हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

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आरक्षण के लिए क्या महज यह कह देना ही काफी है कि इस तबका का शोषण हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति में आरक्षण पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था— यह तबका 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना झेल रहा है। एससी-एसटी पहले से ही पिछड़े हैं इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए अलग से किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है।
कमाल का तर्क है न कि प्रोन्न​ति में आरक्षण देने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं है? यानी जाति काफी है! कैसे भी वोट लेना है तो कैसे भी आरक्षण दे देना है। अब सही बात तो कोर्ट में सरकार नहीं कह सकती न कि दलितों का एकमुश्त वोट वह आरक्षण देकर खरीद रही है? यह सच तो न अभी की सरकार कह सकती है, न पिछली इसलिए हर सरकार के पास यही तर्क है— 1000 वर्षों का शोषण! एससीएसटी एक्ट के पीछे भी शोषण से अधिक यही वोट बैंक की राजनीति है और आरक्षण या प्रोन्नति में आरक्षण के पीछे भी।
क्या कोई सरकार इस तरह बेशर्मी से कह सकती है कि आंकड़े की जरूरत ही नहीं है? माने मायावती दलित हैं, वह 1000 वर्षों से शोषित हैं, उन्हें आरक्षण मिलना चाहिए? माने राम विलास पासवान दबे—कुचले हैं? उनके सुपुत्रों का आरक्षण मिलना चाहिए? माने जिस देश का दलित राष्ट्रपति है, उस देश में यह तर्क कि यह समाज 1000 वर्षों से प्रताड़ना झेल रहा है? माने जो तबका प्रताड़ना झेल रहा है, उस तबके का व्यक्ति राष्ट्रपति है? यह कैसा तर्क है? यह कैसी प्रताड़ना है?
सरकार यदि यह स्पष्ट नहीं कर सकती कि इस समाज को आरक्षण में प्रोन्नति देना क्यों आवश्यक है तो क्या यही स्पष्ट कर सकती है कि 1000 वर्षों तक इस समाज का शोषण किसने किया है? अभी तो 4 वर्षों से खुद यही सरकार है जो दुहाई दे रही है 1000 वर्षों से प्रताड़ित किए जाने का तो क्या मानें कि 1000 वर्षों में इन चार वर्षों में भी यह तबका प्रताड़ना ही झेलता रहा है? कमाल है कि देश को 1947 में आजादी मिल गई थी और इस दौरान 73 वर्षों तक इस तबका का शोषण होता रहा! शोषण की यह कहानी सुना—सुनाकर कब तक कुछ जातियों को सिरमौर और बाकियों को कुचलने का प्रयास चलता रहेगा? इसी शोषण की कहानी की बुनियाद पर आजाद भारत के संविधान में एससीएसटी समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया लेकिन क्या 10 बरस बीते नहीं? 7 बार 10 बरस बीत जाने के बाद क्या लक्ष्य की पूर्ति नहीं हुई? नहीं हुई तो क्यों? क्या इसके लिए भी सवर्ण जिम्मेदार हैं?
जाहिर है कि 1000 वर्षों में आजादी के साल भी शामिल हैं और इस लिहाज से सरकार यह नहीं कह सकती कि आजाद भारत में उसने भी इस तबका का शोषण किया है तो इसका सीधा मतलब है कि शोषण अगड़ी जातियां करती रही हैं। यानी, अपराधी सरकार नहीं, अगड़ी जातियां हैं। इसीलिए एससीएसटी एक्ट के जरिये कथित अगड़ी जातियों पर आपातकाल लागू करने में सरकार ने जरा भी विचार नहीं किया क्योंकि वह पहले से विचार कर चुकी है कि यह जातियां शोषक हैं। मगर इतिहास में इन जातियों ने कब एससीएसटी समाज का शोषण किया, क्या इसका कोई आंकड़ा है? या बस 1000 वर्षों तक के शोषण की गढ़ी गई कहानी से ही आगे भी यह देश चलता रहेगा? यह सरकार सबकुछ तय करती रहेगी?
शोषण तो कोई शासक ही कर सकता है न या उसके जैसा ही कोई अन्य ताकतवर? तो क्या कभी इतिहास में जाकर सरकार ने पता भी किया है कि कब अगड़ी जातियां सिर्फ राजा हुआ करती थीं, जब एससीएसटी तबका सिर्फ प्रजा हुआ करता था? आखिर ऐसा कौन—सा कालखंड था जब राजा कोई सवर्ण था और उसने अपनी सारी दलित प्रजा को जेल में डाल दिया था या उससे चक्की पिसवाई थी, उसका राशन—पानी बंद कर दिया था…। 1000 से अधिक सालों से प्रताड़ना का मतलब है 1018 से अब तक। यदि इतिहास पर नजर डालें तो इस दौरान मुगलों से लेकर अंग्रेजों तक का शासन रहा। क्या मुगलों ने एससीएसटी समाज को अलग छांटकर उस पर जुल्म ढाया? क्या अंग्रेजों ने अलग से एससीएसटी समाज की पहचान कराई और उनपर अलग से अत्याचार किया? जिन शासकों ने भी जुल्म ढाया, भारतवासियों पर ढाया लेकिन प्रताड़ना का इतिहास सिर्फ इसी जाति का क्यों है? यदि एससीएसटी समाज के साथ ही यह सभी जातियां भी इस कालखंड में प्रताड़ित होती रही हैं तो यह झूठ क्यों रचा गया है? और इस झूठ के आधार पर कुछ जातियों को आगे बढ़ाने और अन्य सभी को प्रताड़ित करने के लिए सरकारी योजनाएं कब तक चलाई जाती रहेंगी? कब तक देशहित नहीं, कुछ जाति हित को ध्यान में रखकर सत्ता काम करती रहेगी?
