हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

स्वार्थ से अटलजी का गुणगान, विरोध दोनों सही नहीं…

इस समय एक पक्ष अटलजी की निंदा में लगा हुआ है तो भाजपा अटलजी को भुनाकर 2019 का चुनाव जीतने के फेर में लगी है। सही बात यह है कि न तो अटलजी की निंदा करने से संघ या भाजपा का कुछ उखड़ जाएगा और न ही उनकी प्रशंसा करने से इनका कुछ बन ही जाएगा। इसलिए राजनीतिक, वैचारिक स्वार्थ सिद्धि से इस महामानव का गुणगान या विरोध दोनों ही सही नहीं है।
    कई वामपंथी, संघ विरोधी, भाजपा विरोधी, हिन्दू विरोधी और यहां तक कि ब्राह्मण, सवर्ण विरोधी… अटलजी को अपने-अपने हिसाब से गालियां दे रहे हैं। वामपंथी है तो संघी समझकर गाली दे रहा है। किसी राजनीतिक दल का अंधभक्त है तो भाजपाई समझकर गरिया रहा है। कोई कट्टर मुस्लिम है तो हिंदूवादी बताकर भला-बुरा कह रहा है। कोई कट्टर हिन्दू है तो सेकुलर कहने में शेखी समझ रहा है। जो दलित चिंतक है वह ब्राह्मण, सवर्ण समझकर रटा-रटाया मनुवादी कहकर ही खुश है…। इनमें से कोई खुद स्वतंत्र नहीं है। सभी वैचारिक, राजनीतिक, धार्मिक, जातीय… किसी न किसी तरह की गुलामी से अभी जकड़े हुए हैं। इस हद तक कि इनके अपने खेमे से कोई हत्यारा भी निकल जाए तो बेगुनाह प्रतीत होता है और सामने वाले खेमे में कोई बेहतर निकल जाए तो कोफ्त से मरे जाते हैं। इनमें से कोई भी अच्छा को अच्छा और बुरा को बुरा कहने के लिए स्वतंत्र नहीं है। ऐसे गुलामों को अब स्वतंत्र होने की सोचना चाहिए और इस तरह की प्रायोजित निंदा से बाज आना चाहिए।
अब स्वार्थवश अटलजी की प्रशंसा की बात। अटलजी को संघी, भाजपाई, ब्राह्मण, सवर्ण आदि-इत्यादि बताकर उनके जरिये इन सभी को महान बताने की होड़ चल रही है। यह भी उतना ही गलत है। अटलजी जो थे, वह बस वही थे। उनका व्यक्तित्व उनकी अपनी कमाई, बनाई पूंजी थी। उसका हिस्सा किसी में नहीं बंट सकता। वे संघ से थे तो क्या सभी संघी उनकी तरह हैं? वे भाजपाई थे तो उनकी तरह अभी कौन है भाजपा में? उन्होंने तो एक वोट से सत्ता गंवा दी लेकिन समझौता न किया। अभी तो वोट बैंक के लिए क्या-क्या नहीं किया जा रहा? कुछ बचा भी है क्या?
    आज मोदी को अटलजी के वारिस के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या कोई राजनीतिक वसीयत लिखी कभी अटलजी ने? और नेता वसीयत से बनता है क्या कोई? मोदीजी के अंतिम यात्रा में पैदल चलने तक को भुनाया जा रहा है। कौन सी नई बात हो गई इसमें? अपनी तो संस्कृति ही यही है। और वैसे भी उस महामानव की अंतिम यात्रा में तो दूर-दराज से आए सैकड़ों छात्र, युवा, बुजुर्ग सभी चल रहे थे जिन्होंने अटलजी के राजनीति से सन्यास लेने के बाद जन्म लिया वे भी, तो कौन सी बड़ी बात हो गई यदि भाजपा सरकार के प्रधानमंत्री चले जिनके लिए अटलजी कमल खिलाकर गए थे। पैदल चले तो मुलायम तक, विपक्षी दलों के भी कई नेता… उनकी कहाँ कोई चर्चा है?
    अटलजी की मौत को एक राजनीतिक अवसर के रूप में बदल देने से यदि भाजपा यह सोचती है कि इससे अटलजी के प्रशंसकों का प्यार उसे भी मिल जाएगा तो गलत सोचती है, उल्टे घृणा हो जाएगी अपने प्रिय नेता की मौत का तमाशा बनता देखकर। इसी तरह यदि वह यह सोच रही है कि अटलजी की अस्थियों से राजनीतिक बज्र बना लेगी और उसका इस्तेमाल चुनाव में विरोधियों पर कर लेगी तो यह भी न भूले कि खराब नीयत से किया मन्त्रजाप भी अनिष्टकारी हो जाता है। अतः यह बज्र कहीं वापस लौटकर उल्टा ही प्रहार न कर दे। अटलजी जिन्होंने राजनीति से काफी पहले संन्यास ले लिया और जो एक दशक तक मरणासन्न स्थिति में रहे, उनकी मृत्यु के बाद उनका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना खेदजनक है।
Facebook Comments

मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

View more posts from this author

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.