निष्पक्ष

हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

ये आतंकी है, न पूछो इनकी जात क्‍या है?

बिहार के छपरा में एक आतंकवादी गिरफ़तार हुआ। नाम- फरखंद जमाल। एक और मुसलमान आतंकी के रूप में गिरफ़तार हुआ। कुछ कट़टर हिंदुओं में बहस सी चल पड़ी- मुसलमान आतंकवादी होते ही हैं, इसमें नई क्‍या बात है? सबसे बड़ी बात कि जैसे ही आतंकी के गिरफ़तार होने की सूचना मिली, लोगों ने उसका नाम जानना चाहा। जिसे नाम नहीं पता चलता, उसका एक ही सवाल होता- हिंदू है कि मुसलिम। ऐसा सवाल करते वक्‍त वे पहले ही सोच लिए होते कि वह मुसलमान ही रहा होगा। और जैसे ही पता चलता है कि गिरफ़तार आतंकी मुसलमान था। खुश ऐसे होते हैं गोया उनकी भविष्‍यवाणी सच हो गयी हो। लेकिन, ऐसे लोगों से जब एक सवाल किया गया कि क्‍या होता यदि वह हिंदू होता, तो फिर जैसे उनके अंदर का त्रिकालदर्शी जाग उठता है। कहते हैं,- हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता। मैं तो पहले ही जानता था कि वह मुसलमान ही होगा। हालांकि हमने देखा था कि उसकी जाति नहीं जानने के पहले, वह हिंदू है या मुसलमान का सवाल करते समय ऐसे लोग अंदर ही अंदर खौफजदा थे। उनमें इस बात का खौफ साफ दिख रहा था कि सामने वाला कही आतंकी को हिंदू न बता दे। लेकिन जैसे ही उसके मुसलिम होने का पता चलता ऐसे लोगों के सीने चौड़े हो जाते। हमसे भी कईयों ने फोन कर पूछा। वे पहले आश्‍चर्य से पूछते- सुना है छपरा में आतंकवादी गिरफ़तार हुआ है? जैसे ही हम उन्‍हें कहते कि हां, वह एक सिमी कार्यकर्ता है और आईबी की टीम उसे लेकर यहां से चली गयी, अगला सवाल हो जाता- कहां से धराया है? हम उन्‍हें बताते कि छपरा के गुदरी बाजार से, यह क्षेत्र भगवान बाजार थाना के अंतर्गत आता है। हालांकि कुछ लोग उसकी गिरफ़तारी नगर थाना क्षेत्र से होने की बात भी कह रहे हैं। तुरंत तीसरा सवाल किया जाता- मुसलमान है? हम उन्‍हें बताते कि हां, उसका नाम फरखंद जमाल है और वह यहां अपनी बहन के यहां रहता था। अब तक लगातार सवाल करने वाले यहां आकर अपनी राय देने लग जाते- ये मुसलमान देश को बर्बाद करके ही छोड़ेंगे। इन्‍हें समझ में ही नहीं आता कि इनका देश हिंदुस्‍तान है। ये यही के रहने वाले हैं और यही इनका राष्‍ट्र है।… बस बोलते ही चले जाते और हमें या तो मोबाइल डिसकनेक्‍ट करना पड़ता या फिर हम कहते कि थोड़ी देर बाद करते हैं, और फोन काट देते। कुछ जो कॉल आए उन्‍हें इस घटना के बारे हल्‍की जानकारी भी थी और उनका पहला ही सवाल था कि- गुदरी में जो आतंकवादी गिरफ़तार हुआ है वह मुसलमान ही है न? ऐसे लोग यह पहले ही मान चुके थे कि वह मुसलमान ही होगा, बस तसल्‍ली चाहते थे। हमने एक आतंकवादी को मुसलमान और मुसलमान को आतंकवादी घोषित करने की लोगों में अजीब बेचैनी देखी। यही नहीं, यह हाल केवल हिंदुओं का नहीं था, कुछ मुसलमान भी अपने को शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। अरे, इसमें शर्मिंदगी वाली क्‍या बात है? उसे तो गिरफ़तार होना ही चाहिए था, वह एक आतंकवादी था। क्‍या आतंकियों की भी कोई जाति होती है? कोई धर्म होता है? यदि होता तो फिर वे ऐसे रास्‍ते क्‍यों चुनते। वे या तो हिंदू धर्म के अनुसार आचरण करते या फिर मुसलमान धर्म के अनुसार। लेकिन उनका आचरण तो दोनों में से किसी भी धर्म से इत्‍तेफाक नहीं रखता। ऐसे लोगों का तो धर्म आतंक फैलाना है और जाति आतंकवादी है। ऐसे लोगों के मुसलमान होने पर मुसलमानों को भला शर्मिंदगी क्‍यों हो? और यदि ऐसे आतंकवादी हिंदुओं में से भी निकल जाएं तो हिंदुओं को आश्‍चर्य क्‍यो हो? न तो सनातन धर्म कभी हिंसा की बात करता है और न ही मुसलमानों का पाक ग्रंथ कुरान शरीफ। और जो इस पाक ग्रंथ के अनुसार आचरण ही नहीं करता, उसे हम मुसलमान मानें ही क्‍यों? यदि वह मुसलमान होता तो क्‍या कुरान शरीफ नहीं पढ़ता और पढ़ता तो इसके अनुसार आचरण नहीं करता। यदि किया होता तो फिर वह आतंकी बनता ही नहीं। और जिसने अपने धर्मग्रंथ की बात ही नहीं मानी, वह उस धर्म का कैसे हो सकता है। वह तो उस धर्म के विरोध आचरण कर रहा है। ऐसे में वह न सिर्फ देश के लिए आतंकवादी है बल्कि वह उस धर्म के लिए भी विद्रोही है, जिस धर्म में वह पला-बढ़ा है। हमें तो ऐसा लगता है कि हिंदुओं से अधिक हमारे मुसलमान भाईयों ने इस बात को अधिक हवा दे दी है। अरे, फतवा क्‍या सिर्फ बुर्का नहीं पहनने पर जारी होता है? धर्म विरुद़ध आचरण करने वाले ऐसे लोगों पर फतवे जारी कर इन्‍हें धर्म व समाज से बहिष्‍कृत क्‍यों नहीं कर दिया जाता, ताकि अन्‍य इनसे सीख ले सके और साथ ही अन्‍य धर्म वालों को भी यह पता चल जाये कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान है और कुछ नहीं। हम दाद देते हैं मुम्‍बई के उन मुसलमानों को जिन्‍होंने होटल ताज पर हमले में मारे गए आतंकवादियों को दफानाने के लिए अपने कब्रिस्‍तानों की किवाड़े बंद कर दी थी। हम ऐसे मुसलमान भाईयों की इरादों की कद्र करते हैं। यह उन तमाम भटके हुओं को एक सबक था। एक काम और किया जाना चाहिए, इन आतंकियों के लिए। धर्म बहिष्‍कृत का काम। मुसलमानों में से निकले कुछ ऐसे भ्रष्‍ट युवकों पर भी फतवे जारी होने चाहिए जो कि अपने धर्म को बदनाम कर रहे हैं। मुसलमान यानी मुसल्‍लह ईमान। फिर आतंक की बात सोची भी कैसे जा सकती। जहां ईमान की बात है वहां तो जो भी होगा, जिसका भी होगा भला ही होगा, बुरा तो किसी का हो ही नहीं सकता। हम और लोगों के विचारों से अधिक इत्‍तेफाक नहीं रखते, क्‍योंकि हम इस बात पर दृढ़ निश्‍चय हैं कि आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी है और उसकी कोई जाति नहीं है। यदि है भी तो उसकी जाति भी आतंकवादी की ही है। ऐसे लोग न तो हिंदुओं में होने चाहिए और न ही मुसलमानों में। यदि हिंदुओं में हो तो हिंदू उन्‍हें अपने धर्म से बाहर कर दें और यदि मुसलमानों में से कोई ऐसा दरिंदा पैदा हो जाये तो फिर मुसलमान भी इन्‍हें अपने धर्म से बाहर निकाल फेंके। ऐसे लोग जलाशय में सड़ी किसी मछली की तरह होते हैं जो पूरे तालाब को ही गंदा, दूषित कर देते हैं। जैसे कि कुछ आतंकवादियों के कारण आज पूरा मुसलिम समुदाय कलंकित हो रहा है और कुछ भ्रष्‍ट भगवे धारियों के चलते पूरा सनातन धर्म। मुसलमानों में निकले कुछ आतंकी युवकों से कम खतरनाक ये हिंदू धर्म के भगवेधारी साधु भी नहीं, जो आये दिन पापियों से भी अधिक पापी बन जाते हैं। हम उदाहरण देकर एक बार फिर न तो हिंदुओं की भावना को आहत करना चाहते हैं और न ही ऐसे पापियों का नाम लेकर खुद को। और बात को अधिक लंबा खींचकर कोई विवाद भी नहीं चाहते। हम तो बस इतना ही चाहते हैं कि आगे से यदि कोई आतंकी गिरफ़तार हो और यदि आप हमारे पास सूचना के लिए फोन करें, तो कृपया ऐसे लोगों की जाति ना पूछें। आतंक फैलाने वालों की क्‍या जाति? एक और अनुरोध करना है। यदि हमारे इन विचारों से किसी भी धर्म के किसी समर्थक की भावना को ठेस पहुंची हो तो कृपया माफ करेंगे। यह हमारा अपना व्‍यक्तिगत विचार है। इन विचारों का किसी अन्‍य व्‍यक्ति, संस्‍थान या धर्म से कोई वास्‍ता नहीं।