1000 वर्षों का शोषण रटने वाली सरकार ने इतिहास पढ़ा ही नहीं है, ऐसा तो हो नहीं सकता तो यह तर्क एक साजिश ही तो है कि इस तबका का शोषण हुआ है इसलिए प्रोन्नति में आरक्षण मिलना चाहिए?

सरकार के पास जब प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए यही तर्क है कि एससीएसटी समाज का 1000 वर्षों तक शोषण हुआ है और बाकी जातियों पर एससीएसटी एक्ट थोपने की पृष्ठभूमि भी शायद यही है तो हमें भी यह समझ लेना जरूरी हो गया है कि 1000 वर्षों में कब, किन ब्राह्मणों, राजपूतों, बनियों, कायस्थों, भूमिहारों या अन्य जातियों ने इस तबका को प्रताड़ित किया था। अब उन सभी के लिए 1000 वर्षों का इतिहास पढ़ना जरूरी हो गया है, जो इसी आधार पर निशाना बनाए जा रहे हैं।
1000 वर्ष यानी अब से 1018 तक। 1001 में महमूद गजनी ने भारत पर पहली बार आक्रमण किया था और पंजाब के शासक जयपाल को हराया। 1025 में उसने सोमनाथ मंदिर को विध्‍वंस कर दिया। आज शोषक समझकर हर अधिकार से वंचित की जा रहीं जातियां यदि उस समय इतनी सबल थीं कि एससीएसटी समाज का शोषण कर रही थीं तो यह जातियां मंदिर को विध्वंस होता क्यों ​देखती रहीं? क्या तब सनातन धर्म नहीं था? भगवा ध्वज नहीं था? क्या तब ब्राह्मण, क्षत्रिय नहीं थे? आज जो जातियां हैं, वह सभी तब भी थीं। आज जो भक्ति ईश्वर के प्रति है, वह तब भी थी लेकिन इन सबके बावजूद यदि प्रभु का घर मंदिर विध्वंस होता रहा तो सिर्फ इसीलिए क्योंकि यह जातियां गजनी का सामना करने की स्थि​ति में नहीं थीं। यदि होतीं तो गजनी तभी गाज फेंक चुका होता। यह जातियां बाहर से आए आक्रमणकारियों का गुलाम न बन जातीं। कोई शौक नहीं था किसी को गुलाम बनने का। न तब, न अब।
1191 में तराई का पहला युद्ध हुआ। 92 में दूसरा युद्ध हुआ। 1206 में दिल्‍ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्‍याभिषेक हो गया। 1221 में भारत पर चंगेज खान ने हमला किया। 1236 में दिल्‍ली की गद्दी पर रजिया सुल्‍तान का राज्‍याभिषेक कर दिया गया। 1296 में अलाउद्दीन खिलजी का हमला हुआ। 1325 में मोहम्‍मद तुगलक का राज्‍याभिषेक हुआ। 1351 में फिरोजशाह का राज्‍याभिषेक किया गया। 1398 में तैमूरलंग ने भारत पर आक्रमण कर दिया…
अभी जो सरकार खुद इतिहासकार भी बनी बैठी है, वह बताए तो सही कि इनमें से कौन ब्राह्मण था, राजपूत था, मनुवादी था? जिसके द्वारा शोषण किए जाने का आधार बनाकर देश में जाति के आधार पर आरक्षण से लेकर कानून तक पारित किया जा रहा है। बताइए न कि तब कहां थीं वह हिंदू जातियां, जो शोषण कर रही थीं? और कहां था वह तबका भी जो शोषित हो रहा था। देश को तो बाहरी आक्रांता लूटते जा रहे थे और देश का हर तबका देखता जा रहा था…।
1494 में फरघाना में बाबर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1526 में पानीपत की पहली लड़ाई हुई। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया। मुगल शासन की स्‍थापना की। 1527 में खानवा की लड़ाई हुई। बाबर ने राणा सांगा को हराया। 1530 में हुमायूं का राज्‍याभिषेक हुआ। 1539 में शेरशाह सूरी ने हुमायूं का हराया और भारत का सम्राट बना। 1540 में कन्‍नौज की लड़ाई लड़ी गई। 1555 में हुमायूं ने दिल्‍ली की गद्दी को फिर से हथिया लिया। 1556 में पानीपत की दूसरी लड़ाई लड़ी गई। 1565 में तालीकोट की लड़ाई हुई। 1576 में हल्‍दीघाटी की लड़ाई हुई। राणा प्रताप ने अकबर को हराया…।
हां! अब राणा प्रताप को मनुवादी कहा जा सकता है क्योंकि दलित या मनुवादी—सवर्ण—शोषक सबकुछ कहे जाने का आधार जाति है लेकिन गौर कीजिए कि राणा प्रताप ने भी एससीएसटी समाज को नहीं हराया, एक मुस्लिम शासक को हराया था। फिर शोषण कब, किसका, किसने किया?
