निष्पक्ष

हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

मफलरमैन के बाद शुगरमैन केजरीवाल से मिलिए…

दिल्ली में भीषण गर्मी पड़ रही है, इलाकों में पानी की कालाबाजारी हो रही है, लोग पानी के लिए एक—दूसरे की जान के दुश्मन बने बैठे हैं, लेकिन केजरीवाल के लिए यह सब कोई समस्या नहीं है; उनकी समस्या है उनका ब्लड शुगर जो इस समय 400 पार कर गया है…। देश में दिल्ली से बेहतर अस्पताल कहीं है? लेकिन केजरीवाल के मधुमेह का इलाज बंगलुरु में होगा। जब दिल्ली बूंद—बूंद पानी के लिए तड़प रही है तब केजरीवाल 9 दिन राजनिवास में सोफे पर, 1 दिन घर वाले गद्दे पर बिताने के बाद 10 दिन बंगलुरु में प्राकृतिक चिकित्सा का आनंद लेंगे। जिन आइएएस अधिकारियों की हड़ताल पर रहने की बात कहकर 9 दिनों तक सोफे पर लेटे रहे, वे अब भी इंतजार कर रहे हैं कि मुख्यमंत्रीजी आएंगे और उनकी बैठक लेंगे लेकिन मुख्यमंत्रीजी को अब बैठक के लिए कहाँ फुरसत है? वह तो राजनिवास से सीधे उठे और अपने घर पहुंच गए। आइएएस अधिकारी मंगलवार के बाद बुधवार को भी प्रतीक्षा करते रहे कि युग पुरुष आज तो जरूर उनकी बैठक लेंगे। आखिर इतने बेकरार जो थे, 9 दिन तक इसी बात के लिए तो सोफे पर बैठे थे? लेकिन दिल्ली की तकदीर बने साहब बुधवार को भी नहीं मिले। अचानक खबर आई कि प्रभु बंगलुरु निकल रहे हैं। वह भी 10 दिन के लिए… यानी, 9 दिन राजनिवास, 1 दिन घर, 10 दिन बंगलुरु… 20 दिन का आराम… वह भी ऐसे समय में जब दिल्लीवालों का जीना हराम है।

हमें तो समझ ही नहीं आ रहा कि अचानक क्या हो जाता है ऐसे महापुरुषों को सत्ता में आने के बाद? अचानक चाल-ढाल इतनी कैसे बदल जाती है? क्यों बहुत सारा विजन रहता है सत्ता में नहीं रहने पर और कुर्सी मिलते ही कोई नेता इतना बौरा जाता है कि उसे दूसरे दल और नेताओं के विरोध के अलावा कुछ सूझता ही नहीं? क्यों सत्ता के पहले जनता ही सबकुछ होती है और सत्ता मिलने के बाद वह दिखती ही नहीं? भला डायबिटीज बढ़ जाना इतनी बड़ी बात हुआ करती है क्या?

मुख्यमंत्री बनने के पहले वाले केजरीवाल को याद कीजिए। वे तब खांसी से बहुत परेशान थे लेकिन कभी कहीं इलाज कराने नहीं गए। जनता के मुद्दों पर लड़ने से ​फुर्सत ही नहीं थी कि अपना दर्द भी महसूस कर पाएं। गर्मी में भी मफलर लपेटे रहते, खांसती आवाज से भी दिल्ली वालों के भले के लिए आवाज उठा रहे होते। भीषण गर्मी में न तो पसीने की परवाह थी, न भूख की चिंता। तब न कभी डायबिटीज हुआ, न बीपी ने परेशान किया…। सब फिट था। क्यों? क्योंकि तब अपनी सत्ता नहीं थी। तब दूसरे की सत्ता थी और केजरीवाल को सिर्फ उस सरकार की कमियां गिनानी होती थी। आज उनकी सत्ता है, उन्हें हर तरह की सुख—सुविधा हासिल है, तो कहां है जनता का हित? अब तो उनकी अपनी छोटी परेशानियां भी जनता की बड़ी से बड़ी परेशानियों से भी बड़ी हो गई है। बूंद—बूंद पानी के लिए तरस रही दिल्ली को छोड़कर प्रदेश का मुख्यमंत्री बंगलुरु जा रहा है? अरे भाई, नीतीश को कुछ हो जाए तो वह पटना छोड़कर दिल्ली इलाज के लिए आएं तो बात समझ में आती है, अब दिल्ली के मुख्यमंत्री के इलाज के लिए कहीं और जाने का क्या मतलब है? यह दिल्ली वालों को बेवकूफ बनाना और सरकार के समय की बर्बादी नहीं तो और क्या है?

अव्वल तो केजरीवाल को हड़ताल नहीं करनी चाहिए थी, किए भी तो हड़ताल खत्म होने के बाद सबसे पहले आइएएस अधिकारियों की बैठक करनी चाहिए थी, जिसका बहाना कर वह हड़ताल पर थे। इसके तुरंत बाद उन्हें दिल्ली में घूमकर जल संकट से उपजे हालात का जायजा लेना चाहिए था। जल बोर्ड को दुरुस्त करना चाहिए था। हां, यदि डायबिटीज से कुछ अधिक ही परेशानी हो गई थी तो उसका भी यहीं इलाज कराना चाहिए था। इस तरह केजरीवाल का भी दुख दूर हो जाता और जनता का भी लेकिन केजरीवाल को अभी सिर्फ अपने दुख की चिंता है…।

मफलरमैन केजरीवाल से यह शुगरमैन केजरीवाल बिल्कुल अलग हैं…। केजरीवाल धीरे—धीरे ऐसे नेता के रूप में सामने आ रहे हैं जिसे दूसरी सरकारों की कमियां गिनाने, दूसरे नेताओं पर आरोप लगाने में तो महारत हासिल है लेकिन अपना काम करने में जरा भी मन नहीं लगता। केजरीवाल अपना काम छोड़कर सबका काम जानते हैं। मोदी का, एलजी का, आइएएस अधिकारियों का। वे बहानेबाजी करते हैं जैसे कि हर काम नहीं करने वाला आदमी करता है कि हमें काम नहीं करने दिया जा रहा है। लेकिन हकीकत? वह तो कुछ और ही है! हकीकत यह है कि सभी पर काम नहीं करने का आरोप लगाने वाले केजरीवाल सत्तासुख में इतने मस्त और आरामतलब हो गए हैं कि खुद अपना काम भूल चुके हैं। अरे भाई, जिस दिल्ली का मुख्यमंत्री न विधानसभा में उपस्थित होता हो और न ही कार्यालय में, उस दिल्ली का कोई दूसरा क्या भला कर लेगा? यह तो अच्छा है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है, अच्छा है कि यहां काम करने के लिए राजनिवास भी है वरना सिर्फ केजरीवाल के भरोसे तो इसका बेड़ा गर्क तय था…। केजरीवाल फरवरी में सिर्फ एक दिन कार्यालय गए थे और मार्च में नौ दिन। अप्रैल में तो एक दिन भी नहीं गए। हां, मई में 5 दिन पहुंचकर कार्यालय की मेज—कुर्सी पर अहसान जरूर किए लेकिन वे इतने से ही इतना थक गए कि फिर जून में अभी तक एक दिन भी कार्यालय नहीं गए हैं। साढ़े चार महीने में मात्र 15 दिन कार्यालय में उपस्थिति? और विधानसभा में मात्र 10 फीसदी? इतना काम कौन करता है भाई? बताइए न, है किसी प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री में इतनी कुव्वत जो अपनी जनता के लिए इतना काम कर सके?

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धरना, हड़ताल, आंदोलन से पैदा क्रांतिकारी उसी में दफन हो गया…

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने का आज आठवां दिन है। सबसे पहले तो इसे धरना नहीं कह सकते क्योंकि सरकार में कोई कामकाज नहीं हो रहा। यानी, दिल्ली सरकार धरने पर नहीं, बल्कि पूरी तरह से हड़ताल पर है। जैसा कि आज दिल्ली हाई कोर्ट ने भी पूछ ही लिया कि बताइए सरकार, यह धरना है या हड़ताल? एक तरह से कहिए कि बिना डिटरजेंट का इस्तेमाल किए धो डाला। पूछा, क्या यह ट्रेड यूनियन जैसी कोई हड़ताल है? हाई कोर्ट इस मसले पर शुक्रवार को सुनवाई करेगा लेकिन उसके पहले ही अब इस धरना नाम के ड्रामे का अंत समझिए। तय मानिए कि अपने निजी स्वार्थ, सत्ता लोलुपता के लिए गलत वजहों से, गलत तरीके से दिए जा रहे धरने के अंत में केजरीवाल को परिणाम भी कुछ गलत ही हासिल होना है। यूं तो मीडिया, राजनीति से जुड़े व अन्य बुद्धिजीवी कथित धरने की शुरुआत से ही इसका असल मकसद जानते हैं लेकिन कुछ ही दिनों में भोलीभाली जनता भी जान जाएगी। जो थोड़ी छिछालेदर होनी बची है वह तब हो जाएगी जब हाई कोर्ट धरने को अवैध पाते हुए खत्म करने का आदेश देगा या न तो दिल्ली की जनता और न ही एलजी की तरफ से भाव दिए जाने के कारण केजरीवाल को खुद ही धरना समाप्त करना पड़ जाएगा…। धरना, हड़ताल, आंदोलन से जन्मा एक क्रांतिकारी सत्तालोभ के कारण उसी में दफन हो चुका है और शेष रह गया है एक लोभी, चालाक नेता, जिनकी आज देश में कोई कमी नहीं है…।

अरविंद केजरीवाल, जो कि खुद सरकार हैं, उन्हें धरने की क्यों सूझी। अन्य सरकारें कभी धरना क्यों नहीं देतीं? सत्ता हासिल होने से पहले जिन केजरीवाल के पास हर समस्या का समाधान था, सरकार बनने के बाद वे सिर्फ धरने पर क्यों निर्भर हो गए हैं? इतनी जल्दी क्या था कि बस उठे और जाकर राजनिवास में बैठ गए? सरकार होकर भी नियमों का पालन नहीं किया, धरने की अनुमति नहीं ली? आइए, असल कारणों की थोड़ी पड़ताल हो जाए…।

ज्यादा पीछे नहीं, बस 2015 से शुरू करते हैं।
आइए, 2015 के चुनाव में अरविंद केजरीवाल द्वारा प्रस्तुत घोषणापत्र बांच लिया जाए और देख लिया जाए कि तीन साल से अधिक समय गुजर जाने के बाद उन वादों की स्थिति क्या है जिनकी बदौलत रिकॉर्ड जीत मिली थी। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि दिल्ली में अगले विधानसभा चुनाव से भी पहले 2019 में ही लोकसभा चुनाव में इसका जवाब केजरीवाल से जनता मांग सकती है या बिना कुछ कहे प्रतिकूल फैसला भी दे सकती है…।

1. बिजली के दाम आधे करेंगे, 24 घंटे बिजली देंगे।
हालात— बिजली के लिए दिल्ली में मारामारी मची है।

2. दिल्ली में जनलोकपाल बिल पास करेंगे।
हालात— अन्ना हजारे एक बार और अनशन कर चले गए लेकिन केजरीवाल कुछ ही वर्षों की सत्ता में भ्रष्टाचार के कई आरोपों से ऐसे घिरे हैं कि जनलोकपाल उन्हीं पर भारी पड़ सकता है इसलिए वादे पर कोई चर्चा नहीं होती अब दिल्ली में।

3. दिल्ली में महिला सुरक्षा के लिए 10 से 15 लाख CCTV कैमरा लगेंगे।
हालात— कैमरे लगाने की निविदा में भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं। कहा जा रहा है कि इसकी डील विदेशी कंपनी से हो रही है जो दिल्ली पर नजर रख सकती है और आने वाले दिनों के लिए यह खतरनाक स्थिति हो सकती है। यानी, भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई से जन्मे नेता का यह वादा भी भ्रष्टाचार की गिरफ्त में फंस गया और पूरा नहीं हो सका है।

4. पांच साल में हर घर में पानी की सप्लाई देंगे।
हालात— आप यदि यूपी—बिहार के किसी शहर में हैं तो दिल्ली के हालात का अंदाजा भी नहीं लगा सकते। कहा जाता है कि तृतीय विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा लेकिन दिल्ली में तो अभी ही यह स्थिति बन चुकी है कि पानी के लिए पड़ोसी ही पड़ोसी की हत्या कर रहा है। दिल्ली का भूमिगत जलस्तर इतना नीचे चला गया है कि निजी बोरिंग पर रोक है। जल बोर्ड भी कुछ ही पानी दे पाता है। बाकी पानी नदी के माध्यम से हरियाणा से आता है लेकिन हरियाणा सरकार भी उतना पानी नहीं देती, जिससे दिल्ली का काम चल जाए। जो पानी नदी से आता है उसे साफ कर दिल्ली वालों को मुहैया कराया जाता है। यह पानी जल बोर्ड के टैंकरों में भरा जाता है और लोगों तक पहुंचाया जाता है। स्थिति यह है कि पानी के सरकारी टैंकरों पर आप के अधिकतर विधायकों का अघोषित कब्जा हो जाता है। उनके गुर्गे सरकारी पानी भी लोगों को निजी की तरह बेचते हैं। अभी दैनिक जागरण ने कल ही ग्राउंड रिपोर्टिंग की थी जिसमें यह बात सामने आई कि सरकारी टैंकर के पानी को टैंकर माफिया अपने घर में बनी टंकी में भर लेते हैं और फिर अपने निजी टैंकर में उसको भरकर बेचते हैं। इस खुलासे पर कैमरामैन का कैमरा छीन लिया गया और फोटो डिलीट कर दिया गया लेकिन कार्डरीडर की मदद से बाद में वह फोटो मिल गया और आज छपा भी है…। जल बोर्ड के उपाध्यक्ष आप के ही विधायक है, उनके क्षेत्र की यह तस्वीर है, बाकी जगहों का अंदाजा लगाइए। आम लोगों से बात कीजिए तो वे सीधे कहते हैं कि विधायक के गुर्गे पानी बेचते हैं। यह वह सरकार है जो भ्रष्टाचार मिटाने आई थी और अब अपनी ही जनता को पानी बेच रही है, पानी की कालाबाजारी में लिप्त हो गई है। भीषण गर्मी में जब दिल्ली के लोग प्यास से व्याकुल हैं, सरकार एसी कमरे में सोफे पर धरने की नौटंकी में मशगूल है…।

