हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

जूठा बर्तन धो रहा वीर जवान… न धुलेगा सरकार का यह गुनाह

तस्वीर साभार : नवभारत टाइम्स

यह सतवीर सिंह हैं। लांस नायक सतवीर सिंह। 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दिल्ली से एकमात्र जांबाज, जिनपर दिल्ली ही नहीं; समस्त राष्ट्र को गर्व है किंतु आज यह दूसरों की जूठी प्लेट धो रहे हैं और इस हालात पर सिर्फ दिल्ली ही नहीं, समस्त राष्ट्र को शर्म आनी चाहिए। यह तस्वीर देखने के बाद राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार को तो​ चुल्लूभर पानी के बिना ही शर्म से ही मर जाना चाहिए।

आज विजय दिवस है। कारगिल युद्ध में विजय का दिवस। आॅपरेशन विजय की सफलता ​का दिवस। पाकिस्तान को धूल चटाने का दिवस लेकिन कैसी खुशी? कैसा जश्न? क्या यह तस्वीर किसी राष्ट्रप्रेमी को खुश होने देगी? क्या यह तस्वीर तब से अब तक ​की किसी भी सरकार को माफ करेगी जिन्होंने अपने ही सैनिक को खून के आंसू रुलाए हैं? क्या यह तस्वीर वह आइना नहीं है, जिसमें आज की सत्ता की वास्तविक तस्वीर दिख रही है? सत्ता की इतनी घिनौनी तस्वीर देखने के बाद सिर्फ घृणा हो सकती है, क्रोध आ सकता है; खुशी तो कदापि नहीं हो सकती। नहीं, जब तक यह तस्वीर बदल नहीं जाती, विजय दिवस पर भी विजय का आभास नहीं हो सकता, विजय का आनंद कदापि नहीं हो सकता…।

आजाद देश की सरकार ने सतवीर के साथ कुछ वैसा ही सुलूक किया है, जैसा गुलाम भारत में अंग्रेज भारतीय सैनिकों के साथ किया करते थे। काम निकल गया तो सतवीर को उनके हाल पर छोड़ दिया लेकिन, प्रणाम है सतवीर को कि इतनी उपेक्षाओं के बाद भी इनके देशप्रेम में रत्तीभर भी कमी नहीं आई है। ईमानदारी से अपना कर्म करते हैं। यह देश और सैन्य निष्ठा ही है कि जूठी थाली धोते समय भी इनके सिर पर फौज की टोपी होती है। आखिरकार, सरकार के देश प्रेम और एक नागरिक व सैनिक के देश प्रेम में अंतर जो है। कितनी बड़ी बात है कि 19 साल से पाकिस्तान की एक गोली शरीर में आज भी फंसी हुई है। अफसोस है कि चल—फिर नहीं सकते। बैसाखी ही सहारा है लेकिन हमें भरोसा है कि जब तक सतवीर जैसे वीर हैं, यह देश बेसहारा हरगिज नहीं है। राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकार के स्वार्थप्रेरित कथित राष्ट्रवाद से इतर, देश के एक सच्चे नागरिक, एक सैनिक का यह राष्ट्रवाद ही वास्तविक राष्ट्रवाद है जो अनुकरणीय है, प्रेरणादायक है। आइए, वीर सतवीर सहित उन सभी सैनिकों के शौर्य को याद करें जिन्होंने दुश्मन की गोलियों के लिए अपने शरीर की इंच—इंच जगह दे दी लेकिन देश की जमीन की एक इंच न दी…।

1999 में लाहौर में घोषणा पत्र पर भारत और पाक ने हस्ताक्षर किए थे कि कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करेंगे लेकिन पाकिस्तान के मन में खोंट था। पाक की सेना नियंत्रण रेखा को पार कर भारत में घुस आई। कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को नेस्तनाबूद कर भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाने के मंसूबे से पाकिस्तान ने गुप्त रूप से ऑपरेशन बद्र की शुरुआत कर दी। पहले तो भारत को लगा कि यह छोटी—मोटी घुसपैठ है लेकिन कुछ ही दिनों में समझ में आ गया कि यह तो आक्रमण है, हमला है। बस क्या था, भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय की घोषणा कर दी और करीब 2 लाख जांबाज सैनिकों को युद्ध के मैदान में उतार दिया। राष्ट्रप्रेम के जज्बे से ओत—प्रोत सैनिकों ने पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए। करीब दो महीने तक वीर जवान बॉर्डर पर जमे रहे, जब तक कि पाकिस्तान ने हाथ न खड़े कर दिए। 527 जवानों ने शहादत दी, 1,300 से ज्यादा घायल हुए, कई जीवनभर के लिए अपाहिज हो गए, कई आज भी झूककर चलते हैं किंतु देश न झुकने दिया। इन्हीं में से एक हैं लांस नायक सतबीर सिंह जिनके पैर में दुश्मन की 2 गोलियां लगी थीं। एक तो निकल गई लेकिन दूसरी धंसी रह गई।

तस्वीर साभार : नवभारत टाइम्स

सतवीर बताते हैं, 13 जून 1999 की सुबह कारगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर उनकी ड्यूटी थी। वहां पाकिस्तानी सैनिकों से आमना-सामना हो गया। मात्र 15 मीटर की दूरी पर पाकिस्तान सैनिक थे। सतवीर की 9 सैनिकों की टुकड़ी थी, जिसकी अगुवाई वही कर रहे थे। सतवीर ने हैंड ग्रेनेड फेंका और एक झटके में सात पाकिस्तानी सैनिकों को उपर पहुंचा दिया। लगातार गोलियां चल रही थीं। दो गोलियां उन्हें भी लगीं। 17 घंटे तक पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। काफी खून बह चुका था। 3 बार उन्हें और अन्य घायल सैनिकों को लेने के लिए आर्मी का हेलीकॉप्टर आया लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग के कारण उतर नहीं पा रहा था। आखिरकार भारतीय सैनिक घायल सतवीर तक पहुंचे। एयरबस से उन्हें श्रीनगर ले गए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट किया गया। काफी दिन इलाज चला लेकिन एक गोली नहीं निकल पाई।

26 जुलाई, यानी आज के दिन युद्ध की समाप्ति की घोषणा की गई। सरकार ने घोषणा की कि युद्ध में शहीद जवानों की विधवाओं, घायल सैनिकों के लिए पेट्रोल पंप की व्यवस्था की जाएगी। उन्हें खेती के लिए जमीन मुहैया कराई जाएगी। किंतु, युद्ध के बाद सैनिकों के साथ किए वादे की भी परिणति उसी रूप में दिख रही है, जिस रूप में चुनाव में किए वादे की, उसके बाद दिखती है…। सतवीर को पेट्रोल पंप आज तक नहीं मिल सका। इतना ही नहीं, जीवनयापन के लिए करीब 5 बीघा जमीन दी गई थी। उस पर सतवीर ने मात्र तीन वर्षों तक ही खेती की और वह जमीन उनसे छीन ली गई। सुनकर रोना आ रहा है कि जिस वीर ने देश की रक्षा के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की, उसकी परवाह सरकार ने किस तरह की कि सतवीर के 2 बेटों की पढ़ाई पैसों के अभाव में छूट गई। खर्च के लिए पेंशन कम पड़ी तो सतवीर ने जूस की दुकान खोल ली। अपनी दुकान पर जूठे बर्तन भी सतवीर ही धोते हैं…। हथियार चलाने वाले हाथों से जूठे बर्तन तो फिर भी धूल जाते हैं लेकिन देश चलाने वालों का यह गुनाह धोने से भी धुलने लायक नहीं है…।

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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