निष्पक्ष

हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

सवर्ण जाति के नाम पर एक नहीं तो यह बड़ी खूबी है!

सरकार दलितों की होगी,
सरकार पिछड़ों की होगी,
सरकार अल्पसंख्यकों की होगी…!
अभी हर नेता यही जुमला दोहरा रहा है। क्या अभी किसी नेता में हिम्मत है जो कहे कि सरकार सवर्णों की होगी? कह दिया तो वह जीत पाएगा? नहीं! हरगिज नहीं!
क्यों? क्योंकि बाकी जातियां उसको नफरत से वोट नहीं करेंगी और उसकी अपनी जाति से भी बहुत कम वोट मिल पाएंगे। ऐसा क्यों? क्या इसलिए क्योंकि सवर्णों में एकता नहीं है? नहीं! ऐसा इसलिए कि सवर्ण समाज अभी भी सबसे उदार, सुलझा समाज है जो जाति पर नहीं मचलता। सवर्ण से वोट लिया जा सकता है विकास के नाम पर, सदाचार के नाम पर, देशभक्ति के नाम पर लेकिन जाति के नाम पर नहीं ! हां, प्रत्याशी सवर्ण हो तो उसे कुछ वोट जाति आधार पर भी मिल सकते हैं किंतु सिर्फ जाति को लेकर चुनाव में खड़ा होगा तो उसकी जमानत जब्त होनी तय है। इस समाज में कुछ जातिवादी उसी तरह हैं जैसे अन्य जातियों में कुछ ही जातिवादी नहीं हैं।
सवर्ण समाज की यह नाकामी बिल्कुल नहीं है कि वह जातिवाद पर रीझ नहीं रहा, जाति के नाम पर एक नहीं हो रहा; यह तो उसकी सबसे बड़ी खूबी है। सवर्ण एक है- राष्ट्र के नाम पर, भले नहीं है जाति के नाम पर। यह बात देश की सियासत भी समझती है। इसलिए सवर्णों से वोट लेने के लिए कोई नेता कभी सवर्ण को नहीं पुकारता है, वह देश को पुकारता है जैसे कि मोदी ने पुकारा था। ओबीसी मोदी को सबसे अधिक वोट सवर्णों ने दिए थे। नेता की सबसे कम जाति यही समाज देखता है इसीलिए तो इस समाज का कोई घोषित नेता नहीं है जबकि अधिकतर जातियां अपनी जाति की पुकार होते ही एकत्र हो जाती हैं इसीलिए इन जातियों के अपने नेता हैं। सवर्ण वोटर तो है पर वोट बैंक नहीं है जिसपर कोई डाका डाल सके। इस देश में यदि सबसे कम जातीय भावना वाला समाज है तो वह सवर्ण ही है लेकिन देखिए कि गजब की ब्रांडिंग की गई है कि सबसे अधिक जातिवादी, मनुवादी भी यही समाज घोषित है।
कामचोर नेताओं की मजबूरी है। नेता चाहते हैं कि वास्तविक स्थिति कुछ भी हो, लगना ऐसा चाहिए कि दलितों का शोषण किया जा रहा है और सवर्ण ही वह शोषक है। 1000 वर्षों के शोषण की गढ़ी गई और बार-बार दोहराई जाने वाली कहानी के पीछे यही मंशा है। सबको पता है कि सवा अरब की आबादी वाले बड़े देश में सभी वंचितों, गरीबों को राहत देना बड़ा काम है इसलिए नेताओं ने सुविधाजनक काम चुना है- सिर्फ दलितों को ही वंचित घोषित कर सिर्फ इनके लिए ही काम करने का। बावजूद यह काम भी ईमानदारी से नहीं किया। आज भी दलितों का जो वंचित तबका है, वह कमोबेश उसी हाल में है। इन नेताओं की मंशा है कि समाज का एक हिस्सा यूं ही रहे ताकि इससे कभी जाति के नाम पर रिझाकर वोट लिया जा सके तो कभी सवर्णों से डराकर। दलितों का वोट सिर्फ जाति के नाम पर ही हासिल किया जा सके इसके लिए इनका सवर्णों से नफरत करते रहना जरूरी है। यही नेताओं की सोच है, खासकर दलित-पिछड़ों की ही राजनीति करने वाले नेताओं की राजनीति का आधार ही यही है। देश की इसी ओछी राजनीति ने दलितों, पिछड़ों को निरीह और सवर्णों को शैतान के रूप में प्रस्तुत किया है। नेताओं के इस तरह के राजनीतिक षड्यंत्र के बाद भी यदि सवर्ण उतना जातिवादी नहीं हुआ है तो यह अच्छा है। यदि जाति के नाम पर सवर्ण एक नहीं है तो यह इसकी खूबी है, न कि नाकामी। सवर्ण देश के नाम पर एक है। इसी तरह की जागरूकता सभी जातीय समाज में होनी चाहिए।

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देश से सवर्णों को मिटाने की राजनीति !

उत्तर प्रदेश में मायावती ने नारा दिया था— तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। तिलक माने कि ब्राह्मण। तराजू माने कि बनिया और तलवार यानी कि क्षत्रिय। इन सभी को जूते मारो!
क्या बात है! इतनी नफरत? एक दलित नेता साफ तौर पर सवर्णों को जूते मारने के लिए कह रही है और सभा में दलित तालियां बजा रहे हैं। बजाएं भी क्यों नहीं इन्हें बताया गया है कि 1000 वर्षों तक सवर्णों ने इनका शोषण किया है। कमाल की बात है कि दलितों के मन में सवर्णों के प्रति नफरत भरकर, सवर्णों को जूते मारने की बात कहकर ये नेता कहते हैं कि दोनों एक थाली में क्यों नहीं खाते?
हम मानते हैं कि कभी धर्म की खामियों के कारण दलितों को नुकसान हुआ था, किंतु अब भी यदि सवर्ण और दलित एक थाली में नहीं खा पा रहे तो उसकी असली वजह यह दलित राजनीति ही है…।
अच्छा! कमाल की बात यह भी है कि जो मायावती दलितों की ब्रांडेड नेता हैं, वह सवर्णों को जूते मार सकती हैं। फिर भी दबंग कौन? शोषक कौन जूते खाने वाला सवर्ण ही न! और शोषित कौन? जूते मारने वाली मायावती न!
जिस तरह खुलेआम सवर्णों को जूते मारने की बात की जाती है, यदि दलितों को कह दी जाए तो? बवाल मच जाएगा न? गाली पर ही गिरफ्तारी है, जूते पर क्या होगा? लेकिन, कितना आसान है सवर्णों को जूते मारना…।
यह कुछ जातियों को खुलेआम जूते मारने की बात कहना— क्या इससे बड़ा भी कोई मनुवाद हो सकता है? क्या मायावती से बड़ा कोई मनुवादी है? इसके बाद भी मनुवादी कौन है— सवर्ण! कितनी अजीब बात है कि इस तरह के मनुवादी नेता खुद को ​दलित, शोषित, पिछड़ा बताते हैं और देश का संविधान तक मान लेता है? सिर्फ जाति के कारण। इतनी दुर्भावना! ओह! 1000 वर्षों का शोषित, सताया समाज है, यह तो जूते मार ही सकता है…।
बिहार में लालू प्रसाद ने कहा था— भूरा बाल साफ करो। भू यानी भूमिहार, रा यानी राजपूत, बा यानी ब्राह्मण और ल यानी लाला—कायस्थ। भूरा बाल साफ करो यानी कि सवर्णों को साफ कर दो। इस तरह किसी और जाति को साफ करने की बात कभी किसी नेता ने कही है? कही जा सकती है? कह दे तो? बवाल मच जाएगा न? लेकिन, सवर्णों को साफ करने की बात कोई भी कह सकता है! और गजब की बात है कि फिर भी दबंग कौन है? शोषक कौन है? सवर्ण!
सवर्णों को सीधे साफ करने, मार देने की बातें मंचों से हो रही है लेकिन कहीं कोई एफआईआर नहीं! कोई गिरफ्तारी नहीं! कोई हो-हल्ला नहीं! सवर्ण मारा भी जाए तो कोई बात नहीं क्योंकि यह समाज 1000 वर्षों का ऐतिहासिक शोषक है। सवर्ण तो कहे भी कि उसे किसी ने गाली दी है तो नहीं माना जाएगा। उसे कोई गाली कैसे दे सकता है? और गाली दे भी दे तो उसे लग कैसे सकता है? गाली तो सिर्फ कथित दलित, पिछड़ों को आहत करती है…।
दलित, पिछड़ी राजनीति के नाम पर इस समय देश में सवर्णों के खिलाफ खुलेआम जहर बांटा जा रहा है। कभी सीधे—सीधे सवर्णों को साफ करने की बात कहकर तो कभी दलितों को खुश करने के लिए उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण, नौकरी, प्रोन्नति देकर। देश में सवर्णों को साफ करने की बात ही नहीं कही जा रही, इसके लिए बकायदा इंतजाम किए जा रहे हैं। धीरे—धीरे सबकुछ सवर्णों से छीना जा रहा है। पहचान के लिए बस अब मताधिकार ही रह गया है जो बताता है कि सवर्ण इस देश का नागरिक है। इसके बाद भी उसके लिए कहीं कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि सबको बताया गया है कि सवर्ण 1000 वर्षों का शोषक समाज है।

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यह सवर्ण 1000 वर्षों का हिसाब चुकाने के लिए तैयार है !

