हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

टैग: नरेंद्र मोदी

अभी वोट से भी कीमती नोटा है…

वे जो वर्षों से जातिवादी, भ्रष्टाचारी, अपराधी नेताओं को चुनकर संसद भेजते रहे हैं, उन्हें भी अभी अपने वोट की कीमत समझ आ गई है। सत्ता से लेकर विपक्ष तक के पक्ष में एक आवाज आ रही है कि भाई नोटा न दबाओ, वोट बेकार चला जाएगा। माने फिर से इन्हें जिता दो ताकि ये हमसे अपना ऐतिहासिक बदला (1000 वर्ष) पूरा कर सकें।
भाई लोग, यदि आपको नोटा बेकार लगता है तो हमें आपका वह वोट बेकार लगता है जो बेकार नेताओं को चुन रहा है। देश के तमाम सांसद एससीएसटी एक्ट पर गूंगे हो गए हैं। ऐसे बेजुबानों को सदन भेजकर क्या करना जो बोल ही नहीं सकते? सदन तो बोलने वालों के लिए है न?
भाई, चाहा तो हमने भी हर बार यही कि अपने वोट से एक अच्छी सरकार चुनें। जो वादों और इरादों की पक्की हो। जिसके लिए देशहित सर्वोपरि हो। लेकिन पूरे हुए वादे? और एससीएसटी एक्ट के रूप में सामने तो हैं इरादे! नेक है न यह इरादा? जो कुछ जातियों को तुष्ट करने के लिए देश की अन्य जातियों पर आपातकाल लागू कर दे?
भाई, हमने तो हर बार इन्हें यही सोचकर चुना था कि अब अपनी, आने वाली पीढ़ियों की, देश की तकदीर बेहतर होगी लेकिन हुई? नहीं न! अब इस तरह बार-बार पीठ में छुरा भोंकने वालों को बार-बार चुनकर बार-बार खड्यंत्र के अवसर देने से तो अच्छा है न इस बार का नोटा! यह नोटा बेकार नहीं है। इस समय में वोट की असली कीमत यही है। वोट का मतलब है एक मत और अभी हमारा मत इस बात के लिए है कि एक देश-एक संविधान-विधान हो। जातियों की नहीं, सम्पूर्ण देश की सरकार हो। इसलिए इस बार तो बस नोटा! वह नोटा जो सत्ता को उसकी औकात बताएगा और अन्य सभी दलों को एक सीख, सबक, संदेश दे जाएगा कि अब देश में धार्मिक, जातिवाद का और तुष्टीकरण बर्दास्त नहीं। अब वोट बैंक की गंदी राजनीति और नहीं! अब बस! बस नोटा!

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यूं दबाइए नोटा कि माथा पकड़ बोलें जातिवादी नेता… ले लोटा!

