निष्पक्ष

हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

​जिंदों का कुछ तो ख्याल कीजिए, इन बूतों से खुद को आजाद कीजिए…


जिस देश की जनसँख्या इतनी अधिक हो गई हो कि जिंदा लोगों के रहने-चलने की जगह न बचे, वहां जगह-जगह प्रतिमाएं खड़ी कर राजनीति और फिर उन्हें तोड़कर बवाल करने की सियासत कब तक? जिंदा आदमी की कद्र नहीं, बूतपरस्ती क्यों? 
मेरा मानना है कि देश में प्रतिमाएं सिर्फ उनकी लगाई जाए जिनका इस देश—समाज के लिए कोई योगदान हो। और प्रतिमा भी बस एक लगे- जन्मस्थल पर। यदि शहादत दी है तो दूसरी प्रतिमा लगे- शहादत स्थल पर और यदि इससे भी अधिक सम्मान-श्रद्धांजलि देनी है तो एक अंतिम प्रतिमा लगे देश की राजधानी में स्थित राष्ट्रीय स्मारक में। 
यह तय हो जाए तो किसी भी दल की सरकार होगी, ना तो वह किसी महापुरुष की प्रतिमा तोड़ सकेगा और न ही अपनी मनमर्जी किसी की भी, कहीं भी प्रतिमा खड़ी कर सकेगा। यह क्या मजाक चल रहा है…? कांग्रेस ने देश की अधिकतर जगह गांधी-नेहरू को दे दी है, मायावती ने अम्बेडकर को, वामपंथी सरकारों ने लेनिन को और अब भाजपा दीनदयाल के लिए दयालु हुई जा रही है। हम यह नहीं कहते कि इन्हें सम्मान नहीं मिलना चाहिए, लेकिन इनके नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक राष्ट्रीय स्मारक बने। उसमें सभी महापुरुषों को ससम्मान जगह दी जाए और हर शहर, संस्थान, चौक-चौराहों से सभी की प्रतिमाएं समेट ली जाएं…। एक बार यह करके देखिए, खास नामों और प्रतिमाओं पर होने वाली सियासत बंद हो जाएगी। इनको लेकर होने वाला बवाल भी थम जाएगा। इन पर होने वाला अपव्यय रुक जाएगा। चौक-चौराहों पर जगह होगी और वे सांस ले पाएंगे। एक ही जगह पर सभी महापुरुषों के दर्शन हो सकेंगे। प्रतिमाएं सुरक्षित भी रहेंगी और उनकी देखरेख भी हो सकेगी। 
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किसे छापना है, किसे दिखाना है, यह टीआरपी से तय होता है…

आज तक पर अंजना ओम कश्यप के डिबेट में बाबर कादरी और एक डिप्टी मु्फ्ती को बुलाया गया था। एक ने जिन्ना को कायदे आजम कहने के लिए कहा तो दूसरे ने देश के एक और बंटवारे की बात की…। कादरी के प्रोफाइल को देखिए तो उसे और उसके विचार को समझना मुश्किल नहीं है। यह जानना मुश्किल नहीं कि यदि वह डिबेट में आया तो क्या बोलेगा। यही बात उस मुफ्ती पर भी लागू होती है। फिर भी दोनों को बुलाया गया जान—बुझकर… वैसे ही भड़काउ सवाल पूछे गए जान—बुझकर… और वैसे ही जवाब भी मिले जिसकी उम्मीद चैनल को थी…।
अब इस तरह के ओछे लोगों को मीडिया द्वारा शह देने का असर देखिए..! दोनों ही शख्स जो सिर्फ अपने फेसबुक या वेबसाइट पर भौंक सकते थे,(वह भी सरकार की मर्जी से वरना इन्हें बैन कर देना चाहिए) इन्हें डिबेट में शामिल कर एक चैनल की माइक थमा दी गई ताकि वह भौंकें तो पूरा देश सुने और बहुत हद तक यकीन भी कर ले। इन्हें डिबेट में सम्मान के साथ बैठाया गया, जहां बैठने वाले के बारे में लोगों की एक धारणा बनी हुई है कि वह उस विषय का मर्मज्ञ और उस समुदाय का सर्वमान्य प्रतिनिधि ही होता होगा। वह जो बोलता है वह पूरा कौम बोल रहा है…। इस तरह इन घृणा फैलाने वालों का मतलब सध गया और इस तरह के घृणित लोगों को आमंत्रित कर टीआरपी की चाह रखने वालों का भी। लोगों ने न सिर्फ डिबेट देखा बल्कि समर्थन या निंदा में, बहस की। पोस्ट किए, वीडियो शेयर किए। यही तो आजकल दोनों ही चाहते हैं… आतंक फैलाने वाले आतंकी भी और टीआरपी बटोरने वाले चैनल भी–!
यह सिर्फ चैनल ही नहीं कर रहे, अखबारों का भी यही काम रह गया है। कौन कितना विवादास्पद है, कितने विवाद पैदा करने वाला ​लेख लिख सकता है, उसे संपादकीय पृष्ठ पर आसानी से जगह दी जाती है। दो—तीन परिचित सेवानिवृत्त संपादक हैं, जिनसे बात होती है, जो आजकल देश—समाज के लिए कुछ सकारात्मक कर रहे हैं और लिख भी रहे हैं लेकिन उन्हें उन्हीं अखबारों में जगह नहीं दी जाती, जहां के कभी वे संपादक हुआ करते थे, जहां क्या छपेगा, यह वहीं तय किया करते थे…। लेकिन दिलीप सी. मंडल, जिसकी एकमात्र विद्वता फेसबुक पर गाली देने की है, दलित—ब्राह्मणवाद करने और धर्म—जातियों में घृणा बांटने, वैमनस्यता फैलाने की है; वह हर अखबार के संपादकीय पन्ने पर जगह पाता है। कारण? कारण वहीं टीआरपी है! पठनीयता है…!
पूरे देश में धार्मिक—जातीय उन्माद की आग पूरी तरह फैलने से पहले इस तरह के बोलने—लिखने वालों और इन्हें दिखाने—छापने वालों पर पूरी तरह शिकंजा कसा जाना चाहिए…। यही एकमात्र उपाय है। इनका हर तरह से, हर जगह बहिष्कार—तिरस्कार किया जाना चाहिए तभी यह देश—समाज बचेगा!
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मीडिया में भी ओवैसी हैं; एक नहीं, कई…