हम जन्म से हिंदू हैं। यह मेरा धर्म है, मेरी संस्कृति है किंतु हमें किसी अन्य के मुस्लिम, इसाई होने से भी कोई दिक्कत नहीं है।
हम ब्राह्मण हैं। यह मेरी जाति है, इससे मेरा संस्कार है​ किंतु हम जातिवादी नहीं हैं। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं कि अन्य किस जाति के हैं। किंतु, क्या इसका कोई अर्थ है? इस भाव के बाद भी मेरी पहचान क्या है? सवर्ण ही न! समाज के लिए भी, संविधान के लिए भी, सरकार के लिए भी!
हमने तो एक चीटी भी नहीं मारी लेकिन इसके बाद भी हमपर 1000 वर्षों के शोषण का इल्जाम आता है तो हम तो बन गए न बैठे—बिठाए गुनहगार! और सवर्ण होने की सजा देखिए- हमारा राशन बंद, स्कॉलरशिप बंद, एडमिशन बंद। नौकरी बंद। प्रोन्नति बंद। और जेल भी भेजा जाना तय! बेगुनाही साबित करने तक का मौका नहीं! माने मानवाधिकार भी गए तेल लेने! इतना जुल्म! क्यों? अच्छा समझे! 1000 वर्षों तक हमने जुल्म जो ढ़ाया है …! सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यदि बेहयाई से यह दलील रख ही दी है कि कुछ जातियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए आंकड़े की जरूरत नहीं है क्योंकि ये 1000 वर्षों से सताए हुए हैं तो क्या आश्चर्य है यदि आगे कभी एससी-एसटी एक्ट पर चर्चा हो तो यह दलील भी प्रस्तुत कर दे कि सवर्णों को सजा देने के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं क्योंकि इनके जुल्म का इतिहास 1000 वर्ष पुराना है? यह एक्ट बना भी तो इसी भाव से है!
…तो यदि सवर्ण का भाव न होकर भी हमारी पहचान यही है और इसी के कारण निर्दोष होकर भी हम दंड के भागी हैं तो कब तक सफाई देते रहेंगे कि हम वैसे सवर्ण नहीं हैं जैसा सरकार बता रही। यदि समाज को एक अच्छा इंसान नहीं चाहिए, देश—सरकार को एक अच्छा नागरिक नहीं चाहिए तो देते हैं न वही, जो चाहिए। सरकार ने तो हमें सवर्ण मान ही लिया है, तो चलो सरकार को हम भी सवर्ण बनकर दिखलाते हैं। इन सरकारों से बहुत चोट खा चुके भाई, अबकी सबक हम भी सिखलाते हैं।
आश्चर्य न कीजिए! हमने तो हमेशा यही चाहा है कि मेरा धर्म, मेरी जाति मेरी निजी आस्था, पहचान तक ही रहे। देश के लिए मेरी पहचान उसके एक नागरिक के रूप में हो। किंतु इस देश को नागरिक चाहिए क्या? सरकार हमें नागरिक मानती है क्या? सरकार ने तो हमें या किसी को भी नागरिक के रूप में कभी देखा ही नहीं। उसने तो हमारे धर्म, जाति को ही हमारी मौलिक पहचान घोषित कर रखी है। हमने तो यही चाहा कि यह वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था धीरे—धीरे समाज से भी खत्म हो, इसका भाव खत्म हो किंतु यदि इसे संविधान से लेकर सरकार तक में जगह मिल गई तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? समाज में जाति व्यवस्था के लिए यदि हम दोषी हैं तो इस जातिवादी संविधान के लिए कौन दोषी है जो सबकी जाति देखता है? इस जातिवादी सरकार के लिए कौन दोषी है, जो हर फैसले जाति देखकर लेती है? यह तो किसी को गरीब भी मानते हैं तो धन नहीं, जाति देखकर। सवर्ण भी मानते हैं, तो कर्म नहीं वर्ण देखकर। इसके लिए दोषी कौन है? क्या इसके लिए भी सवर्ण? हमें तो यह समझ में नहीं आता कि आखिर यह बात इस देश के संविधान, सरकार को किसने बताई कि हम सवर्ण हैं? हम तो सर्टिफिकेट लेकर आए नहीं थे? किसी को दिखाए भी नहीं थे? जातियों का सर्टिफिकेट भी तो संविधान, सरकार ने ही मिलकर बांटा लेकिन दोषी कौन? सवर्ण! इस समय हर जाति के पास उसका सर्टिफिकेट है इसके बाद भी जातिवादी कौन है? सवर्ण! तो चलो न जब यही पहचान गई तो इसी के साथ कुछ वक्त बिताते हैं, सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनकर दिखाते हैं!
संविधान ने सबको एक समान माना है किंतु क्या वह अभी कहीं लागू है? यह बात देश के संविधान और सरकार को किसने बताई कि किन जातियों को गाली दी जाए तो उनकी भावना आहत हो जाती है और किनको दी जाए तो उनका सम्मान बढ़ जाता है? गाली तो गाली है न! फिर, बभना, ठकुरा गाली क्यों नहीं और बाकी गाली क्यों है? यह परिभाषा किसने गढ़ी? कैसे? सरकार की कोई समिति बनी थी? यह एससी—एक्ट बनाने वाली सरकार जातिवादी नहीं है जो जाति देखकर गाली को गाली परिभाषित कर रही है? जाति देखकर जेल भेज रही है? तो जातिवादी कौन है? सवर्ण? यानी, संविधान से लेकर सरकार तक दुर्भावना से ग्रसित किंतु निर्लज्जता ऐसी कि दुर्भावनाग्रस्त भी बताया जाएगा सवर्ण ही!
1000 वर्षों का शोषण है! किसने किया, किससे किया? उसमें जीवित कौन है? यह सब कौन पूछता है? कौन जवाब भी देता है? बस शोषण हुआ है! और इस शोषण का बदला तो लिया जाएगा! यह संविधान, यह सरकार हिसाब चुकता करेगी। किससे बदला लेंगे? कोई तो होना चाहिए? 1000 वर्षों के शोषण का हिसाब सवर्ण चुकाएगा! संविधान, सरकार दोनों ने मान लिया है कि देश का यह वर्ग स्वभाव से आततायी है, जुल्मी है। इसे सजा देनी है, बराबर देनी है। तब तक जब तक कि यह घुटने पर न आ जाए। रेंगने न लग जाए। दोनों ने यह भी मान लिया है कि देश का एक वर्ग शोषित है, उसके साथ सदियों तक शोषण हुआ है। उसे इंसाफ दिलाना है, बराबर दिलाना है। तब तक जब तक कि वह खुद शोषक न बन जाए। इसलिए एक बच्चे के अयोग्य होने पर भी उसे स्कूल में प्रवेश दिलाना है, धनी होते हुए भी स्कॉलरशिप दिलानी है, अयोग्य होते हुए भी नौकरी दिलानी है और प्रोन्नति भी। क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषित है! एक और बच्चा है। वह गरीब है किंतु स्कॉलरशिप नहीं देनी, वह योग्य है किंतु स्कूल में प्रवेश नहीं देना, नौकरी भी नहीं देनी और नौकरी नहीं तो प्रोन्नति कैसी? क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषण करता आ रहा है!
सवाल है कि यह सवर्ण कौन है? इससे इतना डर क्यों है? क्या यह समाज—देश के लिए विलेन है? बॉलीवुड की किसी फिल्म से भी बड़ा? किस निर्देशक ने यह चरित्र गढ़ा है कि संविधान से लेकर सरकार और यहां तक कि समाज तक सभी डरे सहमे हुए हैं? डरना तो होगा क्योंकि निर्देशक ने यह भी बताया है कि सवर्ण जातियों के शोषण का इतिहास 1000 वर्षों का है! और कितने पर्यायवाची, परिभाषाएं भी गढ़े हैं! मनुवादी, जातिवादी, अगड़ी जाति, सवर्ण! क्या गजब का विरोधाभास है कि जिनके साथ सबसे अधिक असामान्य व्यवहार होता है, वह सामान्य जातियां कहलाती हैं— सवर्ण। संविधान, सरकार के लिए जो स्पेशल नहीं है, वह​ जनरल है— सवर्ण। सरकार हर नीचता जिनके साथ करे, वह उंची जातियां हैं— सवर्ण। जो जातियां बैकवर्ड भी हैं तो संविधान में फारवर्ड हैं, वह हैं सवर्ण। लोवर भी हैं तो अपर हैं माने सवर्ण। पिछड़ी भी हैं तो अगड़ी हैं तो सवर्ण। जो अनारक्षित हैं, वह सवर्ण। जो डिज्वर्ड हैं तो भी अनरिजव्र्ड हैं, वह है सवर्ण! अब यदि सवर्ण ठहराने के लिए इतना कुछ गढ़ा है तो मेहनत जाया क्यों जाने दें? यदि सरकार की इतनी जिद है तो क्यों न अपनी भी जिद दिखलाएं। सवर्ण कहलाएं ही क्यों, चलो सवर्ण बन भी जाएं!
सवर्ण! सरकार के लिए वह पुतला जिस पर हर तरह के टेस्ट किए जा सकें। जो खेत में खड़ा होकर फसल की रखवाली करे किंतु उस पर हक न जताए। देश में रहकर राष्ट्रभक्ति से आगे निकल सरकार भक्ति दिखलाए किंतु देश के संसाधनों पर उसका हक न हो। हिन्दू खतरे में तो सवर्ण आगे आए, समाज खतरे में तो सवर्ण आगे आए, राष्ट्र खतरे में तो उसे आवाज दी जाए, बस वह पहरेदार बना रहे हिंदुत्व का, धर्म का, राष्ट्र का… वह संसाधनों की रखवाली करता रहे क्योंकि उसके उपभोग का पहला, दूसरा, तीसरा सारा हक किसी और के पास है। सवर्ण माने कि बिना जांच दोषी मान लिया जाए, गिरफ्तार हो जाए। जो देश में 131 लोकसभा सीटों से सांसद बनने का ख्वाब भी न देख सके, वह सवर्ण। जिसे 1225 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार न हो, वह सवर्ण। जिसे सजा देने के लिए अलग से न्यायालय, थाने खोले जाएं, वह सवर्ण। जो योग्य होकर भी देश के 50 फीसदी सरकारी पदों के लिए कोशिश करने से भी वंचित कर दिया जाए, वह सवर्ण। कुछ राज्यों में तो जो सरकारी नौकरियों से प्रायः पूरी तरह वंचित कर दिया जाए वही सवर्ण!
सवर्ण! सवर्ण! सवर्ण! अब जब हमारी सरकारी पहचान सवर्ण ही है और हिसाब भी 1000 वर्षों का है तो हम हिसाब चुकाने के लिए तैयार हैं! कोई सफाई नहीं, हम सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनने को भी तैयार हैं! अभी तक देश—समाज ने माना है, आज हम स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं! साथ ही यदि इतनी सरकारी प्रताड़ना के बाद भी किसी भाई का कुछ हिसाब रह गया है तो हम चुकता करने के लिए तैयार बैठे हैं। जिस किसी भाई का हमसे सिर्फ इसलिए दुराव है कि हम सवर्ण हैं तो वह अपने दस-बीस पुश्त का इतिहास लेकर सामने आएं और बताएं कि मेरे किस दादा या परदादा ने उनके किस दादा या परदादा से काम कराया लेकिन पारिश्रमिक नहीं दिया। जब पैसे मांगे तब किसने किसको कोड़े बरसाए। किस कुएं में पानी पीने गए थे तो किसने रोक दिया था? पहले हिसाब दें, फिर चुकता करने के लिए भी हम तैयार हैं! हम तैयार हैं उस सरकार, व्यवस्था से भी हिसाब चुकता करने के लिए जो 1000 वर्षों का बदला ले रही है। हम आज, अभी उस चुनाव का बहिष्कार करते हैं जिसके जरिये देश के लिए नहीं, कुछ जातियों के लिए सरकार चुनी जाती है। सरकार ने जिन्हें सवर्ण घोषित किया है, हम उन सभी जातियों के लोगों का भी आवाह्न करते हैं कि स्वयं भी अपने को सवर्ण घोषित करें और उस चुनाव का बहिष्कार कर दें जिसमें आपके लिए कुछ भी नहीं है। आप किसी को भी चुनें लेकिन यदि वह आपसे 1000 वर्षों की दुर्भावना लिए बैठा है तो वह आपके साथ न्याय नहीं कर सकता। चूंकि सब यही करते हैं इसलिए जरूरी है कि एक चुनाव ऐसा जाने दीजिए जिसमें किसी को न चुनिए। बस एक चुनाव शांत हो जाइए, यह शांति तूफान का काम करेगी और बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार कोई भी हो, उसका रवैया सवर्णों के साथ एक जैसा है। ऐसे में कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके वोट न देने से सरकार किसकी बनेगी। हां, जिनकी नहीं बनेगी उन्हें सबक मिलेगा और जिनकी बनेगी उन्हें यह संदेश कि अब और ज्यादती कि तो उनकी भी सरकार जानी तय है। साथ ही चुप न रहें। देश-समाज विरोधी जातिवादी कानून, व्यवस्था, सरकार सबके खिलाफ आवाज उठाएं। लिखें, बोलें, शेयर करें। अंदर के गुस्से को इतना फैलाएं कि वह संसद तक पहुंच पाए। अस्तित्व रक्षा का अब बस यही एक उपाय है! करो या मरो!