1597 में राणा प्रताप की मृत्‍यु हो गई। 1600 में ईस्‍ट इंडिया कंपनी की स्‍थापना हुई। 1605 में अकबर की मृत्‍यु के बाद जहाँगीर का राज्‍याभिषेक हुआ। 1627 में जहांगीर की मृत्‍यु हो गई। 1628 में शाहजहां भारत का सम्राट बना। 1659 में औरंगजेब का राज्‍याभिषेक हुआ। 1665 में औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया। शिवाजी इतने मजबूत होते तो कैद क्यों हो गए? और यदि हो गए तो प्रताड़ित तो शिवाजी हुए न? यह सारी लड़ाइयां जब लड़ी जा रही थीं तब वह समाज कहां था जो अभी स्वयं को मूल निवासी बता रहा है और बाकियों को बाहर से आया हुआ? यदि इन कथित मूल निवासी के अलावा सभी बाहरी थे तो बाहरी ही बाहरी से क्यों लड़ रहे थे? सभी बाहरियों को मिलकर तो मूल निवासियों पर शासन करना चाहिए था न?
1739 में नादिरशाह ने भारत पर हमला किया। 1757 में प्‍लासी की लड़ाई हुई। लॉर्ड क्‍लाइव के हाथों भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक शासन की स्‍थापना की गई। कमाल है कि सारी जातियां एससीएसटी समाज पर जुल्म ढ़ाने में इतनी व्यस्त थी कि वे खुद गुलाम होती चली गईं।
1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई। शाहआलम द्वितीय भारत का सम्राट बना। 1764 में बक्‍सर की लड़ाई, 1767-69 में पहला मैसूर युद्ध, 1780-84 में दूसरा मैसूर युद्ध हुआ। 1799 में चौथा मैसूर युद्ध हुआ। टीपू सुल्‍तान की मृत्‍यु हो गई। 1839-42 में पहला अफगान युद्ध हुआ। 1845-46 में पहला अंग्रेज-सिक्‍ख युद्ध हुआ। 1852 में दूसरा अंग्रेज-बर्मा युद्ध हुआ।
इस दौरान कब कौन सवर्ण राजा था, जिसने दलितों पर जुल्म किया? इतिहास देखकर बताए वह सरकार जो 1000 वर्षों के प्रताड़ना का तर्क दे रही है। यदि इस ​इतिहास में प्रताड़ना नहीं हुआ तो वह इतिहास हमें भी पढ़ाए जिसमें उसने पढ़ा है कि 1000 वर्षों से एससीएसटी समाज का शोषण होता रहा है और अन्य समाज शोषक बना रहा है…। आखिर, आपकी सारी योजनाओं का आधार यही तो है?
1857 में स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम लड़ा गया। पता है क्रांतिकारी कौन था? मंगल पांडेय? जी हां, ब्राह्मण, सवर्ण, मनुवादी कहकर आरोप इन पर भी लगाया जा सकता है कि दलितों का शोषण किया लेकिन इतिहास की हकीकत यह है कि इन्होंने एससीएसटी समाज ही नहीं, समस्त देश को बचाने के लिए अंग्रेजो से लड़ाई लड़ी। ब्राह्मण ही नहीं, देश की हर जाति अंग्रेजों को हटाने के लिए लड़ रही थी लेकिन हैरानी है कि देश में कहीं एससीएसटी समाज अंग्रेजों से लड़ नहीं रहा था बल्कि इन जातियों के शोषण का शिकार हो रहा था…।
1911 में दिल्‍ली भारत की राजधानी बनी। 1916 में मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने लखनऊ समझौते पर हस्‍‍ताक्षर किया। 1919 में अमृतसर में जालियाँवाला बाग हत्‍याकांड हुआ। जालियांवाला बाग में मरने वाले एससीएसटी न थे, मारने वाले सवर्ण न थे…। सभी में जुनून देश को बचाने के लिए था, न कि एससीएसटी समाज को प्रताड़ित करने का।
1920 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई। 1927 में साइमन कमीशन का बहिष्‍कार हुआ। 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई। 1931 में गांधी-इर्विन समझौता हुआ। अब महात्मा गांधी को भी जाति के आधार पर सवर्ण— शोषक कहा जा सकता है लेकिन सिर्फ थेथरई से, इतिहास में ऐसा गांधीजी ने नहीं किया बल्कि हरिजन कहकर सम्मानित ही किया।
1935 में भारत सरकार अधिनियम पारित हुआ। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई। अगस्त क्रांति में देश का अधिकतर हिस्सा शामिल हो गया लेकिन एससीएसटी समाज तब भी कहीं प्रताड़ित हो रहा था…।
1946 में ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की भारत यात्रा हुई। केंद्र में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। 1947 में भारत का विभाजन हुआ और स्वतंत्रता मिली। विभाजन के समय सभी हिंदू—मुस्लिम प्रताड़ित हुए। दंगे—फसाद हुए। प्रताड़ित तो हुए सभी मगर प्रताड़ना का इतिहास बना सिर्फ एससीएसटी समाज का।