5. दिल्ली में 47 फास्ट ट्रैक खोले जाएंगे, 3 से 6 महीने में दोषियों को सजा दिलाएंगे।
हालात— यह वादा भी अधूरा…।

6. पूरी दिल्ली को वाई—फाई से लैस करेंगे।
हालात — इस वादे की भी हवा निकल गई। तीन साल में भी वादा पूरा नहीं हुआ। बाकियों की तरह जिओ ही दिल्ली वालों का भी सहारा है।

7. सरकारी डॉक्टरों को सुरक्षा देंगे।
हालात— सरकार ही भ्रष्टाचारियों और गुंडे टाइप नेताओं को संरक्षण दे रही है। 19 फ़रवरी की रात में मुख्यमंत्री निवास पर बुलाई गई बैठक में मुख्य सचिव के साथ मंत्रियों और विधायकों ने बदसलूकी की थी। तत्काल आरोपितों पर कार्रवाई करने की बजाय मुख्यमंत्री उनका बचाव करते रहे। आप ट्विटर देख लीजिए या मीडिया के सामने विधायकों की भाषा— वे खुलेआम एलजी से लेकर आइएएस अधिकारियों तक को धमकाते दिख जाते हैं। इस घटना के बाद एक विधायक ने कहा था कि आइएएस को पीटना सही है। आप, आप नेताओं के ट्वीट पढ़िए, मोदी से लेकर एलजी तक के लिए आप के प्रवक्ता संजय व अन्य की भाषा तुम—तड़ाक वाली ही होती है। सरकार अपनी मर्यादा और सीमा दोनों भूल चुकी है या जान—बूझकर लांघ चुकी है…। हालत यह है कि सरकार दूसरों से क्या सुरक्षा देगी, आईएएस अधिकारी तक खुद सरकार से खतरा महसूस करने लग गए हैं…। मतलब, दिल्ली में सरकारी अराजकता फैल चुकी है।

8. 500 नए स्कूल खोले जाएंगे।
हालात— अभी वादे पूरे नहीं हुए लेकिन काफी काम हुए हैं। बचे दो साल में इस वादे के पूरे होने की उम्मीद की जा सकती है।

9. यमुना को साफ और सुंदर बनाएंगे।
हालात— गंदगी बढ़ी ही है…।

10. दिल्ली को व्यापार, शिक्षा और पर्यटन का केंद्र बनाएंगे।
हालात— शिक्षा को छोड़कर व्यापार और पर्यटन के लिए सरकार का कोई काम नहीं दिखता।

11. दिल्ली में रेड और उगाही परंपरा खत्म करेंगे।
हालात— खुद विधायकों पर ही उगाही के आरोप लग रहे हैं।

12. डीटीसी बसों में महिला सुरक्षा के लिए गार्ड होंगे।
हालात— यह वादा भी पूरा नहीं। बसों में कभी घूम लीजिए, पर्स—मोबाइल बचा रह जाए तो खुद को भाग्यशाली समझिए,इज्जत तो अब उससे भी सस्ती है।

 

घोषणापत्र जारी करते समय केजरीवाल ने कहा था कि यह उनकी पार्टी के लिए गीता, कुरान और बाइबल की तरह है…। माने उन्होंने इन सबका अपमान किया है…। केजरीवाल की घोषणाएं और उनकी हकीकत जानने के बाद उनके धरने की वजह खुद ही जान गए होंगे, फिर भी बता देते हैं। खैर, खुद उनके कामकाज भी जान लीजिए। हाई कोर्ट में एक याचिका इस संबंध में भी दायर की गई है। सदन में केजरीवाल की उपस्थिति सिर्फ 10 फीसदी ही है…। जाहिर है, अधूरे वादों, अपनी नाकामियों और दिल्ली में बढ़ रहे सरकारी भ्रष्टाचार से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इस समय जरूरी है कि उसे कोई ऐसा मुद्दा दे दिया जाए जिसपर वह केंद्रित हो जाए और उसे सरकार से सहानुभूति हो जाए, विपक्ष से खुन्नस। बस क्या था? अचानक अरविंद केजरीवाल धरने पर बैठ गए। अब धरने की कुछ वजह तो होनी ही चाहिए तो कह दिया कि आईएएस अफ़सर हड़ताल पर हैं, जिससे दिल्ली सरकार जन कल्याण की योजनाएं लागू नहीं कर पा रही है। उनकी हड़ताल खत्म कराई जाए।

अब आइएएस अधिकारियों की हड़ताल की हकीकत भी समझ लिया जाए, जिसके आधार पर खुद केजरीवाल सरकार 8 दिनों से हड़ताल पर है…। जब लगातार केजरीवाल आइएएस अधिकारियों को अपनी राजनीति में घसीटते रहे तब आखिरकार कल आइएएस सामने आए। उनके धैर्य को समझिए कि उन पर लगातार आरोप लगाए जाने के बाद भी वे चुपचाप काम करते रहे और राजनीति से बचते रहे थे लेकिन जैसा कि यदि सच को सामने न लाया जाए तब तक झूठ ही सच बना रहता है, उन्हें सच सामने लाने के लिए खुद भी सामने आना पड़ा। आइएएस ऑफ़िसर एसोसिएशन ने साफ कहा है कि उसे सरकार के लोगों से ही खतरा है। उनसे सुरक्षा मिलनी चाहिए। 19 फरवरी के पहले भी अफसरों के साथ मंत्रियों और विधायकों की ओर से होने वाली बदतमीज़ी की शिकायत सामने आती थीं लेकिन उस रात सभी हदें पार हो गई थी। घटना से आहत होकर सभी आइएएस हर दिन 5 मिनट का मौन रखते हैं, वह भी लंच ब्रेक में, काम ​बाधित किए बिना। जहां तक मंत्रियों की बैठकों में न जाने का सवाल है तो जहां सुरक्षा के लिहाज से खतरा दिखता है, वहां नहीं जाते। प्रोजेक्ट, प्लानिंग, फाइलों पर जवाब देना और योजनाओं पर काम करने की सभी जिम्मेदारी वह निभा रहे हैं। आइएएस एसोसिएशन के सामने आने के बाद केजरीवाल का झूठ भी सामने आ गया और इसी के साथ उन्हें ट्वीट कर सुरक्षा का आश्वासन देना पड़ा। केजरीवाल का एक यही झूठ नहीं है, वह अपनी नाकामियों को भुलाने के लिए झूठ बोलने में इतना आगे निकल चुके हैं कि लिखित झूठ भी बोलने लगे हैं। कल नीति आयोग की बैठक में एलजी शामिल नहीं हुए लेकिन केजरीवाल ने ट्वीट किया कि एलजी को किसने अधिकार दिया कि वह उनके बदले नीति आयोग की बैठक में शामिल हुए? यह भी समझिए कि नीति आयोग की बैठक में देशभर के सभी मुख्यमंत्री शामिल हुए। सिर्फ त्रिपुरा के मुख्यमंत्री नहीं आए तो उन्होंने भी पहले ही बता दिया था कि बाढ़ की वजह से वह नहीं आ सकते लेकिन केजरीवाल दिल्ली में होते हुए भी बैठक में नहीं गए।

बात समझिए, आइएएस अधिकारी अपना काम कर रहे हैं, एलजी के आॅफिस में केजरीवाल बैठ गए हैं तो वह अपने आवास से काम कर रहे हैं लेकिन सबके काम न करने का झूठा आरोप लगाकर केजरीवाल खुद एसी वाले कमरे में सोफे पर बैठकर आठ दिनों से आराम फरमा रहे हैं…। भला आराम करने का यह भी कोई तरीका है? काम से थक गए थे तो बकायदा राहुल गांधी की तरह छुट्टी पर जा सकते थे, इस तरह हड़ताल करने की क्या जरूरत है?

स्पष्ट हो चुका है कि केजरीवाल का धरना दिल्ली के लिए नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए है। यह सच मीडिया और केंद्र से लेकर सभी को शुरू से ही पता है, अब जल्द ही हर आदमी समझ जाएगा। चूंकि केजरीवाल का धरना गलत वजहों से है और उसका तरीका भी, इसलिए न तो सरकार के धरने पर होने पर केंद्र ने भाव दिया, न एलजी ने जबकि कोई आम आदमी भी धरना पर बैठे तो बड़ी बात हुआ करती है, बशर्ते कि उसकी वजह वैसी हो। दिल्ली वालों की सहानुभूति बटोरने के लिए किए गए केजरीवाल के धरना—ड्रामा की हालत यह हो गई है कि अब इसके पात्र भी वे खुद हैं और दर्शक भी। अब यह उनपर है कि सीरियल को एकता कपूर की तरह खींचना चाहते हैं या बची—खुची इज्जत बचाने के लिए जल्दी सिमट देना। केजरीवाल के लिए यह ऐसा निवाला बन गया है, जिसे न निगलते बन रहा है, न उगलते। वह बुरी तरह फंस गए हैं। यदि वह धरना तोड़ देते हैं तो खुद ही उजागर हो जाएंगे और यदि धरना जारी रखते हैं तो दिल्लीवालों का गुस्सा मोल लेंगे, यह गुस्सा हर दिन के साथ बढ़ता जा रहा है…। अब दिल्ली हाई कोर्ट में यह मामला चले जाने के बाद तो वह यह भी नहीं समझ पा रहे कि सांस कहां से लें और…।

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देश के प्रधान सेवक को देश के मामूली सेवक का पत्र…

प्रधानमंत्रीजी,
नमस्कार।

आज हमें आपसे मन की बात कहने का मन है, बल्कि मन बड़ा उद्वेलित है इसलिए कहना पड़ रहा है। माननीय प्रधानमंत्रीजी, जब आप किसी मंच से सवा सौ करोड़ देशवासियों कहकर संबोधित कर रहे होते हैं तब उसमें एक हम भी संबोधित हो रहे होते हैं, आपको बड़े गौर से सुन रहे होते हैं। बस थोड़ा समय दीजिए और हमें भी गौर से सुन लीजिए। जी, प्रधानमंत्रीजी, हम देश की जनता बोल रहे हैं। सुन लीजिए!

आज आपकी सरकार के एक आदेश ने हमें आपकी सोच के बारे में सोचने पर विवश कर दिया है। आपकी सरकार ने आदेश दिया है कि रमजान शुरू होने से लेकर अगस्त में अमरनाथ यात्रा संपन्न होने तक आतंकियों के खिलाफ संघर्ष अभियान नहीं चलेगा। प्रधानमंत्रीजी, क्या यह निर्णय सही है? क्या यह आदेश देशहित में है? अक्सर मन की बात करने वाले प्रधानमंत्रीजी, मन को साफ कर बताइए, अक्सर चुनावी सभाओं में झूठ बोलने वाले प्रधानमंत्रीजी, बिल्कुल सच बताइए कि यह आदेश क्या वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित नहीं है? क्या यह निर्णय कश्मीर में रोज देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले जवानों की शहादत का अपमान नहीं है? क्या यह एकतरफा संघर्ष विराम देश की सुरक्षा के लिए लड़ रहे सैनिकों को मौत के मुंह में धकेलने जैसा नहीं है जबकि किसी भी आतंकी संगठन ने हथियार डालने की घोषणा नहीं की है; उल्टे लश्कर—ए—ताइबा ने डराया ही है?

प्रधानमंत्रीजी, जवानों को निर्देश है कि वे रमजान के महीने में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन नहीं चलाएंगे। माने क्या करेंगे? आतंकी जब गोलियां चलाएंगे; तब वंदेमातरम कहते हुए शहीद हो जाएंगे क्योंकि आपके लिए उनकी जान से अधिक 2019 में होने वाले चुनाव की फिक्र है? सच बताइए। 56 इंच का सीना है आपका लेकिन उस सीने में दिल—विल तो है ना? धड़कता तो है ना? ​य​ह निर्णय दिल से ही किया है ना? या सत्ता का धूर्त दिमाग, देशप्रेम वाले दिल पर हावी हो गया है? सच बताइए…।

प्रधानमंत्रीजी, अक्सर चर्चा होती है कि आतंक का तो कोई धर्म नहीं होता और यकीनन नहीं होता है क्योंकि हमारी परंपरा है कि हम धर्म को महज किसी मजहब का नाम नहीं समझते हैं; हम धर्म को सत्य का पर्याय समझते हैं और अधर्म को झूठ का, गलत का। इस तरह भारतीय संस्कृति इस बात को सुनिश्चित करती है कि जो गलत है, वह धर्मविरूद्ध है; जो सही है, सिर्फ वही धर्म है। प्रधानमंत्रीजी, धर्म और आतंक का अर्थ स्पष्ट होने के बाद भी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उसमें शामिल आप तक के इस निर्णय को हम किस रूप में देखें कि रमजान में आतंकियों के खिलाफ अभियान नहीं चलेगा?