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पाकिस्तान में इमरान तो भारत में…?

पाकिस्तान में कल हुए आम चुनाव का आज परिणाम आ रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीति के खिलाड़ी बने इमरान खान की पार्टी तहरीक—ए—इंसाफ (पीटीआई) देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई साफ नजर आ रही है वहीं जेल में बंद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएलएम-एन) दूसरे नंबर पर चल रही है। चुनाव परिणाम इससे थोड़ा ही इधर—उधर होगा। पीटीआई को पूर्ण बहुमत न मिला तो भी गठबंधन कर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो ही जाएंगे…।
यूं तो इमरान पाकिस्तान की जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता हैं लेकिन वह खुद कितने लोकतांत्रिक हैं, इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में, यदि अलोकतांत्रिक विचारों वाले इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत—पाक में शांति वार्ता जैसी कोई चीज रह जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। युद्ध की संभावना न हो तो भी सीमा पर घुसपैठ बढ़नी तय है क्योंकि पाकिस्तान में सेना की सत्ता नहीं होगी तो भी इमरान के रूप में कमोबेश उसका ही नेतृत्व होगा।
अब ऐसे में, 2019 में होने वाले चुनाव में भारत को ऐसा प्रधानमंत्री देना होगा जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देना जानता हो। जो इतना उतावला न हो कि देश को बेमतलब युद्ध की आग में झोंक दे लेकिन इतना कायर भी न हो कि घुसपैठ बर्दाश्त करता रहे, आतंकी गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहे।
भारत में वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के लिए दो ही उम्मीदवार सामने हैं। एक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी।
नरेंद्र मोदी अपने वादे पर काफी हद तक खरे नहीं उतर पाए हैं। आतंक के मुद्दे पर बात करें तो सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही दिखता है। खासकर, कश्मीर मुद्दे पर तो मोदी अपना कोई वादा नहीं निभा पाए। न कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने का और न ही धारा 370 हटाने का। इतना ही नहीं, रमजान में मुस्लिम तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए मोदी सरकार ने ऐसा निर्णय लिया जिससे सैनिकों को बिना लड़े ही मौत के मुंह में समा जाना पड़ा। सरकार ने देशद्रोहियों से केस वापस लिए और जिन पर केस चल रहे हैं, उनमें अधिकतर मामले में अभी तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं करा पाई। राफेल डील में विपक्ष के कुतर्कों को छोड़ दें तो सही सवालों का भी जवाब दे पाने में मोदी असफल रहे हैं। वह नहीं बता पा रहे कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसी कंपनी से करार किया जा रहा, जो अनुभवहीन है। कई मसले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह सरकार देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने में नाकाम है…।
राहुल गांधी की बात करें तो नरेंद्र मोदी से तुलना करने के लिए उनका कोई कार्यकाल तो नहीं है, लेकिन उनके विचार और व्यवहार सामने हैं जिसे देखकर कतई नहीं लगता कि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो आतंक का करारा जवाब दे पाएंगे। यह मोदी सरकार की नाकामी है कि जेएनयू में देशविरोधी नारों की सच्चाई अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है लेकिन देशद्रोह का आरोप लगने के साथ ही आरोपितों के बचाव में उतर जाना बताता है कि राहुल गांधी कभी—कभी किस हद तक गिर सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कठुआ में कुछ लोग दुष्कर्म के आरोपितों के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह सही है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी करार न ​दे दिया जाए, वह दोषी नहीं है लेकिन यदि वह आरोपित भी है तो संदिग्ध तो है ही। ऐसे व्यक्ति का बचाव, उसके गुनाह पर पर्दा डालना ही है। इस तरह आतंकियों, देश द्रोहियों से मुकाबले के मामले में मोदी की अपेक्षा राहुल का व्यवहार अधिक संदिग्ध दिखता है।
बात सच्चाई की करें तो मोदी और राहुल दोनों ही कई बार झूठ बोल चुके हैं। मोदी चुनावी सभाओं में झूठ बोलते हैं लेकिन राहुल ने तो पिछले दिनों राफेल डील मुद्दे पर भरी संसद में ही झूठ बोला, वह भी तब जबकि यह डील कांग्रेस ने ही की थी।
अब बात यदि व्यवहारिक समझ, ज्ञान की करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी मोदी के सामने दूर—दूर तक नहीं टिकते। डिग्री किसकी सही है, यह तो जांच में ही सामने आएगा लेकिन पढ़ार्इ ठीक से नहीं की है राहुल ने यह बार—बार वह खुद साबित कर चुके हैं। मोदी का तो इतिहास ज्ञान ही अनूठा है लेकिन राहुल का व्यवहारिक ज्ञान भी। पिछले दिनों वे नहीं बता पाए कि एनसीसी क्या है? हद है, इस देश में रहकर राहुल एनसीसी नहीं जानते। ऐसा कई बार हुआ है, जब राहुल की अज्ञानता साफ झलकी है और ताज्जुब है कि इसे दूर करने के लिए वह कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। शायद, इसकी उन्हें जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाने वाली उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति है।
अब बात यदि राजनीतिक अनुभव की करें तो कुछ कहना ही नहीं है…। जितनी उम्र है राहुल की, कमोबेश उतना अनुभव है मोदी का। राहुल में यही खूबी हैं कि वह युवा है लेकिन कार्य करने की उर्जा मोदी में उनसे भी अधिक है।
भ्रष्टाचार की बात करें तो न तो स्पष्ट रूप से मोदी के बारे में ही ऐसा कहा जा सकता है और न ही राहुल के बारे में ही लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों पर ही कई आरोप लग चुके हैं। बड़ी बात है कि राहुल गांधी हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं और उसकी सुनवाई चल रही है जबकि मोदी पर अभी तक अधिकतर आरोप, आरोप ही हैं। जिस दंगे के लिए उनकी छवि खराब की गई या जिसकी बदौलत वह इतने बड़े नेता बने, उस मामले में भी वह बरी हो चुके हैं।
इस तरह मेरा निजी विचार है कि 2019 में यदि दोनों में से किसी को न चुनना पड़े तो सबसे अच्छा लेकिन यदि कोई तीसरा चेहरा सामने नहीं आता है, और चुनाव राहुल व मोदी में से ही किसी का करना पड़ता है तो मौका नरेंद्र मोदी को ही देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो हम ऐसी स्थिति में नोटा ही दबाएंगे क्योंकि राहुल से हमें कोई उम्मीद नहीं और मोदी ने उम्मीदों को तोड़ा है।

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जूठा बर्तन धो रहा वीर जवान… न धुलेगा सरकार का यह गुनाह

तस्वीर साभार : नवभारत टाइम्स

यह सतवीर सिंह हैं। लांस नायक सतवीर सिंह। 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दिल्ली से एकमात्र जांबाज, जिनपर दिल्ली ही नहीं; समस्त राष्ट्र को गर्व है किंतु आज यह दूसरों की जूठी प्लेट धो रहे हैं और इस हालात पर सिर्फ दिल्ली ही नहीं, समस्त राष्ट्र को शर्म आनी चाहिए। यह तस्वीर देखने के बाद राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार को तो​ चुल्लूभर पानी के बिना ही शर्म से ही मर जाना चाहिए।