अब तक जब भी किसी मुस्लिम या दलित की मौत हुई, मीडिया ने उसे धर्म-जाति के हिसाब से ही देखा, लिखा और सबको देखने पर मजबूर किया है लेकिन कभी हिन्दू की हत्या लिखने का साहस नहीं किया…। 26 जनवरी को कासगंज में तिरंगा यात्रा में शामिल चंदन गुप्ता की मुस्लिम युवक ने गोली मार हत्या कर दी। हमें पता था कि अब भी कोई नहीं लिखेगा- “हिन्दू की हत्या” लेकिन हमने फिर भी देशभर के संपादकों से आग्रह किया कि वे इसे “कासगंज में हिंदू युवक की हत्या” लिखें जैसे कि वे अब तक “मुस्लिम युवक की हत्या”, “दलित युवक की हत्या” लिखते रहे हैं लेकिन परिणाम…?
सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट पर किए हर वाह—वाह वाले कमेंट को लाइक करने या उसके प्रत्युत्तर में थैंक्यू कहने वाले संपादकों ने मेरे अनुरोध वाली पोस्ट को पढ़ा ही नहीं होगा, यह तो नहीं मान सकते लेकिन इसके बाद भी कासगंज में मुस्लिम युवक द्वारा मार दिए गए अभिषेक उर्फ चंदन गुप्ता की हत्या की खबर को किसी ने निष्पक्ष तरीके से लिखने का साहस नहीं किया। या यूं ​कहिए कि उस तरह से नहीं देखा जिस तरह वे किसी मुस्लिम की हत्या को देखते हैं! खैर, अच्छी बात है कि पहली बार धर्मआधारित शीर्षक न अखबारों में लगे और न ही टीवी चैनलों में इस तरह की स्ट्रिप दिखीं। लेकिन, क्या यह स्थिति संतोषजनक है? क्या इस तरह की पत्रकारिता से निष्पक्षता जाहिर हो रही है? निष्पक्षता तो तभी दिखेगी ना जब कभी मुस्लिम या दलित की हत्या जैसे शीर्षक भी अखबारों में न लिखे जाएं, न टीवी चैनलों पर इस तरह की रिपोर्टिंग की जाए…! क्यों किसी मुस्लिम, दलित की हत्या में उसका धर्म, उसकी जाति इतनी महत्वपूर्ण हो जाती है और क्यों किसी हिन्दू की हत्या कोई आई-गई बात हो जाती है…?
पत्रकारिता के सिरमौर पर बैठे आदरणीय गण, क्षमा कीजिए! लेकिन इस तरह की पत्रकारिता आपकी नियत और सोच को संदेह के दायरे में लाती है। आप यह न समझिए कि आपकी चालाकी कोई नहीं समझता। जनता सबकुछ समझती है। वह अखबार नहीं फाड़ती, पढ़ लेती है; वह टीवी नहीं फोड़ती, देख लेती है तो यह न समझिए कि उसे जो झूठ दिखाया—पढ़ाया जा रहा है, वह उसकी समझ में ही नहीं आ रहा है! जिस तरह से ​किसी हादसे में मुस्लिम या दलित की हत्या लिखकर—बोलकर—दिखाकर पूरे देश को भड़काया जाता है और जिस तरह किसी हिंदू की हत्या पर हिंदू की हत्या लिखना—दिखाना तो छोड़िए, उसे हत्या तक नहीं माना जाता; “एक युवक की मौत” लिखकर खबर को निपटा दिया जाता है, उससे सबकुछ खुद ही साफ हो जाता है, कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती…!
हैरत है ना! कासगंज में चंदन की हत्या को तमाम अखबारों, पोर्टलों, चैनलों ने मौत करार दे दिया? गोली मारकर हत्या करने की बात को यूं लिखा जैसे किसी समारोह में हर्ष फायरिंग में गोली चली और अनजाने में उसे लग गई…। ज्यादातर मीडिया में यही लिखा गया, यही दिखाया गया— “गोली चली, एक युवक की मौत।” मुस्लिम ने मारा इसलिए यूं लिखा गया जैसे गोली खुद ही चल गई…; हिंदू युवक मरा इसलिए हत्या भी मौत में बदल गई…! यह क्या है? किस तरह की रिपोर्टिंग हैं?
अति आदरणीय,
यदि वाकई बहुत चिंता है आपको पत्रकारिता और पत्रकारों की गिरती साख को लेकर जैसा कि आप सेमिनारों में बोलते हैं तो हमें भी चिंता है इसकी एक पत्रकार ही नहीं, एक पाठक—दर्शक और एक नागरिक होने के नाते भी। इसलिए हम यह सारा खेल समझते हुए कहना चाहते हैं कि इस तरह की पत्रकारिता से यह साख उपर नहीं उठनी बल्कि मटियामेट हो जानी है…। सच कहने की मेरी गुस्ताखी के लिए माफ कीजिए लेकिन धर्म—सम्प्रदाय आधारित भाषण देने वाले स्वार्थी नेताओं से बहुत अलग नहीं हैं आप जैसे पत्रकार जो धर्म—जाति देखकर खबरें तय कर रहे हैं, बावजूद चाहते हैं कि जो लिखते—दिखाते हैं, उसे सच माना जाए और आपको निष्पक्ष मान लिया जाए…! दिल पर हाथ रखकर खुद से पूछिए ना कि क्या आप वाकई निष्पक्ष हैं…?
यह सब देखकर हमें कहना पड़ रहा है कि अब तो जनता को नेताओं की तरह पत्रकारों की भी श्रेणी तय कर लेनी चाहिए। अब तो यकीन हो गया; मीडिया में भी ओवैसी हैं, और एक नहीं, तमाम हैं…। कासगंज मामले की रिपोर्टिंग ने यह फिर से साबित कर दिया है…।
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आज हिंदू भी जरूर लिखिए… या फिर कभी मुस्लिम—दलित भी न लिखिए!

