हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

सवर्ण जाति के नाम पर एक नहीं तो यह बड़ी खूबी है!

सरकार दलितों की होगी,
सरकार पिछड़ों की होगी,
सरकार अल्पसंख्यकों की होगी…!
अभी हर नेता यही जुमला दोहरा रहा है। क्या अभी किसी नेता में हिम्मत है जो कहे कि सरकार सवर्णों की होगी? कह दिया तो वह जीत पाएगा? नहीं! हरगिज नहीं!
क्यों? क्योंकि बाकी जातियां उसको नफरत से वोट नहीं करेंगी और उसकी अपनी जाति से भी बहुत कम वोट मिल पाएंगे। ऐसा क्यों? क्या इसलिए क्योंकि सवर्णों में एकता नहीं है? नहीं! ऐसा इसलिए कि सवर्ण समाज अभी भी सबसे उदार, सुलझा समाज है जो जाति पर नहीं मचलता। सवर्ण से वोट लिया जा सकता है विकास के नाम पर, सदाचार के नाम पर, देशभक्ति के नाम पर लेकिन जाति के नाम पर नहीं ! हां, प्रत्याशी सवर्ण हो तो उसे कुछ वोट जाति आधार पर भी मिल सकते हैं किंतु सिर्फ जाति को लेकर चुनाव में खड़ा होगा तो उसकी जमानत जब्त होनी तय है। इस समाज में कुछ जातिवादी उसी तरह हैं जैसे अन्य जातियों में कुछ ही जातिवादी नहीं हैं।
सवर्ण समाज की यह नाकामी बिल्कुल नहीं है कि वह जातिवाद पर रीझ नहीं रहा, जाति के नाम पर एक नहीं हो रहा; यह तो उसकी सबसे बड़ी खूबी है। सवर्ण एक है- राष्ट्र के नाम पर, भले नहीं है जाति के नाम पर। यह बात देश की सियासत भी समझती है। इसलिए सवर्णों से वोट लेने के लिए कोई नेता कभी सवर्ण को नहीं पुकारता है, वह देश को पुकारता है जैसे कि मोदी ने पुकारा था। ओबीसी मोदी को सबसे अधिक वोट सवर्णों ने दिए थे। नेता की सबसे कम जाति यही समाज देखता है इसीलिए तो इस समाज का कोई घोषित नेता नहीं है जबकि अधिकतर जातियां अपनी जाति की पुकार होते ही एकत्र हो जाती हैं इसीलिए इन जातियों के अपने नेता हैं। सवर्ण वोटर तो है पर वोट बैंक नहीं है जिसपर कोई डाका डाल सके। इस देश में यदि सबसे कम जातीय भावना वाला समाज है तो वह सवर्ण ही है लेकिन देखिए कि गजब की ब्रांडिंग की गई है कि सबसे अधिक जातिवादी, मनुवादी भी यही समाज घोषित है।
कामचोर नेताओं की मजबूरी है। नेता चाहते हैं कि वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, लगना ऐसा चाहिए कि दलितों का शोषण किया जा रहा है और सवर्ण ही वह शोषक है। 1000 वर्षों के शोषण की गढ़ी गई और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी के पीछे यही मंशा है। सबको पता है कि सवा अरब की आबादी वाले बड़े देश में सभी वंचितों, गरीबों को राहत देना बड़ा काम है इसलिए नेताओं ने सुविधाजनक काम चुना है- सिर्फ दलितों को ही वंचित घोषित कर सिर्फ इनके लिए ही काम करने का। बावजूद यह काम भी ईमानदारी से नहीं किया। आज भी दलितों का जो वंचित तबका है, वह कमोबेश उसी हाल में है। इन नेताओं की मंशा है कि समाज का एक हिस्सा यूं ही रहे ताकि इससे कभी जाति के नाम पर रिझाकर वोट लिया जा सके तो कभी सवर्णों से डराकर। दलितों का वोट सिर्फ जाति के नाम पर ही हासिल किया जा सके इसके लिए इनका सवर्णों से नफरत करते रहना जरूरी है। यही नेताओं की सोच है, खासकर दलित-पिछड़ों की ही राजनीति करने वाले नेताओं की राजनीति का आधार ही यही है। देश की इसी ओछी राजनीति ने दलितों, पिछड़ों को निरीह और सवर्णों को शैतान के रूप में प्रस्तुत किया है। नेताओं के इस तरह के राजनीतिक षड्यंत्र के बाद भी यदि सवर्ण उतना जातिवादी नहीं हुआ है तो यह अच्छा है। यदि जाति के नाम पर सवर्ण एक नहीं है तो यह इसकी खूबी है, न कि नाकामी। सवर्ण देश के नाम पर एक है। इसी तरह की जागरूकता सभी जातीय समाज में होनी चाहिए।

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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