आज विजय दिवस है। कारगिल युद्ध में विजय का दिवस। आॅपरेशन विजय की सफलता ​का दिवस। पाकिस्तान को धूल चटाने का दिवस लेकिन कैसी खुशी? कैसा जश्न? क्या यह तस्वीर किसी राष्ट्रप्रेमी को खुश होने देगी? क्या यह तस्वीर तब से अब तक ​की किसी भी सरकार को माफ करेगी जिन्होंने अपने ही सैनिक को खून के आंसू रुलाए हैं? क्या यह तस्वीर वह आइना नहीं है, जिसमें आज की सत्ता की वास्तविक तस्वीर दिख रही है? सत्ता की इतनी घिनौनी तस्वीर देखने के बाद सिर्फ घृणा हो सकती है, क्रोध आ सकता है; खुशी तो कदापि नहीं हो सकती। नहीं, जब तक यह तस्वीर बदल नहीं जाती, विजय दिवस पर भी विजय का आभास नहीं हो सकता, विजय का आनंद कदापि नहीं हो सकता…।

आजाद देश की सरकार ने सतवीर के साथ कुछ वैसा ही सुलूक किया है, जैसा गुलाम भारत में अंग्रेज भारतीय सैनिकों के साथ किया करते थे। काम निकल गया तो सतवीर को उनके हाल पर छोड़ दिया लेकिन, प्रणाम है सतवीर को कि इतनी उपेक्षाओं के बाद भी इनके देशप्रेम में रत्तीभर भी कमी नहीं आई है। ईमानदारी से अपना कर्म करते हैं। यह देश और सैन्य निष्ठा ही है कि जूठी थाली धोते समय भी इनके सिर पर फौज की टोपी होती है। आखिरकार, सरकार के देश प्रेम और एक नागरिक व सैनिक के देश प्रेम में अंतर जो है। कितनी बड़ी बात है कि 19 साल से पाकिस्तान की एक गोली शरीर में आज भी फंसी हुई है। अफसोस है कि चल—फिर नहीं सकते। बैसाखी ही सहारा है लेकिन हमें भरोसा है कि जब तक सतवीर जैसे वीर हैं, यह देश बेसहारा हरगिज नहीं है। राजनीतिक दलों, नेताओं और सरकार के स्वार्थप्रेरित कथित राष्ट्रवाद से इतर, देश के एक सच्चे नागरिक, एक सैनिक का यह राष्ट्रवाद ही वास्तविक राष्ट्रवाद है जो अनुकरणीय है, प्रेरणादायक है। आइए, वीर सतवीर सहित उन सभी सैनिकों के शौर्य को याद करें जिन्होंने दुश्मन की गोलियों के लिए अपने शरीर की इंच—इंच जगह दे दी लेकिन देश की जमीन की एक इंच न दी…।

1999 में लाहौर में घोषणा पत्र पर भारत और पाक ने हस्ताक्षर किए थे कि कश्मीर मुद्दे को शांतिपूर्ण ढंग से हल करेंगे लेकिन पाकिस्तान के मन में खोंट था। पाक की सेना नियंत्रण रेखा को पार कर भारत में घुस आई। कश्मीर और लद्दाख के बीच की कड़ी को नेस्तनाबूद कर भारतीय सेना को सियाचिन ग्लेशियर से हटाने के मंसूबे से पाकिस्तान ने गुप्त रूप से ऑपरेशन बद्र की शुरुआत कर दी। पहले तो भारत को लगा कि यह छोटी—मोटी घुसपैठ है लेकिन कुछ ही दिनों में समझ में आ गया कि यह तो आक्रमण है, हमला है। बस क्या था, भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय की घोषणा कर दी और करीब 2 लाख जांबाज सैनिकों को युद्ध के मैदान में उतार दिया। राष्ट्रप्रेम के जज्बे से ओत—प्रोत सैनिकों ने पाकिस्तान के दांत खट्टे कर दिए। करीब दो महीने तक वीर जवान बॉर्डर पर जमे रहे, जब तक कि पाकिस्तान ने हाथ न खड़े कर दिए। 527 जवानों ने शहादत दी, 1,300 से ज्यादा घायल हुए, कई जीवनभर के लिए अपाहिज हो गए, कई आज भी झूककर चलते हैं किंतु देश न झुकने दिया। इन्हीं में से एक हैं लांस नायक सतबीर सिंह जिनके पैर में दुश्मन की 2 गोलियां लगी थीं। एक तो निकल गई लेकिन दूसरी धंसी रह गई।

तस्वीर साभार : नवभारत टाइम्स

सतवीर बताते हैं, 13 जून 1999 की सुबह कारगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर उनकी ड्यूटी थी। वहां पाकिस्तानी सैनिकों से आमना-सामना हो गया। मात्र 15 मीटर की दूरी पर पाकिस्तान सैनिक थे। सतवीर की 9 सैनिकों की टुकड़ी थी, जिसकी अगुवाई वही कर रहे थे। सतवीर ने हैंड ग्रेनेड फेंका और एक झटके में सात पाकिस्तानी सैनिकों को उपर पहुंचा दिया। लगातार गोलियां चल रही थीं। दो गोलियां उन्हें भी लगीं। 17 घंटे तक पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। काफी खून बह चुका था। 3 बार उन्हें और अन्य घायल सैनिकों को लेने के लिए आर्मी का हेलीकॉप्टर आया लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग के कारण उतर नहीं पा रहा था। आखिरकार भारतीय सैनिक घायल सतवीर तक पहुंचे। एयरबस से उन्हें श्रीनगर ले गए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट किया गया। काफी दिन इलाज चला लेकिन एक गोली नहीं निकल पाई।

26 जुलाई, यानी आज के दिन युद्ध की समाप्ति की घोषणा की गई। सरकार ने घोषणा की कि युद्ध में शहीद जवानों की विधवाओं, घायल सैनिकों के लिए पेट्रोल पंप की व्यवस्था की जाएगी। उन्हें खेती के लिए जमीन मुहैया कराई जाएगी। किंतु, युद्ध के बाद सैनिकों के साथ किए वादे की भी परिणति उसी रूप में दिख रही है, जिस रूप में चुनाव में किए वादे की, उसके बाद दिखती है…। सतवीर को पेट्रोल पंप आज तक नहीं मिल सका। इतना ही नहीं, जीवनयापन के लिए करीब 5 बीघा जमीन दी गई थी। उस पर सतवीर ने मात्र तीन वर्षों तक ही खेती की और वह जमीन उनसे छीन ली गई। सुनकर रोना आ रहा है कि जिस वीर ने देश की रक्षा के लिए अपनी जान तक की परवाह नहीं की, उसकी परवाह सरकार ने किस तरह की कि सतवीर के 2 बेटों की पढ़ाई पैसों के अभाव में छूट गई। खर्च के लिए पेंशन कम पड़ी तो सतवीर ने जूस की दुकान खोल ली। अपनी दुकान पर जूठे बर्तन भी सतवीर ही धोते हैं…। हथियार चलाने वाले हाथों से जूठे बर्तन तो फिर भी धूल जाते हैं लेकिन देश चलाने वालों का यह गुनाह धोने से भी धुलने लायक नहीं है…।

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रेपिस्तान… फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

यह सही है कि रेप की कुछ घटनाओं के कारण देश वैसे ही रेपिस्तान नहीं कहा जा सकता जिस तरह कुछ ही अच्छी चीजों का उदाहरण प्रस्तुत कर इसे देवलोक नहीं कहा जा सकता, इसे रामराज की संज्ञा नहीं दी जा सकती…। जम्मू-कश्मीर के आइएएस शाह फैजल को रेपिस्तान जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था लेकिन यदि उन्होंने कहा है तो सरकार को भी इतना बुरा नहीं मानना चाहिए जबकि वह रेप की घटनाएं रोकने में ही नहीं, दोषियों को सजा देने तक में विफल है।
फैजल का ट्वीट है- 

“आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने रेपिस्तान पैदा कर दिया है।”