देश के तमाम पत्रकार मेरी मित्र सूची में हैं लेकिन पता है कि उनसे कहने का कोई फायदा नहीं। इसलिए इस मामूली पत्रकार का आग्रह सबकुछ तय करने वाले देश के महान संपादकों से है…!
समस्त आदरणीय,
गणतंत्र दिवस के अवकाश के चलते कल न छप पाया अखबार जब आज छापिए तो कासगंज की खबर के साथ इस तरह के शीर्षक, उपशीर्षक जरूर लगाएं-
“कासगंज में सरेआम हिन्दू की हत्या”
“तिरंगा यात्रा निकालने पर मुस्लिमों का हमला”
“हिन्दू बोले हिंदुस्तान जिंदाबाद तो मुस्लिम युवक बोला- पाकिस्तान जिंदाबाद”
“तिरंगा लेकर निकला तो मार डाला चंदन को”
कोई बात नहीं यदि आप यह न लिख पाएं तो भी…!कासगंज में साम्प्रदायिक तनाव होने के बाद भी देश में साम्प्रदायिक सौहार्द की कामना हो, सबकुछ जानते हुए भी इसे महज दो गुटों या सम्प्रदायों में भिड़ंत जैसा ही कुछ लिखना हो, जैसा कि कल से ही तमाम अखबारों के पोर्टल पर चल भी रहा है; तो प्लीज साथ में यह कसम भी खा लीजिएगा कि आगे कभी “मुस्लिम की हत्या”, “दलित की हत्या” शीर्षक लगाकर देश में आग नहीं लगाइएगा…।
जी बिल्कुल,
हम भी जानते हैं कि कल कैसे और क्यों सबकुछ पता होते हुए भी देर शाम तक हर जगह “झड़प में एक व्यक्ति की मौत” ही खबर थी। उस व्यक्ति का नाम तक लिखने से बचा गया क्योंकि उससे भी पता चल जाता कि मरने वाला हिन्दू है। हाँ, हम यह भी जानते हैं कि ऐसा किया जाना क्यों जरूरी है, इसलिए इस पर सवाल नहीं उठा रहे। हम तो बस इतना कह रहे हैं कि यदि आपको “मुस्लिम युवक की हत्या” लिखना जायज लग रहा है तो आज “हिन्दू युवक की हत्या” भी जरूर लिखिए, लिखने की इजाजत दीजिए! पत्रकारीय धर्म या अधर्म जो भी निभाते हैं आप, आज भी निभाइए, हर समय निभाइए…।
महोदय,
काफी जनसंख्या है देश की, शरीफों के साथ मवाली भरे पड़े हैं यहां तो हर दिन किसी न किसी वजह से, किसी न किसी की हत्या होती है और मरने वाला हर शख्स किसी न किसी जाति, कौम का तो होता ही है; तो यदि आप जाति-धर्म से ऊपर सोच ही नहीं सकते, आपकी नजर में हर व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसकी यही है तो प्लीज आज भी जरूर लिखिए-
“तिरंगा फहराने पर हिन्दू युवक की निर्मम हत्या”
अब हम थोड़े भावुक हो गए हैं! इसलिए इससे अलग भी अनुरोध है…
आग्रह है कि साइड स्टोरी में ही सही, 22 साल के लड़के के घर वालों का भी ख्याल रखा जाएगा। उसकी माँ के आंसू तस्वीरों से लेकर शब्दों तक झलकेंगे। जवान बेटे के खोने का दर्द बिना हिन्दू-मुस्लिम देखे, दिखेगा। तिरंगा यात्रा में शामिल देशभक्ति से ओत-प्रोत नौजवान को खो देने का दर्द उसी तरह झलकेगा, जिस तरह तिरंगा फहराते हुए शहीद हो जाने वाले जवान के लिए दिखता है। हाँ, आप उसे शहीद भले ना लिख पाएं लेकिन उसकी मौत की बिल्कुल वही वजह होने के कारण उसे वही सम्मान भी जरूर मिलना चाहिए। चंदन तो अन्याय का शिकार हो गया, आतंकियों ने मार डाला उसे लेकिन आप उसकी माँ के साथ न्याय कर सकते हैं, उसके बेटे को सरकार से शहीद का दर्जा दिलाकर। उसे वही सम्मान दिलाकर…! आपको तो सब याद रहता है! याद है ना कि केजरीवाल ने अपनी सभा के दौरान पेड़ से लटककर आत्महत्या करने वाले किसान को शहीद का दर्जा देने की घोषणा कर दी थी? तब शहादत किस बात की थी, पता नहीं! लेकिन आज चंदन ने शहादत ही दी है…!
अंत में,
पुनः आग्रह है कि हिन्दू, मुस्लिम को दिमाग से निकालकर निष्पक्ष होकर देश के एक होनहार देशभक्त लड़के की हत्या की खबर लिखी जाए; उसकी शहादत का सम्मान किया जाए, आतंकियों को आतंकी घोषित न करा पाएं तो भी कोई बात नहीं, देशद्रोहियों को देशद्रोही न लिख पाएं तो भी दिक्कत नहीं लेकिन चंदन को शहीद का दर्जा जरूर दिलाइए…! अपना जमीर जगाइए, अपना पत्रकारीय धर्म निभाइए…!
सादर,
मामूली पत्रकार
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यदि अम्बेडकर युग यही है तो इसे आने न दीजिए…

