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पाकिस्तान में इमरान तो भारत में…?

पाकिस्तान में कल हुए आम चुनाव का आज परिणाम आ रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीति के खिलाड़ी बने इमरान खान की पार्टी तहरीक—ए—इंसाफ (पीटीआई) देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई साफ नजर आ रही है वहीं जेल में बंद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएलएम-एन) दूसरे नंबर पर चल रही है। चुनाव परिणाम इससे थोड़ा ही इधर—उधर होगा। पीटीआई को पूर्ण बहुमत न मिला तो भी गठबंधन कर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो ही जाएंगे…।
यूं तो इमरान पाकिस्तान की जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता हैं लेकिन वह खुद कितने लोकतांत्रिक हैं, इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में, यदि अलोकतांत्रिक विचारों वाले इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत—पाक में शांति वार्ता जैसी कोई चीज रह जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। युद्ध की संभावना न हो तो भी सीमा पर घुसपैठ बढ़नी तय है क्योंकि पाकिस्तान में सेना की सत्ता नहीं होगी तो भी इमरान के रूप में कमोबेश उसका ही नेतृत्व होगा।
अब ऐसे में, 2019 में होने वाले चुनाव में भारत को ऐसा प्रधानमंत्री देना होगा जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देना जानता हो। जो इतना उतावला न हो कि देश को बेमतलब युद्ध की आग में झोंक दे लेकिन इतना कायर भी न हो कि घुसपैठ बर्दाश्त करता रहे, आतंकी गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहे।
भारत में वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के लिए दो ही उम्मीदवार सामने हैं। एक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी।
नरेंद्र मोदी अपने वादे पर काफी हद तक खरे नहीं उतर पाए हैं। आतंक के मुद्दे पर बात करें तो सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही दिखता है। खासकर, कश्मीर मुद्दे पर तो मोदी अपना कोई वादा नहीं निभा पाए। न कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने का और न ही धारा 370 हटाने का। इतना ही नहीं, रमजान में मुस्लिम तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए मोदी सरकार ने ऐसा निर्णय लिया जिससे सैनिकों को बिना लड़े ही मौत के मुंह में समा जाना पड़ा। सरकार ने देशद्रोहियों से केस वापस लिए और जिन पर केस चल रहे हैं, उनमें अधिकतर मामले में अभी तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं करा पाई। राफेल डील में विपक्ष के कुतर्कों को छोड़ दें तो सही सवालों का भी जवाब दे पाने में मोदी असफल रहे हैं। वह नहीं बता पा रहे कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसी कंपनी से करार किया जा रहा, जो अनुभवहीन है। कई मसले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह सरकार देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने में नाकाम है…।
राहुल गांधी की बात करें तो नरेंद्र मोदी से तुलना करने के लिए उनका कोई कार्यकाल तो नहीं है, लेकिन उनके विचार और व्यवहार सामने हैं जिसे देखकर कतई नहीं लगता कि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो आतंक का करारा जवाब दे पाएंगे। यह मोदी सरकार की नाकामी है कि जेएनयू में देशविरोधी नारों की सच्चाई अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है लेकिन देशद्रोह का आरोप लगने के साथ ही आरोपितों के बचाव में उतर जाना बताता है कि राहुल गांधी कभी—कभी किस हद तक गिर सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कठुआ में कुछ लोग दुष्कर्म के आरोपितों के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह सही है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी करार न ​दे दिया जाए, वह दोषी नहीं है लेकिन यदि वह आरोपित भी है तो संदिग्ध तो है ही। ऐसे व्यक्ति का बचाव, उसके गुनाह पर पर्दा डालना ही है। इस तरह आतंकियों, देश द्रोहियों से मुकाबले के मामले में मोदी की अपेक्षा राहुल का व्यवहार अधिक संदिग्ध दिखता है।
बात सच्चाई की करें तो मोदी और राहुल दोनों ही कई बार झूठ बोल चुके हैं। मोदी चुनावी सभाओं में झूठ बोलते हैं लेकिन राहुल ने तो पिछले दिनों राफेल डील मुद्दे पर भरी संसद में ही झूठ बोला, वह भी तब जबकि यह डील कांग्रेस ने ही की थी।
अब बात यदि व्यवहारिक समझ, ज्ञान की करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी मोदी के सामने दूर—दूर तक नहीं टिकते। डिग्री किसकी सही है, यह तो जांच में ही सामने आएगा लेकिन पढ़ार्इ ठीक से नहीं की है राहुल ने यह बार—बार वह खुद साबित कर चुके हैं। मोदी का तो इतिहास ज्ञान ही अनूठा है लेकिन राहुल का व्यवहारिक ज्ञान भी। पिछले दिनों वे नहीं बता पाए कि एनसीसी क्या है? हद है, इस देश में रहकर राहुल एनसीसी नहीं जानते। ऐसा कई बार हुआ है, जब राहुल की अज्ञानता साफ झलकी है और ताज्जुब है कि इसे दूर करने के लिए वह कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। शायद, इसकी उन्हें जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाने वाली उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति है।
अब बात यदि राजनीतिक अनुभव की करें तो कुछ कहना ही नहीं है…। जितनी उम्र है राहुल की, कमोबेश उतना अनुभव है मोदी का। राहुल में यही खूबी हैं कि वह युवा है लेकिन कार्य करने की उर्जा मोदी में उनसे भी अधिक है।
भ्रष्टाचार की बात करें तो न तो स्पष्ट रूप से मोदी के बारे में ही ऐसा कहा जा सकता है और न ही राहुल के बारे में ही लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों पर ही कई आरोप लग चुके हैं। बड़ी बात है कि राहुल गांधी हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं और उसकी सुनवाई चल रही है जबकि मोदी पर अभी तक अधिकतर आरोप, आरोप ही हैं। जिस दंगे के लिए उनकी छवि खराब की गई या जिसकी बदौलत वह इतने बड़े नेता बने, उस मामले में भी वह बरी हो चुके हैं।
इस तरह मेरा निजी विचार है कि 2019 में यदि दोनों में से किसी को न चुनना पड़े तो सबसे अच्छा लेकिन यदि कोई तीसरा चेहरा सामने नहीं आता है, और चुनाव राहुल व मोदी में से ही किसी का करना पड़ता है तो मौका नरेंद्र मोदी को ही देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो हम ऐसी स्थिति में नोटा ही दबाएंगे क्योंकि राहुल से हमें कोई उम्मीद नहीं और मोदी ने उम्मीदों को तोड़ा है।

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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