15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली। गौर कीजिए सरकार, देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली क्योंकि शासक अंग्रेज थे, न कि वह जातियां जिन पर जुल्म ढहाने का आरोप है। और जब आजादी मिली तो सिर्फ इन्हीं जातियों को नहीं मिली, एससी—एसटी समाज को भी मिली। जब गुलाम रहे, तब भी सभी गुलाम रहे और जब आजाद हुए तब भी सभी आजाद हुए लेकिन सरकार के पास 1000 वर्षों के शोषण का इतिहास सिर्फ इसी समाज का न जाने कहां से आया है। खैर…
1948 में 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गई। 1950 में 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू हुआ। इस संविधान में इस समाज को 10 वर्षों के लिए आरक्षण दिया गया। लेकिन, आज तक किसी सरकार ने गिनने की कोशिश नहीं की है कि कितने वर्ष हो गए आरक्षण देते? इतने वर्षों तक आरक्षण देने के बाद अब इस समाज की क्या स्थिति है? क्या यह जानना जरूरी नहीं है? बस आरक्षण या एक्ट देते रहना जरूरी है? क्यों कोई आंकड़ा नहीं है? जब सर्वोच्च न्यायालय आंकड़े मांग रहा है तो वह क्यों नहीं मिल रहा? बस थेथरई? गालगोद? इसी से चलता रहेगा देश?
15 अगस्‍त, 1947 से 27 मई, 1964 तक पं. जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री रहे। नाम में पंडित होने के कारण इन्हें भी मनुवादी कहा जा सकता है लेकिन दलितों का शोषण किया ऐसा तो नहीं कह सकते न?
27 मई, 1964 से 9 जून, 1964 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। एक महीने के कार्यकाल में यह तो चाहते तो भी किसी तबका का शोषण नहीं कर पाते।
9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल रहा। नाम में शास्त्री उपनाम लगे होने से यदि कोई पूर्वाग्रह से पीड़ित न हो जाए तो शोषण का आरोप इनपर भी नहीं लगाया जा सकता।
11 जनवरी, 1966 से 24 जनवरी, 1966 तक गुलजारी लाल नंदा प्रधानमंत्री रहे। अब इनसे भी ऐसी आशंका जाहिर नहीं कर सकते कि इन्होंने शोषण किया होगा।
24 जनवरी, 1966 से 24 मार्च, 1977 तक इंदिरा गाँधी प्रधानमंत्री रहीं। आपातकाल लागू भी कीं तो पूरे देश पर, न कि सिर्फ एससीएसटी पर जिस तरह कि आज चुनकर एससीएसटी एक्ट का आपातकाल जातियों पर लागू किया गया है। इंदिरा गांधी के आपातकाल के समय अग्रिम जमानत की व्यवस्था हटा दी गई थी, इस एक्ट में भी अग्रिम जमानत नहीं दी जाती… अंतर बस इतना है कि तब आपातकाल देश पर लगा था, आज जातियों को चुनकर आपातकाल थोपा गया है।
24 मार्च, 1977 से 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई रहे। इनका भी इतिहास पढ़ लीजिए। कहीं, कभी किसी समाज का शोषण नहीं किया।
28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री रहे। अब यदि आपको उ​​​पनाम सिंह के चलते इनसे द्वेष न हो तो इन्होंने भी कभी दलितों की हानि नहीं सोची।
14 जनवरी, 1980 से 31 अक्‍तूबर, 1984 तक इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री रहीं। पहले कार्यकाल में यदि दलितों का शोषण न किया तो दूसरे में भी नहीं ही की होंगी और की होतीं तो जरूर इसका इतिहास होता।
31 अक्‍तूबर, 1984 से 2 दिसम्‍बर, 1989 तक राजीव गांधी ने देश का नेतृत्व किया। इसके बाद 2 दिसम्‍बर, 1989 से 10 नवम्‍बर, 1990 तक विश्वनाथ प्रताप सिंह। 10 नवम्‍बर, 1990 से 21 जून, 1991 तक चंद्रशेखर। अब फिर वही बात है कि यदि नाम में सिंह होने से ही सारी दिक्कत है तो चंद्रशेखर पर भी शोषण का आरोप लगाया जा सकता है और यदि आज होते तो एससीएसटी एक्ट भी लेकिन यदि बात सच की करें तो इनमें से किसी भी प्रधानमंत्री को दलितों से कभी कोई दिक्कत न थी, ​बल्कि हमेशा दलित ही सरकार और उसकी योजनाओं के केंद्र में रहे।