हम डरते हैं कि हकीकत कह देंगे तो अम्बेडकर की आत्मा बुरा मान जाएगी और अम्बेडकरवाद के नाम पर हनुमानजी को जूते मारे जा रहे हैं…। यदि इसके बाद भी आप चुप हैं तो समझिए अब खून पानी हो गया है आपका…।

सरकारों की दोगली नीति ने तो जाति-धर्म के नाम पर किसी को भी कुछ भी करने की छूट दे रखी है लेकिन हम क्यों चुप हैं? सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि जूते अम्बेडकर को लगते हैं या हनुमानजी को… लेकिन हमें तो पड़ता है? हनुमानजी की पूजा हम करते हैं तो उनको जूते मारने की घटना और ऐसी निकृष्ट सोच वालों का विरोध भी पहले हमें ही करना होगा… तभी सरकारें भी देखेंगी। यदि हम अब भी चुप रहे तो आज हनुमानजी की तस्वीर को जूते मारने वाले कल हमारे घरों पर चढ़ आएंगे, हमारे आंगन से उनका ध्वज पताका उखाड़ ले जाएंगे। हम जैसे आज सिर्फ देख रहे हैं, कल भी देखते रह जाएंगे…!
इस असहनीय कृत्य पर चुप्पी सही नहीं है। हनुमानजी पर जूते मारने वालों का व्यवहार देखकर इनके अंदर की घृणा का अनुमान लगाइए… इन्हें छूट मिली तो ये कुछ भी कर सकते हैं.. इसलिए अब चुप मत रहिए। पानी सिर से ऊपर जा रहा है। हाँ, विरोध में जरूर धैर्य बनाए रखिए लेकिन हकीकत कहने से, उसका प्रतिकार करने कतई न डरिए। यह डर आपको जीने नहीं देगा…। अम्बेडकर के बैनर तले जातियों पर जातियों का यह आतंक अब यहीं थमना चाहिए वरना जातीय रक्तपात से पूरा देश सनेगा। शायद याद हो आपको… जातिवाद के इसी तरह के आतंक ने बिहार में एक सीधे आदमी को ब्रह्मेश्वर मुखिया बनने पर मजबूर कर दिया था। अपने स्वाभिमान, आबरू की रक्षा के लिए किसानों ने अपने खेत बेचकर हथियार खरीद डाले थे…। आज की यह जातीय आतंकी गतिविधि यदि यहीं न रोकी गई तो वह दौर समस्त भारत देखेगा…। वह दौर आने से पहले इस दौर को यहीं रोक दीजिए। साहस कीजिए, जातीय आतंक वाले इस अम्बेडकर युग की भर्त्सना कीजिए…।
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जगाइए अपना जमीर… पुकार रहा कश्मीर…