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दिस इज बिहार पुलिस

देश में तेज-तर्रार पुलिस के तौर पर या तो मुम्‍बई की मिशाल दी जाती है या फिर देश की राजधानी दिल्‍ली की। लेकिन यदि सबसे बेकार पुलिस की कार्यशैली देखनी हो तो आप कहां जाएंगे? ज्‍यादा सोचने की क्‍या जरूरत है, अरे साहब, बिहार चले आइए। हम भी आपको यही मिल जाएंगे। आजकल इसी निकम्‍मी पुलिस की सुरक्षा में मेरा भी आशियाना है। सुरक्षित है या नहीं, यह तो वे ही बताएंगे। फिलहाल हम आपको इनकी कारस्‍तानी बताते हैं। दरअसल बात छोटी होती तो हम भी टाल देते। भला अपने देश की पुलिस की शिकायत कौन करना चाहेगा और बिहार तो हमारी कर्मभूमि है। ऐसे में बिहारी पुलिस की शिकायत करते समय थोड़ी असमंजस की स्थिति तो अवश्‍य है लेकिन पानी सिर से उपर जा चुका है। मामला चोरी, डकैती रोकने का होता तो पचा जाते लेकिन यहां तो पूरा का पूरा आतंकवाद से जुड़ा मामला है, यानी इंटरनेशनल है। बात तो बतानी ही होगी, चर्चा भी करनी होगी और इसी बहाने हमारी बिहार पुलिस की कार्यशैली की समीक्षा भी हो जाएगी। बिहार के यदि सबसे शांत जिलों का नाम लें, तो एक नाम छपरा का भी है। बस यही बात छपरा के लिए घातक हो गयी। दरअसल, हैदराबाद में हुए सीरियल बम ब्‍लास्‍ट के बाद पूरे देश की पुलिस चौकन्‍नी हो गयी थी। देश का खूफिया तंत्र किसी कुत्‍ते की मानिंद इन आतंक‍वादियों के ठिकाने सूंघ रहा था। ऐसे में इससे जुड़े आतंकवादियों को किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश थी और बिहार से सुरक्षित जगह और क्‍या हो सकती है। जहां की जनता तो जागती है लेकिन पुलिस आराम से सोती है। बम ब्‍लास्‍ट में इन्‍वाल्‍व एक आतंकवादी फरखंद जमाल भी इसी बिहार के सबसे शांत और मुफीद जगह छपरा में आ छुपा। सूबे की राजधानी पटना के फुलवारी थाना क्षेत्र में उसका घर है लेकिन बिहार में होने के साथ ही पटना राजधानी सिटी है, ऐसे में यहां की पुलिस थोड़ी सी सतर्क तो है ही? उसने ऐसी जगह रहना ठीक समझा जहां की पुलिस एक पल के लिए भी सतर्क नहीं होती, यानी हर पल नींद में होती है, नौकरी करती है, वेतन पाती है लेकिन डयूटी नहीं करती। छपरा में फरखंद के बहन की शादी हुयी है और वह यहां रह चुका था, यहां की पुलिसिया कार्यशैली से भी परिचित था। उसका बहनोई यहां के एसपी आफिस में बिहार पुलिस में कार्यरत है और इस नाते वह यहां की पुलिस की अंदर की कार्यशैली भी जानता था। फरखंद पहले भी कई बार छपरा आ चुका था और अक्‍सर यहां रहा भी था। आस-पास के कुछ लोगों के अनुसार बीच-बीच में वह लंबे समय के लिए गायब हो जाया करता और जब भी आता तो उसके साथ कुछ नए चेहरे होते थे जिनका परिचय वह अपने दोस्‍तों के रूप में दिया करता था। फरखंद की छपरा में इतनी पैठ बन चुकी थी कि वह यहां के सरकारी विभागों में बतौर संवेदक निर्माण कार्य करा चुका था। और तो और, जेल जैसे संवेदनशील जगह पर उसने निर्माण कार्य कराया था और समाहरणालय का भी टेंडर उसने प्राप्‍त किया था। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके बहाने उसने जेल की गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखी हो। खैर, फरखंद अपनी सुरक्षा के लिए एक बार फिर छपरा में था। यहां रहते हुए जब उसे यह भान हो गया कि यहां की निकम्‍मी पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती उसने बम ब्‍लास्‍ट के मास्‍टर माइंड को भी अपने यहां संरक्षण दिया। मास्‍टर माइंड तौकीर करीब दो माह तक छपरा में रहा और न तो यहां की पुलिस, और न ही यहां की सुरक्षा एजेंसी को इसकी जानकारी हुई। इन आतंकियों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि ये जहां भी जाते सबसे पहले अपने किसी नजदीकी के माध्‍यम से नौकरी प्राप्‍त करते और फिर वहीं रहने लगते। इस प्रकार किसी को शक नहीं हो पाता। अपनी इसी नीति के तहत स्‍लीपर सेल का सदस्‍य फरखंद जमाल भी यहां ठेकेदारी का काम किया करता था और जब तौकीर यहां आया तो उसको भी उसने यहां के एक कम्‍प्‍यूटर इंस्‍टीच्‍यूट में काम दिला दिया। बाद में तौकीर की गतिविधियों से कम्‍प्‍यूटर संचालक को कुछ शक हुआ और उसने उसे नौकरी से निकाल दिया। यह जैसे तौकीर के लिए वरदान ही था। उसे लग गया कि अब उसका भांडा कभी भी फूट सकता है और वह यहां के गुप्‍तचरों की नजर में आ सकता है। लिहाजा उसने छपरा को अलविदा कह दिया। लेकिन इसी बीच, हैदराबाद बम ब्‍लास्‍ट के एक आरोपी की गिरफ़तारी गुजरात पुलिस करने में सफल हो गयी और साथ ही उसके साथियों का नाम उगलवाने में भी उसे सफलता हाथ लग गयी। गिरफ़तार आतंकी ने फरखंद का नाम लिया और उसका पटना स्थित ठिकाना भी पुलिस को बता दिया। फरखंद की टोह में इंटेलीजेन्‍स ब्‍यूरो के खिलाड़ी पटना में आ जमे। तहकीकात के बाद उसके फुलवारी स्थित ठिकाने का पता चला लेकिन वह वहां नहीं मिला। इसके बाद उन्‍होंने उसके छपरा में रहने का पता खोज निकाला और आईबी की टीम छपरा में आ जमी। लेकिन इसके पहले ही तौकीर यहां से जा चुका था। लेकिन एक आतंकी फरखंद जमाल अब भी छपरा में ही था। आईबी के गुप्‍तचर उसकी गतिविधियों पर नजर रखने लगे। करीब पांच दिनों बाद आईबी वालों को लगा कि अब यदि फरखंद को गिरफ़तार नहीं किया गया तो वह भी हाथ से निकल सकता था। इतने दिनों तक आईबी वालों को इंतजार था कि फरखंद के बहाने कोई बड़ी मछली भी उनके हाथ में आ जाए। लेकिन तौकीर पहले ही जा चुका था लिहाजा उसके हाथ आने का सवाल ही नहीं था। लोकल पुलिस की कार्यशैली से शायद आईबी वाले भी परिचित थे, इसलिए न तो आईबी के यहां आने का पता यहां की पुलिस को था और न ही शिकार फरखंद को। हो सकता था कि यदि इसकी जानकारी पहले यहां की पुलिस को होती तो शायद फरखंद गिरफ़तार ही ना होता क्‍योंकि एसपी आफिस में ही उसका साला काम करता है। आईबी ने फरखंद की गिरफ़तारी के लिए सही समय देखते हुए मुख्‍यालय को सूचना दे दी। जिसके बाद स्‍पेशल टीम रातोरात छपरा पहुंच गयी। बगैर स्‍थानीय पुलिस के सहयोग के फरखंद को गिरफ़तार किया। यहां की पुलिस को तो तब पता चला जब फरखंद को ट्रांजिट रिमांड पर लेने के लिए उसकी पेशी मजिस्‍ट्रेट के यहां हुयी। बाद में पता चला कि फरखंद कोई छोटा-मोटा प्‍यादा नहीं बल्कि इंडियन मुजाहिदीन का महासचिव है और बिहार समेत नेपाल के इलाकों में तबाही का इंतजाम करने की जिम्‍मेवारी उस पर है। खैर, आईबी की टीम फरखंद को लेकर यहां से चली गयी और छपरा की पुलिस लकीर पीट रही है। आम आदमी से अधिक यहां की पुलिस को भी कुछ पता नहीं। वह भी किसी अजनबी की तरह मीडियाकर्मियों व अन्‍य लोगों से सवाल करती फिर रही है- कैसे हुआ यह सब? यानी पुलिस की नाक के नीचे वह रहता रहा और आईबी ले भी गयी लेकिन वाह रे यहां की पुलिस, कुछ भी न कर सकी। आईबी वालों का सहयोग भी नहीं। छपरा की पुलिस ने बिहार पुलिस का चेहरा दिखाया है लोगों के सामने। यहां के लोग यह सोचकर ही दहल जाते हैं कि यदि आईबी की टीम यहां नहीं आती तो यहां की पुलिस के भरोसे न तो फरखंद कभी गिरफतार होता और न ही वे सुरक्षित रह पाते। कभी न कभी तो फरखंद को अपने रूप में आना ही था और उस दिन छपरा में कोई आतंकी घटना होती, पुलिस मूकदर्शक बनी रहती। हम छपरा के लोगों की तरफ से आईबी के उन जाबांज सदस्‍यों के शुक्रगुजार हैं जिसने इस आतंक को इस जिले के लोगों के बीच से निकाल ले गयी वरना इस पुलिस के भरोसे तो…।
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तथाकथित जनसेवकों! अब बस भी करो