21 जून, 1991 से 16 मई, 1996 तक पी.वी. नरसिंह राव और 16 मई, 1996 से 1 जून, 1996 तक अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे। अब अटलजी पर भी दलितों के शोषण का आरोप सिर्फ ब्राह्मण, मनुवादी की दुर्भावना से ही लगाया जा सकता है, वरना हकीकत सिर्फ यही है कि इस व्यक्ति ने समस्त देश को सबल बनाने की कोशिश की और उसमें एससीएसटी समाज भी शामिल रहा।
1 जून, 1996 से 21 अप्रैल, 1997 तक एच. डी. देवेगौड़ा, 21 अप्रैल, 1997 से 19 मार्च, 1998 तक इंद्र कुमार गुजराल रहे। पुन: 19 मार्च, 1998 से 22 मई, 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार रही। वही अटलजी जिनके जाने पर पूरा देश रोया। रोने वालों में एससीएसटी समाज का कोई नहीं होगा, ऐसा नहीं कह सकते। तो ऐसे जनप्रिय नेता पर तो इस तबका के शोषण का आरोप बिल्कुल नहीं लगा सकते।
22 मई, 2004 से 26 मई, 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे। कांग्रेस वैसे भी मुस्लिम से लेकर दलित तुष्टीकरण तक में देश की अन्य पार्टियों से बेहतर पार्टी समझी जाती है तो इस सरकार में तो इसकी आशंका भी जाहिर नहीं की जानी चाहिए।
अब बारी इस सरकार की, जिसका तर्क है 1000 वर्षों के शोषण का। 2014 में जब यह भाजपा सरकार बनी तबसे भी जितनी भी योजनाएं बनीं, अधिकतर का आधार जाति ही रही। यही एससीएसटी जाति। हां, कभी ओबीसी भी। जाति के आधार पर योजना, जाति के आधार पर आयोग, जाति के आधार पर कानून, जाति के आधार पर आरक्षण और अब जाति के आधार पर प्रोन्नति में आरक्षण की बात…। और इन सभी का आधार सिर्फ एक— 1000 वर्षों का वह शोषण जो कभी, किसी ने किया ही नहीं।

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देश से सवर्णों को मिटाने की राजनीति !

उत्तर प्रदेश में मायावती ने नारा दिया था— तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। तिलक माने कि ब्राह्मण। तराजू माने कि बनिया और तलवार यानी कि क्षत्रिय। इन सभी को जूते मारो!
क्या बात है! इतनी नफरत? एक दलित नेता साफ तौर पर सवर्णों को जूते मारने के लिए कह रही है और सभा में दलित तालियां बजा रहे हैं। बजाएं भी क्यों नहीं इन्हें बताया गया है कि 1000 वर्षों तक सवर्णों ने इनका शोषण किया है। कमाल की बात है कि दलितों के मन में सवर्णों के प्रति नफरत भरकर, सवर्णों को जूते मारने की बात कहकर ये नेता कहते हैं कि दोनों एक थाली में क्यों नहीं खाते?
हम मानते हैं कि कभी धर्म की खामियों के कारण दलितों को नुकसान हुआ था, किंतु अब भी यदि सवर्ण और दलित एक थाली में नहीं खा पा रहे तो उसकी असली वजह यह दलित राजनीति ही है…।
अच्छा! कमाल की बात यह भी है कि जो मायावती दलितों की ब्रांडेड नेता हैं, वह सवर्णों को जूते मार सकती हैं। फिर भी दबंग कौन? शोषक कौन जूते खाने वाला सवर्ण ही न! और शोषित कौन? जूते मारने वाली मायावती न!
जिस तरह खुलेआम सवर्णों को जूते मारने की बात की जाती है, यदि दलितों को कह दी जाए तो? बवाल मच जाएगा न? गाली पर ही गिरफ्तारी है, जूते पर क्या होगा? लेकिन, कितना आसान है सवर्णों को जूते मारना…।
यह कुछ जातियों को खुलेआम जूते मारने की बात कहना— क्या इससे बड़ा भी कोई मनुवाद हो सकता है? क्या मायावती से बड़ा कोई मनुवादी है? इसके बाद भी मनुवादी कौन है— सवर्ण! कितनी अजीब बात है कि इस तरह के मनुवादी नेता खुद को ​दलित, शोषित, पिछड़ा बताते हैं और देश का संविधान तक मान लेता है? सिर्फ जाति के कारण। इतनी दुर्भावना! ओह! 1000 वर्षों का शोषित, सताया समाज है, यह तो जूते मार ही सकता है…।
बिहार में लालू प्रसाद ने कहा था— भूरा बाल साफ करो। भू यानी भूमिहार, रा यानी राजपूत, बा यानी ब्राह्मण और ल यानी लाला—कायस्थ। भूरा बाल साफ करो यानी कि सवर्णों को साफ कर दो। इस तरह किसी और जाति को साफ करने की बात कभी किसी नेता ने कही है? कही जा सकती है? कह दे तो? बवाल मच जाएगा न? लेकिन, सवर्णों को साफ करने की बात कोई भी कह सकता है! और गजब की बात है कि फिर भी दबंग कौन है? शोषक कौन है? सवर्ण!