आज आपको याद न रहा होगा लेकिन कश्मीरी पंडित जहां भी हैं, आज का दिन भूल नहीं सकते…! 28 साल पहले 19 जनवरी 1990 को कश्मीरियत की सरेआम हत्या की गई थी…। इन हत्याओं को सत्ता ने संरक्षण तब भी दिया था, आज भी दे रखा है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ इस दर्द को महसूस करने के लिए रहा है नहीं, मर चुका है; और न्याय तंत्र अपनी आत्मा गिरवी रख चुका है। जो न्यायाधीश मनचाहे केस नहीं मिलने पर आज यह कहकर प्रेस कांफ्रेंस करते हैं कि आने वाले वर्षों में कोई यह न कहे कि हमने बेच दी है अपनी आत्मा… वे भी यह केस नहीं खोलते, इस पर कुछ नहीं बोलते क्योंकि इस मुद्दे पर लोकतंत्र के हर स्तम्भ ने बहुत पहले बेच दी है अपनी आत्मा…।

शायद आपको, किसी को अब कुछ याद नहीं कि आज के दिन क्या-क्या हुआ लेकिन कश्मीरी पंडित जहां भी हैं, आज का दिन नहीं भूल सकते…। आज हम कहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता लेकिन आज ही के दिन कश्मीर में रहने वाले तमाम मुसलमानों का आतंक ही एकमात्र धर्म बन गया था और हम चुप रहे…। आज दुनिया में आईएस पर कोहराम मचा है लेकिन अपने ही देश में आज के दिन कश्मीर इस्लामिक स्टेट बन गया और हम चुप रहे…। आज कहीं किस एक धर्म-जाति के किसी शख्स की हत्या होती है और हम उबल पड़ते हैं लेकिन आज के दिन धर्म के नाम पर हजारों हत्याएं की गईं लेकिन हम चुप रहे… किसी ने न रोका, न टोका बल्कि सरकारी, संवैधानिक संरक्षण दिया गया इस जुल्म को…। आज हम दूर किसी देश से आए रोहिंग्या को शरण देने के लिए मचल उठते हैं लेकिन आज ही के दिन हजारों कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन गए और हम चुप रहे; किसी को कोई फर्क न पड़ा…। आज कहीं एक रेप होता है और हम रो पड़ते हैं लेकिन आज ही के दिन हमारे माँ-बहनों की सरेआम बोली लगी कश्मीर में…; मस्जिदों से आवाज दी गई कि पंडितों कश्मीर छोड़ दो और अपनी बीवी-बहनों को हमारे लिए छोड़ दो… लेकिन हम चुप रहे, तब भी जमीर न जगा हमारा। आज हम लोकतंत्र के लिए चिंतित हैं लेकिन सत्ता के दोगलेपन से आज ही के दिन लोकतंत्र की सरेआम हत्या की गई और हम चुप रहे…। आज हर भूमिहीन को भूमि, हर बेघर को घर देने के लिए सब परेशान हैं लेकिन आज ही के दिन पूरे कश्मीर को कश्मीरियों से छीनकर उसे आतंकियों का पनाहगार बना दिया गया और हम चुप रहे…। लेकिन… हम कब तक चुप रहें? नहीं… अब और नहीं!

आइए, इतिहास में हुए इस जुल्म का प्रतिकार करें… हर हत्या, हर जुल्म को धर्म से परे जाकर देखें और आतंक के हर रूप का विरोध करें। आइए, आज ही नहीं, हर दिन खड़े हों अन्याय के खिलाफ ताकि सबके साथ हो न्याय। आइए, महसूस करें कश्मीरी शरणार्थियों के दर्द को और आइए उनकी आवाज बन जाएं…। आइए कि हवा में एक साथ बन्द मुट्ठी लहराएं और इस तरह बोलें कि सत्ता डोले… आइए नारा लगाएं कि जिन्हें आतंक चाहिए, वे कहीं और जाएं… कश्मीरी पंडितों को वापस अपना कश्मीर चाहिए…।

