हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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एससीएसटी एक्ट समाज के लिए कैंसर तो मीडिया के लिए सेंसर है…

खबर कुछ दिन पुरानी है लेकिन अब एससीएसटी एक्ट के दुरुपयोग वाली ऐसी खबरों की आदत डाल लीजिए। खबर पढ़ने पर आपकी तो सिर्फ सुबह खराब होगी, खबर बनने वाले की जिंदगी खराब होनी तय समझिए। यह आशंका हमने तभी जाहिर की थी कि जब सुप्रीम कोर्ट को दरकिनार कर यह एक्ट लाया गया। हमने कहा था कि अब यह एक्ट कइयों को रोजगार देगा, ब्लैकमेलिंग का बन्द धंधा फिर चल पड़ेगा और यह चल पड़ा है। शिकार आम आदमी से पत्रकार तक हो रहे हैं…।
आप सोचिए तो सही! जो व्यक्ति राजस्थान के बाड़मेर का है, कभी पटना गया ही नहीं उस पर पटना में मारपीट करने का केस दर्ज है। फरियादी खुद कभी राजस्थान नहीं गया लेकिन केस दर्ज हो गया कि उसे वहां ले जाकर काम कराया गया और पैसे नहीं दिए गए। इतना ही नहीं, फरियादी ने खुद केस किया भी नहीं! तो क्या बिना किए केस हो गया? यह तो हो नहीं सकता न! यानी केस किसी तीसरे ने किया। कितना आसान हो गया है न किसी पर भी किसी और के नाम से केस ठोंक देना? और जैसा कि एससीएसटी एक्ट के तहत जांच की जरूरत तो रही नहीं है तो थाने में केस दर्ज हो गया, वारंट जारी हो गया और गिरफ्तारी भी हो गई। जमानत भी नहीं ले सकते, जेल तो जाना ही पड़ेगा। गिरफ्तारी में की गई हड़बड़ी तो देखिए केस दुर्गेश सिंह पर दर्ज हुआ, पुलिस ने उठा लिया दुर्ग सिंह को। जाहिर है कि इस एक्ट में आपके नाम से फर्क नहीं पड़ता, दुर्भावना तो जाति के विरुद्ध है, एक्ट भी तो जातियों के ही विरुद्ध है, खास जातियों पर ही लगेगा तो पुलिस ने भी लिफाफा खोले बिना एक्ट का मजमून भांप लिया है। उठा लाई दुर्ग सिंह को। नाम गलत तो क्या हुआ, नाम में ‘सिंह’ तो लगा ही है! इतना काफी है…।
दुर्ग सिंह बाड़मेर के पत्रकार हैं। उन पर पटना के दीघा में मारपीट करने का आरोप है जबकि उस दिन दुर्ग सिंह बाड़मेर में आयोजित एक कार्यक्रम से एफबी लाइव कर रहे थे। जाहिर है केस रंजिशवश की गई है लेकिन सुनेगा कौन? जांच की आवश्यकता ही कहाँ है? वह तो शुक्र है कि मीडिया ने अपने पत्रकार के लिए इतनी मेहनत की और सच्चाई बाहर लाई लेकिन कितने केस का मीडिया ट्रायल होगा? मीडिया को भी तो कई जिम्मेदारी है तो कुछ तो यूहीं अंदर कर दिए जाएंगे और आपको कानोंकान खबर न होगी…। आप आम आदमी हैं, पत्रकार हैं, सरकारी अधिकारी हैं, किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप बेगुनाह हैं तो भी फर्क नहीं पड़ता; फर्क आपकी जाति से पड़ता है क्योंकि जाति देखकर ही आपकी औकात बताने के लिए यह पूरी व्यवस्था की गई है।
यह एक्ट अब आपके लिए ही कैंसर नहीं है, यह मीडिया के लिए भी सेंसर है। आज आप पत्रकारों पर हो रहे झूठे केस पर चुप रहिए, कल यदि सारे पत्रकार इस तरह झूठे केस में फंसाए जाने के डर से चुप हो गए तो जब आप फंसाए जाएंगे तो आपके लिए आवाज उठाने वाला कोई न होगा इसलिए भी निर्दोष दुर्ग सिंह के लिए आवाज उठाइए। आप चौक-चौराहों पर ही बोलिए क्योंकि जिन्हें सदन में बोलने के लिए आपने भेजा है वे चुप हैं। आप फेसबुक पर ही लिखिए, क्योंकि आप जिन्हें समाज के लिए लिखने वाला समझते हैं वे तरह-तरह के खेमे में कैद हैं, कोई वैचारिक गुलामी का शिकार है तो कोई राजनीतिक, संस्थानिक। आप बोल-लिख नहीं सकते तो दूसरों का लिखा ही शेयर कीजिए… आप कुछ भी कीजिए लेकिन समय रहते इस एक्ट के जरिए हो रहे अत्याचार का लोकतांत्रिक ढंग से विरोध कीजिए अन्यथा बने रहिए आप भी राजनीतिक, वैचारिक तुष्टी के लिए इस एक्ट के हिमायती जब तक कि आप खुद किसी झूठे केस में जेल न पहुंचा दिए जाएँ। और तब यकीन मानिए, जब आप जेल में होंगे तो आज आप जिस पत्रकार के लिए खड़े नहीं हो रहे, वह आपके लिए खड़ा होना भी चाहे तो नहीं हो पाएगा क्योंकि वह तो खुद जेल से अपना केस लड़ रहा होगा…।
कोई मुगालता न पालिए, जेल में जाने की बारी आपकी भी आएगी जब कानून ही ऐसा है, गिरफ्तारी का तरीका ही यही है…।

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इस हालात में नोटा न दबाएं तो क्या करें?