इस ट्वीट में यदि रेपिस्तान शब्द पर आपत्ति को छोड़ दें तो बाकी गलत क्या है, यह मेरी समझ से बाहर है। और यदि यह सारे कारण मिलते हैं तो इनसे रेपिस्तान का निर्माण हो रहा है, तो यह तर्क भी कहां गलत है? हो सकता है कि एक लोकसेवक होने के कारण फैजल को ऐसा ट्वीट नहीं करना चाहिए था लेकिन एक नागरिक के नाते तो वह कर ही सकते हैं न! क्या लोकसेवक एक नागरिक नहीं होता? क्या देश में अभिव्यक्ति की आजादी जैसा कुछ नहीं होता! क्या यह संविधानप्रदत्त अधिकार नहीं है? सरकार ने महज एक ट्वीट पर नोटिस भेज दिया है कि लोकसेवक को यह व्यवहार शोभा नहीं देता पर क्या सरकार को लोकसेवक के प्रति, देश के नागरिक के प्रति यह व्यवहार शोभा देता है? सबसे बड़ी बात तो यह कि फैजल के ट्वीट में कहीं भी सरकार का जिक्र नहीं है। फैजल ने सरकार की निंदा नहीं की है, बल्कि रसातल में जा रहे भारतीय समाज की चिंता की है। फैजल ने रेप के लिए जो कारण दिए हैं, उसके लिए भी सरकार से अधिक समाज ही कठघरे में है। इस तरह यह कहीं से भी सरकारविरोधी ट्वीट नहीं है लेकिन चूंकि सरकार अपनी नाकामियों के कारण हीन भावना से ग्रसित है इसलिए उसे कहीं से भी उठती कोई आवाज अपने विरुद्ध ही प्रतीत हो रही है। यदि सरकार अपना दिल बड़ा करे और रेप रोकने की दिशा में कुछ काम करे तो फैजल ने तो उसकी राह आसान ही की है। रेपमुक्त भारत ही नहीं, अपराधमुक्त भारत बनाने की राह। खुद मेरी नजर में भी रेप या अपराध के बड़े कारणों में सबसे उल्लेखनीय कारण यही हैं जो फैजल ने बताए हैं। इस ट्वीट के लिए फैजल को दंडित करने की बजाय, इनके सुझाए गए कारणों पर चिंतन कर इस दिशा में सरकारी और सामाजिक स्तर पर प्रयत्न किए जाने की जरूरत है।
फैजल ने सबसे पहले आबादी का जिक्र किया है। सोचकर देखिए, बढ़ती आबादी रेप ही नहीं, हर समस्या के लिए जिम्मेदार है; किसी के लिए कम तो किसी के लिए ज्यादा। यदि परिवार में पांच-छह बच्चे हों तो सबपर माता-पिता ठीक से ध्यान नहीं रख पाते, उन्हें शिक्षित, संस्कारित नहीं कर पाते। शिक्षाविहीन, संस्कारहीन नागरिक कैसा होगा? परिवार से आगे निकल यदि हम देश की बात करें तो सरकार खुद भी अक्सर बढ़ती आबादी का रोना रोती रहती है कि ‘इतने बड़े देश में सभी को रोजगार दे पाना मेरी तो क्या, किसी के वश की बात नहीं है।’ अब यदि सरकार के बूते में हर व्यक्ति को रोजगार देना नहीं है तो बेरोजगार आदमी करेगा क्या? अपराध ही तो करेगा?
सवाल उठता है कि जब सरकार को भी अच्छी तरह पता है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में वह सबको आवास, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार आदि मुहैया नहीं करा सकती तो वह इस देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए ही क्या प्रयास कर रही है? 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी एक अरब 21 करोड़ है, जो कि चीन से महज 10 करोड़ ही कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व की कुल आबादी में अकेले भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी है, जबकि हमारे पास दुनिया का केवल चार फीसदी पानी और 2.5 फीसदी ही जमीन है। जाहिर है कि सच में इतनी बड़ी आबादी की जरूरतें कैसे पूरी की जा सकती है? और यदि नहीं की जा सकती तो इस आबादी को बढ़ने क्यों दिया जा रहा है? अब जबकि जनसंख्या विस्फोटक स्तर पर पहुंच चुकी है, सरकार “हम दो— हमारे दो” से आगे बढ़कर “हम दो— हमारे एक” का नारा क्यों नहीं देती? नारा छोड़िए, यह अध्यादेश क्यों नहीं लाती कि जिन वर्तमान कपल की एक से अधिक संतान होगी, उन संतानों को हर तरह के सरकारी लाभ से महरूम कर दिया जाएगा? हर साल करोड़ों की आबादी पैदा करने से अच्छा है कि जो देश की आबादी है, उसी के भरण—पोषण का सही इंतजाम हो। यह कब होगा? आबादी को नियंत्रित करने के उपाय करने की बजाय, आबादी को एक समस्या के रूप में सामने रखने वाले आइएएस अधिकारी का उपाय करना कितना सही है? क्या सरकार को यह मिर्ची इसलिए लगी है कि वह बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल है?
पितृसत्तात्मक समाज। यह दूसरा कारण बताया है फैजल ने। क्या गलत कहा है? देश में अभी 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हैं। अभी भी बेटियों की भ्रूण हत्या हो रही है। कोई नहीं चाहता कि उसके घर बेटी हो। हो गई तो बेटे का इंतजार। यूं किसी को एक भी बेटी नहीं चाहिए लेकिन बेटे के इंतजार में दो—चार भी हो जाए तो क्रम नहीं रोका जाता जब​तक कि बेटा न हो जाए। अब बेटे के इंतजार में हुई बेटियों की क्या कद्र होगी? शुरू से ही भेदभाव…। पालन—पोषण से लेकर पढ़ाई तक में। बेटी थोड़ी बड़ी हुई तो परिवार पर उसकी इज्जत बचा लेने की चुनौती। और बड़ी हुई तो शादी की चुनौती। क्या बेटे—बेटी के मोर्चे पर समाज में दोहराव नहीं है? क्या पितृसत्तात्मक समाज नहीं है? और यदि है तो गलत क्या कहा है फैजल ने?
शराब। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सबसे ताज़ा रिपोर्ट (2016) के अनुसार, 95 प्रतिशत अपराधी पीड़िता के जानने वाले होते हैं। मां से, ​बहन से, रिश्तेदार से, बच्ची से, बुजुर्ग से बलात्कार करने वाले अक्सर नशे में ही होते हैं। हवस में डूबा आदमी जब शराब में डूब जाता है तो वह आदमी से आदमखोर बन जाता है, और इसलिए उसे किसी की चीख में भी आनंद मिल रहा होता है। यदि नशे में दुष्कर्म का आंकड़ा जुटाया जाए तो मेरा दावा है कि यह साबित हो जाएगा कि रेप की अधिकतर घटनाएं नशे में अंजाम दी जाती हैं और शराब रेप का एक बड़ा कारण है; यह बात तो साबित हो ही चुकी है कि घरेलू हिंसा का सबसे बड़ा कारण शराब ही है। आप कुछ न कीजिए। आप एक सप्ताह के अखबार से रेप की घटनाएं एकत्रित कीजिए। फिर देखिए कि नशे में कितनी वारदात हुई और होश में कितनी। आंकड़ा सामने होगा। शराब या कोई भी नशा सिर्फ रेप ही नहीं, अधिकतर अपराध की वजह है। जब यह कोई छुपी हुई बात नहीं है तो इसे फैजल ने सार्वजनिक कह दिया तो क्या गलत कह दिया?
अश्लीलता…। इस पर चर्चा करते ही कथित प्रगतिशील पुरुष और नारियां बिदकने लगते हैं क्योंकि उन्हें डर लगने लगता है कि जिस अश्लीलता को उन्होंने प्रगति का आवरण देकर ढंका है, कहीं वह सामने न आ जाए। वह भी अश्लील ही हैं, कहीं समाज यह भी न जान जाए। अश्लील का मतलब है जो नैतिक व सामाजिक आदर्शों से च्युत है। जो गंदा है। अश्लील बातें हो सकती हैं, अश्लील दृश्य हो सकता है, अश्लील शब्द हो सकते हैं, अश्लील पहनावा हो सकता है, अश्लील आचरण हो सकता है…। अश्लीलता किसी व्यक्ति के अंदर की वह गंदगी है, जो दूसरे व्यक्ति के अंदर की गंदगी को हवा देती है, शह देती है, उसे भड़काती है…। सोचकर भी नहीं बताया जा सकता कि कौन—सा क्षेत्र ऐसा बचा है, जहां अश्लीलता नहीं है, जहां अश्लील लोग नहीं हैं। मीडिया, साहित्य, संगीत, फिल्म, टीवी, राजनीति, सरकार से लेकर समाज तक…। यह अश्लीलता इस हद तक फैल चुकी है कि अब तो कुछ भी अश्लील नहीं लगता। सबकुछ यह कहकर स्वीकार कर लिया जाता है कि अब इतना तो चलता ही है! ऐसे माहौल में जहां अश्लीलता समय की मांग लगने लगी है, अश्लील लोग मॉडर्न और प्रगतिशील समझे जाने लगे हैं, वहां एक और अश्लीलता— रेप और एक और अश्लील— रेपिस्ट की उत्पत्ति पर क्या आश्चर्य है?
तकनीक। यौन इच्छाएं अपनी पूर्ति के लिए हर युग में मौजूद संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करती हैं। जब तकनीक नहीं थी, तब मस्तराम किसने नहीं पढ़ा? जिसने नहीं पढ़ा, उसने रसभरी कहानियां पढ़ लीं। कुछ न मिला तो सरस सलील ही खरीद ली। लेकिन बस। इससे अधिक कुछ भी चारा नहीं था। जिसने छुपकर कुछ अश्लील पढ़ा भी तो यहीं तक, देखा भी तो यहीं तक, सीखा भी तो यहीं तक। और अब? अश्लीलता तक किसकी पहुंच नहीं है? अश्लीलता की कौन—सी हद बाकी है? कोई सीमा है? यह तो पूरी तरह बच्चे के विवेक पर है न कि वह मोबाइल का डाटा क्या देखने, क्या पढ़ने पर खर्च कर रहा है? कोई रोक—टोक है? किसी भी स्तर पर? माहौल का व्यापक असर पड़ता है लेकिन कैसा माहौल है यह? व्यक्ति जो सोचता है, धीरे—धीरे वही बन जाता है लेकिन कौन जानता है कि मोबाइल पर पोर्न देखने वाले किसी बच्चे से लेकर कोई बुजुर्ग तक क्या सोचता है? फेसबुक के जरिये तो किशोरों के आतंकी तक बन जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लगातार रेप के क्लिप देख—देखकर यदि वे रेपिस्ट बन रहे हैं तो क्या आश्चर्य है? इस पर क्या नियंत्रण जरूरी नहीं है? तो क्या गलत कह दिया है फैजल ने?
अराजकता। अभी हाल ही में दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल में अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान पर उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यहां अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं है। जाहिर है कि अराजकता अच्छी बात नहीं है। सवाल है कि अराजकता है क्या? अराजकता से आशय है, देश में सरकार का न होना या होते हुए भी न होने जैसी स्थिति हो जाना। एक ऐसी स्थिति जिसमें कोई व्यवस्था न रह जाए। अनार्की। … तो कुछ हद तक इसमें भी क्या गलत है? रेप हो जाने के बाद किस पीड़िता को किसी व्यवस्था के होने का अहसास होगा? जो सरकार किसी लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती; उसके होने या न होने का क्या मतलब है? क्या यह अराजकता नहीं है? सबसे चर्चित निर्भया मामले में भी अभी तक दोषियों को उनके कुकर्म की सजा सुनाई भर गई है, उस पर अमल नहीं हुआ है। यह कौन—सी स्थिति है? न्याय में देरी भी एक अन्याय है तो क्या अन्याय अराजकता नहीं है? एक लड़की सिर्फ इसलिए सड़कों पर न निकल पाए क्योंकि वह लड़की है तो क्या यह अराजकता नहीं है? ऐसी व्यवस्था जिसमें न तो रेप करने से पहले ही रेपिस्ट डरता है और न ही किसी की इज्जत व जिंदगी छीन लेने के बाद ही उसके कृत्य के अनुरूप उसे सजा हो पाती है, फांसी हो पाती है तो यह कौन—सी स्थिति है? क्या यह अराजकता नहीं है?क्या यह अराजकता रेप के लिए किसी भी हद तक जिम्मेदार नहीं है?
रेपिस्तान। यानी वह दुनिया, जिसकी पहचान ही रेप है। फैजल के अनुसार, वह दुनिया जिसे आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने गढ़ा है। अब जबकि अराजकता ही है तो रेपिस्तान पर भी क्या आपत्ति है? इस देश में जहां हर 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है, यह रेपिस्तान नहीं तो और क्या है? फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