तालों का लटकना, रैली की बहार
बस को आग लगाना, मारपीट का समाचार
रेल को रोकना, आम लोगों पर प्रहार
मुबारक हो आपको भारत बंद का त्‍योहार…।
5 जुलाई की सुबह-सुबह हमें अपने एक मित्र का यह एसएमएस मिला। पहले तो हम समझ नहीं पाये, फिर याद आया कि आज एनडीए व वाम दलों का संयुक्‍त भारत बंद है। इस एसएमएस के माध्‍यम से सेंडर ने अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त करने की कोशिश की थी। पुन: 6-7 जुलाई माकपा का चक्‍का जाम तो आज 10 जुलाई को जदयू-लोजपा का बिहार बंद। महंगाई को रोकने के बहाने हो रहे इस बंद के कारण महंगाई कितनी कम हो जाएगी यह तो हम नहीं जानते, लेकिन इतना अवश्‍य पता है कि केवल 5 जुलाई को भारत बंद के कारण 20000 करोड़ का नुकसान हुआ। केवल बिहार में ही 226.18 करोड़ के नुकसान का अनुमान है। राजनीतिक पार्टियां बंद में कुछ इस तरह बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं जैसे वे महंगाई का विरोध नहीं उसका उत्‍सव मना रही हों। अब यह उत्‍सव नहीं तो और क्‍या? जो हजारों करोड़ की देश को आर्थिक क्षति हो रही है वह महंगाई बढ़ा रही है या घटा रही है? महंगाई के कारण सालों में व्‍यवसायी या फिर आम उपभोक्‍ता, ग्राहक उनके परेशान नहीं हुए जितना कि कुछ दिनों के बंदी कार्यक्रम में। यह सब क्‍या है? जनता को महंगाई से निजात दिलाने का तरीका या फिर जनता को महंगाई की आग में झोकने के लिए इस आग में घी डालने का प्रयास? अपने स्‍वार्थ के लिए पार्टियां लोगों को बेवकूफ बनाने के अलावा और कुछ नहीं कर रही है। यदि सरकार पर दबाव ही बनाना है तो वह संसद में भी हो सकता है, इसके अन्‍य माध्‍यम भी हो सकते हैं, चक्‍का जाम, रेल रोकना, सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आम लोगों को परेशान करना, क्‍या यह महंगाई रोकने का हथियार है? बंदी को किसी त्‍योहार की तरह मनाकर राजनेता क्‍या साबित करना चाहते हैं ? यदि हड़ताल और बंद से ही महंगाई रूक जानी होती तो फिर तो भारत में कभी महंगाई आती ही नहीं। क्‍योंकि यहां होली, दीवाली तो वर्ष में एक बार आते हैं लेकिन हड़ताल और बंद का उत्‍सव तो हर महीने मनाया जाता है। फिर महंगाई क्‍यों बढ़ गयी? स्‍पष्‍ट है कि हड़ताल करने और बंद कराने से कभी महंगाई दूर नहीं हो सकती। इसके लिए ठोस प्रयास करने होंगे। विपक्ष को भी और पक्ष को भी। यदि सत्‍ता पक्ष महंगाई की आग में झोककर आम आदमी को झुलसा रहा है तो ऐसे कारनामें कर विपक्ष उनका एक तरह से साथ ही देर रहा है और झुलस रही जनता को सीधे जला देने पर आमादा है। यदि सब जानते हैं कि देश में बंदी अभियान चलाकर महंगाई नहीं रोकी जा सकती तो फिर ऐसे आयोजनों का क्‍या तात्‍पर्य है? राजनीतिक पार्टियां जानते हुए बेवकूफ बन रही हैं या आम जनता को बेवकूफ बना रही हैं, जो वह सदा से करती आ रही हैं?
5 जुलाई, 6-7 जुलाई और फिर 10 जुलाई… हड़ताल, बंद, चक्‍का जाम… इन सबके दौरान हम बिहार के छपरा जिले में थे और हमने देखा कि कैसे केवल और केवल आम जनता ही परेशान हुयी। जबकि बंदी के पीछे हवाला यह दिया जा रहा है कि आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए यह सरकार पर दबाव है। लेकिन हमने देखा कि पार्टियां सरकार को नहीं आम जनता को दबाव में ला रही हैं। किसी के घर चुल्‍हे नहीं जले तो कोई मरीज दवा के अभाव में तड़पता रहा। किसी रिक्‍शे वाले को खाने को नहीं थे तो बाहर में रहकर पढ़ाई और नौकरी करने वाले कई युवा पैसा होने के बाद भोजने के लिए भटकते रहे और अंतत: उन्‍हें भूखे पेट सोना पड़ा। हमें यह देखने को कहीं नहीं मिला कि कहीं कोई कार्यकर्ता या समर्थक किसी रोगी को हास्‍पीटल पहुंचाता दिखा हो, यह भी नहीं दिखा कि किसी कार्यकर्ता ने बोझ लेकर पैदल चल रही किसी वृद्ध की मदद की हो। हां, उन्‍होंने मदद अवश्‍य की है लेकिन सिर्फ और सिर्फ महंगाई बढ़ाने में। लोगों की परेशानियां बढ़ाने में। 5 जुलाई को हमने देखा कि एक कर्तव्‍यपरायण सिपाही साइकिल से अपनी ड़यूटी पर जा रहा था लेकिन उपद्रवी बंद समर्थकों ने उसके साइकिल की हवा खोल दी। यह सोचे बगैर कि उसे अब कितनी दूर पैदल जाना होगा, और इसमें उसे कितनी परेशानी होगी। क्‍या वह एक आम आदमी नहीं है? एक मरीज महिला दर्द से बेहाल थी। अस्‍पताल तक ले जाने के लिए वाहन मालिक तैयार नहीं हो रहे थे। एक ठेला वाले ने रिस्‍क लिया और परिजन ठेले पर लादकर महिला को अस्‍पताल ले गए। इस दौरान भी उन्‍हें कई जगहों पर इन तथाकथित महंगाई रोकने वालों से सामना हुआ जो एक मरीज को रोक रहे थे। हमने पिछले 5 सालों में ना तो कभी देखा और ना ही सुना कि किसी पार्टी के कार्यकर्ता ने कूड़े चुन रहे बच्‍चों को कॉपी-किताब देकर स्‍कूल में दाखिल कराया हो। हां, राजनीतिक फायदे के लिए थोक में ऐसे काम अवश्‍य होते रहे हैं। लेकिन हमने उस दिन यह अवश्‍य देखा कि किस तरह कूड़ा चुनने वाले बच्‍चों, गंदी बस्तियों के बच्‍चों को एकत्र कर उनके हाथ में पार्टी का झंडा, डंडा देकर सड़क पर उतार दिया गया था। बच्‍चे किसी को भी देखकर हल्‍ला करते, उसे दौड़ाते और कभी-कभी डंडा भी चला देते थे। यह उन्‍हें क्‍या सिखाया जा रहा था? छपरा के विभिन्‍न विद्यालयों में इग्‍नू की परीक्षा थी। पैदल ही परीक्षार्थी कोसों दूर से केन्‍द्रों पर आ रहे थे। शादी-विवाह के दिन हैं और बिटिया की शादी के लिए कई पिता पैदल ही चक्‍कर लगाते दिखे। एक बार को उस पिता की बेबसी सोच कर देखिये जिसकी बेटी की शादी 5 को ही थी, उसी दिन जिस दिन भारत बंद का आयोजन था। एक आम आदमी का मांगलिक आयोजन इन उपद्रवियों, तथाकथित जनसेवकों के बंद आयोजन के चलते फीका पड़ गया था। हम इस दौरान यह नहीं जान सके कि इन राजनीतिक पार्टियों के बंद से किसका भला हुआ है। लेकिन कितनों का अहित हुआ इसकी कल्‍पना भी नहीं की जा सकती।
बंद और हड़ताल के माध्‍यम से आम लोगों को बेवकूफ बना उन्‍हें छलने की यह नीति राजनेताओं को त्‍यागनी ही होगी। माना कि लोकतंत्र में बंद, हड़ताल, धरना-प्रदर्शन, नारेबाजी सबकुछ जायज है। लेकिन जबरिया तो नहीं? पार्टियां और उनके कार्यकर्ता, समर्थक दावा कर रहे हैं कि बंद, हड़ताल जनता के लिए किया जा रहा है लेकिन वे इसी दौरान उसी जनता का भी विरोध करते देखे जाते हैं। किसी की साइकिल की हवा खोल देना क्‍या उसका विरोध करना नहीं, क्‍या उसकी स्‍वतंत्रता छीनना नहीं है, या फिर यह एक अपराध नहीं है? सड़कों पर बैरिकेटिंग करने का तो जैसे लाइसेंस मिल गया है। रेल रोकना तो कार्यकर्ता अपनी बहादुरी का प्रतीक समझते हैं। यदि इतना ही शौक है बंदी का, हड़ताल का तो कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था करें ये राजनेता कि उनके एक आग्रह पर भारत बंद हो जाए और एक अनुरोध पर भारत खुल जाये। ऐसी लोकप्रियता, जनता का ऐसा विश्‍वास तो वे जीतने में सफल नहीं हो पा रहे तो अपने गुंडों, तथाकथित समर्थकों की बदौलत जनता को जबरिया अपने पक्ष में करने में लगे हैं। दुकानदारों को पीटकर दुकानें बंद करा दी जाती हैं, वाहन चालकों को पीटा जाता है और फिर शाम में पार्टी का मालिक दावा करता है कि उसका बंद सफल रहा। एक भी दुकान नहीं खुली, एक भी वाहन नहीं चला। यदि यह सब लोगों की इच्‍छा से हुआ हो तब तो? यह सब हुआ जरूर लेकिन यह तो नेताओं व उनके गुर्गों की गुंडई की बदौलत न कि उनके जनाधार के कारण। नेताओं को अपनी दोरंगी नीति से बाज आनी चाहिए और जनता को बेवकूफ बनाने से भी।

