वक्त बिताते हैं, सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनकर दिखाते हैं!
संविधान ने सबको एक समान माना है किंतु क्या वह अभी कहीं लागू है? यह बात देश के संविधान और सरकार को किसने बताई कि किन जातियों को गाली दी जाए तो उनकी भावना आहत हो जाती है और किनको दी जाए तो उनका सम्मान बढ़ जाता है? गाली तो गाली है न! फिर, बभना, ठकुरा गाली क्यों नहीं और बाकी गाली क्यों है? यह परिभाषा किसने गढ़ी? कैसे? सरकार की कोई समिति बनी थी? यह एससी—एक्ट बनाने वाली सरकार जातिवादी नहीं है जो जाति देखकर गाली को गाली परिभाषित कर रही है? जाति देखकर जेल भेज रही है? तो जातिवादी कौन है? सवर्ण? यानी, संविधान से लेकर सरकार तक दुर्भावना से ग्रसित किंतु निर्लज्जता ऐसी कि दुर्भावनाग्रस्त भी बताया जाएगा सवर्ण ही!
1000 वर्षों का शोषण है! किसने किया, किससे किया? उसमें जीवित कौन है? यह सब कौन पूछता है? कौन जवाब भी देता है? बस शोषण हुआ है! और इस शोषण का बदला तो लिया जाएगा! यह संविधान, यह सरकार हिसाब चुकता करेगी। किससे बदला लेंगे? कोई तो होना चाहिए? 1000 वर्षों के शोषण का हिसाब सवर्ण चुकाएगा! संविधान, सरकार दोनों ने मान लिया है कि देश का यह वर्ग स्वभाव से आततायी है, जुल्मी है। इसे सजा देनी है, बराबर देनी है। तब तक जब तक कि यह घुटने पर न आ जाए। रेंगने न लग जाए। दोनों ने यह भी मान लिया है कि देश का एक वर्ग शोषित है, उसके साथ सदियों तक शोषण हुआ है। उसे इंसाफ दिलाना है, बराबर दिलाना है। तब तक जब तक कि वह खुद शोषक न बन जाए। इसलिए एक बच्चे के अयोग्य होने पर भी उसे स्कूल में प्रवेश दिलाना है, धनी होते हुए भी स्कॉलरशिप दिलानी है, अयोग्य होते हुए भी नौकरी दिलानी है और प्रोन्नति भी। क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषित है! एक और बच्चा है। वह गरीब है किंतु स्कॉलरशिप नहीं देनी, वह योग्य है किंतु स्कूल में प्रवेश नहीं देना, नौकरी भी नहीं देनी और नौकरी नहीं तो प्रोन्नति कैसी? क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषण करता आ रहा है!
सवाल है कि यह सवर्ण कौन है? इससे इतना डर क्यों है? क्या यह समाज—देश के लिए विलेन है? बॉलीवुड की किसी फिल्म से भी बड़ा? किस निर्देशक ने यह चरित्र गढ़ा है कि संविधान से लेकर सरकार और यहां तक कि समाज तक सभी डरे सहमे हुए हैं? डरना तो होगा क्योंकि निर्देशक ने यह भी बताया है कि सवर्ण जातियों के शोषण का इतिहास 1000 वर्षों का है! और कितने पर्यायवाची, परिभाषाएं भी गढ़े हैं! मनुवादी, जातिवादी, अगड़ी जाति, सवर्ण! क्या गजब का विरोधाभास है कि जिनके साथ सबसे अधिक असामान्य व्यवहार होता है, वह सामान्य जातियां कहलाती हैं— सवर्ण। संविधान, सरकार के लिए जो स्पेशल नहीं है, वह​ जनरल है— सवर्ण। सरकार हर नीचता जिनके साथ करे, वह उंची जातियां हैं— सवर्ण। जो जातियां बैकवर्ड भी हैं तो संविधान में फारवर्ड हैं, वह हैं सवर्ण। लोवर भी हैं तो अपर हैं माने सवर्ण। पिछड़ी भी हैं तो अगड़ी हैं तो सवर्ण। जो अनारक्षित हैं, वह सवर्ण। जो डिज्वर्ड हैं तो भी अनरिजव्र्ड हैं, वह है सवर्ण! अब यदि सवर्ण ठहराने के लिए इतना कुछ गढ़ा है तो मेहनत जाया क्यों जाने दें? यदि सरकार की इतनी जिद है तो क्यों न अपनी भी जिद दिखलाएं। सवर्ण कहलाएं ही क्यों, चलो सवर्ण बन भी जाएं!