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पॉलीथिन बिकता रहेगा जब तक नीति और नीयत दोनों सही नहीं होगी…

नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में शपथपूर्वक कहा था कि गलती मुझसे भी हो सकती है लेकिन गलत नीयत से कोई काम नहीं करूंगा…।
दरअसल, यही नहीं हो पाता। सरकारों से गलतियां तो होती ही हैं, गलत नीयत भी खूब होती है। बल्कि, गलतियों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार नेताओं या सरकारों की गलत नीति नहीं, बल्कि गलत नीयत ही होती है। यह बात न तो किसी एक नेता पर लागू होती है और न ही किसी एक दल या सरकार पर; हमाम में सभी नंगे हैं…।
बात अभी उत्तर प्रदेश में पॉलीथिन बैन की हो रही है। सरकारी दावा है कि 15 जुलाई से प्रदेश में पॉलीथिन नजर नहीं आएगा। यह दावा नया नहीं है। योगी आदित्यनाथ से पहले ही यह दावा अखिलेश यादव कर चुके हैं। यूपी में वर्ष 2000 से ही पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है लेकिन चूंकि नीयत नहीं है इसलिए सरकार भले बदल गई लेकिन हालात वही हैं…।
हां, तो कैसे जानें कि किसी सरकार या नेता की नीयत है कि नहीं? है तो क्या है? क्योंकि नीति क्या है, यह तो सरकार खुद ही स्पष्ट कर देती है लेकिन नीयत वह छुपा ले जाती है। सवाल है कि नीयत जानें कैसे? हम बताते हैं…। आप अपनी आंख, कान, दिल, दिमाग को धर्म—जाति—नेता—दल आदि के मोह—माया से मुक्त कर सबसे पहले एक नागरिक बन जाइए। एक नागरिक के रूप में नेता की नीति का अध्ययन कीजिए, आपको उसकी नीयत साफ पता चल जाएगी। आपको पता है? जब कोई संपादक किसी पत्रकार की कॉपी पढ़ता है तो उसे सिर्फ खबर ही पता नहीं चलती है, उस खबर को लिखने का उद्देश्य भी पता चल जाता है, पत्रकार की नीयत भी पता चल जाती है…। आप पाठक तो हैं ही, सरकार की नीतियों का संपादक बन जाइए।​ फिर देखिए, आप बड़े आराम से नेता की नीति के जरिये उसकी नीयत तक पहुंच जाएंगे, जैसे कि संपादक खबर के जरिये उसके उद्देश्य तक पहुंच जाता है…।
हां तो पॉलीथिनमुक्त उत्तर प्रदेश की बात। बिल्कुल संभव है लेकिन तब जब नीयत हो। चूंकि नीयत में खोंट है इसलिए पॉलीथिमुक्त प्रदेश की कल्पना अभी बेमानी है।
ठेले—खोमचे पर पॉलीथिन में सब्जी बेचने वाले से पन्नी छीनी जा रही है और वजन देखकर जुर्माना भी ठोंका जा रहा है। इससे क्या होगा? पब्लिक तो तैयार ही नहीं, अपने घर से बैग ले जाने के लिए, बेचारा वह ठेले वाला क्या करे? क्या ठेले वाला वह गरीब आदमी उस पन्नी को बनाता है? यदि वह पन्नी नहीं बने तो? फिर जहां वह पन्नी बनती है, वह फैक्ट्री ही क्यों नहीं सीज कर दी जाती? यदि कर दी गई तो? फिर तो ठेले तक पॉलीथिन पहुंच ही नहीं पाएगा। फिर? फिर सरकार क्या करेगी? इतने अधिकारी बहाल किए हैं, वे क्या करेंगे? जिन अधिकारियों ने, जिन पुलिस वालों ने मूल वेतन के साथ ऊपरी आमदनी का ख्वाब देखकर सरकारी नौकरी ज्वाइन की है, उनका क्या होगा? भाई! यह सबकुछ यूंही चलता रहे, इसके लिए पॉलीथिन हमेशा बिकता रहेगा और जनता को शासन—प्रशासन का कुछ काम भी दिखता रहे, इसलिए प्रदेश को पॉलीथिनमुक्त किए जाने का कथित प्रयास भी चलता रहेगा।
यह सबकुछ साथ—साथ चलता है…। हर सरकार में चलता है। वैसे ही, जैसे दारू दुकानों को लाइसेंस देने का काम और नशामुक्ति का अभियान साथ—साथ चलता रहता है…। जैसे, रेप पर सख्त कानून बनाने और अपनी सरकार, अपने दल के आरोपियों को बचाने का काम साथ—साथ चलता रहता है…। यह समझ जाइएगा तो नीति और नीयत का अंतर भी समझ जाइएगा। यह नीति और नीयत वही दो पटरियां हैं जो दिखने में तो साथ—साथ चलती हैं लेकिन हकीकत में कहीं मिलती नहीं। इन्हीं पटरियों पर भारतीय राजनीति की रेलगाड़ी दौड़ती है…।
पिछले वर्ष 15 जून तक ही उत्तर-प्रदेश की सड़कों के सभी गढ्ढे भर लिए जाने थे, भरे गए? इसी तरह 15 जुलाई तक पॉलीथिन भी बंद नहीं होगा, आगे भी बिकता रहेगा…। यह सबकुछ यूंही चलता रहेगा… तब तक, जबतक कि सही नीति के साथ सही नीयत न हो …।

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आपको आदमी बनना है? इन पिशाचों से सीखिए…

महोबा की घटना है। कुछ सालों पूर्व पिता की मौत हो गई तो किशोरी परिवार के भरण-पोषण के लिए दुकानों में काम करने लगी। 13 दिसंबर 2017 को मकनियापुरा निवासी फारुख बहला-फुसला कर किशोरी को अपने साथ लेकर गया और सात दिन तक साथ रखकर दुष्कर्म किया। इसके बाद उसके साथियों ने भी सामूहिक दुष्कर्म किया। फिर किशोरी को कांशीराम कॉलोनी निवासी आॅटो चालक रियाज को बेच दिया। रियाज ने बजरिया में पांच दिन रखकर किशोरी से दुष्कर्म किया और फिर उसे ननौरा गांव निवासी अवनीश को बेच दिया।
अब यहां गौर करो पीड़ित या गुनहगार में हिंदू—मुसलमान ढूंढने वालो, देखो कि उनमें आपस में कोई भेदभाव नहीं है। पहले मुसलमान ने दुष्कर्म किया और फिर हिंदू ने। अब आगे सुनो।
अवनीश ने किशोरी को 15 दिन रखकर दुष्कर्म किया और फिर इकरार निवासी बेलाताल व बुधौरा निवासी देव साह को बेच दिया। इन दोनों ने भी किशोरी से दुष्कर्म किया और कई अन्य लोगों से कराया भी। किशोरी को फिर से अवनीश ने खरीद लिया। इसके बाद अवनिश ने किशोरी के सौदा बबलेश तिवारी निवासी सोनकपुरा लहचूरा झांसी से किया। उसने किशोरी को उसके हवाले कर दिया।
यहां फिर गौर करो पीड़ित की पीड़ा देखने से पहले ब्राह्मण—दलित करने वालो…। गुनहगारों में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है। वे एक हैं। पहले मुस्लिम ने दुष्कर्म किया, फिर हिंदू ने, फिर दलित ने, फिर ब्राह्मण ने…। दुष्कर्मियों की आपस में क्या गजब की एकता है! सीखो इन पिशाचों से।
परसो पुलिस ने छापा मारा और किशोरी बबलेश तिवारी के घर से बरामद हुई।
अब जरा सोचो। गत वर्ष दिसंबर से इस वर्ष की जुलाई तक एक किशोरी का वास्ता हर धर्म, हर जाति के लोगों से पड़ा और वह हर धर्म—हर जाति वालों से रौंदी जाती रही…। दुष्कर्मियों ने उसमें बस अपनी हवस देखी, आपकी तरह पीड़ित को पीड़ित और गुनहगार को गुनहगार कहने के लिए भी उसकी धर्म—जाति नहीं देखी। उस लड़की को तो खुदा का बंदा भी मिला तो न छोड़ा और ईश्वर की संतान भी लील गई। मनुवादी भी मिला, जय भीम—जय मीम कहने वाला भी लेकिन बचाया किसी ने भी नहीं, बल्कि रौंदा, जीभर रौंदा। इस सफर में उस लड़की को तलाश थी एक इंसान की जो उसे भी अपनी तरह एक इंसान समझे, लेकिन वह कहीं न मिला। अब इंसान बचा ही कहां है?
अब भी वक्त है। हम अपना मानवीय धर्म भूल बैठे हैं तो इन पिशाचों से ही सीख लें जो अपना कुकर्म नहीं भूले हैं। यदि हम पीड़ित का बचाव करने के लिए धर्म—जाति देखने लगे हैं तो इन पिशाचों से ही सीख लें जो साथ—साथ गुनाह करते हैं। यदि हम सबसे बड़े धर्म मानवता को भुलाकर मजहबों में बंट गए हैं तो इन पिशाचों से सीख लें जिनका एक ही धर्म है— आतंक, जुल्म। इस तरह एकजुट इन पिशाचों का मुकाबला यदि हम मानव बनकर नहीं बल्कि बल्कि धर्म—जाति का होकर करेंगे तो मानवता की रक्षा कहां संभव है? फिर तो एक दिन सब या तो शिकारी होंगे या शिकार। कोई बचाने वाला कहां होगा? पिशाचों की इस भीड़ में कोई मानव कहां होगा?