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बीबी हो तो ऐसी

आपने यह फिल्‍म अवश्‍य देखी होगी। अपने जमाने की हिट फिल्‍म है। रेखा ने अपनी बेजोड़ अदाकारी की बदौलत इस चरित्र को ऐसा जिया कि फिल्‍म का नाम लेते ही रेखा की अदाकारी की याद स्‍वत: हो आती है। लेकिन हम यहां न तो इस फिल्‍म की बात करने जा रहे हैं और न ही फिल्‍म की नायिका रेखा की। हम रील नहीं रियल लाइफ में घटित एक घटना का जिक्र करने जा रहे हैं। इस घटना को जिसने भी सुना, एक बार चुटकी ले ही ली- बीबी हो तो ऐसी। दरअसल, सभी पति चाहते हैं कि उनकी पत्‍नी उन्‍हें थोड़ी स्‍वतंत्रता दे। कुछ पति यह भी चाहते हैं कि वे दूसरी लड़कियों या दूसरों की बीबीयों को जी भर कर देखें भी और जब वे ऐसा कर रहे हों तो उनकी पत्‍नी उन्‍हें टोके भी नहीं। पर, ऐसा होता नहीं। ऐसे नजारे देखना तो दूर, सुनकर भी किसी की पत्‍नी का पारा हाई हो जाता है और पति से उलझ पड़ती है। बहुत सारी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती रहती हैं कि किसी मर्द को दूसरे की बीबी या किसी अन्‍य लड़की के साथ इश्‍क लड़ाते देख उसकी पत्‍नी ने उसे पीट डाला, थाने पहुंचा दिया। उदाहरण के तौर पर हम बिहार के एक बहुत ही चर्चित और सनसनीखेज घटना का जिक्र करना चाहेंगे। हिंदी के प्रोफेसर मटुक नाथ अपनी ही स्‍टूडेंट जुली को दिल दे बैठे और दोनों ने ऐसा इश्‍क फरमाया कि मीडिया ने उन्‍हें प्रेमियों के आदर्श के रूप में उछाल दिया। कालेज गोइंग लडकों ने तो उन्‍हें अपना आदर्श ही मानना शुरू कर दिया, इश्‍क के मामले में। लेकिन जब पूरी दुनियां इन दोनों के प्रेम पर चुटकी ले रही थी, मजे ले रही थी, तब एक औरत थी जिसने इसका पूरा विरोध किया। वह मटुक जी की पत्‍नी थीं। उन्‍होंने जूली के साथ जब प्रोफेसर को पकड़ा तो दोनों की जमकर पिटाई की और फिर जूली को थाने लेकर चली गयीं। अलग बात है कि पति का स्‍वार्थी प्‍यार झुका नहीं और बीबी को ही हार माननी पड़ी। प्रोफेसर साहब अपने स्‍टूडेंट के साथ रह रहे हैं और बीबी अलग। लेकिन, इन आम घटनाओं से अलग हम जिस घटना का जिक्र आपसे करने जा रहे हैं उसमें पत्‍नी ने अपने पति की इश्‍कबाजी का विरोध नहीं किया, बल्कि उसे इश्‍क करने का लाइसेंस ही दे डाला। यह अंदर की बात है कि ऐसा करना उसकी मजबूरी थी, या इसके पीछे पति से उसका बेइंतहा प्‍यार था। दरअसल, पत्‍नी को जब पति के इश्‍क की खबर मिली तो पहले तो उसने समझाया लेकिन जब इश्‍क में अंधे पति ने उसकी बात नहीं मानी तो फिर उसने पति की इच्‍छा पूरी ही कर दी। जिस लड़की से उसके पति का इश्‍क चल रहा था वह भी कोई और नहीं उसकी ही अपनी छोटी बहन थी। उसने ऐसा उपाय किया कि दोनों मिलते ही नहीं रहे बल्कि हमेशा के लिए मिल गए, कभी जुदा न होने के लिए। एक-दूसरे का हमसफर बन गए। जी हां, उसने उन दोनों की शादी ही करा दी। अब तो आप कहेंगे ना कि बीबी हो तो ऐसी…।
बिहार प्रदेश के सारण जिले के नगरा पंचायत के रसूलपुर गांव के कालिका साह ने 2003 में अपनी पुत्री सबिता की शादी इसी जनपद के गड़खा थाना के सत्यहा गांव के वैद्यनाथ साह के 30 वर्षीय पुत्र अशोक साह से की थी। जिसे तीन बच्चे भी हुए। पहले बच्चे के जन्म के समय सबिता अपनी 23 वर्षीय बहन सरिता कुमारी को देखभाल के लिये बुलाई थी। उसी समय उसके पति का दिल अपनी साली पर आ गया। धीरे-धीरे एकतरफा प्रेम दोतरफा में बदल गया और फिर जीजा-साली प्रेमी-प्रेमिका की भूमिका में आ गए। अंतत: इस प्रेम कहानी की खबर पत्‍नी सबिता को भी हुयी और उसने अपनी बहन व पति को काफी समझाया लेकिन दोनों नहीं माने। इधर कुछ दिनों से पति अशोक सरिता से शादी के लिए सबिता पर दबाव बनाने लगा। यहां तक कि उसने यह भी धमकी दी कि यदि उनकी शादी नहीं हुयी तो वे दोनों ही खुदकुशी कर लेंगे। पत्‍नी को गंभीर होना पड़ा। उसने सोचा यदि उसने दोनों के प्रेम को स्‍वीकार नहीं किया तो फिर बहन भी मरेगी और पति भी। बच्‍चे अनाथ हो जाएंगे। जबकि यदि उसने दोनों की बातें मान ली तो फिर उसे कष्‍ट तो अवश्‍य होगा लेकिन उसका पति व बहन दोनों खुशी-खुशी रह सकेंगे। अपने स्‍वार्थ के लिए उनकी खुशी क्‍यों बर्बाद की जाए। सबिता ने दोनों की शादी कराने की बात मान ली। गांव स्थित ही एक मंदिर में पत्‍नी ने दोनों की शादी करा दी। गांव वालों ने इसका काफी विरोध किया लेकिन जब पत्‍नी ही पति के पक्ष में खड़ी हो तो फिर कोई क्‍या कर सकता है। सबको अंतत: झुकना ही पड़ा।
कालिका का शादी के बाद प्रेम करना, दूसरी शादी करना ठीक है या नहीं, यह अलग विषय है लेकिन उसकी पत्‍नी के इस त्‍याग ने यह साबित कर दिया है कि प्रेम में हमेशा अपनों की खुशी देखी जाती है, अपनी नहीं। सही अर्थों में कहें, तो हम कह सकते हैं कि सबिता का प्रेम उच्‍च स्‍तर का है जबकि सरिता और कालिका का प्रेम स्‍वार्थ की बुनियाद पर है। सरिता और कालिका के प्रेम की बुनियाद हवस है, जबकि पत्‍नी सबिता का त्‍याग उसके आंतरिक व अगाध प्रेम का प्रतीक है। यदि कालिका सरिता से भी प्रेम करता तो वह निश्चित ही सबिता के भी प्रेम को समझ सकता था। और एक प्रेम करने वाला व्‍यक्ति दूसरे प्रेम करने वाली स्‍त्री को दुख देने वाला कार्य कभी नहीं करता। इसी तरह यदि सरिता भी कालिका से सच्‍चा प्रेम करती तो वह समझ सकती थी कि ऐसा ही प्रेम उसकी दीदी सबिता भी करती होगी और उसके प्रेम पर डाका डालना प्रेम का अपमान है। पत्‍नी सबिता का प्रेम ही वास्‍तविक है जिसने अपनों की खुशी के लिए अपनी खुशी की बलि दे दी। हम गर्व कर सकते हैं अपने पति को इतना अधिक प्रेम करने वाली एक स्‍त्री पर, लेकिन हमें शर्म है अपनी पत्‍नी की खुशी छीन लेने वाले पति पर और अपनी बहन का पति छीनने वाली सौतन पर। प्‍यार सिर्फ सबिता का ही सच्‍चा है, जीजा-साली का एक-दूसरे से प्‍यार करना प्‍यार नहीं, दैहिक भूख मिटाने का माध्‍यम भर है। ऐसे प्रेमी-प्रेमिकाओं का समाज में विरोध उचित है। गांव वालों की भूमिका इसमें सही रही। हां, जब पत्‍नी ने ही दोनों को मिलाने की ठान ली हो तो फिर गांव वालों का विरोधी स्‍वर रूक जाना भी ठीक ही था। एक बात और, कई लोग यह तर्क दे सकते हैं कि सबिता को झुकना नहीं चाहिए था, उसे ऐसे पति से तलाक ले लेनी चाहिए थी। लेकिन उन लोगों के लिए हमारा जवाब यह है कि शादी में भले ही तलाक हो जाए, प्रेम में तलाक नहीं होता। सबिता ने अपने पति से सच्‍चा प्‍यार किया, वह न तो उसे तलाक दे सकती थी और न ही उसे दुख देने वाला आचरण कर सकती थी। फिर एक मां के तौर पर बेटों का भविष्‍य भी तो सोचना था उसे। उसने जो भी किया सही किया, इस पर गर्व किया जाना चाहिए, लेकिन दोनों प्रेमियों ने जो किया वह सरासर गलत है, शर्म करने वाली बात है।