नरेंद्र दामोदारदास मोदीजी, आप अक्सर अपनी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र किया करते हैं फिर तो उनके समय की बातें भी याद होंगी आपको, या भूल गए? इस बात की क्या गारंटी है कि सेना चुप बैठ जाएगी तो आतंकी भी हथियार रखकर रमजान में नमाज पढ़ने बैठ जाएंगे जोकि मंदिरों के साथ मस्जिदों में भी बम विस्फोट करते समय नहीं सोचते? याद कीजिए 18 साल पहले की घटना। 2000 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और उन्होंने आतंकियों के विरूद्ध लड़ाकू अभियानों की शुरुआत नहीं करने की घोषणा कर दी थी। उस घोषणा के चार महीनों के दौरान आतंकियों ने श्रीनगर एयरपोर्ट पर बड़ा हमला किया था। लश्कर—ए—ताइबा के छह आतंकियों के हमले में दो जवान और दो नागरिक मारे गए थे और घाटी में सक्रिय सभी आतंकी गुटों ने सरकार के प्रस्ताव को ठुकराया दिया था। आतंकी कश्मीर में खुलेआम घूम रहे थे…। आप बताइए, इस बात की क्या गारंटी है कि हालात फिर से नहीं दोहराए जाएंगे? माननीय, संघर्ष विराम का यह निर्णय लेते समय आपने चाहे अपना सीना 56 इंच से भी अधिक फुलाने की कोशिश की हो लेकिन इसे आपकी बुजदिली ही मानी जाएगी, बहादुरी नहीं। आप बताइए ना कि आतंक के सामने हथियार डाल दिए जाने के आपके निर्णय को किस रूप में देखें जबकि पिछले साल रमजान के दौरान करीब 80 फीसदी हिंसा की घटनाएं हुई थीं और ज्यादातर मुठभेड़ स्थलों पर आतंकियों के बचाव के लिए मुस्लिम नागरिकों को ढाल बनते देखा गया था। आठ अमरनाथ यात्रियों की मौत भी भूल गए क्या? यदि याद है तो फिर अमरनाथ यात्रा यह एकतरफा संघर्ष विराम क्यों?

प्रधानमंत्रीजी, आप देश में इस समय हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे हैं। कुछ लोग तो आपको हिंदू हृदय सम्राट भी कहते हैं तो बताइए ना कि क्या हिंदुओं के हृदय का सम्राट ऐसा होता है? इस देश में जब महज आरोप लगने पर मन्दिरों में घुसकर, पूजा से उठाकर, घरों में जाकर, सोते से जगाकर भी कई हिन्दू सन्तों को गिरफ्तार करने में पुलिस नहीं हिचकी है जबकि उनमें से कई बाद में बेगुनाह भी साबित हुए, ऐसे में आतंकियों के खिलाफ उनका धर्म देखकर कार्रवाई रोक देना क्या सही है? यह निर्णय आप हिंदू बनकर किए हैं? या सरकार बनकर? सही बताइए, हमें तो यह दोनों में से किसी का नहीं, सिर्फ एक मौकापरस्त नेता का निर्णय लग रहा है। क्या आपने हिंदुओं को खुश करने के लिए भी कभी कोई ऐसा आदेश दिया कि नवरात्र तक किसी अपराधी की गिरफ्तारी नहीं होगी? फिर, हिंदू सम्राट का मुस्लिम प्रेम का यह ढोंग क्यों? सच बताइए, 2019 का चुनाव नजदीक है इसलिए ना!

प्रधानमंत्रीजी, संविधान में धर्मनिरपेक्ष देश है अपना। सभी धर्मों के पर्व—त्योहारों पर उस धर्म के लोगों का विशेष ख्याल किया जाना चाहिए। निश्चित ही, सरकार को ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि रमजान में न किसी मुसलमान को दिक्कत हो, न नवरात्र में किसी हिंदू को लेकिन सवाल यह है कि आप कश्मीर के आतंकियों को आतंकी की जगह, मुस्लिम के रूप में क्यों देख रहे हैं? प्रधानमंत्रीजी, जो आतंकी होगा वह क्या रमजान के महीने में अल्हा का नेक बन्दा हो जाएगा? वह जो आतंक को ही धर्म मान चुका है, उसके प्रति यह प्रेम क्यों? माननीय, आपके इस निर्णय से एक तरफ तो देश में यह संदेश जा रहा है कि मुस्लिम आतंकी होते हैं तो दूसरी तरफ यह भी कि मौके जब चुनाव के हों तो आप जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई भी दांव चल सकते हैं, भले ही वह देशविरूद्ध हो। आप बताइए ना, जो सरेआम बच्चों पर पत्थर बरसाते हैं, तीर्थयात्रियों को मौत के घाट उतार रहे हैं, जिनके हाथ असंख्य कश्मीरी पंडितों के खून से रंगे हैं, जो हर धर्म वालों को मिटाकर सिर्फ अपना कथित जिहाद जिंदा रखना चाहते हैं, वे आपको रमजान पर नमाज पढ़ने वाले लगते हैं क्या? वे आपको पत्थरबाज, आतंकी नहीं, बल्कि मुस्लिम दिखते हैं क्या? वे जब किसी निर्दोष नागरिक या देश की सुरक्षा में लगे कर्तव्यनिष्ठ जवान को मारने के बाद यदि हथियार रखकर नमाज भी पढ़ रहे होंगे, तब क्या कश्मीर कल्याण- देश कल्याण की दुआ मांग रहे होंगे? बिल्कुल नहीं! वे आतंक कायम रहे की बात ही दोहरा रहे होंगे… ।

प्रधानमंत्रीजी, हम देश के नागरिक हैं, देश के सेवक हैं लेकिन आप तो प्रधानसेवक हैं फिर आपकी सेवकाई में इतना दोष क्यों? आप तो सरकार हैं, आपके पास आतंक के सबसे पुष्ट आंकड़े हैं, फिर सुरक्षा से समझौता क्यों? आतंकवादियों के प्रति यह दरियादिली क्यों? 1990 में जबसे कश्मीर में आतंक का दौर शुरू हुआ, तब से अब तक 13978 नागरिकों की आतंकी हमलों में जान जा चुकी है। यह जानकारी आपही की सरकार ने हालही में एक आरटीआई कार्यकर्ता रोहित चौधरी को दी है। इसमें गृह मंत्रालय ने माना है कि आतंकी हमलों में 5123 सुरक्षाकर्मियों की जान भी गई है। प्रधानमंत्रीजी, यकीन नहीं होता कि आप महज सत्ता के लालच में 5123 जवानों की जान का इस तरह सौदा करेंगे…। विनती है कि कृपया वोट के लिए देश का सौदागर बनने से बचिए।

प्रधानमंत्रीजी, 2014 के लोकसभा चुनाव के समय आपकी कई रैलियों में हमने आपको सुना था। तब हम छपरा में थे। हमें याद है कि कांग्रेस की सरकार थी और जवानों की हत्या के बाद आतंकी उनके सिर काट ले गए थे। छपरा स्थित एयरपोर्ट के मैदान पर आप गरज रहे थे कि यदि मेरी सरकार आई तो किसी जवान का सिर काटना तो दूर, उसकी तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देख सकेगा। सच बता रहे हैं, आपका भाषण सुनकर मेरे अंदर देशप्रेम का रक्त प्रवाह अचानक बढ़ गया था। देशप्रेम रगों में तेजी से दौड़ने लगा था। जवानों के साथ हुई उस नाइंसाफी और उसके बाद मौन—मनमोहन सरकार पर हमें भी बहुत गुस्सा आया था और तब हमने मन ही मन तय किया कि आपको जरूर वोट देंगे। देश में ऐसी मजबूत सरकार लाएंगे जो आतंक का नामोनिशान मिटा दे और देश के अंदर हम नागरिक ही नहीं, सीमा पर हमारे जवान भी सुरक्षित रहें। यूपी से होने और बिहार में होने के कारण हम वहां के वोटर नहीं थे। सिर्फ आपको वोट देने के लिए हमने अपनी पत्रकारिता की तमाम पैरवियां लगा दीं, अपने तमाम परिचितों से आग्रह किया और वोटरलिस्ट में नाम जुड़वाए। हमने वोट किया लेकिन आज आपने उसी भावना पर चोट किया। आज हम आहत हैं कि ये हमने किसे चुन लिया? अखिल भारत में सिर्फ भाजपा का परचम लहराने वाले एक प्रचारक को? सरकार बनाने के लिए चुनावी सभाओं में झूठ बोलने वाले को? हम जैसे राष्ट्रप्रेमी नागरिकों को भरमाने के लिए सभाओं में 56 इंच सीना फुलाने वाले को और देश की तमाम समस्याओं के मोर्चों पर सीना सिकुड़ा लेने वाले को? कश्मीर में पंडितों को बसाने का वादा कर, रोहिंग्याओं को बसाने वाले को? आतंक को धर्म समझने वाले को? या सत्ता को ही अपना सर्वस्व समझने वाले को?

प्रधानमंत्रीजी, आपने आतंक पर मनमोहन के मौन से हमें डराया था और हमारा वोट पाया था लेकिन अभी आप क्या कर रहे हैं? आपके शासनकाल में बीते तीन वर्षों में जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की 4,799 घटनाएं हुईं जिनमें दो सुरक्षाकर्मियों की मौत भी हो गई। गौर कीजिए कि आपकी सरकार ने ही राज्यसभा में यह आंकड़ा दिया था। लिखित सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने कहा था कि 2015 में पत्थरबाजी की 730, 2016 में 2,808 और 2017 में 1,261 घटनाएं दर्ज की गई हैं। बताइए ना, यह कब थमेगा? और यह भी बताइए ना कि आप इन घटनाओं पर मौन क्यों हैं? जबकि बाकी सभी मुद्दों पर बोलते हैं? यह भी बताइए कि इसके लिए कौन दोषी है, क्योंकि देश की सारी समस्याओं के लिए आप बताते हैं कि कौन दोषी है…।

प्रधानमंत्रीजी, कहां तो आतंक मिटाने का वादा था और कहां आप उससे ही गठजोड़ कर बैठे। आपके होते हुए जम्मू कश्मीर सरकार ने पत्थरबाजी के 9,730 मामले वापस ले लिए और आप देखते रहे? प्रधानमंत्रीजी, यह मेरे आंकड़े नहीं हैं, यह जानकारी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा में दी थी और वह भी लिखित में। दो साल में पत्थरबाजी की छोटी घटनाओं में शामिल 4000 से ज्यादा लोगों के लिए माफी की सिफारिश की गई है। पत्थरबाजों और उनके परिवार की सुरक्षा के लिए पहली बार आरोपियों की पहचान उजागर नहीं की गई है। यह क्या है? पत्थरबाजों और उनके परिवार की सुरक्षा? अरे, वादा तो नागरिकों की सुरक्षा का था ना! सच बताइए, पत्थरबाजों से लेकर आतंकियों तक पर आपका दिल कब आया? अब तो आपकी सरकार को पत्थरबाजों पर पैलेट गन से वार करना भी अच्छा नहीं लगता, क्यों सच है ना? सुना है कि पैलेट गन नहीं, अब पत्थरबाजों पर घाव नहीं करने वाली प्लास्टिक की बुलेट चलाई जाएंगी? सवा सौ करोड़ नागरिकों की समस्याओं, उनके दर्द से जो आहत नहीं हैं, उनके दिल में पत्थरबाजों के लिए इतना दर्द क्यों है? बताइए ना!

प्रधानमंत्रीजी, वादा तो यही था ना कि यदि एक जवान भी मरा तो आप दस मारेंगे? और हकीकत क्या है? साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल तो आप जान ही रहे हैं ना! पंजाब के पूर्व जांबाज पुलिस अफसर केपीएस गिल ने इसे शुरू किया था। पोर्टल की रिपोर्ट साफ कह रही है कि सुरक्षा बलों की जम्मू कश्मीर में और नियंत्रण रेखा, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शहादत बढ़ रही है। आपका केन्द्रीय गृहमंत्रालय तो इतना घबराता है कि शहादत का आंकड़ा ही नहीं बताता। मंत्रालय की रिपोर्ट में 2011-13 के दौरान 239 और 2014-2017 के दौरान 368 आतंकियों के मारने का दावा है लेकिन सुरक्षा बलों की शहादत की संख्या का आंकड़ा नहीं है। हां, साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल पर इसके भी आंकड़े हैं। इसकी रिपोर्ट में साफ है कि पहले एक सुरक्षा बल का जवान शहीद होता था तो तीन आतंकी मारे जाते थे और अब एक जवान की शहादत पर दो आतंकी मारे जा रहे हैं। आम नागरिकों के मारे जाने का अनुपात करीब-करीब जस का तस है। पिछले साल 28 मई तक 25 नागरिक जम्मू-कश्मीर में हिंसा-आतंकवाद की भेंट चढ़े, 25 जवान शहीद हुए और आतंकी मारे गए 60। यानी दो आतंकियों को मारने के लिए एक जवान को मरना पड़ रहा है…। क्या खाक आप जवानों की चिंता कर रहे हैं?