कश्मीर की कहानी को जन—जन तक पहुंचाने के लिए कुछ मित्रों ने प्रयास शुरू किया है, जो सराहनीय है। यू—ट्यूब पर टैबलॉयड भारत चैनल पर कहानी की पहली कड़ी का वीडियो अपलोड हो चुका है। देखिए—सुनिए और जानिए 5000 वर्ष पुरानी कश्मीरियत को और कश्मीरी पंडितों के साथ हुए जुल्म को…। यह सब देख-सुनकर रो न पड़ें तो कहिएगा…। यह काफी कठिन और साहसिक प्रयास है कश्मीर की हकीकत को आप तक पहुंचाने का, सत्ता के मद में चूर हुक्मरानों को कश्मीरी पंडितों के दर्द का अहसास दिलाने का…। आइए इस प्रयास में अपना प्रयास जोड़ते हुए इसे एक अभियान बनाएं और कश्मीरियों को उनका कश्मीर दिलाएं…। 12 मिनट दीजिए और कश्मीर की कहानी की पहली कड़ी देखिए…। कश्मीरियों के दर्द को महसूस कीजिए और उनकी आवाज बन जाइए…।

[youtube=https://www.youtube.com/watch?v=G1AE-g511sg&w=320&h=266]
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हां, निष्पक्ष नहीं हैं हम…!

किसी की मिथ्या प्रशंसा करने वालों से जितनी चिढ़ नहीं होती, उससे अधिक नफरत होती है हमें मिथ्या दोषारोपण करने वालों से। इस कारण जब भी कोई अंधविरोध होता है तो हम उसके विरोध में हो जाते हैं और ऐसा होते ही न होते हुए भी हम आरोपित पक्ष के प्रति रक्षात्मक दिखने लगते हैं। यही स्वभाव है मेरा, यही काम है मेरा… इसलिए जब हाल में ब्राह्मणों पर लगातार झूठे हमले किए गए तो हम फिर खड़े हैं उसी तरह सच और झूठ के बीच में या कहिए कि सच की तरफ और इसलिए आश्चर्य नहीं यदि आपको हम नजर आ रहे हैं ब्राह्मणों की तरफ…।

हां, थोड़ा दुख है लेकिन आश्चर्य नहीं यदि आप इनबॉक्स में, फोन पर और मिलने पर भी मेरी निष्पक्षता पर संदेह कर रहे हैं। अपने या अपनों के झूठे आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सकते आप इसलिए उससे भी आगे जाकर हमें भी झूठा आरोपित करने लगे हैं कि इस तरह की पोस्ट कोई पत्रकार नहीं, सच लिखने वाला मृत्युंजय नहीं बल्कि उसके साथ जुड़ा त्रिपाठी लिख रहा है…। जानते हैं हम हर झूठ बोलने वाले की आदत… कि कैसे वह अपने बचाव में किसी को ऐसे लपेटता है कि कोई भी व्यक्ति घबरा जाए, सच से पीछे हट जाए और उसका झूठ आगे बढ़ जाए। हम यह भी जानते हैं कि बिल्कुल यही खेल ब्राह्मणों—सवर्णों के विरोध के भी पीछे भी खेला जा रहा है कि जब इनके खिलाफ फैलाए झूठ के विरुदृध इनके बीच का कोई व्यक्ति खड़ा हो, उसका खंडन करे तो घोर ​जातिवाद को जीने वाले और उसका समर्थन करते नहीं लजाने वाले आप तड़ से उसे ही जातिवादी करार दे दें और वह निष्पक्षता का पुजारी कहलाने की चाह में तुरंत अपना पांव पीछे खींच ले।

हां, हम जानते हैं घबराए हुए हैं आप अपने झूठ का रायता न फैलता देखकर, वर्षों से फैलाए रायते को हमें समेटता देखकर और इसलिए अब आपका विरोध तथ्यों से इतर व्यक्तिगत होने लगा है। लेकिन, आप निश्चिंत रहिए… हमें हर हाल में सच के साथ ही खड़ा पाएंगे; हम तब भी नहीं डिगेंगे जब हम आपको मित्र की जगह सिर्फ हिंदू, सवर्ण, ब्राह्मण, त्रिपाठी ही नजर आएंगे। कोई मुगालता न रखिए, मन को बिल्कुल साफ रखिए। जैसे—जैसे आपका अंधविरोध बढ़ेगा, वैसे—वैसे मेरी तरफ से आपका विरोध बढ़ेगा। जैसे—जैसे आप हमें हतोत्साहित करने की कोशिश करेंगे, मेरा मनोबल और बढ़ता जाएगा। और मित्र, हमसे ​बात करते समय निष्पक्षता की दुहाई तो न ही दीजिए, हमसे इसकी उम्मीद भी न कीजिए क्योंकि हम सदैव खड़े हैं सत्य के पक्ष में और झूठ के खिलाफ। फिर यदि आजकल उस झूठ के साथ आप खड़े हैं तो समझ लीजिए कि हम आपके ही खिलाफ खड़े हैं। मेरा तो यही स्वभाव है तो मेरे पास कोई रास्ता भी नहीं है; हां, आपके पास है कि सच को स्वीकार कर लीजिए, नहीं तो आदत डाल लीजिए अपने झूठ के विरुद्ध हमें देखने की…। हां, निष्पक्ष नहीं हैं हम, क्योंकि सच के पक्ष में हैं हम…।

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अब यह दोष भी ब्राह्मणों पर…?