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यतो धर्म: ततो जय

कहते हैं जहां धर्म है वही जीत है यानी, यतो धर्म: ततो जय। विज्ञान की विकृतियों और प्रकृति से छेड़छाड़ के नतीजों को भुगत रही दुनियां फिर से धर्म की तरफ लौट रही है, या कहें कि लौटने के लिए विवश हो गयी है। धर्म सिर्फ जीत ही नहीं दिलाता, यह हमें तटस्‍थ रहने का भी धैर्य और शक्ति प्रदान करता है। 26 जून की रात हम बिहार के छपरा स्थित चिरांद घाट पर मौजूद हैं। यहां हजारों की भीड़ धर्म की जय-जयकार करने के लिए उतावली हुयी जा रही है। जीवनदायिनी मां गंगा, श्‍यामिली सरयू और गंडक की धाराएं यहां से थोड़ी ही दूरी पर जब एक-दूसरे को काटती हैं, या कहें कि एक-दूसरे से मिलती हैं तो इस पुनीत दर्शन के बाद ऐसा लगता है जैसे जीवन में कुछ शेष ही नहीं रह गया। सबकुछ पा लिया हमने। ऐसी संतुष्टि, ऐसी शांति, ऐसा अहसास कभी हमें विज्ञान ने नहीं दिया, कभी दुनियां की किसी अविस्‍कारिक कृति से नहीं मिली, लेकिन यहां आकर तो ऐसा लगा जैसे हम यही के होकर रह जाएं। नदी घाट के किनारे पर दूर-दूर तक नावें नजर आ रही हैं। रात के अंधेरे में इन नावों पर जलती लालटेन की लौ से प्रस्‍फुटित रोशनी जब नदी की धारा से टकराती है तो अद़भुत छटा का निर्माण हो रहा है। प्रसिद़ध संस्‍था चिरांद विकास परिषद ने यहां गंगा घाट पर गंगा बचाओ संकल्‍प का आयोजन किया है। नदी के तट पर पांच छोटे-छोटे आरती मंच बने हैं और काशी से आए बटुक इन पांचों मंचों पर अपनी उपस्थिति से जनमानस को धन्‍य कर रहे हैं। नदी घाट के किनारे मंदिरों पर लगे कृत्रिम प्रकाश से काफी रोशनी है लेकिन जब बटुकों ने अपने दाहिने हाथ से आरती अरधा पकड़ा और बाये हाथ के सहारे से चारों तरफ मां गंगे की स्‍तुति शुरू की तो उससे निकली रोशनी ने इस कृत्रिम रोशनी को मात दे दी है। इस अरधे की 108 ज्‍योतियों ने लोगों के मन के सारे विकार मिटा दिये और हमारे अंदर तक रोशनी पहुंच गयी। पांच अरधों की कुल 540 ज्‍योतियों से न सिर्फ घाट पर गजब की रोशनी फैल गयी है बल्कि यहां मौजूद लोगों के दिलों में व्‍याप्‍त अंधेरा भी दूर हो गया। लोग अनायास ही बोल रहे हैं- मां गंगा की जय। गंगा मईया की जय। यह स्‍वर उनके मुख से नहीं, मन से निकल रहा है। वे नहीं जानते, क्‍या बोल रहे हैं, बस खुद ही आवाज निकल रही है- गंगा मईया की जय। आरती शुरू हो गई है। उपस्थित हजारों हाथ खुद ही हवा में लहराये और मां गंगा की स्‍तुति के लिए एक-दूसरे से जुड़कर ऐसे चिपक गए हैं जैसे वे हमेशा से ऐसे ही हों। पूरे एक घंटे की महाआरती के दौरान हाथ जुड़े रहे और लोगों के मन में मां गंगा की अविरल धारा बह रही थी। न किसी को गर्मी हो रही है, न पसीने छूट रहे है और न ही कहीं आने-जाने की जल्‍दी है। अथवा, सबकुछ है लेकिन उपस्थित लोगों को मां गंगा के अलावा कुछ याद ही नहीं। वे सबकुछ भूल चुके हैं। बस मां याद हैं, वे उनके बच्‍चे हैं और उनकी अपार कृपा के बदले आज जब उन्‍हें उनकी स्‍तुति के लिए यह अवसर मिला है तो वे भला इसे कैसे जाने दे सकते हैं। बस जड़ हो गए हैं सभी। सबकुछ थम गया है। वक्‍त जैसे रूक गया है यहां आकर। ऐसा सिर्फ धर्म में ही संभव है। हजारों की भीड़ लेकिन कोलाहल कही नहीं। यदि स्‍वर है तो सिर्फ आरती के स्‍वरयुक्‍त पंक्तियों की। हम नवम्‍बर 2007 में अपनी मां के साथ काशी स्थित दशाश्‍वमेघ घाट पर गए थे, यहां आकर ऐसा लग रहा है जैसे हम काशी में ही आ गए हों। सबकुछ वैसा ही है। नदी के किनारे मंदिरों की श्रृंखला, अपार आस्‍था को समेटे महाआरती के दर्शन को लालायित लोग। कुछ भी इतर नहीं। बस जगह बदल गयी है। 2 साल पहले हम बनारस में थे, आज वहीं दृश्‍य चिरांद में पाकर धन्‍य हो रहे हैं। मां गंगा के शीतल जल को छूते हुए जब हवाएं दक्षिण की तरफ से आ रही हैं तो ऐसा लगता है जैसे मां का आंचल हमें छूकर गया हो। अधिकतर लोगों की आंखें श्रद्धा से बंद है और वे बंद आंखों में मां गंगा की प्रतिमूर्ति देख रहे हैं। ऐसे में जब हवाएं उन्‍हें (हमें भी) छूकर जा रही है तो अद्भुत आनंद की अनुभूति हो रही है। यहां सिर्फ हम नहीं हैं, हमारे जैसे हजारों लोग हैं और कुछ बड़े लोग भी हैं जो विशेष अवसरों पर ही देखे जाते हैं। लेकिन आज वे भी हमारे जैसे ही हैं, एकदम सामान्‍य वेष में, सामान्‍य शैली में लेकिन अपार आस्‍था के साथ। जाति-धर्म का भी कोई भेदभाव नहीं। बिहार विधानसभा प्रत्यायुक्त समिति के सभापति रामदास राय, विधानपरिषद सदस्य सलीम परवेज, विधायक ज्ञानचंद मांझी, पूर्व मंत्री मुनेश्वर चौधरी, पूर्व सांसद लाल बाबू राय, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक स्वांत रंजन, वरीय पत्रकार कृष्‍णकांत ओझा, अखिल रंजन, श्रीराम तिवारी, विश्व हिन्दू परिषद के मंत्री ओमप्रकाश, वरीय अधिवक्ता मणीन्द्र कुमार सिन्हा, प्रमुख देवंती देवी, मुखिया सरिता देवी आदि विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित हैं। अभी-अभी चिरांद विकास परिषद के संरक्षक महंत कृष्ण गिरी उर्फ नागा बाबा ने आगंतुक विशिष्ट अतिथियों का इस महाआरती में स्‍वागत किया है। कृष्‍णगिरि स्‍वयं संत हैं और सैकड़ों उनके भक्‍त भी। लेकिन यहां आज वे भी नतमस्‍तक हैं। धर्म खुद अपनी गाथा कह रहा है। वह बोल नहीं रहा लेकिन सबकुछ दिख रहा है। आरती के दौरान जब मां गंगा की लहरों में थोड़ी उथल-पुथल हो रही है तो ऐसा लग रहा है जैसे मां कह रही हो- हम खुश हुए तुम्‍हारी प्रार्थना से, मांगो, क्‍या मांगते हो। लेकिन हमें बोध कहां है, हम तो बस निश्‍चेत हो गए हैं। यहां धर्म है और जय भी। धर्म की बात हो और जय-जयकार न हो, भला कैसे हो सकता है। हर तरफ मां गंगा की जय-जय कहते आज हमें लगा कि हम खुद ´जय´ हो गए हैं। जैसे ही आरती समाप्‍त हुयी, एकाएक सबकी तन्‍द्रा भंग हो गई और वे अमर लोक से पुन: चिरांद की धरती पर वापस आ गए। उपस्थित महिलाएं, बच्‍चे अवाक हैं। वे शायद सोच रहे हैं कि आरती अभी खत्‍म क्‍यो हो गयी। मां की स्‍तुति के लिए इतनी बेसब्री, अकुलाहट वाली इस धार्मिक भीड़ को देखकर हमें जो सुखद अनुभूति हुयी है, वह हम शब्‍दों में बयां नहीं कर सकते। हमने यहां जो कुछ भी महसूस किया, वह आपको बताने की पूरी कोशिश की। लेकिन, हम जानते हैं कि हम इसमें सफल नहीं हो सके हैं। अहसास को यदि इंसान पूरी तरह बांट ले तो फिर क्‍या कहना। लेकिन ऐसा संभव नहीं। हमने चिरांद की इस पुण्‍यभूमि पर आकर जो कुछ महसूस किया वह सबकुछ जानना है तो इस महाआरती में शामिल होने के अलावा आपके पास और कोई विकल्‍प नहीं है। गंगा महाआरती के अवसर पर उपस्थित लोगों की इस अविस्‍मरणीय और अपार आस्‍था को हमारा प्रणाम !

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ये रिश्‍ता टूटे ना

फकत एक नजर तो है मेरे पास
क्‍यों देखें जिंदगी को दूसरों की नजर से हम,
माना कि चमन को गुलजार ना कर सके
कुछ खार तो कम कर दें गुजरे जिधर से हम…।

