हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

जातिवाद की राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए…

देश में अभी 4900 के करीब सांसद और विधायक हैं। इसमें से सवर्णों के लिए या कहें कि एक देश-एक कानून के लिए आवाज कितनों ने उठाई? बस दो विधायकों ने जातिवादी एससी-एसटी कानून के खिलाफ मुंह खोला। सांसदों ने तो एक भी नहीं…।
इससे फर्क नहीं पड़ता कि आपने देश में कितने सवर्ण सांसद, विधायक चुने हैं। फर्क तो इससे पड़ता है कि कितने मर्द चुने हैं जो आपके लिए, देश के लिए, सही के लिए खड़े हो सकें।
अलोकतांत्रिक कानून एससी-एसटी एक्ट हो या लगातार जातीय आरक्षण देने का मसला, आपही के चुने इन सभी सवर्ण सांसदों-विधायकों की इसमें सहमति रही है।
ऐसा क्यों? क्योंकि आप इन्हें तब भी वोट देते हैं जब ये आपके खिलाफ हो रही साजिशों में शामिल होते हैं।
यकीन कीजिए, इन्हें आपके होने पर भी आपके होने का जरा भी अहसास नहीं है। इन्हें बस देश में अल्पसंख्यकों, दलितों के ही होने का आभास है।
देश में हर दलित नेता दलितों के कथित हक के लिए उनके साथ खड़ा है। यहां तक कि दलित आंदोलन के नाम पर 2 अप्रैल को सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले, दर्जनभर हत्याएं करने वाले ‘निर्दोषों’ को भी मुकदमों से बरी किए जाने की मांग हो रही है। भाजपा के दलित सांसद, विधायक दलितों के लिए नेतृत्व से लड़ रहे हैं लेकिन सवर्णों के साथ कौन है? या कहें कि कौन है ऐसा जो कहें कि नहीं सभी देशवासी बराबर हैं? सवर्णों के साथ हो रही हकमारी पर सवर्ण नेताओं के मुंह से एक शब्द तक नहीं निकल रहा जैसे मुंह पर टेप चिपका दिए गए हों। अबकी आएं चुनाव में तो जवाब ऐसा दीजिए कि मुंह से कुछ बोल न सकें जैसे कि चुने जाने के बाद न संसद में, न विधानसभा में ही आपके लिए इनकी आवाज निकल रही है…।
जान लीजिए यह सच कि आप देश में होकर भी अब तक अपने होने का आभास तक इन नेताओं को नहीं करा पाए हैं। अब एक बार खुद भी मान लीजिए कि आप देश में नहीं हैं। चूंकि अब तक होकर भी अपने होने का अहसास नहीं करा पाए हैं तो इस बार नहीं होकर अपने अस्तित्व का अहसास दिलाइए। दबाइए नोटा ताकि यह भी देखें कि जब आप इनके साथ नहीं होते हैं तब ये खुद कहाँ होते हैं। आज तक इन्हें चुनने के लिए वोट करते आए हैं, अब अपने लिए एक वोट कीजिए- नोटा! जातिवादी राजनीति के खिलाफ नोटा दबाइए, अपना और देश का अस्तित्व बचाइए।

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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