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टैग: जाति आधारित राजनीति

यह राहुल का दलित प्रेम है या सवर्ण घृणा…?

इस समय देश में दलित राजनीति की बयार बह रही है। कभी—कभी तो ऐसा लगता है कि मानो देश में कोई और वर्ग रहता ही न हो। बस दलित—दलित—दलित। आज राहुल गांधी भावुक भी हो गए। हमें तो लगा कि कथित दलितों का कथित दर्द देखकर कहीं रो ही न पड़े। इतने मासूम हैं कि बिना जांच ही सवर्णों की गिरफ्तारी का कानून बनने के बाद भी डरे हुए हैं कि कहीं दलितों का शोषण न हो जाए। इनके हिसाब से यह एक्ट अभी उतना प्रभावी नहीं है। शायद, इसमें फांसी का प्रावधान चाह रहे हों! खैर…।
राहुल गांधी की राजनीतिक सोच और समझ कितनी है, इस पर तो किसी बहस की गुंजाइश ही नहीं रह गई है लेकिन इनकी मंशा क्या है, इस पर चर्चा जरूरी है। खासकर तब जबकि इन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर रखा है। ऐसे में जरूरी है जानना कि विपक्ष में होकर भी जो व्यक्ति समस्त देश की चिंता नहीं कर पा रहा; किसी एक खास वर्ग, खास जाति पर ही फिदा हुआ जा रहा है वह प्रधानमंत्री बना तो क्या करेगा!
देश के प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है कि वह हर नागरिक को वैसे ही एक समान समझे जैसे कि कोई पिता अपने सभी बच्चों को समझता है। वह आगे बढ़ने वाले बच्चे को प्रोत्साहित करे, गलत करने वाले को डांटे, कमजोर बच्चे को बल प्रदान करे। वह सबको स्कूल भेजे, सबको उसकी क्षमता के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने और उसे प्राप्त करने में मदद करे। प्रधानमंत्री ऐसा हो जो नागरिकों की धर्म—जाति न देखे। उन्हें एक जैसा समझे। खैर…।
राहुल गांधी कल जंतर मंतर पर दलितों और जनजातीय समुदाय द्वारा आयोजित एक रैली में बोल रहे थे। कहा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस न्यायाधीश को दोबारा नौकरी देकर सरकार की दलित विरोधी मानसिकता पर मुहर लगा दी है जिन्होंने दलितों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के प्रावधान वाले अधिनियम को कमजोर करने के आदेश पारित किए थे। मोदी दलित विरोधी हैं…।
बस यह बयान काफी है राहुल गांधी की मंशा जाहिर करने के लिए। यदि राहुल गांधी दलितों के दर्द से आहत थे तो उनकी पीड़ा अब तक दूर हो जानी चाहिए थी क्योंकि एससी—एसटी कानून में बिना जांच ही सवर्ण की गिरफ्तारी का प्रावधान कर दिया गया है। अब इससे अधिक क्या होगा? लेकिन नहीं, उन्हें दलितों को आकर्षित करना है तो इसके लिए इससे भी आगे जाकर शायद सवर्णों से बैर साधना चाह रहे हैं। अब उन्हें वह न्यायमूर्ति तक पसंद नहीं, जिन्होंने इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कही थी। यानी, एक तरह से सवर्णों को कुछ हद तक राहत दी थी।