रिश्‍तों में दरारें बढ़ती ही जा रही हैं। अपनी जिंदगी को दूसरों की नजर से देखने के कारण रिश्‍तों में जहां अविश्‍वास पैदा हो रहा है वहीं रिश्‍तें टूट रहे हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यदि रिश्‍तों को हम ठीक ढंग से जी नहीं पा रहे तो कम से कम अपनी गलतफहमियां तो दूर कर लें। जिंदगी की इस तेज रफ़तार में यह मौका भी कोई किसी को नहीं दे रहा। यदि किसी को अपने से कोई शिकायत है तो वह इसे मन में रखकर खुद ही घुटता रहता है और फिर एक दिन रिश्‍ता तोड़ने का ऐलान कर देता है, सच्‍चाई जाने बगैर। भला ऐसा भी कहीं होता है। यदि हम रिश्‍तों को निभा नहीं सकते तो कम से कम तोड़ने का प्रयास तो न करे। पिछले कुछ वर्षों में तलाक शब्‍द ने जो ख्‍याति पाई है वह शायद ही किसी और शब्‍द को मिली हो। गांवों में पहले लोग या तो यह शब्‍द ही नहीं सुने थे या फिर अधिकतर इस शब्‍द के अर्थ से अनजान थे। लेकिन अब तो मैरेज के साथ ही डाइवोर्स शब्‍द जुड़ गया है। कुछ ऐसा जैसे दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो। मैरेज के बाद कोई दिक्‍कत हो तो डाइवोर्स का कितना बेहतर आप्‍शन है। कायरों की इस दुनियां में वाकई रिश्‍तों को निभाने का साहस तो कोई-कोई ही कर सकता है। रिश्‍ते निभाना इतना आसान नहीं, तोड़ना कितना आसान हो गया है। रिश्‍ते जोड़ना भी मुश्किल नहीं लेकिन निभाना तो जैसे मुसीबत है। एक से रिश्‍ते तोड़कर दूसरे से जोड़ने वाले क्‍या यह बता सकेंगे कि क्‍या गारंटी है कि नये रिश्‍तेदार से भी उनके रिश्‍ते जीवनभर के होंगे।
आज कल की सबसे बड़ी मुसीबत माता-पिता की गलत सीख भी बन रही है। पहले जब बेटियां अपने ससुराल की शिकायत लेकर मायके पहुंचती थीं तो उन्‍हें उनकी मां सिखाती थीं- बेटा एडजस्‍ट करो, सबकुछ ठीक हो जाएगा। शुरू-शुरू में थोड़ी परेशानी तो होती ही है।लड़के के भी माता-पिता अपने बच्‍चे को समझाते थे- कि जैसे तुम्‍हानी बहन किसी और के घर गयी है, वैसे ही बहूं भी इस घर में आयी है। वह सबको छोड़कर तुम्‍हारे लिए आयी है, उसकी परेशानियां भी तुम्‍हारी है, उसे समझने का प्रयास करो। वक्‍त लगेगा, लेकिन सबकुछ ठीक हो जाएगा। और अब… ससुराल की शिकायत मायके पहुंचती है तो फिर पूरा घर इस पोजिशन में आ जाता है कि जैसे उनकी बेटी पाकिस्‍तान से लौटकर आ रही हो। …यह तो अच्‍छा हुआ कि बेटी वहां से आ गयी नहीं तो पता नहीं जालिम क्‍या करते… तुम चिंता मत करो यदि वे लोग नहीं सुधरते हैं तो फिर क्‍या दुनियां में लड़कों की कमी है, तुम्‍हारी शादी कहीं और कर देंगे। कुछ अति उत्‍साही मगर बगैर दिल वाले समझाते हैं- दहेज कानून में फंसा दो, बहुत फुदक रहे हैं। दिमाग ठिकाने आ जाएगा। फिर कोई रिश्‍तेदार तलाक के हथियार इस्‍तेमाल करने की सीख दे डालता है और फिर कितना सस्‍ता है तलाक लेना-देना। घर के भाई-पिता बेटी-बहन की तलाश के फाइल को लेकर कुछ यूं उत्‍साह से चलते हैं कि शायद ही कभी उसके शादी के कार्ड को इतने उत्‍साह से कहीं पहुंचाया हो। जितना उत्‍साह उसे तलाक दिलाने में दिखाते हैं, काश कि दोनों के परिवार वाले इस रिश्‍ते को फिर से जोड़ने में उतनी कोशिश करते तो फिर ऐसी नौबत ही नहीं आती। वे इस बिखराव को कभी दूर करने की कोशिश नहीं करते। इसमें उनकी मर्दानगी को चोट पहुंचने लगती है। … हम भला क्‍यों माफी मांगे, गलती उसकी है। अरे, यदि हमने गलती नहीं भी की है लेकिन यदि कोई गलतफहमी हो गयी है तो उसे दूर करने में क्‍या जाता है। एक बार कुछ बुरा हो जाने के बाद दंपत्ति कभी पुराने दिनों को याद करने की भी कोशिश नहीं करते… जब उनमें से एक बीमार होता था और दूसरे की नींद गायब हो जाती थी। उन्‍हें सिर्फ अपना झूठा अहंकार दिखता है। और अपने अहम को बरकरार रखने की चाह में वे अपना रिश्‍ता बरकरार नहीं रख पाते। लोगों का यह समझना चाहिए कि उनका अहम इस बात में है कि उनका रिश्‍ता बना रहे, लोग उनके रिश्‍ते का उदाहरण दिया करें। उनका अहम इस मायने में नहीं है कि उनके नहीं झूकने के कारण उनका रिश्‍ता ही टूट जाये। रिश्‍तों की कीमत पर अहम को बरकरार रखना कहां की समझदारी है। और किस बात का अहम। जो लोग अपना रिश्‍ता तक नहीं निभा सकते, उन्‍हें किस बात का घमंड हो जाता है। जिंदगी कोई कंपनी की तरह नहीं है कि उसमें आज किसी और को जगह दे दें और अपना काम निकल जाए तो फिर किसी और कर्मचारी को रख लिया जाए। जिंदगी तो बस एक ही है और इस राह में चलने वाला साथी हमसफर भी एक ही होना चाहिए। लोगों को इस बात की खुदा से बहुत शिकायत है कि उनकी आयु छोटी होती जा रही है। लेकिन एक बार को जरा सोचे, कि जो लोग इतनी छोटी जिंदगी में अपना रिश्‍ता निभा नहीं पाते, क्‍या हो यदि उनकी जिंदगी बड़ी हो जाए। तब तो केवल रिश्‍ते ही बदलेंगे, टूटेंगे और दिल सड़क पर यूं पड़े मिलेंगे जैसे कुचले हुए टमाटर, आलू मिलते हैं। ना तो जिदंगी दो बार मिलती है, ना ही दिल दो होता है फिर चाहत कैसे बदलती रहती है, आज उसे चाहते हैं, कल किसी और को और परसो कोई दूसरा साथी हो जाता है। जो अपने पुराने रिश्‍ते को बरकरार नहीं रख सकता वह क्‍या दूसरे नये रिश्‍ते को निभा पाएगा। माना कि तेज रफ़तार की इस जिंदगी में लोगों को फुरसत नहीं कि वे एडजस्‍ट कर पाए लेकिन क्‍या रिश्‍ते तोड़कर फिर से जोड़ने वाले यह दावा करने को तैयार हैं कि उनके नये रिश्‍ते में कोई समझौता नहीं है। दरअसल ऐसे लोग रिश्‍ते को समझौते से अधिक कुछ समझते ही नहीं। रिश्‍ता टूटा मतलब समझौता टूटा और नया रिश्‍ता मतलब नया समझौता। हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक संबंधी नए कानून पर लोग ऐसे खुश हुए जैसे उन्‍हें दूसरी आजादी प्राप्‍त हुई हो। कई जगहों पर तो‍ मिठाईयां बांटी गयी। रिश्‍ते तोड़ने की इतनी खुशी, हमने पहले कभी नहीं देखा। रिश्‍ते जुड़ने पर तो खुशी होती है लेकिन रिश्‍ता टूटने पर भी लोग खुश होते है, आज ही के युग में संभव है।
मां-पिता को भी अपने लाडलों के रिश्‍ते तोड़ने की कितनी जल्‍दी है, इसका एक उदाहरण आपको हतप्रभ कर देगा। बिहार के मुजफ़फरपुर की मधु की शादी 30 साल पहले 1974 में ललित बाधवा के साथ हुई थी। लेकिन इस बीच उनमें कुछ मनमुटाव हो गया और मधु ने तलाक का फैसला लिया। मधु के इस फैसले में उसकी 70 वर्षीय मां प्रेमलता ने उसका भरपूर साथ दिया। लेकिन मधु के पिता 72 वर्षीय चन्‍द्र नरूला ने इसका विरोध करते हुए दामाद का पक्ष लिया यानी उन्‍होंने रिश्‍ते को तोड़ने की बजाय जोड़ने की वकालत की। इससे मधु के माता-पिता के बीच इतनी तकरार बढ़ी कि अंत में उन्होंने भी तलाक के लिए सहारनपुर के उसी कोर्ट में मामला दायर कर दिया जिसमें बेटी ने दायर किया था। अब दोनों मामले कोर्ट में लंबित हैं। यह उदाहरण था इस बात का कि एक बेटी किस तरह खुद के रिश्‍ते को तो नहीं निभा पायी अपने माता-पिता के रिश्‍ते को भी खराब कर दिया। हम इस बात के भी पक्षधर नहीं कि किसी लड़की या लड़के का शोषण होने लगे और वे रिश्‍ता बनाये रखे। लेकिन छोटी-छोटी बातों को अहम का विषय बनाकर झगड़ना और इसके तलाक के अंजाम तक पहुंचाना देना तो गलत है ही। यदि कभी हमारी गलती नहीं भी है और हमारा साथी हमसे नाराज हो जाता है तो उससे माफी मांग लेने में क्‍या चला जाता है। हम किसी गैर से तो माफी नहीं मांग रहे, अपने से माफी मांगने में शर्म आने लगे और अहम बिगड़ने लगे तो फिर रिश्‍ता तो यूं ही नहीं रह जाता है। हमारी तो बस एक ही विनती है कि रिश्‍ता चाहे माता-पिता से हो, भाई-बहन का हो, मित्र का हो या फिर पति-पत्‍नी का, इसमे कोर्ट को बीच में न लाएं। रिश्‍ते की बात आपस की बात है और आपस में ही सुलझ जानी चाहिए। बाकी हमारी शुभकामनाएं उन सभी के साथ है जो कुछ परेशानियां आने के बाद भी अपने रिश्‍तों को कभी नहीं तोड़े, कभी टूटा भी तो उनकी सांस के साथ।

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चुनाव के पहले ही तूफान बीच लालटेन