नोटा बेकार कतई नहीं है।
यह बताता है कि मौजूदा सरकार उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई और विपक्ष तो यह भरोसा तक जगाने में नाकाम रहा कि उसे सत्ता सौंपी गई तो वह कुछ सार्थक कर पाएगा।
यदि आपको इस भाव का अहसास है, खुद के छले जाने का अहसास है तो आपके लिए नोटा सबसे बेहतर विकल्प है। यह बेकार कतई नहीं है।
बूथ पर जाने का अर्थ किसी न किसी को वोट देकर आना ही नहीं है। बूथ पर जाने का अर्थ यह बताकर आना भी है कि तुम में से कोई भी इस लायक नहीं है कि मेरा वोट पा सके।
नोटा सत्ता पक्ष के लिए एक संदेश है कि देखो हम फिर 5 साल बाद बूथ पर आए हैं लेकिन इस बार तुम्हारी गलतियों के कारण तुम्हें चुनने कतई नहीं आए हैं। ठीक से देख लो! हम वोट दे रहे हैं लेकिन तुम्हारे पक्ष में नहीं, तुम्हारे खिलाफ। तुम्हारी तुष्टीकरण वाली नीतियों के खिलाफ। तुम्हारी जातिवादी राजनीति के खिलाफ। तुम्हारी दुर्भावनाग्रस्त सोच के खिलाफ।
जहां कहीं भी नोटा की संख्या इतनी पहुंच पाती है, जितने से कि सत्तासीन नेता हार जाता है तो समझ लीजिए कि बदला चुकता हो गया। समझ लीजिए कि उसे आपके गुस्से ने ही हराया है और यह बात वह खुद भी ठीक से समझ जाएगा। यह संदेश उसके जरिये सभी नेताओं को जाएगा।
आप आज की चिंता बिल्कुल मत कीजिए क्योंकि आपका आज इन नेताओं ने पहले ही खराब कर रखा है। आप दूरगामी सोचिए। नोटा दूरगामी परिणाम देगा। अपनी तो जैसे—तैसे कट ही रही, कट ही जाएगी; अभी आने वाली पीढ़ियों के हक की रक्षा के ​लिए खड़े होने का वक्त है। कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर आपसे बच्चे पूछें कि जब एक—एक कर उनके अधिकार छीने जा रहे थे तब आप क्या कर रहे थे तो आपके पास कोई जवाब न हो! शर्म की वह स्थिति आने से पहले चेत जाइए। नोटा ही दबाइए।
यकीन मानिए, एससी—एसटी एक्ट से लेकर आरक्षण तक, सिर्फ धर्म—जाति की राजनीति करने वाले नेताओं के मुंह पर मारने के लिए यदि जूते से भी बेहतर कुछ है तो वह नोटा ही है। न संविधान की प्रतियां जलाइए, न कहीं तोड़—फोड़ कीजिए। राजनीतिक स्वार्थ, वोट बैंक के लिए किए जा रहे धार्मिक—जातीय तुष्टीकरण और देश के संविधान और संसाधनों के हो रहे दुरुपयोग का विरोध भी संवैधानिक तरीके से ही कीजिए। अपने संवैधानिक अधिकार— नोटा का प्रयोग ब्रह्मास्त्र समझकर कीजिए।
यदि आप कभी किसी सरकार को चुनने के लिए बूथ पर नहीं गए हैं तो भी इस बार नहीं चुनने के लिए जाइए। इस बार बूथ पर जरूर जाइए। अपने लिए नहीं, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जाइए। जाइए और सिर्फ नोटा दबाने के लिए जाइए।

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पाकिस्तान में इमरान तो भारत में…?