सवर्णों को सीधे साफ करने, मार देने की बातें मंचों से हो रही है लेकिन कहीं कोई एफआईआर नहीं! कोई गिरफ्तारी नहीं! कोई हो-हल्ला नहीं! सवर्ण मारा भी जाए तो कोई बात नहीं क्योंकि यह समाज 1000 वर्षों का ऐतिहासिक शोषक है। सवर्ण तो कहे भी कि उसे किसी ने गाली दी है तो नहीं माना जाएगा। उसे कोई गाली कैसे दे सकता है? और गाली दे भी दे तो उसे लग कैसे सकता है? गाली तो सिर्फ कथित दलित, पिछड़ों को आहत करती है…।
दलित, पिछड़ी राजनीति के नाम पर इस समय देश में सवर्णों के खिलाफ खुलेआम जहर बांटा जा रहा है। कभी सीधे—सीधे सवर्णों को साफ करने की बात कहकर तो कभी दलितों को खुश करने के लिए उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण, नौकरी, प्रोन्नति देकर। देश में सवर्णों को साफ करने की बात ही नहीं कही जा रही, इसके लिए बकायदा इंतजाम किए जा रहे हैं। धीरे—धीरे सबकुछ सवर्णों से छीना जा रहा है। पहचान के लिए बस अब मताधिकार ही रह गया है जो बताता है कि सवर्ण इस देश का नागरिक है। इसके बाद भी उसके लिए कहीं कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि सबको बताया गया है कि सवर्ण 1000 वर्षों का शोषक समाज है।

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यह सवर्ण 1000 वर्षों का हिसाब चुकाने के लिए तैयार है !

हम जन्म से हिंदू हैं। यह मेरा धर्म है, मेरी संस्कृति है किंतु हमें किसी अन्य के मुस्लिम, इसाई होने से भी कोई दिक्कत नहीं है।
हम ब्राह्मण हैं। यह मेरी जाति है, इससे मेरा संस्कार है​ किंतु हम जातिवादी नहीं हैं। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं कि अन्य किस जाति के हैं। किंतु, क्या इसका कोई अर्थ है? इस भाव के बाद भी मेरी पहचान क्या है? सवर्ण ही न! समाज के लिए भी, संविधान के लिए भी, सरकार के लिए भी!
हमने तो एक चीटी भी नहीं मारी लेकिन इसके बाद भी हमपर 1000 वर्षों के शोषण का इल्जाम आता है तो हम तो बन गए न बैठे—बिठाए गुनहगार! और सवर्ण होने की सजा देखिए- हमारा राशन बंद, स्कॉलरशिप बंद, एडमिशन बंद। नौकरी बंद। प्रोन्नति बंद। और जेल भी भेजा जाना तय! बेगुनाही साबित करने तक का मौका नहीं! माने मानवाधिकार भी गए तेल लेने! इतना जुल्म! क्यों? अच्छा समझे! 1000 वर्षों तक हमने जुल्म जो ढ़ाया है …! सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यदि बेहयाई से यह दलील रख ही दी है कि कुछ जातियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए आंकड़े की जरूरत नहीं है क्योंकि ये 1000 वर्षों से सताए हुए हैं तो क्या आश्चर्य है यदि आगे कभी एससी-एसटी एक्ट पर चर्चा हो तो यह दलील भी प्रस्तुत कर दे कि सवर्णों को सजा देने के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं क्योंकि इनके जुल्म का इतिहास 1000 वर्ष पुराना है? यह एक्ट बना भी तो इसी भाव से है!
…तो यदि सवर्ण का भाव न होकर भी हमारी पहचान यही है और इसी के कारण निर्दोष होकर भी हम दंड के भागी हैं तो कब तक सफाई देते रहेंगे कि हम वैसे सवर्ण नहीं हैं जैसा सरकार बता रही। यदि समाज को एक अच्छा इंसान नहीं चाहिए, देश—सरकार को एक अच्छा नागरिक नहीं चाहिए तो देते हैं न वही, जो चाहिए। सरकार ने तो हमें सवर्ण मान ही लिया है, तो चलो सरकार को हम भी सवर्ण बनकर दिखलाते हैं। इन सरकारों से बहुत चोट खा चुके भाई, अबकी सबक हम भी सिखलाते हैं।
आश्चर्य न कीजिए! हमने तो हमेशा यही चाहा है कि मेरा धर्म, मेरी जाति मेरी निजी आस्था, पहचान तक ही रहे। देश के लिए मेरी पहचान उसके एक नागरिक के रूप में हो। किंतु इस देश को नागरिक चाहिए क्या? सरकार हमें नागरिक मानती है क्या? सरकार ने तो हमें या किसी को भी नागरिक के रूप में कभी देखा ही नहीं। उसने तो हमारे धर्म, जाति को ही हमारी मौलिक पहचान घोषित कर रखी है। हमने तो यही चाहा कि यह वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था धीरे—धीरे समाज से भी खत्म हो, इसका भाव खत्म हो किंतु यदि इसे संविधान से लेकर सरकार तक में जगह मिल गई तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? समाज में जाति व्यवस्था के लिए यदि हम दोषी हैं तो इस जातिवादी संविधान के लिए कौन दोषी है जो सबकी जाति देखता है? इस जातिवादी सरकार के लिए कौन दोषी है, जो हर फैसले जाति देखकर लेती है? यह तो किसी को गरीब भी मानते हैं तो धन नहीं, जाति देखकर। सवर्ण भी मानते हैं, तो कर्म नहीं वर्ण देखकर। इसके लिए दोषी कौन है? क्या इसके लिए भी सवर्ण? हमें तो यह समझ में नहीं आता कि आखिर यह बात इस देश के संविधान, सरकार को किसने बताई कि हम सवर्ण हैं? हम तो सर्टिफिकेट लेकर आए नहीं थे? किसी को दिखाए भी नहीं थे? जातियों का सर्टिफिकेट भी तो संविधान, सरकार ने ही मिलकर बांटा लेकिन दोषी कौन? सवर्ण! इस समय हर जाति के पास उसका सर्टिफिकेट है इसके बाद भी जातिवादी कौन है? सवर्ण! तो चलो न जब यही पहचान गई तो इसी के साथ कुछ वक्त बिताते हैं, सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनकर दिखाते हैं!