कभी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी रही राष्‍ट्रीय जनता दल की लालटेन अब तूफान बीच आ गयी है। इसकी लौ चुनाव के पहले ही बुझने के कगार पर है। नहीं, बिल्‍कुल नहीं, यह किसी चैनल या अखबार की सर्वे रिपोर्ट नहीं है। यह तो खुद चुनाव आयोग कह रहा है। दरअसल पिछले विधानसभा चुनाव में राजद के खराब प्रदर्शन को देखते हुए चुनाव आयोग उसके राष्‍ट्रीय पार्टी होने के तमगे को वापस लेने पर विचार कर रहा है, साथ ही वह इस फैसले पर भी विचार कर रहा है कि क्‍यों न पार्टी के राष्‍ट्रीय चिह़न लालटेन को वापस ले लिया जाए। यानी, 15 सालों तक आंधियों में भी पूरे शान से जलने वाली लालटेन की लौ अब बगैर हवा के टिमटिमाने लगी है। यह लालू प्रसाद के लिए चुनाव से पहले बहुत बड़ा झटका है। जनता की आंखों में धूल झोंक 15 वर्षों तक शासन करने वाले लालू को अब जनता के एक ही फैसले ने कहीं का नहीं छोड़ा है। बता दें कि 15 वर्षों तक बिहार में लगातार राजद की सरकार रही। इस दौरान बिहार में विकास की गति काफी धीमी रही, कुछ ऐसी जैसे विकास ही नहीं हुआ हो। सड़कें ऐसी हो गयी थी कि गाडि़यों में बैठने वाले पहाड़ पर चढ़ने-उतरने का मजा लेते थे, बिजली की स्थिति तो ऐसी थी कि यूपी-बिहार के पहचान की प्रतीक ही बिजली हो गयी थी। बिहार का पश्चिमी छोर उत्‍तर प्रदेश को छूता है। जब उत्‍तर प्रदेश से गाडि़या बिहार में प्रवेश करती थी और सड़के जर्जर दिखती थीं तो लोग समझ जाते थे कि अब बिहार की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं। वैसे ही जब रात में गाडि़यां अंधेरे में प्रवेश करती तो अंदाजा हो जाता कि अब वे बिहार की सीमा में है। इतना ही नहीं 15 वर्षों के अपने शासन काल में लालू ने बिहार को इतना कुख्‍यात कर दिया था कि बिहार के लोग जहां कहीं भी मजदूरी के लिए जाते उन्‍हें खदेड़ दिया जाता। हालांकि अब भी यदा-कदा ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। लेकिन उस समय कुछ और ही बात थी। विदेशी तो छोड़ दें, अपने ही देश के अन्‍य प्रदेशों के लोग बिहार आने से कतराते थे, डरते थे। जनता ने जैसे-तैसे जेपी के चेले के नाम पर लालू को 15 वर्षों तक बर्दाश्‍त किया लेकिन जब उन्‍होंने अपनी आदत नहीं छोड़ी तो जनता को फैसला लेना ही पड़ा। फिर क्‍या था, बिहार में लगातार डेढ़ दशक तक सत्‍तासीन रहे लालू प्रसाद की पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। बिहार में जेपी के ही दूसरे चेले नीतीश कुमार की सरकार बन गयी। जनता लालू से इतना खफा थी कि उसने उन्‍हें करारी शिकस्‍त दिलवायी। अपने वोटिंग हथियार से जनता ने लालू को शर्मनाक स्थिति मे ला खड़ा किया। अब जनता के उसी फैसले के परिणाम स्‍वरूप लालू की कुंडली में एक बार फिर दोष आ गया है। पिछले चुनाव में उनके पार्टी के शर्मनाक प्रदर्शन को लेकर चुनाव आयोग ने ऐसा विचार जताया है कि उनकी पार्टी से राष्‍ट्रीय पार्टी व चुनाव चिह़न लालटेन वापस लिया जा सकता है। यदि ऐसा हो गया तो पहले से ही बिहार की राजनीति में हाशिये पर चल रहे लालू का राजनीतिक कैरियर दांव पर लग सकता है। बिहार में लालटेन को इतने दिनों में लोग लालू का पर्याय समझने लगे हैं। ऐसे में यदि पार्टी का चुनाव चिह़न बदल गया तो गांवों में रहने वाले गंवार व अशिक्षित वोटरों का वोट स्‍वत: ही प्रभावित हो जाएगा। जबकि लालू की जीत में इन वोटरों का खास महत्‍व है। खैर, कुछ भी हो लेकिन लालू को उनके किए का फल लगातार मिल रहा है। जनता के विश्‍वास को तोड़ने का नतीजा उन्‍हें कुछ इस कदर चुकाना पड़ सकता है, शायद लालू ने भी नहीं सोचा होगा। लेकिन जब हाय लगती है तब फिर दुआएं भी बेअसर हो जाती हैं। लालू भी कुछ इसी स्थिति से गुजर रहे हैं।

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कांग्रेस : परिवारवाद की जद में पार्टी तो हर मोर्चे पर विफल सरकार

कांग्रेस पार्टी न तो अपनी पार्टी की मर्यादा कायम रख पायी है और न ही पूर्व में जनता की जिस सेवा भावना के कारण वह जानी जाती रही, उसे ही कायम रख पायी है। पार्टी कार्यकर्ताओं में जहां राहुल गांधी के रोज-रोज की नौटंकी को लेकर रोष है वहीं शासन के दोषों को लेकर जनता में बेहद आक्रोश है। अब पार्टी की नीति परिवार का लड़का तय कर रहा है तो शासन का कार्य रिमोट के दम पर हो रहा है। पार्टी और सरकार दोनों ही मोर्चों पर विफल रही इस पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