प्रधानमंत्रीजी, हम ढूंढ रहे हैं, उस शख्स को जो 2014 के चुनाव के समय दिखा था। हमें बताइए कि चुनाव के दौरान आतंक के खिलाफ गरजने वाला वह शेर बचा भी है या मर गया? और इन चार वर्षों के बीच की वह तारीख भी बताइए, जब सत्ता के लिए आतंक से समझौता करने वाला यह बुजदिल पैदा हुआ? प्रधानमंत्री जी, किसी निर्दोष व्यक्ति को धर्म के आधार पर निशाना बनाना जितना गलत है, उतना ही गलत है उसके धर्म को देखकर उसके अपराध, आतंक को शह देना। इस तरह धर्म, जाति के आधार पर किसी का आतंक, अपराध बर्दास्त करने का चलन चल पड़ा तो हर राज्य में कश्मीर जैसे हालात होंगे। आग्रह है कि यह आदेश तत्काल रदद् कीजिए। आतंक मिटाने का अपना वादा पूरा कीजिए, नहीं तो चूड़िया ही पहन लीजिए; ताकि जब शहीदों की विधवाएं अपनी चूड़ियां तोड़ रही होंगी तब आप अपनी चूड़ियां खनकाते रहिएगा…।
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अम्मा…

सभी माताओं को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। मेरी अम्मा को छोड़कर, क्योंकि अम्मा फेसबुक पर नहीं हैं। हां, उनकी नजर हर उस जगह है, जहां उनके बेटे की पहुंच है। यहां भी यदि हमने कुछ गलत लिखा तो वह जरूर भाई—बहन के माध्यम से उन तक पहुंच जाएगा और उसके बाद कोई तूफान आने जैसी चेतावनी मौसम विभाग की तरह जारी कर देंगी।
मेरी अम्मा देश की अधिकतर महिलाओं की तरह एक साधारण महिला और अधिकतर मांओं की तरह असाधारण मां हैं। वह फेसबुक पर नहीं हैं लेकिन वह तकनीकी रूप से दक्ष नहीं हैं, ऐसा भी नहीं हैं। दरअसल, वह होना नहीं चाहतीं। वह ऐसी मां हैं, जो वह सबकुछ सीख सकती हैं जो उनके बेटे के लिए हो; अपने लिए बस एक ऐसा बेटा रखती हैं जिसपर वे गर्व न कर सकें तो लज्जा भी न आए। इस फेसबुक पर जहां नहीं होने पर आजकल लोग किसी को गंवार भी समझ जाते हैं, यहां यदि हम एक शब्द भी लिख पाते हैं तो उसे सिखाने की शुरुआत अम्मा ने ही की थी; यह हम कैसे भूल सकते हैं? अम्मा निश्चित ही मातृ दिवस जैसे आयोजनों को नहीं समझतीं क्योंकि यह उनके समझने के लिए हैं भी नहीं, यह हमारे लिए हैं। उनके समझने के लिए जो कुछ भी है, वह— वह सबकुछ समझती हैं। अम्मा से आज भी बात हुई लेकिन मातृभाषा— भोजपुरी में ही। वैसी ही बातचीत जैसी अन्य दिनों होती है। ‘अम्मा गोड़ लागsतानी’ से शुरुआत और ‘अच्छा प्रणाम’ कहने के बाद ‘खूब खुश रहs’ सुनकर समाप्त। इस तरह की बातचीत में हैप्पी मदर्स डे या मातृदिवस की शुभकामनाएं कहना ऐसा लगता है जैसे मां—बेटे की बातचीत में कहीं कोई और आ टपका हो, ऐसा जैसे ये शब्द कहीं से जबरदस्ती घुसेड़ दिए गए हों। इसलिए हम मातृदिवस कीअम्मा को शुभकामनाएं नहीं देते। हां, यदि माँ पर लिखने बैठें तो हजारों पन्ने लिख सकते हैं और उसके केंद्र में निश्चित वही अम्मा होंगी। वह हमें एक—एक शब्द के लिए प्रेरणा दे रही होंगी।
आज कई आधुनिक मम्मियों ने पोस्ट किए हैं। उनमें अपने ममत्व से अधिक श्रेष्ठता साबित करने की होड़ है और वह भी किससे? मां से ही। आज की कुछ नई मम्मियों ने कल की अम्माओं से खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश की है जबकि वह खुद उन्हीं जैसी की संतान हैं। यह बहुत बुरा लगा हमें क्योंकि एक मां की दूसरी मां से कभी तुलना नहीं हो सकती है। हां, एक दौर से दूसरे दौर की तुलना जरूर की जा सकती है। और यदि उस दौर से आज के दौर की तुलना की जाए तो निश्चित मानो की तब की अम्मा ने आज की मम्मी से हजार गुना अधिक संघर्ष किया है। इसलिए कि तब हर मोड़ पर लड़ना होता था, आज आपके पास लड़ने के लिए अतिरिक्त में आपका करियर और आपकी अपनी चाहतें हैं। बेटे को कहीं और छोड़कर जॉब पर चली जाने वाली यदि आप महान हैं, तो आपको पालने के लिए कभी कोई नौकरी न करने वाली मां क्या गंवार है? फेसबुक, पढ़ाई, करियर, पद, वेतन इनमें से एक भी अच्छी माँ होने की अहर्ता नहीं है, मां के लिए ममता होना चाहिए, संतान के लिए त्याग होना चाहिए, उसके लालन पालन में आ रही कठिनाइयों का सामना करने का साहस होना चाहिए और इनमें से कोई भी तब की अम्मा में आज की मम्मी से कम नहीं था। चाहों तो जिंदगी को रिवर्स गियर में लगाओ और बचपन में जाकर उस दौर को, तब के संघर्षों को, तब की अम्मा को एक नजर देख लो। इसी बहाने अपना बचपन भी दिख जाएगा और अम्मा भी।
अम्मा! 10वीं तक पढ़ी मेरी अम्मा ने हमें उतना पढ़ाया है, जितनी आज की कई माएं न पढ़ा सकें। अम्मा ने मुझे सिलेबस की किताबें ही नहीं पढ़ाई हैं, अपने साथ बैठाकर राम—राम भी लिखवाया है। मुझे धर्म ग्रंथ पढ़ाए हैं। और ढ़ेर सारी कहानियां सुनाई हैं… अनगिनत। जिंदगी देने के साथ ही जीना भी सिखाया। जिंदगी में संघर्ष करना, चुनौतियों से लड़ना भी सिखाया। अम्मा ने हमें सिर्फ पालने में झुलाकर बड़ा नहीं किया है, अपने साथ अपने संघर्षों में भी शामिल किया है और इसलिए हम काफी नजदीक से जानते हैं कि अम्मा होना, मम्मी होना एक ही है लेकिन अम्मा होना, मम्मी से अधिक नहीं होना तो कम होना भी नहीं है। तब घरों में भोजन ही नहीं बनाना होता, भोजन के योग्य खाद्य पदार्थ खुद ही तैयार करने होते थे। अम्मा ने अपने साथ ‘ढेकुली’ से धान कुटवाए हैं। दाल दरने के लिए ‘जात’ चलवाए हैं। चटनी पीसने के लिए ‘सिलवट’ पर ‘लोढ़ा’ भी चलवाया है। ‘चूल्हा’ बनवाया और लिपवाया भी है, उसके लिए हम खेतों से मिट्टी लाए हैं, जिसकी सुगंध आज तक है…। उन्होंने नौकरी नहीं की है, मगर इतने तरह के महीन और मेहनत वाले कार्य आप कर पाएंगे?
अब घरों में मां-बेटे के तौलिए भी अलग हैं। हम बड़े होने के ​काफी बाद तक कहीं से खेलकर, थककर आने पर तौलिए की जगह मां के आंचल से ही पसीने पोंछते रहे हैं। कई बार तो अब भी। और स्तनपान? अभी एक रिपोर्ट आई है कि भारत की मम्मियां स्तनपान में तीसरे नंबर पर हैं। आपको पता है ? हम वर्षों तक भारत की इस मां के सीने से ही लगकर सोते और जगते रहे हैं। स्तनपान के बाद बछड़ों की तरह सिंग मारते रहे हैं और वह बस मुस्कुराती रही हैं…! हां, अपने पुत्रों के लिए आज भी बहुत कुछ करती हैं मम्मियां लेकिन हम यह भी देख रहे हैं कि उतना बर्दास्त कभी नहीं कर पाएंगी आज की माएं कि खुद भूखी हों, घर में अन्न का दाना न हो तब भी उनका लाडला भूखा न सो पाए।
हां, आज की मम्मी की तरह अम्मा मेरी फ्रेंड नहीं हैं, वह आज भी कल वाली मेरी अम्मा ही हैं जो गलत फ्रेंडशिप से दूर रहने की नसीहत देती हैं और अच्छे दोस्तों के साथ समय बिताने पर मना नहीं करतीं। इस बेटे ने काफी फ्रेंड बनाए हैं लेकिन अपनी अम्मा को अम्मा ही रहने दिया है। इसके बाद भी अम्मा के साथ औपचारिकताएं नहीं निभाते, न हमें आती हैं इसलिए न तो आज हमने विश किया और न ही यदि करते तो वह सुनकर थैंक्यू बोलतीं। वह बह हंस देतीं जैसा कि वह सिर्फ मेरी कॉल चले जाने पर या मुझे देख लेने पर भी करती हैं। मेरा खुश होना ही उनके लिए अशेष शुभकामनाएं हैं और मेरा चिंतित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा अशुभ।
और हां, मेरी अम्मा। आज की कुछ मम्मियों के पोस्ट यह भी हैं कि तब कि माएं कुछ बच्चों को सिखाती नहीं थीं…। आज वे अपने बच्चों को सबकुछ सिखा रही हैं— गुड टच—बैड टच भी। जी, यह बिल्कुल आसान है! खुद टीवी देखते हुए कहना कि बेटा टीवी नहीं देखना चाहिए। यह आसान है मोबाइल चलाते हुए कहना कि इससे आंख खराब हो जाएगी। बड़ा आसान है बच्चे को गुड टच, बैड टच बताना…। लेकिन बहुत मुश्किल है बच्चे के लिए इन सबसे खुद को दूर कर पाना, इन सबका त्याग कर पाना। बड़ा आसान है ‘लेक्चर’ से बताना; बड़ा कठिन है ‘प्रैक्टिकल’ कर दिखाना। तब की अम्मा ने कभी थ्योरी नहीं पढ़ाई, सच है कि हमें कहकर नहीं सिखाया क्योंकि उन्हें उसे करके बताया और बच्चे नकल बड़ी तेजी से करते हैं; हमने किया और हम सीखते गए।
यह सच है लेकिन उसके आगे भी एक सच है। अम्मा हमेशा अपने आचरण से बताती रहीं कि माएं पुत्रों के लिए क्या करती हैं, पत्नियां पतियों के लिए क्या करती हैं, बहुएं परिवार के लिए क्या करती हैं, स्त्रियां समाज के लिए क्या करती हैं, बहने भाई के लिए क्या करती हैं? और जिस नारी का जीवन ही त्याग की प्रतिमूर्ति हो, उसके लिए हमारा आचरण कैसा हो— यह बताने की भी जरूरत है क्या? हमने जो भी सीखा है, अपनी अम्मा और पापाजी से ही सीखा है और यह भी जान लीजिए कि दोनों ने ही हमें कुछ कहकर कभी नहीं सिखाया है; हमने सबकुछ उन्हें देखकर सीखा है। गुरुजी के आने पर दोनों ही झुक जाते, हम भी झुक जाते। ईश्वर के सामने दोनो ही झुक जाते, हम भी झुक जाते। दोनों हमें पढ़ने भेजते, हम चले जाते। हां, खेलने से मना करते तब भी चले जाते और देर से आने पर थप्पड़ पाते, रोने लग जाते और खुद ही मान भी जाते। अम्मा और पापाजी ने प्यार और कुटाई में पूरा बैलेंस रखा। बस हमने जान लिया कि गलत करो तो कुटाई होती है, सही करो तो तारीफ होती है। सही करने पर धर्म होता है, गलत करने पर पाप होता है और पाप नहीं करना चाहिए।
युग बदला है, नारियां बदली हैं, पुरुष बदले हैं, उनके चरित्र बदले हैं… लेकिन अम्मा और मेरा रिश्ता ठहरा हुआ है उसी बचपन में… जहां अम्मा की अंगुलियां छोड़ी थी; उससे एक पग भी हम आगे न बढ़े हैं। वक्त का साहस नहीं कि वह मुझे मेरे बचपन से निकाल पाए, अम्मा के आंचल से दूर कर पाए इसलिए सबकुछ बदल गया है लेकिन अम्मा वही हैं, हम भी वही हैं, हमारी बातचीत की भाषा वही है, पुट वही है… कुछ न बदला। आज फिर अम्मा के आंचल में बेटा सिमट गया है, यह वक्त वहीं जाकर ठहर गया है…।

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अमोघ ‘झूठास्त्र’ की निंदा न कीजिए, प्रधानमंत्री की इस कला को नमस्कार कीजिए!