यह कर्नल वीएस चौहान हैं। नोएडा के सेक्टर-29 में रहते हैं। इनके पड़ोस में एक महिला रहती हैं। पति एडीएम हैं बावजूद वह आज भी दलित ही हैं जैसा कि देश में अभी आर्थिक स्थिति से नहीं, बल्कि जाति देखकर कोई गरीब समझा जाता है और अपराध नहीं जाति देखकर सजा दी जाती है…। खैर!
पड़ोसियों से प्रायः किसी न किसी बात पर कुछ लोगों को दिक्कत रहती ही है तो कर्नल साहब से पड़ोसन को भी थी। बस, हिसाब चुकता करने के लिए पड़ोसन को एक्ट मिल गया और उन्होंने इसका बखूबी इस्तेमाल भी किया। कर दीं कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का केस। और साथ में एससीएसटी तो लगना ही है…। और यह एक्ट लगने के बाद कुछ बचत है क्या? अग्रिम जमानत कहाँ मिलनी है? और गिरफ्तारी से पहले जांच की कहाँ जरूरत है? … तो देश की सेवा करने वाले 75 वर्षीय कर्नल साहब जेल भेज दिए गए।
केस दर्ज होने की घटना एक सप्ताह पुरानी है। तब हमने अपने साथियों से इस बात का जिक्र किया था कि क्या एक प्रशासनिक अधिकारी की पत्नी को भी दलित ही समझा जाना चाहिए? सबने कहा कि जब तक आधार जाति है तब तक तो समझना ही पड़ेगा…!
आज Anurag भाई की पोस्ट पढ़ी तो पता चला कि केस झूठा था। सोसायटी में लगे सीसीटीवी कैमरे ने पोल खोल दी है। पता चला है कि कर्नल साहब पर छेड़खानी, मारपीट का आरोप लगाने वाली महिला ने खुद ही उनकी पिटाई की थी। बेचारे 75 बरस के हैं, पिट गए। अब वह सीसीटीवी फुटेज वायरल हो रही है…।
कर्नल साहब तो पूर्व सैनिकों की पैरोकारी और सीसीटीवी के दम पर छूट गए हैं, लेकिन अन्य का क्या होगा? अब यह सबकुछ देखने-जानने के बाद नोटा के अलावा कुछ सूझता है क्या?

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जातिवाद की राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए…

देश में अभी 4900 के करीब सांसद और विधायक हैं। इसमें से सवर्णों के लिए या कहें कि एक देश-एक कानून के लिए आवाज कितनों ने उठाई? बस दो विधायकों ने जातिवादी एससी-एसटी कानून के खिलाफ मुंह खोला। सांसदों ने तो एक भी नहीं…।
इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने देश में कितने सवर्ण सांसद, विधायक चुने हैं। फर्क तो इससे पड़ता है कि कितने मर्द चुने हैं जो आपके लिए, देश के लिए, सही के लिए खड़े हो सकें।
अलोकतांत्रिक कानून एससी-एसटी एक्ट हो या लगातार जातीय आरक्षण देने का मसला, आपही के चुने इन सभी सवर्ण सांसदों-विधायकों की इसमें सहमति रही है।
ऐसा क्यों? क्योंकि आप इन्हें तब भी वोट देते हैं जब ये आपके खिलाफ हो रही साजिशों में शामिल होते हैं।
यकीन कीजिए, इन्हें आपके होने पर भी आपके होने का जरा भी अहसास नहीं है। इन्हें बस देश में अल्पसंख्यकों, दलितों के ही होने का आभास है।
देश में हर दलित नेता दलितों के कथित हक के लिए उनके साथ खड़ा है। यहां तक कि दलित आंदोलन के नाम पर 2 अप्रैल को सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले, दर्जनभर हत्याएं करने वाले ‘निर्दोषों’ को भी मुकदमों से बरी किए जाने की मांग हो रही है। भाजपा के दलित सांसद, विधायक दलितों के लिए नेतृत्व से लड़ रहे हैं लेकिन सवर्णों के साथ कौन है? या कहें कि कौन है ऐसा जो कहें कि नहीं सभी देशवासी बराबर हैं? सवर्णों के साथ हो रही हकमारी पर सवर्ण नेताओं के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकल रहा जैसे मुंह पर टेप चिपका दिए गए हों। अबकी आएं चुनाव में तो जवाब ऐसा दीजिए कि मुंह से कुछ बोल न सकें जैसे कि चुने जाने के बाद न संसद में, न विधानसभा में ही आपके लिए इनकी आवाज निकल रही है…।
जान लीजिए यह सच कि आप देश में होकर भी अब तक अपने होने का आभास तक इन नेताओं को नहीं करा पाए हैं। अब एक बार खुद भी मान लीजिए कि आप देश में नहीं हैं। चूंकि अब तक होकर भी अपने होने का अहसास नहीं करा पाए हैं तो इस बार नहीं होकर अपने अस्तित्व का अहसास दिलाइए। दबाइए नोटा ताकि यह भी देखें कि जब आप इनके साथ नहीं होते हैं तब ये खुद कहाँ होते हैं। आज तक इन्हें चुनने के लिए वोट करते आए हैं, अब अपने लिए एक वोट कीजिए- नोटा! जातिवादी राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए, अपना और देश का अस्तित्व बचाइए।

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