पाकिस्तान में कल हुए आम चुनाव का आज परिणाम आ रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीति के खिलाड़ी बने इमरान खान की पार्टी तहरीक—ए—इंसाफ (पीटीआई) देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई साफ नजर आ रही है वहीं जेल में बंद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएलएम-एन) दूसरे नंबर पर चल रही है। चुनाव परिणाम इससे थोड़ा ही इधर—उधर होगा। पीटीआई को पूर्ण बहुमत न मिला तो भी गठबंधन कर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो ही जाएंगे…।
यूं तो इमरान पाकिस्तान की जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता हैं लेकिन वह खुद कितने लोकतांत्रिक हैं, इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में, यदि अलोकतांत्रिक विचारों वाले इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत—पाक में शांति वार्ता जैसी कोई चीज रह जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। युद्ध की संभावना न हो तो भी सीमा पर घुसपैठ बढ़नी तय है क्योंकि पाकिस्तान में सेना की सत्ता नहीं होगी तो भी इमरान के रूप में कमोबेश उसका ही नेतृत्व होगा।
अब ऐसे में, 2019 में होने वाले चुनाव में भारत को ऐसा प्रधानमंत्री देना होगा जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देना जानता हो। जो इतना उतावला न हो कि देश को बेमतलब युद्ध की आग में झोंक दे लेकिन इतना कायर भी न हो कि घुसपैठ बर्दाश्त करता रहे, आतंकी गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहे।
भारत में वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के लिए दो ही उम्मीदवार सामने हैं। एक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी।
नरेंद्र मोदी अपने वादे पर काफी हद तक खरे नहीं उतर पाए हैं। आतंक के मुद्दे पर बात करें तो सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही दिखता है। खासकर, कश्मीर मुद्दे पर तो मोदी अपना कोई वादा नहीं निभा पाए। न कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने का और न ही धारा 370 हटाने का। इतना ही नहीं, रमजान में मुस्लिम तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए मोदी सरकार ने ऐसा निर्णय लिया जिससे सैनिकों को बिना लड़े ही मौत के मुंह में समा जाना पड़ा। सरकार ने देशद्रोहियों से केस वापस लिए और जिन पर केस चल रहे हैं, उनमें अधिकतर मामले में अभी तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं करा पाई। राफेल डील में विपक्ष के कुतर्कों को छोड़ दें तो सही सवालों का भी जवाब दे पाने में मोदी असफल रहे हैं। वह नहीं बता पा रहे कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसी कंपनी से करार किया जा रहा, जो अनुभवहीन है। कई मसले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह सरकार देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने में नाकाम है…।
राहुल गांधी की बात करें तो नरेंद्र मोदी से तुलना करने के लिए उनका कोई कार्यकाल तो नहीं है, लेकिन उनके विचार और व्यवहार सामने हैं जिसे देखकर कतई नहीं लगता कि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो आतंक का करारा जवाब दे पाएंगे। यह मोदी सरकार की नाकामी है कि जेएनयू में देशविरोधी नारों की सच्चाई अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है लेकिन देशद्रोह का आरोप लगने के साथ ही आरोपितों के बचाव में उतर जाना बताता है कि राहुल गांधी कभी—कभी किस हद तक गिर सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कठुआ में कुछ लोग दुष्कर्म के आरोपितों के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह सही है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी करार न ​दे दिया जाए, वह दोषी नहीं है लेकिन यदि वह आरोपित भी है तो संदिग्ध तो है ही। ऐसे व्यक्ति का बचाव, उसके गुनाह पर पर्दा डालना ही है। इस तरह आतंकियों, देश द्रोहियों से मुकाबले के मामले में मोदी की अपेक्षा राहुल का व्यवहार अधिक संदिग्ध दिखता है।
बात सच्चाई की करें तो मोदी और राहुल दोनों ही कई बार झूठ बोल चुके हैं। मोदी चुनावी सभाओं में झूठ बोलते हैं लेकिन राहुल ने तो पिछले दिनों राफेल डील मुद्दे पर भरी संसद में ही झूठ बोला, वह भी तब जबकि यह डील कांग्रेस ने ही की थी।
अब बात यदि व्यवहारिक समझ, ज्ञान की करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी मोदी के सामने दूर—दूर तक नहीं टिकते। डिग्री किसकी सही है, यह तो जांच में ही सामने आएगा लेकिन पढ़ार्इ ठीक से नहीं की है राहुल ने यह बार—बार वह खुद साबित कर चुके हैं। मोदी का तो इतिहास ज्ञान ही अनूठा है लेकिन राहुल का व्यवहारिक ज्ञान भी। पिछले दिनों वे नहीं बता पाए कि एनसीसी क्या है? हद है, इस देश में रहकर राहुल एनसीसी नहीं जानते। ऐसा कई बार हुआ है, जब राहुल की अज्ञानता साफ झलकी है और ताज्जुब है कि इसे दूर करने के लिए वह कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। शायद, इसकी उन्हें जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाने वाली उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति है।
अब बात यदि राजनीतिक अनुभव की करें तो कुछ कहना ही नहीं है…। जितनी उम्र है राहुल की, कमोबेश उतना अनुभव है मोदी का। राहुल में यही खूबी हैं कि वह युवा है लेकिन कार्य करने की उर्जा मोदी में उनसे भी अधिक है।
भ्रष्टाचार की बात करें तो न तो स्पष्ट रूप से मोदी के बारे में ही ऐसा कहा जा सकता है और न ही राहुल के बारे में ही लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों पर ही कई आरोप लग चुके हैं। बड़ी बात है कि राहुल गांधी हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं और उसकी सुनवाई चल रही है जबकि मोदी पर अभी तक अधिकतर आरोप, आरोप ही हैं। जिस दंगे के लिए उनकी छवि खराब की गई या जिसकी बदौलत वह इतने बड़े नेता बने, उस मामले में भी वह बरी हो चुके हैं।
इस तरह मेरा निजी विचार है कि 2019 में यदि दोनों में से किसी को न चुनना पड़े तो सबसे अच्छा लेकिन यदि कोई तीसरा चेहरा सामने नहीं आता है, और चुनाव राहुल व मोदी में से ही किसी का करना पड़ता है तो मौका नरेंद्र मोदी को ही देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो हम ऐसी स्थिति में नोटा ही दबाएंगे क्योंकि राहुल से हमें कोई उम्मीद नहीं और मोदी ने उम्मीदों को तोड़ा है।

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