कर्नाटक में चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि “महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में एक के बाद एक चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस उतनी चिंतित नहीं थी जितनी अब है क्योंकि हार उसे नजर आ रही है. मैं आपको बताऊं क्यों… क्योंकि कर्नाटक में उनके मंत्रियों एवं नेताओं ने यहां एक टैंक बनाया है. लोगों से लूटे गये धन का एक हिस्सा घर ले जाया जाता है जबकि बाकी उस टैंक में डाल दिया जाता है. टैंक पाइपलाइन के मार्फत दिल्ली से जुड़ा है, जो धन सीधे दिल्ली पहुंचाती है….”
यह देश के प्रधानमंत्री का भाषण है। वह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार का ऐसा आरोप लगा रहे हैं, जिसका कोई सबूत उनके पास नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने चैलेंज भी किया है कि यदि प्रधानमंत्री के पास सबूत है तो देश के सामने सार्वजनिक कर दें लेकिन कोई सबूत नहीं है तो सार्वजनिक क्या करेंगे? झूठ के भी भला कोई सबूत होते हैं? यदि प्रधानमंत्री के इस आरोप का कोई सबूत होता तो मोदी सरकार सीबीआई, आईटी से लेकर तमाम केंद्रीय एजेंसियों को इस काम में लगा चुकी होती और अब तक कर्नाटक सरकार के कई नेता जेल में होते। अब तक भाजपा की आईटी टीम इन सबूतों को कर्नाटक ही नहीं देश के कोने—कोने में फैला चुकी होती और कर्नाटक चुनाव कांग्रेस बिना लड़े ही हार चुकी होती। लेकिन, चूंकि ऐसा नहीं है इसलिए प्रधानमंत्री कुछ नहीं कर पा रहे। वे सिर्फ बोल रहे हैं। करिअप्पा-थिमैय्या प्रकरण के बाद वे एक बार फिर झूठ बोल रहे हैं…। सवाल है कि प्रधानमंत्री आजकल झूठ क्यों बोल रहे हैं? दरअसल, प्रधानमंत्री मजबूर हैं। इसलिए उनके अमोघ अस्त्र ‘झूठास्त्र’ के प्रयोग किए जाने पर उनकी नींदा न कीजिए, बल्कि उनकी इस खूबी के लिए उन्हें नमस्कार कीजिए।
प्रधानमंत्री को पता है कि कर्नाटक चुनाव जीतने के लिए न तो उनके पास विपक्ष के खिलाफ कुछ ठोस मसाला है और न ही अपना बखान करने के लिए अपनी कुछ खास उपलब्धियां इसलिए वे करें भी तो क्या? भाजपा ने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को छोड़ दिया है और उसे बचाने की सारी जिम्मेदारी अकेले प्रधानमंत्री पर। ऐसे में प्रधानमंत्री को इस चुनाव में भी आजमाना ही पड़ा है अपना अमोघ अस्त्र— झूठ। वह झूठ जो प्रधानमंत्री के मुंह से सुनते समय जनता को बिल्कुल सच लगता है। वैसे भी, भला कोई सोच सकता है कि देश का प्रधानमंत्री भी झूठ बोल सकता है? यदि किसी को संशय भी हो तो उसे दूर कैसे करे? और चुनावी सभाओं में उमड़ी एक—दो लाख की भीड़ में से यदि दो—चार लोगों ने यह प्रयास किया, सच जान भी गए तो क्या? अधिकतर भीड़ तो झूठ पर ही फिदा होगी ना? और हो भी क्यों न! अपने प्रधानमंत्री के झूठ बोलने का अंदाज ही कुछ ऐसा है कि कोई भी फिदा हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी किसी भी झूठ को इस खूबी के साथ बोलते हैं कि संदेह की गुंजाइश ही न बचे। वह इतना जोर देकर कोई बात कहते हैं कि सच जानने वाले को खुद पर ही संदेह हो जाए कि कहीं उसे ही तो गलत पता नहीं था! झूठ को सच में बदल देने की इतनी बड़ी खूबी होने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की यह भलमनसाहत ही कही जाएगी कि इस खूबी पर उनको जरा भी घमंड नहीं है। यकीन मानिए, प्रधानमंत्री झूठ बोलना बिल्कुल नहीं चाहते लेकिन वे जानते हैं कि सच बोलना उनके ही खिलाफ जाएगा, इसलिए झूठ बोलने के लिए मजबूर हैं। चार साल पहले जनता से किए उनके सारे वादे हवा हो गए हैं। नोटबंदी और जीएसटी, जिसे वे उपलब्धियां बताते थे, वही सबसे अधिक फेल साबित हुईं। ऐसे में वे बोलें क्या?
कर्नाटक चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार से लेकर तमाम प्रत्याशियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। बीजेपी ने उम्मीदवारों की जो दो सूची जारी की है, उनमें 24 ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले हैं। कई ऐसे भी हैं जो जेल तक जा चुके हैं। कट्टा सुब्रमण्यनायडू और कृष्णा शेट्टी तो भूमि घोटाले में जेल जा चुके हैं। माइनिंग माफिया जी सोमशेखर रेड्डी, जिसे बेल्लारी सिटी विधानसभा सीट से बीजेपी ने टिकट दिया है, उसे जमानत दिलाने के लिए जज को रिश्वत देने के आरोप में उसका छोटा भाई जेल गया था। अब बताइए, प्रधानमंत्री किस मुंह से कहें कि कांग्रेस ने या किसी और दल ने आपराधिक छवि के लोगों को टिकट दे दिया है? जब खुद उनकी पार्टी आपराधिक छवि वालों के साथ कर्नाटक चुनाव जीतने उतरी है? अब वे किस तरह यह सच बोलें? अपना ही कुकृत्य कैसे बोलें? इसलिए झूठ बोलना पड़ रहा है।
हां, वे चुनावी सभाओं में यह बोल सकते हैं कि देखिए केंद्र सरकार राज्यों के लिए क्या कर रही है लेकिन वह भी कैसे बोलें? कुछ करें तब तो बोलें? अभी इसी 3 मई को सुप्रीम कोर्ट में कावेरी जल विवाद पर सुनवाई चल रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह मंगलवार तक एक हलफनामा दाखिल कर बताए कि उसने कावेरी जल विवाद को निपटाने के लिए क्या कदम उठाए हैं? जानते हैं सरकार ने क्या कहा? सरकार का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा- “कावेरी नदी के जल बंटवारे से संबंधित विधेयक कैबिनेट के समक्ष रखा जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा के बाद फिलहाल कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं, इस वजह से अभी तक विधेयक को मंजूरी नहीं मिल पाई है। कृपया मामले की सुनवाई 12 मई तक के लिए टाल दें क्योंकि इस दिन कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं…।” अब सोचिए, तमिलनाडु और कर्नाटक में कावेरी के पानी बंटवारे को लेकर योजना बनाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दो माह पहले ही दे दिया था लेकिन योजना सिर्फ इसलिए लंबित है क्योंकि प्रधानमंत्री विदेश दौरों के बाद चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं? एक तरफ पानी के लिए तमिलनाडु का गला सूखा जा रहा है और दूसरी तरफ ’18 घंटे देश के लिए काम’ करने का दावा करने वाली सरकार कह रही है कि वह 12 मई तक कर्नाटक में प्रचार छोड़कर देश का कोई और काम करने के लिए खाली नहीं है? जाहिर है कि अब ऐसे में प्रधानमंत्री झूठ नहीं बोलेंगे तो क्या बोलेंगे?
आप भरोसा कीजिए, अपने प्रधानमंत्री झूठे बिल्कुल नहीं हैं। वे न तो अपना सच छुपाना चाहते हैं और न ही विपक्ष के बारे में झूठ बोलना चाहते हैं लेकिन वे यह दोनों काम बस मजबूरी में कर रहे हैं। आप उनकी मजबूरी समझिए और उनकी निंदा की जगह, उनके झूठ पर आंखें बंद कर यकीन करते हुए उनका साथ दीजिए। समझिए कि वे यदि झूठ बोलने के आदी होते तो हर समय बोलते लेकिन वे मजबूरी में बोलते हैं इसलिए कभी—कभार बोलते हैं। खासकर चुनावों में उनकी यह मजबूरी बढ़ जाती है। अभी एक बार फिर चुनाव है इसलिए झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आप सकारात्मक ढंग से सोचिए और झूठ के प्रयोग से किसी भी चुनाव को अपने पक्ष में करने की इस नई रणनीति के लिए मोदीजी के आभारी होइए। धन, बाहुबल इन सबसे बहुत हानि है लेकिन झूठ बोलकर वोट लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें कोई खर्च भी नहीं आता। न किसी को धमकाना पड़ता है। इसलिए इसे प्रधानमंत्री की खूबी के रूप में लीजिए, और गौरव का आभास कीजिए कि ब्रह्मास्त्र के बाद झूठास्त्र का भी अविष्कार अपने ही देश में हुआ है। आप इसके प्रचार-प्रसार में शामिल होइए। प्रधानमंत्री की इस खूबी को उनकी तमाम खूबियों में शीर्ष पर रखिए क्योंकि यह खूबी इस हद तक देश के किसी भी अन्य प्रधानमंत्री में नहीं थी। हम खुद ऐसा सोचने लगे हैं कि किसी झूठ से माहौल बनाकर चुनाव जीत लेना कोई आसान काम नहीं है, यह बहुत बड़ी खूबी है। झूठ को भी अति आत्मविश्वास के साथ बोलने की प्रधानमंत्री की इस बड़ी खूबी में एक और खूबी के हम कायल हैं, वह है झूठ बोलने के विषय चयन के साथ ही उसके समय चुनाव का। वे अपने झूठास्त्र का प्रयोग हमेशा अंतिम समय में करते हैं। चुनाव से ठीक एक—दो सप्ताह पहले। वे जानते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते इसलिए वे सतर्क रहते हैं कि मतदान तिथि और उनके झूठ—तिथि में इतना अधिक फासला न हो जाए कि बीच में सच से उस झूठ का सामना हो जाए। इसी खूबी से बोले गए झूठ का परिणाम गुजरात चुनाव में दिखा था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन पर लगाए गए झूठे आरोपों के बारे में भले ही बाद में राज्यसभा में गुपचुप माफी मांग ली गई लेकिन गुजरात में सरकार तो बन गई ना? यदि चुनाव में जीत की कीमत दो—चार झूठ है तो बोलने में क्या हर्ज है? हां, ऐसा करने से प्रधानमंत्री पद की गरिमा मटियामेट हो रही है तो यह चिंता मोदी क्यों करें? उन्हें कौन-सा हमेशा इस पद पर बने रहना है। वे तो कहते ही हैं कि फकीर हैं। भाई, वे तो उठेंगे और अपने झूठ के झोले के साथ चल देंगे। समझेंगे आने वाले वे प्रधानमंत्री, जिनके सच को भी जनता चेक करेगी कि कहीं यह भी ‘पिछले वाले’ की तरह झूठ तो नहीं बोल रहा? वैसे भी मोदीजी का सपना प्रधानमंत्री पद की गरिमा बनाए रखनी थोड़ी है? उनका सपना कांग्रेसमुक्त भारत है फिर चाहे वह सच बोलने से साकार हो या झूठ बोलने से और वह सपना झूठ के जरिए सच में परिणत हो रहा है। एक—एक कर अखंड भारतवर्ष में भाजपा राज हो रहा है। हां, यह राज झूठ की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है लकिन कांग्रेसमुक्त भारत तो सच में हो रहा है ना! आप प्रधानमंत्री के झूठ बोलने की कला से जलते हैं इसलिए निंदा करते हैं; हम तो उनकी इस कला के मुरीद हो चुके हैं और इसलिए हमें तो गुजरात के बाद कर्नाटक में भी अपने मोदीजी के झूठास्त्र के सकारात्मक परिणाम की उम्मीद है…।
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समान नागरिक संहिता का वादा भी झूठ था…?