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हिंदू तो नियम पहले, मुस्लिम तो कैसा नियम? वाह तुष्टीकरण!

कल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में ठीक वैसी ही घटना हुई, जैसी परसो नोएडा में हुई थी। अंतर बस इतना है कि नोएडा वाले मामले की पात्र सादिया मुस्लिम हैं, एएमयू मामले के पात्र सत्यवीर हिन्दू हैं। लेकिन, देखिए कि कैसे हिन्दू होने पर नियम ही बड़े रहते हैं, धर्म नहीं। स्पष्ट है कि यह सहूलियत तो नेताओं, सरकार ने अभी बस इस्लाम अपना लेने वालों को दी हुई है। इसे सनातन धर्म छोड़ इस्लाम अपनाने वालों के लिए अघोषित मगर लागू प्रोत्साहन योजना समझ लीजिए…।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में एलएलएम में दाखिला के लिए कल इगलास के गांव तेहरा मुंज निवासी सत्यवीर सिंह पुत्र स्व. वेदराम परीक्षा देने पहुंचे। उन्हें परीक्षा देने से रोक दिया गया। सत्यवीर का आरोप है कि हाथ में कलावा एवं हिंदू धर्म का होने के कारण उन्हें परीक्षा से रोका गया है। सत्यवीर ने विधि विभाग के कर्मचारियों पर अभद्रता एवं अपशब्दों का प्रयोग करने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री से भी शिकायत की है…।

अब जानिए हुआ क्या! सादिया ने भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाते हुए सुषमा स्वराज को ट्वीट किया तो नियम न होते हुए भी उनके हाथ में पासपोर्ट आ गया था। सत्यवीर ने भी कल मानव संसाधन विकास विकास मंत्री से शिकायत की मगर कुछ न हुआ…। वह परीक्षा नहीं दे पाए। क्यों? क्योंकि सादिया मामले में सादिया का मुसलमान होना महत्वपूर्ण है, सत्यवीर मामले में नियम महत्वपूर्ण हैं…।

एएमयू पीआरओ ऑफिस के एमआईसी प्रो. शाफे किदवई ने का कहना है कि गाइड लाइन के अनुसार, एलएलएम की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए एलएलबी/बीएएलएलबी में 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य है। सत्यवीर सिंह ने डॉ. भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी आगरा से वर्ष 2016 में एलएलबी की डिग्री ली है। परीक्षा में उन्होंने 2800 में 1446 अंक यानी 51.64 प्रतिशत अंक हासिल किया था। ऐसे में वह परीक्षा के लिए पात्र नहीं हैं…।

अब फिर गौर कीजिए! सादिया के पासपोर्ट मामले में विकास मिश्रा ने भी नियमों का हवाला दिया था और कहा था कि वह तन्वी नाम से पासपोर्ट लेने की पात्र नहीं हैं लेकिन विकास की किसने सुनी? सबने सादिया की सुनी। लेकिन, यहां उल्टा है। एएमयू में सत्यवीर की कोई नहीं सुन रहा… यानी, अब फिर एक बार देश में नियम ही सर्वोपरि हैं। तब सादिया को नियम का पाठ पढ़ाने वाले विकास का ट्रांसफर हो गया था, उस हिसाब से तो अब सत्यवीर को नियम बताने वाले शाफे का भी ट्रांसफर हो जाना चाहिए न…। लेकिन, नहीं होगा क्योंकि ऐसा करना गलत है। क्योंकि हिन्दू संविधान से ऊपर थोड़े है, वह तो सिर्फ…।

एएमयू विधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. जावेद तालिब एवं कंट्रोलर मुजीब उल्लाह जुबैरी ने कहा कि सत्यवीर सिंह का आरोप दूषित मानसिकता से प्रेरित है। एएमयू में छात्रों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है।

अच्छा! और सादिया का आरोप? वह किस मानसिकता से प्रेरित था? अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जिसके नाम में ही मुस्लिम है, जिसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला हुआ है, वहां हिन्दू युवक से कोई भेदभाव नहीं किया गया; लेकिन एक पासपोर्ट दफ्तर जो न तो कोई बहुसंख्यक टाइप संस्थान है और न ही नाम में हिन्दू लगा है, वहां मुस्लिम महिला से भेदभाव हो गया था?
गजब…!

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भाड़ में जाए संविधान, इस्लाम जिंदाबाद!

संविधान में यह देश धर्मनिरपेक्ष है मगर हकीकत में राजनीतिक दल, मीडिया, बुद्धिजीवी और यहां तक कि सरकार भी एक विशेष धर्म की तरफ साफ लुढ़के हुए नजर आते हैं। ठीक है कि धर्म विशेष को खुश करना है लेकिन कितना? किस कीमत पर? किस हद तक? तुष्टीकरण की भी कोई हद होती है कि नहीं? अरे भाई, जब संविधान नहीं, मजहब देखकर ही देश चलाना है तो धर्मनिरपेक्ष देश का यह ढोंग क्यों? सीधे इस्लामिक कंट्री का ही दर्जा क्यों नहीं दे देते? जो दिक्कत है भी वह तो हिंदू राष्ट्र होने में है ना? इस्लामिक कंट्री होने में कहां कोई दिक्कत है जहां देश का सार्वजनिक से लेकर निजी तंत्र तक मुसलमानों का खुशामद करने में लगा हुआ है? एक अधिकारी कर्तव्यनिष्ठा दिखाता है, नियमों का पालन करता है और मुस्लिम महिला के आवेदन में कमियां पाते हुए सुधार के लिए कहता है तो उसकी नौकरी ले ली जाती है और सारे नियम—कानून ताक पर रखकर उस महिला को पासपोर्ट जारी कर दिया जाता है? क्यों भाई? नियम—कानून धर्म देखकर अप्लाई होने लगा है क्या? यदि ऐसा है तो क्यों न संविधान में एक ही बार संशोधन कर साफ—साफ लिख दिया जाए कि देश का ​कानून फलां धर्म पर ही लागू होगा और फलां धर्म वालों की मनमर्जी ही देश का कानून है। कम से कम नियमों का पालन करने के कारण कोई कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी बलि का बकरा तो नहीं बनेगा। तुष्टीकरण ही करनी है तो खुलकर करो, नियम बना दो, संविधान में संशोधन कर दो। कह दो कि भाड़ में जाए संविधान, अब से इस्लाम जिंदाबाद!

तन्वी उर्फ सादिया के मामले में सुषमा स्वराज द्वारा बिना किसी जांच वरिष्ठ अधीक्षक को हटाना और पासपोर्ट विभाग द्वारा सारे नियमों को ताक पर रखकर पासपोर्ट जारी करना यह बताने के लिए काफी है कि इस समय देश में सिर्फ किसी का मुसलमान होनाभर ही काफी है। उसका महज एक ट्वीट कर देना काफी है कि उसके मुसलमान होने के नाते उससे अन्याय हुआ है। फिर तो वह दोषी भी होगा तो अचानक पीड़ित हो जाएगा। फिर उसे हर नियम से छूट है, वह हर जांच से परे है।

अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं पत्रकार असद अशरफ के मामले को। रविवार रात करीब 9 बजे असद अपने घर जामिया नगर जाने के लिए ओला कैब लिए थे। कैब के ड्राइवर ने उन्हें जामिया नगर से पहले ही उतरने के लिए कह दिया। उन्होंने कारण जानना चाहा तो ड्राइवर ने कहा …. जामिया गन्दी लोकलिटी है। वहां अजीब लोग रहते हैं। गौर कीजिए कि ड्राइवर सुरक्षा के लिहाज से वहां नहीं गया था। लिहाजा, होना यह चाहिए था कि जामिया के हालात बदले जाएं ताकि वहां जाने से किसी को कोई डर न हो लेकिन बदल दिया गया वह ड्राइवर। चूंकि असद पत्रकार हैं तो वह इस नाते अच्छी तरह जानते हैं कि पत्रकार होने से भी बड़ी बात है मुसलमान होना। उन्होंने ओला कम्पनी में शिकायत दर्ज कराई कि मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहने की वजह से उनके साथ यह सब हुआ। बस क्या था? ओला ने असद से माफी मांगी और ड्राइवर अशोक कुमार को बर्खास्त कर दिया। NDtv को भी खुराक मिल गई। ट्विटर पर भी असद को खूब सहानुभूति और ड्राइवर को लानत मिली। खबर का केंद्र हिंदू—मुसलमान हो गया, जामिया की हालत पर कोई चर्चा नहीं हुई…।

हमें याद हैं, जब हम पटना में पढ़ते थे तब की घटना। वहां हम बोरिंग रोड के पीछे शिवपुरी में रहते थे। तब पुनाईचक, राजवंशीनगर, शास्त्रीनगर से सटा शिवपुरी असुरक्षित माना जाता था। रात में उधर बेली रोड और इधर बोरिंग रोड तक तो आने में कभी कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन उसके बाद शिवपुरी में अंदर जाने के लिए हर रिक्शा वाला तैयार नहीं होता था। अलग बात थी कि मेरी इतनी बुद्धि नहीं थी कि हम पूछ सकें कि वह रिक्शा वाला कहीं मुसलमान तो नहीं है? कहीं वह मेरे हिंदू होने के नाते तो ना नहीं कर रहा? खैर, दैनिक जागरण में नौकरी मिल गई तो हम बिहार के छपरा पहुंच गए। हमने रूम की तलाश शुरू की। सोचा, सस्ते में निपट जाए तो अच्छी बात हो। रेलवे ढाला पार प्रभुनाथनगर तरफ कमरे सस्ते मिल रहे थे लेकिन किसी भी रिक्शा वाले से रात में कहते कि चलोगे? तो वह ना कह देता था। इसलिए हम हमेशा नगरपालिका चौक के इर्द—गिर्द ही रह गए। हां, इस दौरान कभी किसी रिक्शे वाले से उसका धर्म नहीं पूछा हमने। अभी यहां दिल्ली—नोएडा में भी हर शहर की तरह कुछ इलाके हैं, जहां की ऐसी ही स्थिति है। आप न अपना धर्म बताइए, न ड्राइवर का धर्म पूछिए लेकिन उससे किसी जगह चलने के लिए कहिए तो तैयार हो जाएगा, किसी जगह चलने के लिए कहिए तो नहीं होगा। जिस जगह के लिए वह ना कर रहा है, इसके पीछे की वजह उससे जरूर जानी जा सकती है। इसके बाद सरकार, प्रशासन, मीडिया सबकी जिम्मेदारी है कि उस जगह को इस लायक बना दे कि कोई ड्राइवर वहां जाने से इनकार न करे लेकिन यह तो बहुत मुश्किल है। आसान तो यही है कि उसके ना की वजह धर्म को बता दिया जाए। हालात बदलने की बजाय, ड्राइवर ही बदल दिया जाए। कभी किसी ने सोचा है कि एक ड्राइवर की नौकरी खा जाने से क्या क्या दूसरे ड्राइवर के लिए हालात बदल जाएंगे? खैर, सोचने की जरूरत ही क्या है? मुसलमान होना ही काफी है…।