न्यायमूर्ति एके गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने 20 मार्च को अपने आदेश में एससी—एसटी एक्ट के राजनीतिक या निजी कारणों के लिए दुरुपयोग किए जाने की बात कही थी जो कि बिल्कुल सत्य थी। दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा था कि आगे से इस अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करनी होगी और अग्रिम जमानत भी दी जा सकेगी। इसी के बाद 2 अप्रैल को देशभर में आंदोलन के नाम पर हिंसा की आग भड़की और इस आग में नेताओं ने जमकर दलित राजनीति की रोटियां सेंकीं। इसी हंगामे के बाद भाजपा सरकार ने एक्ट में संशोधन किया ताकि उसका दलित वोट बैंक न खिसके। अब राहुल इस एक्ट को भी निष्प्रभावी बता रहे हैं ताकि इनका वोट बैंक न खिसके।
बता दें कि न्यायमूर्ति एके गोयल 6 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हो गए और उसी दिन राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के चेयरमैन नियुक्त हुए। राहुल गांधी को इसी से दिक्कत है। यह राहुल का कमाल का दलित प्रेम है कि किसी न्यायाधीश ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बात करते हुए इतना ही कह दिया कि एससी—एसटी एक्ट में बगैर जांच गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए तो वे चाहते हैं कि अब वह भूखो मर जाए, उसे नौकरी से निकाल दी जानी चाहिए या फिर कभी, कहीं नौकरी न दी जाए।
यानी, इनकी चले तो इस देश में सिर्फ सवर्णों की ही नौकरी पर रोक नहीं लगनी चाहिए, बल्कि हर उस शख्स की नौकरी—प्रोन्नति रोक दी जानी चाहिए जो सवर्णों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाए। यह दलित प्रेम है या सवर्णों के प्रति इनकी घृणा? क्या समझें?
राहुल या कोई भी नेता यदि सच में किसी दलित पर हुए जुल्म के खिलाफ खड़ा हो तो स्वागत है। जिस किसी दलित पर कोई भी अत्याचार हो, जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसे जेल भेजा ही जाना चाहिए, इसका स्वागत है। यहां तो यह भी दरियादिली दिखाई गई है कि बिना जांच ही जेल होगी। होना तो यह चाहिए कि धर्म—जाति के आधार पर कानून ही न बने लेकिन वोट बैंक की राजनीति में पड़कर भाजपा ने इतनी दरियादिली दिखा ही दी है तो राहुल की दलितों के प्रति दरियादिली तो इससे आगे बढ़कर सवर्ण घृणा तक पहुंचनी ही चाहिए।
दरअसल, जिस तरह इन नेताओं ने लगातार आरक्षण के जरिये एक समाज को बैसाखी की आदत लगा दी है, ये खुद भी दलितों की बैसाखी के सहारे राजनीति करने के आदी बन चुके हैं। इनकी गंदी राजनीति के चलते विविधताओं का देश, हजारों जातियों का देश, दो-चार जातियों पर सिमट गया है। इस तरह धर्म-जाति के नाम पर देश को बांटने की राजनीति करने वाले राहुल ही नहीं, हर नेता के खिलाफ खड़े होने का वक्त है। चुनाव में बेहतर विकल्प न मिले तो नोटा दबाइए लेकिन किसी जातिवादी नेता के हाथ में देश की तकदीर बिल्कुल न सौंपिए। सबसे पहले राजनीति से जाति को खत्म कीजिए। तभी यह देश भी बचेगा और सम्पूर्ण समाज भी।