भारत के संविधान की धारा 44 में समान नागरिक संहिता राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के रूप में दर्ज की गई है। भाजपा का मानना है कि जब तक भारत में समान नागरिक संहिता को अपनाया नहीं जाता है, तब तक लैंगिक समानता कायम नहीं हो सकती है। समान नागरिक संहिता सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करती है। भाजपा सर्वश्रेष्ठ परंपराओं से प्रेरित समान नागरिक संहिता बनाने को कटिबद्ध है जिसमें उन परंपराओं को आधुनिक समय की जरूरतों के मुताबिक ढाला जाएगा।”
– (भाजपा चुनाव घोषणा पत्र 2014)
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2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के तमाम बड़े लोक लुभावने वादों में से यह भी एक था— समान नागरिक संहिता। सत्ता मिलने के बाद इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया। हां, इस दौरान कानून कई बनाए। ऐसे कानून जो समान नागरिक संहिता की संभावनाओं को और दूर कर सकें। और कुछ ऐसे कानून भी जिससे भाजपा समेत तमाम राजनीतिक दलों को मनमानी की खुली छूट मिल जाए। यह दल हर निगरानी, हर जांच से परे हो जाएं…।
भाजपा शासनकाल से पहले एक कानून हुआ करता था— विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010। यह कानून विदेशी कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकता था यानी कि राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो अब तक ​पाक, चीन या कहीं से भी दलों के खाते में कोई राशि आने पर वह जांच के दायरे में होती थी लेकिन अब कोई जांच—वांच नहीं होगी। इसी मार्च में लोकसभा ने विपक्षी दलों के विरोध के बीच वित्त विधेयक 2018 में 21 संशोधनों को मंजूरी दी थी जिसमें एक संशोधन विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010 से संबंधित भी था। भाजपा सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेना आसान कर दिया लेकिन इतने से जी नहीं भरा। इसमें और अधिक संशोधन कर यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई कि अभी से नहीं, बल्कि 1976 से राजनीतिक दलों को मिले चंदे की कोई जांच न हो। इसके लिए तारीखें तक बदल दी गईं। लोकसभा वेबसाइट के ही अनुसार, वित्त अधिनियम, 2016 की धारा 236 के पहले पैराग्राफ में 26 सितंबर 2010 के शब्दों और आंकड़ों के स्थान पर पांच अगस्त 1976 शब्द और आंकड़े पढ़े जाएंगे। पूर्व की तिथि से किए गए इस संशोधन से भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों दलों को एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया।
कुल मिलाकर, अब आर्थिक चंदे के जरिये विदेशी कंपनियों और देशों को भारतीय चुनाव को प्रभावित करने की पूरी छूट होगी। जाहिर सी बात है, जो विदेशी कंपनियां लाखों—करोड़ों रुपये दान में देंगी, उनके कुछ एजेंडे भी होंगे लेकिन इन दलों को वह राशि बताने की कोई मजबूरी नहीं होगी, न कोई जांच की जा सकेगी।
… तो बताइए, इसी कानून को मान लें ना समान नागरिक संहिता? भाजपा आई थी सत्ता में नागरिकों के लिए कानून बनाने के वादे कर, और सत्ता मिलते ही अपने हित के कानून बनाने लगी। कानून भी कैसे? जिसके जरिए देश के चुनाव में विदेशी अपनी पूंजी के बलबूते हस्तक्षेप कर सकें? अब इस कानून से तो भाजपा की देशभक्ति और पारदर्शिता दोनों ही साबित हो जाती है ना? अच्छा तरीका है… हर तरह के भ्रष्टाचार को संविधान में संशोधन कर कानून बना देना ताकि न कोई जांच हो, न कोई सवाल उठे। करने वाला पाक—साफ बना रहे।
अरे हां, कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रभावशाली लोकपाल के गठन का भी वादा किया था। वह वादा तो पूरा किया नहीं, ऐसी व्यवस्था जरूर कर दी कि अपने साथ—साथ कांग्रेस को भी 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचा लिया जिसमें इन दोनों दलों को ही एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था।
वाकई, अंतर तो है…। भाजपा, भाजपा है…। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन को भुनाकर भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर सरकार बनाती है और सत्ता हाथ में आते ही कानून की नाव पर सवार होकर खुद ही भ्रष्टाचार का सागर पार नहीं करती, अपने साथ उस कांग्रेस को भी वैतरणी पार करा देती है…। कितनी दरियादिल है ना…। वाकई, अंतर तो है…।
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मोदीजी! याद कीजिए, एनपीए वाला वादा…

आप जानते हैं एनपीए किस बला का नाम है? अब जब यह बला आपके सिर पड़ी है तो जान ही रहे होंगे लेकिन अब भी निश्चिंत बैठे हैं तो जान लीजिए। एनपीए का फुल फॉर्म होता है— Non-performing asset। बैंक में एनपीए का सीधा मतलब वह लोन है जो बहुत बड़ा है लेकिन बैंक अब वसूल नहीं सकता। इस तरह के कर्ज अक्सर वे बड़े लोग लेते हैं जिन पर उनसे भी बड़े लोगों के हाथ होते हैं…। 
सोचकर देख लीजिए, यदि हम—आप जैसे लोग कोई लोन लेते है तो पहले तो मिलना आसान नहीं। मिल गया और चुका नहीं पाए तो उसकी वसूली के लिए बैंक संपत्ति छीन लेता है, घर गुंडे भेज देता है, वसूली के लिए खून पीने को तैयार बैठा रहता है। हिम्मत कहां हमारी कि ऋण लें और चुकाए नहीं? न चुकाने के बारे में तो छोड़िए, हम सब तो ऋण लेने से पहले ही हजार बार सोचते हैं। … तो हम लोग जो ऋण लेते हैं, वह एनपीए नहीं हो पाते। लेकिन, बड़े लोगों की बड़ी बातें…। इसलिए वे बड़े लोन लेकर भी नहीं चुकाते। बैंक भी वसूली से हाथ खड़े कर देता है क्योंकि इन लोन लेने वालों के हाथ बहुत लंबे होते हैं, कई बार तो कानून से भी लंबे… तो इन पर हाथ कौन डालेगा? लालच या बड़े दबाव में बैंक इस तरह के लोन देता है और फिर लालच या दबाव में ही आकर लोन वसूल पाने में अक्षम हो जाता है तब इसे एनपीए की श्रेणी में डाल देता है। यानी यह एक पूंजी हो जाती है, जिसके हमारे पास सिर्फ आंकड़े होते हैं लेकिन इसका देश की अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं होता बल्कि नुकसान होता है…।
भारतीय अर्थव्यवस्था को जमीन पर ला पटकने वाले इस एनपीए का आंकड़ा भी बताते हैं लेकिन उसके पहले 2014 के चुनाव में भाजपा द्वारा इस बारे में की गई यह घोषणा तो पढ़ लीजिए—
“”साल दर साल एनपीए की मात्रा बढ़ती जा रही है। पिछले कई वर्षों से ऐसा हो रहा है। भाजपा ऐसे कदम उठाएगी जिससे बैंकिंग क्षेत्र में एनपीए में कमी आए। भाजपा एक ऐसा मजबूत नियामक निकाय बनाएगी जो गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से निवेशकों की रक्षा करेगी…।””
भाजपा के घोषणापत्र में एनपीए के जिक्र और इस संबंध में की गई इस घोषणा का मतलब है कि भाजपा को सत्ता में आने से पहले ही मालूम था कि एनपीए कितनी गंभीर समस्या है लेकिन सत्ता में आने के बाद सरकार न जाने किन कार्यों में व्यस्त हो गई कि अपनी सारी घोषणाओं की तरह यह घोषणा भी भूल गई। करना था सदाचार, बढ़ता गया भ्रष्टाचार…। जिन क्षेत्रों में विकास के दावे किए, उनमें तो हुए नहीं, लेकिन एनपीए का विकास खूब हुआ। एक ताजा आंकड़े के अनुसार, डूबे कर्ज के मामले में भारत इस समय दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के नीमच निवासी चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है उसके अनुसार, देश का संपूर्ण एनपीए (जीएनपीए)7,76,067 करोड़ रुपये है। इसमें से 6,89,806 करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों के हैं, तो 86,281 करोड़ रुपये निजी बैंकों के हैं. पौने आठ लाख करोड़ रुपए यूं ही कुछ लोग ले गए।
समझते हैं न कि पौने आठ लाख करोड़ में कितने शून्य लगेंगे? यह पैसा अब देश में नहीं है, न देश के किसी काम आएगा… फिर भी यह कोई घोटाला नहीं है। इस सरकार की तारीफ में आप सब सही कहते हैं, बाकी सरकारों और इस सरकार में अंतर तो है इसलिए तो इस सरकार में घोटाला करने और उसे ढ़कने के तरीके भी अलग तरह के हैं। सरकार भगोड़ों से रुपये तो वसूल नहीं पा रही तो एनपीए कम करने के लिए आपके—हमारे टैक्स से भरे रुपए इनके अब खाते में जमा कर रही है। यह हम यूं ही नहीं कर रहे। ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ का आंकड़ा देख लीजिए। 38 विलफुल डिफॉल्टरों के 500 करोड़ रुपये का एनपीए write off कर दिया गया है। इसका मतलब समझते हैं? इसका मतलब यह हुआ कि बैंक ने अपने मुनाफे से एनपीए के खाते में पैसा डाला और इस कारण एनपीए के खाते में नुकसान कम दिखने लगा है। कुल छह बैंक ऐसे हैं, जिनमें 60,000 करोड़ से ज़्यादा रकम डाली गई है। यह 60 हजार करोड़ रुपये सरकार के हैं, यानी जनता के हैं। इसका मतलब यह कि लुटेरे देश का खजाना लूटकर गायब हो गए और देश की जनता से टैक्स वसूलकर भरे गए सरकारी खजाने से सरकार उसकी भरपाई कर रही है। यानी दोनों तरफ से लूट। वाकई, यह सरकार बेमिसाल है। अंतर तो है…।
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जब गड्ढों से गुजरते हुए चिकनी सड़क की खबरें पढ़ रहे हों तो समझ जाना…

“हाय, मैं नरेंद्र मोदी हूं और मैं देश का पीएम हूं। जब आप मेरे नमो एप में साइन अप करते हैं तो मैं आपका सारा डाटा अपने अमेरिकी कंपनियों के दोस्तों को दे देता हूं…।”
“हाय मेरा नाम राहुल गांधी है और मैं देश की सबसे पुरानी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं। जब आप हमारे आधिकारिक एप पर साइन अप करते हैं तो मैं आपकी सारी जानकारी सिंगापुर में अपने दोस्तों को दे देता हूं…।”

दरअसल, यह दोनों ही ट्वीट आरोप कम, सच्चाई अधिक हैं। इन चार वर्षों में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी ने ठीक से अपना काम नहीं किया है। सत्ता पक्ष अपने वादे पूरे करने में नाकाम है तो विपक्ष उसकी मनमानियां रोकने में नाकाम रहा है। अब दोनों को पुन: सत्ता की लालसा है। ऐसे में, षड्यंत्र ही एकमात्र सहारा है। यह सब करने के लिए एक तरफ आवारा पूंजी का सहारा लिया जा रहा है तो दूसरी तरफ सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया जा रहा है। इस षड्यंत्र में सभी दल शामिल हैं इसलिए ठोस तरीके से कोई किसी का विरोध नहीं कर रहा। धरातल पर जनता से कट चुकी यह पार्टियां अब सोशल साइट पर उनसे जुड़ना चाहती हैं। भाजपा सरकार ने तो सभी सांसदों को ट्विटर पर फॉलोवर बढ़ाने और सभी एनसीसी जवानों को नमो एप डाउनलोड करने का भी फरमान तक जारी कर रखा है। हां, यहां फिर वही बात लागू होती है, जो मैंने कही थी। दोनों ही दल बेशर्मी पर उतर आए हैं लेकिन कांग्रेस डरती है और भाजपा डराती है…। नमो एप और राहुल गांधी एप के जरिए जनता की जानकारी जुटाने का मामला उजागर होने के बाद कांग्रेस ने जहां गूगल एप से राहुल गांधी एप को डिलीट​ कर दिया वहीं भाजपा ने नमो एप को जारी रखा है क्योंकि वह चोरी ही नहीं करती, सीनाजोरी भी करती है…।
आप क्या सोचते हैं? आप—हम किसी के प्रशंसक नहीं हैं? लेकिन उसकी प्रशंसा में रोज कितनी पोस्ट लिख पाते हैं? यह सोचिए ना कि हम खुद अपने पेज पर अपने ही बारे में कितना लिख पाते हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि यह कौन से प्रशंसक हैं जो इन नेताओं के नाम पर चलने वाले फैन पेज पर 24 घंटे पोस्ट अपडेट करते हैं? आखिर वे इसके अलावा करते क्या हैं? और कुछ और नहीं करते तो उनका खर्च कैसे चलता है? दरअसल, फैंसपेज जैसा कहीं, कुछ भी नहीं है। सबकुछ पेड है। यह अरबों के झूठ—फरेब का कारोबार है। आप आरटीआई से इस बारे में जानकारी मांगिए तब भी आपको सूचना नहीं मिलेगी लेकिन सच यही है कि कुछ मीडिया समूह अपने पत्रकारों के वेतन पर जितना खर्च नहीं करते, उससे अधिक खर्च भाजपा की आईटी सेल अपनी प्रशंसा लिखने वालों पर करती है। आईटी सेल के बंदों का वेतन भी कमोबेश पत्रकारों से अधिक है। अभी देश की राजधानी में भी एक नौसिखिए पत्रकार का वेतन 8 हजार से शुरू है लेकिन राजनीतिक दलों के आईटी सेल को ज्वाइन करने वाले बंदे को 15—20 हजार आराम से मिल जाते हैं। अखबार में एक संपादक का वेतन 60 हजार से अधिकतम 2—3 लाख तक पहुंचेगा, लेकिन आईटी सेल के प्रमुख का वेतन कुछ भी हो सकता है। उपर से सत्ता का संरक्षण अलग से। फर्जी फैंसपेज, फर्जी न्यूज पोर्टल, फर्जी सोशल एकाउंट्स… इन सबका कारोबार इतना बड़ा है कि चंद अच्छे पत्रकार लिखते—लिखते मर जाएं लेकिन ये सब मिलकर किसी भी सच को झूठ बना दें और किसी भी झूठ को सच। भाजपा ही नहीं, इस कारोबार में सभी दल शामिल हैं। नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल… सभी को चमकाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। जिस दल के पास आवारा पूंजी अधिक है, जिसके पास सत्ता है, वह उसका सबसे अधिक दुरुपयोग कर रही है। चूंकि हमाम में सभी नंगे हैं इसलिए कोई इस षड्यंत्र के खिलाफ आर—पार की लड़ाई नहीं लड़ रहा, बस इस तरह से आवाज उठा रहा है कि कहीं राज खुल जाए तो आगे वह कह सके कि मैंने तो कहा ही था…।
इस गरीब देश में जहां कई लोगों को खाने के लिए अनाज ठीक से नहीं मिल पा रहा, लाइक के नाम पर करोड़ों के वारे—न्यारे हो रहे हैं। इन पर होने वाले खर्च का किसी के पास कोई हिसाब नहीं है और न आप सवाल कर सकते हैं कि यह धन आ कहां से रहा है? चूंकि भाजपा ने पहले ही वह कानून बना दिया है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाली राशि किसी को बताई नहीं जाएगी तो आप पूछ भी नहीं सकते। बस…। अब आप वहीं सुनिए जो सुनाया जाए, वहीं देखिए जो दिखाया जाए…। यह भ्रमजाल इतना बड़ा है कि कब आप इसकी चपेट में आ जाएंगे, आप भी समझ नहीं पाएंगे। हां, टूटी सड़क पर चलते हुए भी यदि आप हाथ में मोबाइल लेकर चिकनी सड़क की खबर पढ़ते हुए आगे बढ़ते जाएं और आप जिस सड़क पर हैं, उसी के गड्ढे न दिखाई दें तो समझ जाइए कि आप इस कारोबार का हिस्सा बन चुके हैं। तब आप यदि इस भ्रम जाल से बचना चाहते हैं तो मोबाइल पॉकेट में रखिए और सड़क की तरफ देखिए… यानी आभासी दुनिया से निकलकर वास्तविकता में लौट आइए। हां, यदि तब भी आपकी भक्ति कायम हैं तो यकीन मानिए आप कोई भक्त—वक्त नहीं हैं, आप मूर्ख बन चुके हैं! फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम, वेबसाइट, एप पर अरबों रुपए पानी की तरह बहाने वाले राजनीतिक दलों का बस यही एक उद्देश्य भी है— सभी को मूर्ख बनाना। एक ऐसा आभासी आवरण तैयार कर देना कि आंखें खुली रहें लेकिन सामने से वास्तविकता ओझल हो जाए…।
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कैडर… जिनपर भाजपा को नाज है…