हर बात में ब्राह्मणों को दोष देने वाले अपने स्मृति दोष को कभी नहीं देखते। अब खिचड़ी मनाए खुद ही 14 को, लेकिन दोष उसका भी ब्राह्मणों पर…। प्रायः विप्र ब्राह्मण सिर्फ इसलिए दोषी बन जाते हैं क्योंकि वे कभी प्रतिकार करने सामने नहीं आते और पर्व-त्योहारों को अलग-अलग तारीख में बांटने वाले ‘पोंगा पंडित’ फेसबुक पर ज्ञान बघारकर मिथ्या दोषारोपण करने में सफल हो जाते हैं…। 

     अब भला मकर संक्रांति की तिथि में क्या संशय है? भाई, पंडितजी के धार्मिक ज्ञान पर भरोसा नहीं और आप खुद बहुत बड़े वैज्ञानिक हैं तो इतना तो समझ सकते हैं ना कि धरती की गति के अनुसार संक्रांति की तारीख करीब प्रत्येक 100 साल पर आगे बढ़ जाती है? इसी कारण जो खिचड़ी पहले 14 को होती थी, अब 15 को होती है…? यही बात पञ्चाङ्ग देखने वाले ब्राह्मणों ने पिछले साल भी कही थी, इस बार भी बताया लेकिन यदि आपको 14 को ही खिचड़ी मनाने की जिद पड़ी थी तो अब दोष खुद ही लीजिए ना?

     आज स्नान, पुण्य कीजिए… और खिचड़ी खाइए-खिलाइए। ब्राह्मण को दान कीजिए, या न कीजिए; हर पर्व-त्योहार पर उस पर मिथ्या दोषारोपण कर बहुत बड़ा ‘तीसमारखाँ’ बनने की कोशिश न कीजिए! किसी पर्व-त्योहार के महत्व, उसकी तिथि के बारे में कोई भ्रम है तो अपने ब्राह्मण से तर्क कीजिए। एक न बता पाए तो दूसरे से पूछिए, जैसे कि आप किसी विषय को समझने के लिए जरूरत पड़ने पर अधिक योग्य शिक्षक के पास जाते हैं। जाते हैं ना? लेकिन अपनी धर्म-संस्कृति, परंपरा को समझने के लिए आपने कब समय दिया है? अब इतना समय तो देना होगा…!

शुभकामनाएं!

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प्रधानमंत्रीजी, हिम्मत जुटाइए, यह करके दिखाइए तो मानें…

प्रधानमंत्री जी,
देश में जाति के नाम पर बहुत कोहराम मचा हुआ है और जानते हैं सारा कोहराम क्यों मचा है? क्योंकि जाति के नाम पर सबकुछ खैरात में मिल रहा है… राशन, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, टिकट, सत्ता… सबकुछ। यकीन नहीं तो जाति के नाम पर एक बार झटके से देशभर में सरकारी लाभ, आरक्षण खत्म करके देख लीजिए। किसी को याद नहीं रहेगा कि कौन ब्राह्मण है और कौन शुद्र…! नहीं कह रहे कि रामराज आ जाएगा, लेकिन ऐसा करके देखिए, मोदीराज सब पापियों के पाप धो जाएगा, खुद का भी…।

     मोदीजी, अभी तो आपने जाति को योग्यता बना रखी है…। अब सोचिए, जब नौकरियों के लिए यही योग्यता है तो पाने वाले अपनी तो जाति दिखाएंगे ही, दूसरों की भी देखेंगे… वे अपनी जातीय योग्यता साबित करने के लिए ब्राह्मणवाद का काल्पनिक डर दिखाएंगे, सवर्ण को गरियाएँगे और जातिवाद के विरोध के नाम पर खुद घोर जातिवादी बन जाएंगे, खुलकर आतंक मचाएंगे और मनुस्मृति के विरोध की नौटंकी भी करेंगे…। यह सब स्वाभाविक है जब तक सबकुछ जाति के नाम पर दिया-लिया जा रहा है। हां, यदि सच में इस जातीय नौटँकी का समाधान चाहते हैं तो हर क्षेत्र में नौकरियों को उसके लिए जरूरी योग्यता के आधार पर देना शूरू कीजिए फिर देखिए कि कैसे सबकुछ सही हो जाता है। कैसे हर कोई खुद को उस नौकरी के योग्य बनाने के लिए मेहनत करने लग जाता है और कैसे आरक्षण मांग रहे निठल्ले मेहनत करने लग जाते हैं…। यह करके तो देखिए, फिर जाति के नाम पर हुड़दंग करने वाले, नारे लगाने वाले यदि आपको नौकरी के लिए आवेदन भरते, तैयारी करते और इंटरव्यू के लिए इधर-उधर भागते नजर न आएं तो कहिएगा…। जातीय वैमनस्यता, हिंसा की सबसे बड़ा कारण बना है यह आरक्षण जिसे सरकारों ने संरक्षण दिया है… आपकी सरकार ने भी। एक बार हौसला तो कीजिए। यदि इस देश में चाय वाला प्रधानमंत्री बन सकता है तो किसने रोका है, किसी को, कुछ बनने से? यह डर दिखाकर अपने वोटबैंक के लिए इस पाप की मियाद और न बढ़ाइए। अब घड़ा भर चुका है… अब यहीं फोड़िए इसे… किसी मंदिर में नारियल फोड़ने से अधिक पुण्य मिलेगा आपको…।