संविधान ने सबको एक समान माना है किंतु क्या वह अभी कहीं लागू है? यह बात देश के संविधान और सरकार को किसने बताई कि किन जातियों को गाली दी जाए तो उनकी भावना आहत हो जाती है और किनको दी जाए तो उनका सम्मान बढ़ जाता है? गाली तो गाली है न! फिर, बभना, ठकुरा गाली क्यों नहीं और बाकी गाली क्यों है? यह परिभाषा किसने गढ़ी? कैसे? सरकार की कोई समिति बनी थी? यह एससी—एक्ट बनाने वाली सरकार जातिवादी नहीं है जो जाति देखकर गाली को गाली परिभाषित कर रही है? जाति देखकर जेल भेज रही है? तो जातिवादी कौन है? सवर्ण? यानी, संविधान से लेकर सरकार तक दुर्भावना से ग्रसित किंतु निर्लज्जता ऐसी कि दुर्भावनाग्रस्त भी बताया जाएगा सवर्ण ही!
1000 वर्षों का शोषण है! किसने किया, किससे किया? उसमें जीवित कौन है? यह सब कौन पूछता है? कौन जवाब भी देता है? बस शोषण हुआ है! और इस शोषण का बदला तो लिया जाएगा! यह संविधान, यह सरकार हिसाब चुकता करेगी। किससे बदला लेंगे? कोई तो होना चाहिए? 1000 वर्षों के शोषण का हिसाब सवर्ण चुकाएगा! संविधान, सरकार दोनों ने मान लिया है कि देश का यह वर्ग स्वभाव से आततायी है, जुल्मी है। इसे सजा देनी है, बराबर देनी है। तब तक जब तक कि यह घुटने पर न आ जाए। रेंगने न लग जाए। दोनों ने यह भी मान लिया है कि देश का एक वर्ग शोषित है, उसके साथ सदियों तक शोषण हुआ है। उसे इंसाफ दिलाना है, बराबर दिलाना है। तब तक जब तक कि वह खुद शोषक न बन जाए। इसलिए एक बच्चे के अयोग्य होने पर भी उसे स्कूल में प्रवेश दिलाना है, धनी होते हुए भी स्कॉलरशिप दिलानी है, अयोग्य होते हुए भी नौकरी दिलानी है और प्रोन्नति भी। क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषित है! एक और बच्चा है। वह गरीब है किंतु स्कॉलरशिप नहीं देनी, वह योग्य है किंतु स्कूल में प्रवेश नहीं देना, नौकरी भी नहीं देनी और नौकरी नहीं तो प्रोन्नति कैसी? क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषण करता आ रहा है!
सवाल है कि यह सवर्ण कौन है? इससे इतना डर क्यों है? क्या यह समाज—देश के लिए विलेन है? बॉलीवुड की किसी फिल्म से भी बड़ा? किस निर्देशक ने यह चरित्र गढ़ा है कि संविधान से लेकर सरकार और यहां तक कि समाज तक सभी डरे सहमे हुए हैं? डरना तो होगा क्योंकि निर्देशक ने यह भी बताया है कि सवर्ण जातियों के शोषण का इतिहास 1000 वर्षों का है! और कितने पर्यायवाची, परिभाषाएं भी गढ़े हैं! मनुवादी, जातिवादी, अगड़ी जाति, सवर्ण! क्या गजब का विरोधाभास है कि जिनके साथ सबसे अधिक असामान्य व्यवहार होता है, वह सामान्य जातियां कहलाती हैं— सवर्ण। संविधान, सरकार के लिए जो स्पेशल नहीं है, वह​ जनरल है— सवर्ण। सरकार हर नीचता जिनके साथ करे, वह उंची जातियां हैं— सवर्ण। जो जातियां बैकवर्ड भी हैं तो संविधान में फारवर्ड हैं, वह हैं सवर्ण। लोवर भी हैं तो अपर हैं माने सवर्ण। पिछड़ी भी हैं तो अगड़ी हैं तो सवर्ण। जो अनारक्षित हैं, वह सवर्ण। जो डिज्वर्ड हैं तो भी अनरिजव्र्ड हैं, वह है सवर्ण! अब यदि सवर्ण ठहराने के लिए इतना कुछ गढ़ा है तो मेहनत जाया क्यों जाने दें? यदि सरकार की इतनी जिद है तो क्यों न अपनी भी जिद दिखलाएं। सवर्ण कहलाएं ही क्यों, चलो सवर्ण बन भी जाएं!