भाजपा ने इन चार सालों में इतने काम कर दिए हैं कि कैडर वोटरों के पास अब अपने आस-पास के लोगों के सवालों के जवाब नहीं हैं। इस तरह भाजपा ने अपने कैडर वोटर तो नहीं खोए हैं लेकिन निःस्वार्थ लाखों ‘प्रचारक’ खो दिए हैं। 
हर आदमी न तो सरकार से सवाल करता और न ही हर आदमी के सवाल का जवाब सरकार देती है। चौक-चौराहों पर चाय पीते हुए, सड़क पर चलते हुए, ऑफिस में काम के बीच में जो सवाल निकलते हैं और उनके जवाब वहीं नहीं मिलते हैं तो आदमी को खटकने लगता है। न सरकार, न दल, न नेता, न कार्यकर्ता… यह कैडर वोटर ही होते हैं जो दूसरे वोटरों के सवालों का तत्क्षण मौके पर ही जवाब देकर उनका मुंह ही बंद नहीं कराते बल्कि उनपर उस दल, नेता, और उस विचारधारा का प्रभाव भी छोड़ जाते हैं लेकिन अब कैडर वोटर ही बाकी वोटरों से बचकर निकलने लगे हैं…।
यह कैडर वोटर बिल्कुल जमीन पर होते हैं और उनसे विचार-विमर्श, बहस करने वाले भी इसलिए इनके सवाल भी जमीन से जुड़े होते हैं और कैडर के जवाब भी। दुर्भाग्य है कि इन 4 वर्षों में भाजपा ने कुछ काम भी किए हैं तो जमीन पर रहकर नहीं, हवा में उड़ते हुए। इस कारण जमीन पर न कोई काम दिखता है, न कैडर वोटर को जमीन से जुड़े सवालों का जवाब सूझता है। वह भाजपा के प्रति समर्पित है जी-जान से… उसका दिल साफ है… वह पार्टी को दिल से चाहता है… उसे किसी पद, वेतन, सत्ता की इच्छा नहीं लेकिन वह नहीं चाहता कि वह जिसे चाहता है उसके बारे में कोई बुरा कहे। इसलिए वह किसी से भी लड़ पड़ता है लेकिन अब वह खुद से लड़ने लगा है। वह किसी नरेंद्र मोदी जैसे नाम से भी अधिक समर्पित है इस दल के लिए लेकिन वह वोटर है, नेता नहीं। वह जमीन से जुड़े अपने भाइयों के सवालों के जवाब थेथरई से नहीं दे सकता और जवाब है नहीं, इसलिए जो कैडर भाजपा को कुछ बोलते ही बरस पड़ता था, अब वह चुप रहने लगा है, वह कैडर जिसके पास सबके सवालों के जवाब थे, वह अब निरुत्तर होने लगा है… वह जो भाजपा और उसके नेता के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता था, वह अब उनको दी जा रही गाली भी सहन करने लगा है…।
हाँ, यह कैडर वोटर अब भी भाजपा के साथ है लेकिन अब वह अपने आस-पास के लोगों से अपने साथ चलने के लिए नहीं कह रहा। वह जो हर पल चहकता था, अब अकेले गुमशुम रहने लगा है…। वह जिसे कारवां पसंद था, अब अकेले चलने लगा है…। वह जिसकी जुबान पर सबके सवालों के जवाब होते थे, अब वह मन ही मन खुद से सवाल करने लगा है… मैं रुक क्यों नहीं रहा? मैं क्यों चल रहा हूँ? कैडर रुका नहीं है, थका नहीं है, अब भी चल रहा है लेकिन अब उसके पास अपने ही सवाल का जवाब नहीं है…।
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गोरखपुर में उपेंद्र नहीं, योगी हारे हैं…

Yogi Adityanath
राजनीति हो, खेल हो या फिर जिंदगी; जीत—हार तो लगी ही रहती है। इस रूप में यदि गोरखपुर लोकसभा सीट पर गोरक्षपीठ समर्थित भाजपा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त शुक्ल की हार को देखें तो किसी तरह का कोई आश्चर्य नहीं होता, चौंकने जैसी कोई बात नहीं लगती लेकिन एक तथ्य यह भी है कि किसी क्षेत्र में जब कोई वर्षों तक न हारा हो तो वह अपराजेय मान लिया जाता है, और तब यदि वह अचानक पहली बार आखाड़े में उतरे लड़के से पटखनी खा जाए तो पिछली कई जीत से इस एक हार की कहानी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, यह हार बेहद चौंकाने वाली हो जाती है…। गोरखपुर लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त शुक्ल की हार भी कुछ इसी तरह की है, क्योंकि यह हार उनकी नहीं, बल्कि 29 साल तक गोरखपुर की सत्ता पर काबिज रहे गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की हार है और हराने वाला है पहली बार चुनाव लड़ने वाला मात्र29 साल का लड़का प्रवीण निषाद। यानी महज उतनी उम्र का, जितनी पीठ की सत्ता की उम्र है। अभी यह परिणाम हकीकत नहीं होता तो बस कोरी कल्पना ही होता इसलिए इस परिणाम से सबको चौंकना लाजिमी है और हारने वालों का चौकन्ना होना भी…। यह परिणाम इतना अप्रत्याशित है, इतना आश्चर्यजनक है कि जब तक यह परिणाम न आया था, इसकी थोड़ी आशंका तो जताई जा सकती थी मगर कोई भी पूरी यकीन के साथ नहीं कह सकता था… यहां तक कि अभी विजयी मुस्कान लिए इंजीनियर प्रवीण निषाद भी नहीं। गोरखपुर में रहना है तो योगी—योगी कहना है, गोरखपुर में योगीजी को कोई हरा नहीं सकता… इस तरह की बातें इतनी आम हो चुकी थीं कि ये बातें सच भी लगने लगी थीं और ऐसे में जब प्रवीण नाम के अभिमन्यु ने योगी के राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदा तो उससे गोरखपुर में राजनीति की नई इबारत बननी ही थी…। कल तक इस हार के कोई कयास तक ठीक से नहीं लगा सकता था लेकिन आज इस हार के सभी के पास कई कारण हैं। यहां तक कि मुझ जैसे अज्ञानी के पास भी…। हम कोई राजनीतिक पंडित तो नहीं हैं लेकिन गोरखपुर क्षेत्र से हैं वहां वर्षों तक रहने, वहां की बाहरी दुनिया के साथ ही अंदर की बातें जानने—समझने के कारण इस हार की कुछ वजहें मेरे पास भी हैं। इनमें कुछ प्रमुख कारणों की चर्चा कर देना जरूरी है…।

1. आस्था का सवाल न रहा…
आस्था बहुत कुछ होती है। मानें तो मूरत नहीं तो पत्थर…। मानें तो गंगा नहीं तो पानी…। मानें तो सोना नहीं तो माटी…। इस तरह मान लेना भी बहुत कुछ होता है जिसका जन्म आस्था से होता है। किसी के प्रति आस्था उसे हर समीक्षा से परे कर देती है। गोरक्षपीठ के लिए गोरखपुर वालों की इसी आस्था ने इसके ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ से लेकर वर्तमान महंत योगी आदित्यनाथ तक को अपराजेय बना दिया। पहली बार जब पीठ से अलग जाकर किसी को प्रत्याशी बनाया गया तो चुनाव में आस्था का सवाल न रहा। वर्षों तक भक्त बने रहे लोग अचानक जनता बन गए क्योंकि सामने महाराजजी की जगह नेताजी थे। फिर, बीजेपी के कार्यों की भी समीक्षा होनी थी और उसके प्रत्याशी की भी। फिर तो प्रत्याशी की जाति भी देखनी थी। और जब सबकुछ देखा तो उपेन्द्रदत्त के रूप में योगी को हारना ही था…। 

2. विकास महज छलावा…
भाजपा ने यह चुनाव विकास के नाम पर लड़ा लेकिन यदि ​इस मुद्दे पर उसका मूल्यांकन किया जाए तो वोट न देने का निर्णय ही लेना होगा…। इसके पूर्व, हालिया कई चुनाव भी भाजपा ने विकास के नाम पर ही लड़े थे लेकिन उनमें बाकी समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा था, विकास का मुद्दा तो सिर्फ मुखौटा था। इस बार पार्टी ने योगी के नाम को ही सबकुछ मान लिया और विकास को मुख्य मुद्दा ही नहीं बनाया, मान भी लिया इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि तीन दशक तक राज करने के बाद भी पार्टी गोरखपुर में विकास के नाम पर कुछ खास नहीं कर पाई है। सड़कों में गड्ढे हैं, नालियां जाम हैं, रात में मच्छर काटते हैं, दिन में सड़क पर सांड़ भिड़ जाते हैं, हाट—बाजारों में शौचालय नहीं हैं, बिजली मनमर्जी कटती है और बिल मनमर्जी बनता है, अपराध में कोई कमी नहीं, सड़कें अतिक्रमित और चलने की जगह नहीं… कुल मिलाकर कहीं, कुछ भी व्यवस्थित नहीं फिर भी मुद्दा उछाल दिया विकास का…? यह कुल्हाड़ी पर पैर दे मारने जैसा ही तो था… इस तरह के विकास पर वोटिंग पड़ने पर यह परिणाम तो तय ही था…।

3. जाति है कि जाती नहीं…
यह सच है कि आदमी के कर्म बाद में तय होते हैं लेकिन उसके पैदा होते ही उसकी जाति तय हो जाती है। जाति की यह भावना सबके मन में होती है; किसी में कम, किसी में ज्यादा। बात जब चुनाव की हो तब यह जातिगत भावना खुलकर सामने होती है। योगी इस बात को जानते हैं और जरूरत पड़ने पर खुद कभी हिंदूवादी चेहरा तो कभी ठाकुर बन जाते हैं लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई और गोरखपुर में प्रत्याशी चयन में शीर्ष नेतृत्व ने जातिगत समीकरण का ठीक से ख्याल न रखा…। गोरखपुर के जातीय गणित को देखें तो यहां करीब 19.5 लाख मतदाताओं में 3.5 लाख मतदाता उस निषाद समाज से हैं, जिस समाज से सपा—बसपा ने अपना प्रत्याशी खड़ा किया। इस समाज का वोट यहां के कुल वोटरों का 18 प्रतिशत है जो जीत—हार तय करने के लिए काफी है। यही नहीं, यहां करीब साढ़े तीन लाख मुस्लिम, दो लाख दलित, दो लाख यादव और डेढ़ लाख पासवान मतदाता हैं। इस तरह ये सभी मिल जाएं तो किसी की भी जीत—हार तय हो जानी है। दूसरी तरफ गोरखपुर में ब्राह्मण और ठाकुरों की पुरानी दुश्मनी है जो दिल में दफन है लेकिन जब भी मौका मिलता है बाहर आ जाती है। ब्राह्मण प्रत्याशी चुने जाने से ठाकुरों में गुस्सा था क्योंकि वह इसे अपने समाज से एक बड़ा सीट छीन लिए जाने के रूप में देख रहे थे और कहीं न कहीं उनमें यह डर भी था कि कहीं फिर से गोरखपुर में ब्राह्मण न हावी हो जाएं। एक तरफ ठाकुर इस चुनाव के प्रति उदास हो गए, वहीं उपेंद्रदत्त शुक्ल अपने बलबूते ब्राह्मणों को भी एकजुट नहीं कर पाए। ब्राह्मणों के वोट बंटे तो नहीं लेकिन सारे बूथों तक पहुंचे भी नहीं। दूसरी तरफ, प्रवीण निषाद को निषाद समाज का वोट तो मिला ही, सपा—बसपा गठजोड़ के चलते यादव, मुस्लिम, दलित वोट भी थोक में मिले। जीत के लिए सबसे बड़ा कारण यही जातीय समीकरण बना, जिसे भाजपा ने नजरअंदाज कर दिया था और गोरखपुर की नब्ज जानने वाले योगी ने भी बहुत गंभीरता से नहीं लिया।

