फख्र है अपने स्कूल के इतिहास पर, शर्म आती है वर्तमान हालात पर

1942, आज का दिन। पटना सचिवालय। महात्मा गांधी से प्रेरणा लेकर सात छात्र पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने निकले। 11 अगस्त को दोपहर दो बजे तिरंगा फहराने जा रहे छात्रों के दल पर जिलाधिकारी डब्ल्यूजी आर्थर ने गोलियां चलाने का आदेश दिया। सबसे पहले जमालपुर गांव के 14 वर्षीय छात्र को गोली लगी। यह देवी पद थे— मिलर स्कूल के छात्र। देवीपद के गिरते ही पुनपुन के दशरथा गांव के राम गोविंद सिंह ने तिरंगे को थामा और आगे बढ़ने लगे। उन्हें भी गोली लगी। वे गिरे, तिरंगा न गिरा। तिरंगे को लेकर रामानंद बढ़ चले, जिनकी कुछ दिन पूर्व शादी हुई थी। उन्हें भी गोली मार दी। तिरंगे को लेकर आगे बढ़े गर्दनीबाग उच्च विद्यालय के छात्र राजेन्द्र सिंह। वह भी शहीद। गिरते राजेंद्र सिंह के हाथ से तिरंगे को गिरने न दिया बीएन कॉलेज के छात्र जगतपति कुमार ने। जगतपति को एक गोली हाथ में, दूसरी छाती में लगी और तीसरी जांघ में धंस गई। इसके बावजूद तिरंगे को झुकने नहीं दिया और उसे अपने हाथ में लिया उमाकांत ने। पुलिस ने उन्हें भी गोली का निशाना बनाया लेकिन शहीद भी हुए तो तिंरगे को सचिवालय के गुंबद पर फहराकर।
उमाकांत प्रसाद सिंह राम मोहन राय सेमेनरी स्कूल में नौवीं कक्षा के छात्र थे। वह सारण जिले के नरेंद्रपुर गांव के निवासी थे। सतीश प्रसाद झा पटना कॉलेजिएट के 10वीं कक्षा के छात्र थे। भागलपुर जिले के खडहरा के रहने वाले थे। रामानंद सिंह राम मोहन राय सेमेनरी स्कूल में नौवीं कक्षा के छात्र थे। पटना जिले के शहादत गांव के रहने वाले थे। देवीपद चौधरी मिलर हाई स्कूल के नौवीं कक्षा के छात्र थे। सिलहट जमालपुर के रहने वाले थे। राजेन्द्र सिंह पटना हाई स्कूल में 10वीं कक्षा के छात्र थे। सारण जिले के बनवारी गांव के रहने वाले थे। राम गोविंद सिंह पुनपुन हाई स्कूल के 10वीं के छात्र थे। पटना अंतर्गत दशरथा के रहने वाले थे। जगतपति कुमार बीएन कॉलेज में सेकेंड इयर के स्टूडेंट थे। औरंगाबाद जिले के खराठी गांव के रहने थे…।
आज इन सभी का शहादत दिवस है लेकिन शर्म आती है कि इन्हीं स्कूलों-कालेजों के बच्चों तक को नहीं बताया जाता है कि यहां कुछ छात्र ऐसे भी हुआ करते थे जो देश प्रेम में जान न्योछावर किया करते थे। जब तक हम मिलर के छात्र थे, हम सब अपने वीर योद्धा देवी पद चौधरी के बारे में पढ़ते थे, उन पर फख्र करते थे। मिलर स्कूल में जहां उनकी प्रतिमा थी वहां हम खड़े होकर तब की घटनाओं पर बहस किया करते थे।
आज भी फख्र है हमें अपने स्कूल के छात्र देवी पद की शहादत पर और स्वयं के उस क्रांतिकारी स्कूल से होने पर लेकिन शर्म आती है यह जानकर कि पांच साल पहले इस स्कूल के सिलेबस से देवी पद से संबंधित पाठ हटा दिया गया। यह बात खुद स्कूल की प्राचार्य सोफिया खातून ने स्वीकार किया है कि नए सिलेबस में शहीद देवीपद चौधरी का उल्लेख नहीं है। दुख होता है इस हालात पर। शर्म आती है शहीदों के साथ बिहार सरकार के इस बर्ताव पर।