सवर्ण! सरकार के लिए वह पुतला जिस पर हर तरह के टेस्ट किए जा सकें। जो खेत में खड़ा होकर फसल की रखवाली करे किंतु उस पर हक न जताए। देश में रहकर राष्ट्रभक्ति से आगे निकल सरकार भक्ति दिखलाए किंतु देश के संसाधनों पर उसका हक न हो। हिन्दू खतरे में तो सवर्ण आगे आए, समाज खतरे में तो सवर्ण आगे आए, राष्ट्र खतरे में तो उसे आवाज दी जाए, बस वह पहरेदार बना रहे हिंदुत्व का, धर्म का, राष्ट्र का… वह संसाधनों की रखवाली करता रहे क्योंकि उसके उपभोग का पहला, दूसरा, तीसरा सारा हक किसी और के पास है। सवर्ण माने कि बिना जांच दोषी मान लिया जाए, गिरफ्तार हो जाए। जो देश में 131 लोकसभा सीटों से सांसद बनने का ख्वाब भी न देख सके, वह सवर्ण। जिसे 1225 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार न हो, वह सवर्ण। जिसे सजा देने के लिए अलग से न्यायालय, थाने खोले जाएं, वह सवर्ण। जो योग्य होकर भी देश के 50 फीसदी सरकारी पदों के लिए कोशिश करने से भी वंचित कर दिया जाए, वह सवर्ण। कुछ राज्यों में तो जो सरकारी नौकरियों से प्रायः पूरी तरह वंचित कर दिया जाए वही सवर्ण!
सवर्ण! सवर्ण! सवर्ण! अब जब हमारी सरकारी पहचान सवर्ण ही है और हिसाब भी 1000 वर्षों का है तो हम हिसाब चुकाने के लिए तैयार हैं! कोई सफाई नहीं, हम सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनने को भी तैयार हैं! अभी तक देश—समाज ने माना है, आज हम स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं! साथ ही यदि इतनी सरकारी प्रताड़ना के बाद भी किसी भाई का कुछ हिसाब रह गया है तो हम चुकता करने के लिए तैयार बैठे हैं। जिस किसी भाई का हमसे सिर्फ इसलिए दुराव है कि हम सवर्ण हैं तो वह अपने दस-बीस पुश्त का इतिहास लेकर सामने आएं और बताएं कि मेरे किस दादा या परदादा ने उनके किस दादा या परदादा से काम कराया लेकिन पारिश्रमिक नहीं दिया। जब पैसे मांगे तब किसने किसको कोड़े बरसाए। किस कुएं में पानी पीने गए थे तो किसने रोक दिया था? पहले हिसाब दें, फिर चुकता करने के लिए भी हम तैयार हैं! हम तैयार हैं उस सरकार, व्यवस्था से भी हिसाब चुकता करने के लिए जो 1000 वर्षों का बदला ले रही है। हम आज, अभी उस चुनाव का बहिष्कार करते हैं जिसके जरिये देश के लिए नहीं, कुछ जातियों के लिए सरकार चुनी जाती है। सरकार ने जिन्हें सवर्ण घोषित किया है, हम उन सभी जातियों के लोगों का भी आवाह्न करते हैं कि स्वयं भी अपने को सवर्ण घोषित करें और उस चुनाव का बहिष्कार कर दें जिसमें आपके लिए कुछ भी नहीं है। आप किसी को भी चुनें लेकिन यदि वह आपसे 1000 वर्षों की दुर्भावना लिए बैठा है तो वह आपके साथ न्याय नहीं कर सकता। चूंकि सब यही करते हैं इसलिए जरूरी है कि एक चुनाव ऐसा जाने दीजिए जिसमें किसी को न चुनिए। बस एक चुनाव शांत हो जाइए, यह शांति तूफान का काम करेगी और बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार कोई भी हो, उसका रवैया सवर्णों के साथ एक जैसा है। ऐसे में कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके वोट न देने से सरकार किसकी बनेगी। हां, जिनकी नहीं बनेगी उन्हें सबक मिलेगा और जिनकी बनेगी उन्हें यह संदेश कि अब और ज्यादती कि तो उनकी भी सरकार जानी तय है। साथ ही चुप न रहें। देश-समाज विरोधी जातिवादी कानून, व्यवस्था, सरकार सबके खिलाफ आवाज उठाएं। लिखें, बोलें, शेयर करें। अंदर के गुस्से को इतना फैलाएं कि वह संसद तक पहुंच पाए। अस्तित्व रक्षा का अब बस यही एक उपाय है! करो या मरो!

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