4. प्रत्याशी चयन में गड़बड़ी…
भाजपा ने ऐसा ब्राह्मण प्रत्याशी खड़ा किया, जिसका कई ब्राह्मण वोटर पहली बार नाम सुने वहीं निषाद समाज से ऐसा प्रत्याशी खड़ा हुआ जिसका परिवार वर्षों से सिर्फ निषादों के लिए ही संघर्ष करता आ रहा है और अपने समाज का इस समय अगुआ है। उपेंद्रदत्त शुक्ल भाजपा के अच्छे कार्यकर्ता हैं और सक्रिय भी लेकिन जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी कोई पहचान नहीं है। संगठन में तो उन्हें हर कोई जानता है लेकिन ब्राह्मण समाज में उनकी वह ख्याति नहीं है। कई लोगों ने तो पहली बार गणेशदत्त का नाम सुना। इस बात को योगी भी समझते हैं इसलिए उन्होंने 16 चुनावी रैलियां कीं जबकि अखिलेश यादव ने केवल एक रैली की और बाजी पलट दी। गणेशदत्त जमीनी स्तर पर ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी बहुत प्रभावी नाम नहीं है इसलिए युवाओं में उनकी लोकप्रियता बहुत कम है। वर्षों गोरखपुर में रहने, सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के बाद भी हम खुद उनके बारे में बहुत नहीं जानते थे, ब्राह्मण चेहरा के रूप में तो कतई नहीं। जब प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की घोषणा हुई तो हमने सबसे पहले उन्हें सोशल मीडिया पर ढूंढा था। एक पेज मिला था—
https://m.facebook.com/upendrabjpofficial/ लेकिन इस पर भी बहुत कम गतिविधियां दिखीं। गोरखपुर से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त के पेज पर आज भी मात्र 13872 लाइक्स हैं। हां, लाइक्स वोट नहीं होते लेकिन हुए तो? भाजपा की आईटी सेल कहां है? इस पेज पर अंतिम पोस्ट 9 मार्च को है। चुनाव के बाद जो मत मिले, उसके लिए भी जनता का आभार नहीं जताया…। जाहिर है कि जो वोट मिले भी, वह योगी के नाम पर वरना उपेंद्रदत्त गोरखपुर में आज भी कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। इस हकीकत को जानने के बाद भी इस नाम का चयन आ बैल मुझे मार जैसा ही था लेकिन जैसा कि योगी ने हार का कारण अति आत्मविश्वास को बताया; तब तक चर्चा यह थी कि जिसके सिर पर महाराजजी हाथ रख दें वह गोरखपुर का सांसद हो जाएगा और इसलिए यह नाम भी एक पल के लिए लोगों को मुफीद ही लगा लेकिन परिणाम उसके लिए मुफीद बना जिसने सारे समीकरण समझे और पूरी तैयारी से अपनी जीत के लिए संघर्ष किया।

5. सत्ता का लोभ और घमंड…
योगी ने कहा कि अति आत्मविश्वास इस हार का कारण बना, वह इसे घमंड नहीं बोल पाए ​क्योंकि यह उनका खुद का घमंड था… कैसे बोलते? लगातार जीत के बाद घमंड किसी को भी हो सकता है लेकिन यदि योगी को हो जाए तो खुद गोरक्षपीठ उस घमंड को तोड़ने वाले को अपना आशीर्वाद दे देता है। योगी ने तो सत्ता का लोभ भी कर लिया और उसके मद में चूर भी हो गए। सजा मिलनी ही थी…। जब योगी मुख्यमंत्री बने थे तब हम गोरखपुर में ही थे। गोरखपुर में कुछ साथियों ने हमसे कहा था कि योगी ने यह ठीक नहीं किया। बड़े महाराजजी यानी ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने उनसे एक बार कहा था कि गोरखपुर गोरक्षपीठ की जिम्मेदारी है। वे राजनीति में कोई दूसरा बड़ा पद न लें जिससे गोरखपुर को छोड़ना पड़े। वह महंत के रूप में गोरक्षपीठ और सांसद के रूप में गोरखपुर के लोगों की सेवा करते रहें लेकिन योगी नहीं माने। गोरक्षपीठ में श्रद्धा रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि जब महाराजजी पीठ की गद्दी से अधिक सियासत के सिंहासन पर बैठने लगेंगे तो उनकी ख्याति कम होती जाएगी और उनका तेज यानी प्रभाव खत्म होता जाएगा…। हो सकता है कि यह बात कइयों को न पचे। शायद महाराजजी को भी नहीं इसलिए सत्तालोभ में उन्होंने अपने गुरु की बात को भी नजरअंदाज किया और सांसद से मुख्यमंत्री बन गए। सत्तालोभ के बाद मिली राजनीतिक जीत की सफलता से सत्ता का घमंड भी होना ही था। इस घमंड में चूर योगीजी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि गोरखपुर में उनके समर्थित प्रत्याशी के सामने कौन खड़ा है। इसलिए वह तो सपा—बसपा गठबंधन को भी सांप—छछूंदर ही समझे जबकि खुद उनकी पार्टी सत्ता के लिए कहीं भी, किसी भी दल के साथ हो जाती है और किसी भी दल के किसी भी व्यक्ति को अपने दल में शामिल कर लेती है। महाराजजी अपने घमंड में भूल गए कि वे उन निषादों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो उनके भक्त रहे हैं और उनकी जीत में बड़े सहायक। वह यह भी भूल गए इन कुछ सालों में निषादों ने संजय निषाद के रूप में अपना प्रतिनिधि चुन लिया है और उनका बेटा प्रवीण निषाद सिर्फ सपा—बसपा का ही नहीं, उस समाज का भी प्रत्याशी है। महाराजजी चाटुकारिता प्रेम से भी वंचित नहीं रह पाए और कुछ विशेष लोगों से घिर गए। इससे सभी का उन तक पहुंचना मुश्किल हो गया जिससे वह असली फीडबैक से वंचित रह गए और चापलूस उन्हें ले डूबे।

6. कार्यकर्ताओं की उपेक्षा…
किसी भी चुनाव में शीर्ष नेतृत्व प्रत्याशी ही चयन करता है लेकिन उसकी जीत—हार तो स्थानीय कार्यकर्ता ही तय करते हैं। यूं तो गोरखपुर में शुरू से ही हिंदू युवा वाहिनी के आगे भाजपा कार्यकर्ता पानी भरते थे लेकिन जबसे महाराजजी लखनउ बैठने लगे तबसे वाहिनी के कार्यकर्ता ही सबकुछ हो गए और भाजपा कार्यकर्ता हाशिए पर। मंदिर में कोई भाजपा कार्यकर्ता उतनी आसानी से कभी नहीं जा सकता है, जितनी आसानी से वाहिनी का दूत। इस तरह धीरे—धीरे भाजपा कार्यकर्ता उदासीन होते चले गए। इस चुनाव में उनकी उदासीनता काफी हद तक दिखी। अपनों से अपने अपमान का बदला लेने की हद तक…। योगी ने ताबड़तोड़ रैलियां जरूर कीं, लेकिन जनसंपर्क नहीं हो सका। जो समर्पित कार्यकर्ता घर—घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाते थे, उनमें से अधिकतर अपने ही घर से अपना ही वोट देने नहीं निकले। कई बूथ पर तो कार्यकर्ता नजर ही नहीं आए। जबकि दोपहर तक बूथों पर निगरानी होती है और स्थानीय वोटरों के नहीं पहुंचने पर उन्हें ढूंढकर बूथों तक पहुंचाया जाता है। यह काम सपा—बसपा ने तो किया लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नहीं। योगी के क्षेत्र में महज 47.45 फीसदी वोटिंग का यह बड़ा कारण रहा। कई लोग सिर्फ इसलिए वोट करने नहीं गए क्योंकि उनसे किसी ने कहा ही नहीं। भाजपा के वोटरों ने कहीं और वोट नहीं किया, लेकिन भाजपा को भी नहीं दिया। कार्यकर्ताओं की उदासीनता से बूथ मैनेजमेंट निष्प्रभावी हो गया और हार प्रभावी…। दूसरी तरफ वोटरलिस्ट में खामियों ने भी बड़ी भूमिका निभाई। कई वास्तविक वोटरों के नाम कट गए और क्रिकेटर विराट कोहली जैसों तक के फर्जी नाम जुड़ गए। वास्तविक वोटरों के घर पर्ची नहीं पहुंची तो कई बूथ पर जाकर लौट आए। उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था…। यदि कार्यकर्ता सक्रिय और सजग रहते तो समय रहते मतदाता सूची में अपनों के नाम न छूटते और हर वोटर बूथ तक पहुंचता… मत प्रतिशत ठीक रहता और तब हार होती भी तो इतनी शर्मनाक न होती…।
अब आगे…
जो लोग यह समझते हैं कि यह प्रवीण निषाद सिर्फ कुछ दिनों के लिए सांसद बने हैं, और यह हार महज योगी की असावधानी का नतीजा है तो वे जरा सावधान हो जाएं। प्रवीण की जीत भाजपा और योगी के घमंड, उनकी अधूरी तैयारी, असावधानी से थोड़ी आसान जरूर हो गई लेकिन यह इसलिए हुई क्योंकि सपा-बसपा ने ही नहीं, निषाद समाज ने भी अपनी तरफ से जीत के लिए पूरी तैयारी की थी…। इसलिए इसे महज संयोग न समझिए। गोरखपुर में संख्याबल में बहुत अधिक नहीं होने के बाद भी हमेशा ब्राह्मण, ठाकुरों का वर्चस्व रहा है जो पहली बार टूटा है। हमेशा इन दो जातियों की ही चर्चा होती है, पहली बार किसी अन्य जाति की चर्चा हो रही है…जिसके लिए ही निषाद समाज संघर्ष कर रहा था। इस उपलब्धि के लिए यह समाज वर्षों से खुद को एकजुट कर बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा करने में लगा था। हाल के दिनों में इस समाज की एकता ऐसी हो चली है कि कभी आरक्षण तो कभी किसी छोटी—मोटी मांग के लिए भी हजारों की तादाद में लोग एकत्र हो जाते हैं और सत्तासीन ब्राह्मणों—ठाकुरों में आपसी वैमनस्य व फूट इतनी है कि वे अपने ही प्रत्याशी के लिए पूरी तरह एकमत नहीं हो पाए। लोकतंत्र के लिए यह सुकून देने वाला पल है कि पहली बार किसी उपेक्षित समाज से इस तरह कोई अगुआ सामने आया है। पढ़ा—लिखा, युवा और बेदाग छवि वाला…। जिसे दोबारा चुनने की कई वजहें हैं, न चुनने की एक भी नहीं। निषाद समाज समेत पिछड़ी जातियों के लिए प्रवीण सिर्फ नेता नहीं, गर्व का विषय हैं इसलिए आगामी चुनावों में निषादों का वोट तो दूसरे दल और जातियों के प्रत्याशी भूल ही जाएं। जो सोचते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव बड़ी सहजता से जीता जा सकेगा, वे बड़े मूर्ख हैं। जब कोई योगी को हराने की नहीं सोच सकता था, तब निषादों ने अपनी एकजुटता से करारी शिकस्त दी है… ऐसे में अब तो वे विजयी हैं, आगे उन्हें हराना और कठिन होगा। निषाद किसी भी मुद्दे पर नहीं रिझेंगे, विकास के मुद्दे पर भी नहीं— क्योंकि उन्हें पहली बार अपने समाज पर गर्व करने की वजह मिली है। हम यह सब यूहीं नहीं कह रहे। हमने निषाद पार्टी की वेबसाइट और फेसबुक पेज दोनों का अध्ययन किया और यह पाया कि यह दल ब्राह्मणवाद—मनुवाद से नफरत करता है। इसलिए इस जीत में वह सिर्फ अपने समाज की राजनीतिक जीत ही नहीं देख रहा है, बल्कि सामंती, मनुवादी ब्राह्मण—ठाकुरों और अन्य सवर्ण जातियों की हार भी देख रहा है। यह जीत इस समाज के लिए बहुत बड़ी है… राजनीतिक जीत से बहुत आगे… और इसीलिए इस जीत ने सभी पिछड़ी जातियों को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एकजुट कर दिया है, लेकिन हमें पता है कि यह हार भी ठाकुरों—ब्राह्मणों व अन्य सवर्ण जातियों को एकजुट नहीं कर पाएगी… और चूंकि आगामी चुनाव में भी जाति ही अधिक प्रभावी रहेगी क्योंकि विकास सिर्फ भाषणों में हुआ है तो दोबारा यह सीट भाजपा के खाते में बड़ी आसानी से चली जाएगी… यह मुगालता न ही पालिए! 
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