पत्रकार असद अशरफ का यह मामला ताजा ही था कि सादिया का मामला आ गया। सादिया ने भी असद का ही फॉर्मूला अपनाया… असद ने आरोप लगाया था कि ड्राइवर ने इसलिए पहले उतार दिया क्योंकि वे मुसलमान बहुल क्षेत्र में रहते हैं, सादिया ने आरोप लगाया कि इसलिए पासपोर्ट नहीं मिला, क्योंकि उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया है, अब वह मुसलमान हैं…। और मुसलमान होना मतलब… देश के संविधान से उपर हो जाना है। भला कोई क्यों न हर बात में कहे खुद को मुसलमान? निर्दोष होने के बाद भी कोई पुलिस से पिट रहा हो तो क्या वह कभी आरोप लगा सकता है कि इसलिए पिट रहा है कि वह हिंदू है? सवर्ण है? ब्राह्मण है? लेकिन, गलत करने पर, गलत होने पर भी बड़े आराम से कहा जा सकता है कि मैं मुसलमान हूं, मैं दलित हूं इसलिए मुझे पुलिस ने पीटा या ‘दबंगों’ ने पीटा। पुलिस की लाठियां धर्म, जाति देखकर नहीं बरसतीं लेकिन कभी किसी अखबार में हेडिंग लगी है— ब्राह्मणों या राजपूतों, कायस्थों को दौड़ा—दौड़ाकर पीटा? ‘दलितों को पीटा’ ऐसी हेडिंग अक्सर लगती है। बलात्कार करने वाले भी भला धर्म, जाति देखते हैं क्या? कभी ‘ब्राह्मण महिला से बलात्कार’ हेडिंग देखी है? लेकिन ‘दलित से बलात्कार’, ‘मुसलमान युवती से बलात्कार’ जैसी हेडिंग अखबारों की पठनीयता पढ़ाती हैं। दलित, मुसलमान हो जाने का मतलब है सत्ता, विपक्ष, बुद्धिजीवी, मीडिया, सरकार सबका केंद्रबिंदु हो जाना। यह फॉर्मूला हिट है, इसलिए इसे हर कोई आजमा रहा है। सादिया ने भी आजमाया। दस्तावेज गलत और अपूर्ण होने पर जब उनका पासपोर्ट न बना तो उन्होंने इसे हिंदू—मुस्लिम का रंग दे डाला। ट्वीट कीं तो सहानुभूतियों की बाढ़ आ गई। सुषमा स्वराज जैसी सुलझी नेत्री भी भाव विह्वल हो गईं। तत्काल नोटिस देकर उस अधिकारी का तबादला कर दिया, जिसने एक मुसलमान महिला से नियम—कायदे पूरा करने की गुस्ताखी कर डाली। कुछ ही देर में अधिकारी के हाथ में तबादले का पत्र था, सादिया के हाथ में पासपोर्ट था…। न एलआईयू जांच, न पुलिस वेरीफिकेशन, न स्थल निरीक्षण, कुछ नहीं। नियम तो यह भी है कि पासपोर्ट सिर्फ डाक से ही भेजा जाता है, लेकिन सादिया को तो हाथों-हाथ मिला। यहां तक कि कुछ दिन पहले जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का पता बदला था तो उन्हें भी नया पासपोर्ट नियमानुसार डाक से ही ​भेजा गया था। यानी, जो नियम सीएम के लिए भी नहीं टूटा था वह सादिया के लिए टूटा…। कह सकते हैं कि मुसलमान होना; पत्रकार ही नहीं, सीएम होने से भी बड़ा होता है…।

सादिया और पति मोहम्मद अनस सिदृदीकी नोएडा में रहते हैं और दोनों नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं। सादिया, शादी से पहले तन्वी सेठ थीं। तन्वी सेठ और मोहम्मद अनस सिद्दीकी ने 2007 में शादी कर ली और अब उनकी छह साल की एक बेटी भी है। अनस ने इसी 19 जून को अपने पासपोर्ट रिन्युअल और तन्वी सेठ ने नए पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। बुधवार को दोनों को दस्तावेज के साथ रतन स्क्वायर स्थित पासपोर्ट सेवा केंद्र बुलाया गया था। सादिया ने पासपोर्ट के लिए अपना आवेदन तन्वी सेठ के नाम से दिया था। आवेदन में आवेदक का नाम तन्वी सेठ और पति का नाम मोहम्मद अनस सिदृदीकी पहली बार किसी को भी चौकाएगा। वरिष्ठ अधीक्षक विकास मिश्र ने भी कुछ सवाल पूछ डाले। तन्वी का आरोप है कि विकास ने उनसे नाम बदलने के लिए कहा। राजी नहीं होने पर पति से हिंदू रीति के अनुसार सात फेरे लेने को कहा। कहा कि तभी यह शादी वैध मानी जाएगी और पासपोर्ट बन सकेगा। विकास मिश्र ने तन्वी की फाइल सहायक पासपोर्ट अधिकारी (एपीओ) विजय द्विवेदी के पास भेज दी। इसके बाद तन्वी ने ट्वीट किया और देश में सूनामी आ गई। तुरंत विकास के हाथ में तबादले का लेटर और सादिया के हाथ में पासपोर्ट। न तो विकास को सजा देने के लिए कोई जांच हुई और न ही सादिया को पासपोर्ट देने के लिए। यानी, फॉर्मूला हिट रहा…।

धर्म—जाति की राजनीति करने वालों या किसी खास धर्म के लिए सहानुभूति और अन्य के लिए विद्वेष रखने वालों के लिए यह मामला यहीं खत्म हो गया लेकिन इससे अलग, सही और गलत देखने वाले हम जैसों के लिए कहानी अभी बाकी है…। कहानी में विकास मिश्र का पक्ष क्या जरूरी नहीं है? क्योंकि वह हिंदू हैं? क्योंकि वह ब्राह्मण हैं? क्योंकि वह नियमों का पालन कर रहे थे? सुनना तो होगा, क्योंकि न सुनेंगे, न जानेंगे तो भी सच नहीं बदल जाएगा…। विकास का कहना है कि पहली बात तो यह कि आवेदन में तन्वी सेठ का पता नोएडा का था। इस लिहाज से उन्हें गाजियाबाद पासपोर्ट सेवा केंद्र में अप्लाई करना चाहिए था। दूसरी बात यह कि अंतरजातीय विवाह करने पर पासपोर्ट मैन्युअल 2016 के तहत आवेदक को एक घोषणा पत्र देना होता है जिस पर लिखना होता है कि उसने जिससे शादी की है उसका नाम और पता यह है। तीसरा यह कि पासपोर्ट एक्ट 1967 के तहत नाम बदलने पर पासपोर्ट के आवेदन में एक बॉक्स में सही का निशान लगाकर दूसरा नाम भी जोड़ना पड़ता है। यहां तक कि घर का नाम भी बताया जाता है जिससे एक ही आदमी के अलग-अलग नाम से पासपोर्ट न बन सके। तन्वी के पति का नाम मुस्लिम होने पर विकास ने यह कहा था कि यदि अंतरजातीय विवाह है तो उन्हें दूसरा नाम भी बताना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि तन्वी निकाह के बाद धर्म परिवर्तन कर चुकी हैं। निकाहनामा में उनका नाम सादिया असद है। आवेदन तन्वी नाम से, दस्तावेज सादिया नाम के? पासपोर्ट कैसे जारी कर देते? आवेदन की त्रुटियों पर विचार करने के लिए विकास ने उसे एपीओ विजय के पास भेज दिया। विकास ने कहा कि यदि एपीओ स्वीकृति दे देंगे तो वे आवेदन की प्रक्रिया को इसी तरह मंजूर कर लेंगे। पासपोर्ट अधिकारी पीयूष वर्मा खुद कहते हैं कि विकास मिश्र पर इसके पहले किसी भी पासपोर्ट आवेदक के साथ अभद्रता की शिकायत नहीं है। वहां के कर्मचारी भी किसी अभद्रता से इनकार कर रहे हैं। सभी का यही कहना है कि विकास ने नियम के अनुसार ही पासपोर्ट प्रक्रिया के लिए तन्वी से उनके मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद नए नाम सादिया हसन की जानकारी भी फॉर्म में भरने के लिए कहा था। लेकिन, नियम—कानून भी कुछ होता है क्या? इस देश में मुसलमान होने से भी बड़ा कुछ होता है क्या?

नोट— हम किसी भी धर्म—जाति के खिलाफ नहीं हैं लेकिन धर्म—जाति के नाम पर भेद—भाव करने वालों के खिलाफ हैं। धर्म—जाति के नाम पर किसी को भी विशेष सुविधा देने या किसी को भी प्रताड़ित किए जाने के खिलाफ हैं। हम इसके खिलाफ थे, हैं और हमेशा रहेंगे…।

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