सवर्ण! सरकार के लिए वह पुतला जिस पर हर तरह के टेस्ट किए जा सकें। जो खेत में खड़ा होकर फसल की रखवाली करे किंतु उस पर हक न जताए। देश में रहकर राष्ट्रभक्ति से आगे निकल सरकार भक्ति दिखलाए किंतु देश के संसाधनों पर उसका हक न हो। हिन्दू खतरे में तो सवर्ण आगे आए, समाज खतरे में तो सवर्ण आगे आए, राष्ट्र खतरे में तो उसे आवाज दी जाए, बस वह पहरेदार बना रहे हिंदुत्व का, धर्म का, राष्ट्र का… वह संसाधनों की रखवाली करता रहे क्योंकि उसके उपभोग का पहला, दूसरा, तीसरा सारा हक किसी और के पास है। सवर्ण माने कि बिना जांच दोषी मान लिया जाए, गिरफ्तार हो जाए। जो देश में 131 लोकसभा सीटों से सांसद बनने का ख्वाब भी न देख सके, वह सवर्ण। जिसे 1225 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार न हो, वह सवर्ण। जिसे सजा देने के लिए अलग से न्यायालय, थाने खोले जाएं, वह सवर्ण। जो योग्य होकर भी देश के 50 फीसदी सरकारी पदों के लिए कोशिश करने से भी वंचित कर दिया जाए, वह सवर्ण। कुछ राज्यों में तो जो सरकारी नौकरियों से प्रायः पूरी तरह वंचित कर दिया जाए वही सवर्ण!
सवर्ण! सवर्ण! सवर्ण! अब जब हमारी सरकारी पहचान सवर्ण ही है और हिसाब भी 1000 वर्षों का है तो हम हिसाब चुकाने के लिए तैयार हैं! कोई सफाई नहीं, हम सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनने को भी तैयार हैं! अभी तक देश—समाज ने माना है, आज हम स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं! साथ ही यदि इतनी सरकारी प्रताड़ना के बाद भी किसी भाई का कुछ हिसाब रह गया है तो हम चुकता करने के लिए तैयार बैठे हैं। जिस किसी भाई का हमसे सिर्फ इसलिए दुराव है कि हम सवर्ण हैं तो वह अपने दस-बीस पुश्त का इतिहास लेकर सामने आएं और बताएं कि मेरे किस दादा या परदादा ने उनके किस दादा या परदादा से काम कराया लेकिन पारिश्रमिक नहीं दिया। जब पैसे मांगे तब किसने किसको कोड़े बरसाए। किस कुएं में पानी पीने गए थे तो किसने रोक दिया था? पहले हिसाब दें, फिर चुकता करने के लिए भी हम तैयार हैं! हम तैयार हैं उस सरकार, व्यवस्था से भी हिसाब चुकता करने के लिए जो 1000 वर्षों का बदला ले रही है। हम आज, अभी उस चुनाव का बहिष्कार करते हैं जिसके जरिये देश के लिए नहीं, कुछ जातियों के लिए सरकार चुनी जाती है। सरकार ने जिन्हें सवर्ण घोषित किया है, हम उन सभी जातियों के लोगों का भी आवाह्न करते हैं कि स्वयं भी अपने को सवर्ण घोषित करें और उस चुनाव का बहिष्कार कर दें जिसमें आपके लिए कुछ भी नहीं है। आप किसी को भी चुनें लेकिन यदि वह आपसे 1000 वर्षों की दुर्भावना लिए बैठा है तो वह आपके साथ न्याय नहीं कर सकता। चूंकि सब यही करते हैं इसलिए जरूरी है कि एक चुनाव ऐसा जाने दीजिए जिसमें किसी को न चुनिए। बस एक चुनाव शांत हो जाइए, यह शांति तूफान का काम करेगी और बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार कोई भी हो, उसका रवैया सवर्णों के साथ एक जैसा है। ऐसे में कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके वोट न देने से सरकार किसकी बनेगी। हां, जिनकी नहीं बनेगी उन्हें सबक मिलेगा और जिनकी बनेगी उन्हें यह संदेश कि अब और ज्यादती कि तो उनकी भी सरकार जानी तय है। साथ ही चुप न रहें। देश-समाज विरोधी जातिवादी कानून, व्यवस्था, सरकार सबके खिलाफ आवाज उठाएं। लिखें, बोलें, शेयर करें। अंदर के गुस्से को इतना फैलाएं कि वह संसद तक पहुंच पाए। अस्तित्व रक्षा का अब बस यही एक उपाय है! करो या मरो!

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