    मोदीजी, प्रचारक रहे हैं आप। समाजसुधारक की नौकरी रही है आपकी तो यह सब सिर्फ स्वच्छ राजनीति के लिए न कीजिए; उस समाज के लिए भी अब यह कर डालिए जिसके लिए खुद के होने का दावा करते हैं आप। जातीय आरक्षण का खत्म होना सिर्फ इसलिए जरूरी नहीं है कि सबकी योग्यता का सम्मान हो और उसे उसका हक मिले बल्कि देश को उसका हक दिलाने, देश को अधिक सबल, योग्य और प्रतियोगी बनाने के लिए भी यह सबसे अधिक जरूरी है। हर क्षेत्र में योग्य लोग हों इसके लिए आवश्यक है कि कोई योग्य ही उस क्षेत्र विशेष का प्रतिनिधित्व करे, न कि कोई विशेष जाति वाला।  प्रतिभाओं की विविधता झलके देश में, न कि जाति की… अपना देश अपनी योग्यता से जाना जाए, न कि जातीय पहचान बने…। प्रधानसेवकजी, कड़वी दवा कहकर बहुत कुछ पिलाया है आपने, कई कड़े फैसले लिए हैं… हिम्मत जुटाइए और यह कड़वी दवा करके देखिए… देश को सर्वश्रेष्ठ बनाने का बस यही एक तरीका है कि हर जगह श्रेष्ठ व्यक्ति हो, फिर वह किसी भी जाति का हो…। नोट बदली, नोट बन्दी का साहस अन्य ने भी किया है; आप तो बस एक बार जातिबन्दी करने की हिम्मत दिखाइए तो मानें…।

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कल गणेश चतुर्थी थी…? 

 सुबह नींद खुली तो व्हाट्सएप से फेसबुक मैसेंजर तक गणेश चतुर्थी की आपकी शुभकामनाओं ने स्वागत किया। अच्छा लगा, अच्छा लगता है जब आप हमें पूजा, पर्व, त्योहारों पर याद करते हैं लेकिन बुरा भी लगता है जब हम आपको अपने ही धर्म, उसमें बताए गए पूजा, पर्व, त्योहारों से अनजान पाते हैं। हममें से कितने तो यह भी नहीं जानते कि पूजा, व्रत, पर्व, त्योहार सब अलग-अलग हैं, सबके अलग महत्व हैं… इसलिए कल भी आश्चर्य नहीं हुआ जब यह पाया हमने कि तमाम लोग हर माह मनाई जाने वाली संकष्टी चतुर्थी और वर्ष में एक बार मनाई जाने वाली गणेश चतुर्थी में अंतर नहीं समझते, इनका महत्व नहीं जानते…! तथापि सोचकर दुःख हुआ कि जो धर्म को मानते हैं वे भी इसे कितना कम जानते हैं…!

     आपकी शुभकामनाओं से भला कब परहेज है हमें? जीवन में आपकी शुभकामनाओं का हर क्षण स्वागत है, आज भी है… कल भी किया हमने, आज भी है…लेकिन गणेश चतुर्थी की शुभकामना सितम्बर में ही दीजिए ना…। इतनी भी क्या जल्दी है? जिस गणेश चतुर्थी की शुभकामना आप जो कल हमें लगातार दिए, वह वर्ष में एक बार ही आती है, आपके-हमारे जन्मदिन की तरह… गणेशजी के अवतरण को ही हम गणेश चतुर्थी के रूप में 9 दिनों तक बड़े उल्लास के साथ मनाते हैं और इस वर्ष यह 12 से 23 सितम्बर तक मनाने वाले हैं…। 

    … तो आखिर कल था क्या? जी, कल भी चतुर्थी ही थी लेकिन गणेश चतुर्थी नहीं, संकष्टी चतुर्थी…! हिंदू पंचाग के अनुसार यह संकष्टी हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष के चौथे दिन आती है। शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी तो कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाते हैं। कल वही संकष्टी चतुर्थी थी। कल से होली तक के पूजा कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू हो गई और चूंकि हर पूजा की शुरुआत श्री गणेश की पूजा से होती है इसलिए आज मंगलकर्ता, संकटहर्ता… श्री गणेश की पूजा की सबने…। 

     इस चतुर्थी से उस चतुर्थी तक, और उसके बाद की हर चतुर्थी तक सारे संकट हरें आपके विघ्नहर्ता गणेश।  

जय श्री गणेश! 

संकष्टी चतुर्थी के बाद आज पंचमी की भी शुभकामनाएं!

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