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सवर्ण जाति के नाम पर एक नहीं तो यह बड़ी खूबी है!

सरकार दलितों की होगी,
सरकार पिछड़ों की होगी,
सरकार अल्पसंख्यकों की होगी…!
अभी हर नेता यही जुमला दोहरा रहा है। क्या अभी किसी नेता में हिम्मत है जो कहे कि सरकार सवर्णों की होगी? कह दिया तो वह जीत पाएगा? नहीं! हरगिज नहीं!
क्यों? क्योंकि बाकी जातियां उसको नफरत से वोट नहीं करेंगी और उसकी अपनी जाति से भी बहुत कम वोट मिल पाएंगे। ऐसा क्यों? क्या इसलिए क्योंकि सवर्णों में एकता नहीं है? नहीं! ऐसा इसलिए कि सवर्ण समाज अभी भी सबसे उदार, सुलझा समाज है जो जाति पर नहीं मचलता। सवर्ण से वोट लिया जा सकता है विकास के नाम पर, सदाचार के नाम पर, देशभक्ति के नाम पर लेकिन जाति के नाम पर नहीं ! हां, प्रत्याशी सवर्ण हो तो उसे कुछ वोट जाति आधार पर भी मिल सकते हैं किंतु सिर्फ जाति को लेकर चुनाव में खड़ा होगा तो उसकी जमानत जब्त होनी तय है। इस समाज में कुछ जातिवादी उसी तरह हैं जैसे अन्य जातियों में कुछ ही जातिवादी नहीं हैं।
सवर्ण समाज की यह नाकामी बिल्कुल नहीं है कि वह जातिवाद पर रीझ नहीं रहा, जाति के नाम पर एक नहीं हो रहा; यह तो उसकी सबसे बड़ी खूबी है। सवर्ण एक है- राष्ट्र के नाम पर, भले नहीं है जाति के नाम पर। यह बात देश की सियासत भी समझती है। इसलिए सवर्णों से वोट लेने के लिए कोई नेता कभी सवर्ण को नहीं पुकारता है, वह देश को पुकारता है जैसे कि मोदी ने पुकारा था। ओबीसी मोदी को सबसे अधिक वोट सवर्णों ने दिए थे। नेता की सबसे कम जाति यही समाज देखता है इसीलिए तो इस समाज का कोई घोषित नेता नहीं है जबकि अधिकतर जातियां अपनी जाति की पुकार होते ही एकत्र हो जाती हैं इसीलिए इन जातियों के अपने नेता हैं। सवर्ण वोटर तो है पर वोट बैंक नहीं है जिसपर कोई डाका डाल सके। इस देश में यदि सबसे कम जातीय भावना वाला समाज है तो वह सवर्ण ही है लेकिन देखिए कि गजब की ब्रांडिंग की गई है कि सबसे अधिक जातिवादी, मनुवादी भी यही समाज घोषित है।
कामचोर नेताओं की मजबूरी है। नेता चाहते हैं कि वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, लगना ऐसा चाहिए कि दलितों का शोषण किया जा रहा है और सवर्ण ही वह शोषक है। 1000 वर्षों के शोषण की गढ़ी गई और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी के पीछे यही मंशा है। सबको पता है कि सवा अरब की आबादी वाले बड़े देश में सभी वंचितों, गरीबों को राहत देना बड़ा काम है इसलिए नेताओं ने सुविधाजनक काम चुना है- सिर्फ दलितों को ही वंचित घोषित कर सिर्फ इनके लिए ही काम करने का। बावजूद यह काम भी ईमानदारी से नहीं किया। आज भी दलितों का जो वंचित तबका है, वह कमोबेश उसी हाल में है। इन नेताओं की मंशा है कि समाज का एक हिस्सा यूं ही रहे ताकि इससे कभी जाति के नाम पर रिझाकर वोट लिया जा सके तो कभी सवर्णों से डराकर। दलितों का वोट सिर्फ जाति के नाम पर ही हासिल किया जा सके इसके लिए इनका सवर्णों से नफरत करते रहना जरूरी है। यही नेताओं की सोच है, खासकर दलित-पिछड़ों की ही राजनीति करने वाले नेताओं की राजनीति का आधार ही यही है। देश की इसी ओछी राजनीति ने दलितों, पिछड़ों को निरीह और सवर्णों को शैतान के रूप में प्रस्तुत किया है। नेताओं के इस तरह के राजनीतिक षड्यंत्र के बाद भी यदि सवर्ण उतना जातिवादी नहीं हुआ है तो यह अच्छा है। यदि जाति के नाम पर सवर्ण एक नहीं है तो यह इसकी खूबी है, न कि नाकामी। सवर्ण देश के नाम पर एक है। इसी तरह की जागरूकता सभी जातीय समाज में होनी चाहिए।

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