पुरानी कहावत है इश्‍क और जंग में सबकुछ जायज है। आज की राजनीति ने उस समय के इस कहावत को प्रासंगिक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। राजनीति में 80 साल का पार्टी का कोई कार्यकर्ता अपने पूरे जीवन-काल में केवल पार्टी-समारोहों में कुर्सियां रखने-उठाने का काम करता रह जाता है तो कोई विदेशों में पढ़ाई करने के बाद यहां आकर उन्‍हीं पुराने कार्यकर्ताओं पर अपना हुक्‍म सुनाता है। वैसे, हुक्‍म देने वाला यह व्‍यक्ति भी अपने को पार्टी का कार्यकर्ता ही बताता है। लेकिन, वह यह शायद ही बता सके कि उसने ऐसा क्‍या किया कि उसे अपने पिता के उम्र वाले कार्यकर्ताओं पर भी हुक्‍म सुनाने का अधिकार मिल गया। लेकिन, हम बता सकते हैं और आप जानते भी हैं। यह अधिकार उसे सिर्फ इसलिए प्राप्‍त है क्‍योंकि वह परिवार की पार्टी के मुखिया का बेटा है। क्‍या खूब समझे आप। हम कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी की ही बात कर रहे हैं। राहुल ने न तो भारत में अपनी शिक्षा पूरी की और न ही भारतीय परिवेश में पले-बढ़े। पार्टी से तो उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था। बल्कि हाल तक तो वे राजनीति से तौबा-तौबा करते फिरते थे। लेकिन जब राजनीति में आये तो वाह, क्‍या राजनीति करते हैं। पार्टी के ही कार्यकर्ताओं पर उनकी राजनीति भारी पड़ रही है। जब पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी के इस पुत्र ने इस क्षेत्र में कदम रखा तो पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने किसी राजकुमार की तरह उनका स्‍वागत किया, उन्‍हें बगैर किसी विरोध के राजनीति में जगह दी, हमेशा बेदाग बनाए रखा लेकिन अब जबकि राहुल बाबू को राजनीति समझ में आ गयी है तो उन्‍हीं कार्यकर्ताओं को वे अपनी जागीर समझने लगे हैं। वे खुद पदाधिकारी की भूमिका में हैं और कार्यकर्ताओं को कर्मचारी समझते हैं। ऐसा कर्मचारी जिसे वे भुगतान करते हैं, मनचाहा काम लेते हैं और जब चाहे नौकरी से निकाल सकते हैं। ऐसा हम नहीं कह रहे, यह सबकुछ तो आये दिन जारी हो रहे उनके बयानों से ही साफ हो रहा है। हालांकि राहुल की इस नौटंकी को लोग भी समझते हैं, कार्यकर्ता भी और विरोधी पार्टियां भी। कहीं ऐसा न हो कि जिस पार्टी ने उन्‍हें आश्रय दिया, चर्चित किया, उसी पार्टी के लिए वे नुकसानदायक साबित हो जायें। राहुल ने अब तक कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिसकी चर्चा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आवश्‍यक हो, फिर भी वे पार्टी के सबसे चर्चित नेता हैं। उन्‍हें पार्टी में प्रवेश से पहले एक सवाल तक नहीं किया गया लेकिन अब वे पार्टी के पुराने और निष्‍ठावान कार्यकर्ताओं का बाकायदा इंटरव्यू ले रहे हैं। वे भी कार्यकर्ता नहीं रहे सीधे कार्यकर्ताओं के मालिक बन गए- महासचिव बन गये और जो सालों से पार्टी के प्रति समर्पित रहे हैं उन्‍हें वे अपनी वेस्‍टर्न स्‍टाइल का शिकार बना रहे हैं। कार्यकर्ताओं का इंटरव्यू ले उन्‍हें छंटनी की धमकी दे रहे है। हालांकि यह भी सत्‍य है कि राहुल कई मायनों में कांग्रेस के लिए शुभ हैं लेकिन उनके आचरण उन्‍हें पार्टी कार्यकर्ताओं में कुख्‍यात बनाने वाले हैं।
पिछले दिनों जब राहुल गांधी बिहार आए तो यहां के लोगों ने उन्‍हें पलकों पर बिठाया। लोगों ने अखबारों में देखा था राहुल को टोकरी उठाते, दलितों के घर उठते-बैठते। वे खुश थे कि उनके पास आज कोई नेता नहीं, बेटा सरीखा युवक आया है। लेकिन उनकी यह उम्‍मीद काफूर हो गई जब राहुल बिहार की गरीब जनता से नहीं मिलकर, लड़कियों से मिलने पटना वोमेन्‍स कॉलेज जा पहुंचे। घंटों तक लड़कियों से हंस-हंस के बात की, हाथ मिलाया और वाहवाही भी लूटे। लेकिन जितना समय उन्‍होंने ईसाईयों के इस कॉलेज में बिताया था उतने समय में वे गांवों के किसी भूमिहीन-भवनहीन विद्यालय में आसमान के नीचे पढ़ रहे बच्‍चों से भी मिल सकते थे। लेकिन उन्‍हें तो सिर्फ ख्‍याति पानी थी। वह तब भी मिल गयी जब वे गर्ल्‍स कॉलेज में गए। हालांकि दरभंगा जाकर उन्‍होंने अपनी राजनीति खूब चमकाई। लेकिन यहां के समारोह में जब युवकों ने उनसे यह सवाल दागा कि क्‍या आप इंटरव्यू देकर कांग्रेस में आये थे जो दूसरों का इंटरव्यू ले रहे हैं, तो उनकी बोलती बंद हो गयी थी और बगैर जवाब दिये ही वे वहां से चल दिए थे। राहुल के इस आगमन से लोगों को शायद दिली खुशी नहीं हुई और इसलिए ही बिहार में उनकी पार्टी को पाप लग गया। वे उधर पटना से दिल्‍ली गए और इधर बिहार कांग्रेस में घमासान छिड गया। पार्टी अध्‍यक्ष अनिल शर्मा और बिहार मामलों के प्रभारी जगदीश टाइटलर आपस में ही भिड गए। विवाद इतना बढ़ा कि आलाकमान को दोनों को हटाना पड़ा। इसके बाद राहुल गांधी बिहार में नजर नहीं आये।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ परिवारवाद के कारण ही कांग्रेस की फजीहत हो रही है। सरकार चलाने की उसकी नीति भी उसे बदनाम कर रही है। यह बयान हर माह में किसी न किसी विरोधी पार्टी के नेता द्वारा आ ही जाता है कि मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की कठपुतली हैं। पार्टी अध्‍यक्ष होना और बात है लेकिन सरकार के प्रधानमंत्री पर अपनी नीतियां थोपना, अपने आदेश लादना कहीं न कहीं सत्‍ता की बागडोर को अपने हाथ में लेने वाली स्थिति की ओर इंगित करता है। एक बात और है जो कांग्रसियों द्वारा अपनी सोनिया मैडम के बारे में कही जाती है। वह यह कि सोनिया गांधी ने सत्‍ता का त्‍याग किया है, वे चाहतीं तो खुद प्रधानमंत्री बन सकती थीं लेकिन उन्‍होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन, ऐसा करके सोनिया गांधी ने कोई त्‍याग किया हो, यह नजर नहीं आता। यदि उन्‍होंने सत्‍ता का त्‍याग कर दिया होता तो फिर वे मनमोहन को रोबोट बनाकर रिमोट की तरह उन्‍हें नहीं चलाती। वे सत्‍ता से अलग रहकर पार्टी के लिए काम कर सकती थीं। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रही हैं। प्रधानमंत्री के हर शासनादेश में या तो उनका समर्थन होता है या फिर यह आदेश ही उन्‍हीं का होता है। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद काफी सोची-समझी नीति के तहत मनमोहन को दिया। यदि वे खुद प्रधानमंत्री बनी रहतीं तो उन्‍हें सरकारी कार्यों से ही फुरसत नहीं मिलती और वे पार्टी के लिए समय नहीं दे पाती। फिर पार्टी में अंतर्कलह, विवाद उत्‍पन्‍न होते। यही नहीं सरकार की गलत नीतियों के छींटे प्रत्‍यक्ष रूप से सोनिया गांधी पर पडते और इसका सीधा असर पार्टी पर होता। इससे भी वे बच गईं। एक बात और, सोनिया यदि खुद प्रधानमंत्री बनतीं तो फिर विपक्षी उन्‍हें चैन से जीने नहीं देते। बार-बार विदेशी मूल का मुद़दा उठाया जाता। एक बात और, यदि उन्‍होंने खुद सत्‍ता का प्रत्‍यक्ष सुख लिया होता तो फिर आम लोगों के दिलों मे जो उन्‍होंने त्‍याग की प्रतिमूर्ति बने रहने की छवि बनाई है, वह कभी नहीं बनती। खैर, जिस कारण भी उन्‍होंने मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया हो लेकिन यह तो तय है कि उनके प्रधानमंत्री, सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। जिन मुद़दों को लेकर यह सरकार सत्‍ता में आयी, जनता से जिन वादों के बदले में वोट बटोरे, उन्‍हें इस सरकार ने अब तक पूरा नहीं किया है। हम अब से 20 वर्ष पहले चलते हैं। डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्तमंत्री के रूप में भारत की आर्थिक नीति पूरी तरह से बदल दी। आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का रास्ता सा़फ कर उन्होंने यह भरोसा दिलाया था कि 2010 तक देश में बेरोज़गारी खत्म हो जाएगी, सारी सड़कें पक्की हो जाएंगी, बिजली की समस्या खत्म हो जाएगी, किसान खुशहाल हो जाएंगे, मज़दूरों की सारी ज़रूरतें पूरी हो जाएंगी और देश विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जाएगा। बीस साल बीत गए। मनमोहन सिंह वित्तमंत्री से प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन ग़रीब पहले ज़्यादा ग़रीब और अमीर पहले से कई गुना ज़्यादा अमीर बन गए। गांव और शहर में इतना फासला पैदा हो गया है कि नेताओं के झूठे वादों से भी भरोसा उठ गया। विकास की रोशनी चंद महानगरों में सिमट कर रह गई और बाकी देश अंधेरे के दलदल में फंसकर सिसक रहा है। मनमोहन सिंह ने पिछले एक साल में उन्हीं नीतियों को अपनाया, जिस नीति की उन्होंने 1991 में शुरुआत की थी। मनमोहन सिंह ने पूरे साल भर देश की जनता को नव उदारवाद की आग में झोंक दिया। नव उदारवाद का असर हमारे देश पर ऐसा हुआ है कि 80 फीसदी लोग विकास की धारा से अलग हो चुके हैं। सरकार की नीतियों का फायदा इन 80 फीसदी तक नहीं पहुंच पा रहा है। पिछले साल जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो दुनिया मंदी की चपेट में थी। लेकिन यूपीए की सरकार पिछले एक साल में आम आदमी से ज़्यादा खास लोगों के साथ नज़र आई। सरकार ने अमीरों के कर में ज़्यादा छूट देने की रणनीति पर काम किया। 2009-2010 के दौरान 502299 करोड़ रुपये की छूट दी गई। इसमें से 79554 करोड़ रुपये की छूट कॉरपोरेट सेक्टर को दी गई और 40929 करोड़ रुपये की छूट इनकम टैक्स देने वालों को मिली। इन आंकड़ों से सा़फ है कि सरकार ने मंदी के नाम पर देश के कॉरपोरेट सेक्टर और अमीरों को भारी फायदा पहुंचाया। पिछले एक साल में भारत ने महंगाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। आम आदमी ने महंगाई की ऐसी मार कभी नहीं झेली थी। खाने-पीने के सामानों के दाम आसमान छूने लगे। 2009 में महंगाई की दर 20 फीसदी तक पहुंच गई, जो अभी भी लगभग 17 फीसदी है। इस रिकॉर्ड तोड़ महंगाई की वजह यह है कि सरकार ने कृषि को अनदेखा कर दिया। पिछले साल भीषण सूखे की वजह से किसानों ने दोहरी मार झेली। बाकी कसर सरकार ने कृषि क्षेत्र का सरकारी खर्च कम करके पूरा कर दिया। किसानों की मदद करने के बजाय सरकार ने फूड सब्सिडी में 400 करोड़ और खाद सब्सिडी में 3000 करोड़ रुपये की कमी कर दी। यह कैसी विचारधारा है कि अमीरों और कॉरपोरेट सेक्टर की मदद के लिए सरकार अपनी तिज़ोरी खोल देती है, लेकिन ग़रीब किसानों की मदद के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। इस नीति का क्या मतलब निकाला जाए। क्या यह मान लिया जाए कि सरकार पूरी तरह उद्योगपतियों, कॉरपोरेट सेक्टर और अमीरों के हाथों की कठपुतली बन गई है।
पिछले एक साल में जितने घोटाले सामने आए, वह यूपीए की पिछली सरकार के पांच सालों में नहीं आए। आईपीएल की काली दुनिया का जब भंडाफोड़ हुआ तो उसके छींटों ने सरकार के कई मंत्रियों को दागदार कर दिया। यह बात आम हो गई है कि क्रिकेट की आड़ में उद्योगपतियों, नेताओं, फिल्म स्टारों, खिलाड़ियों, अधिकारियों और अंडरवर्ल्ड का एक खतरनाक नेटवर्क देश में फल-फूल रहा है। आईपीएल मनी लाउंडरिंग, अंडरहैंड डीलिंग, भाई-भतीजावाद, हवाला और काले धन का केंद्र बन चुका है। यूपीए के महत्वपूर्ण मंत्री शशि थरूर का इस्ती़फा लेकर सरकार ने इस मामले की लीपापोती करने की कोशिश तो ज़रूर की, लेकिन कई और मंत्री एवं नेता शक़ के घेरे में हैं। यह कैसी सरकार है, जिसकी नाक के नीचे उसके मंत्री और नेता पिछले तीन सालों से इतना बड़ा घोटाला करते रहे, लेकिन उसे इसका पता तक नहीं चला। कहने को तो जांच हो रही है, लेकिन जनता को पूरी तरह यह विश्वास हो चुका है कि विपक्ष के साथ मिलकर सरकार आईपीएल घोटाले के सभी गुनहगारों को बचा ले जाएगी।
जब सरकार बनी थी, तब मनमोहन सिंह ने सौ दिनों के एजेंडे की घोषणा की थी. संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के ज़रिए सरकार ने यह वादा किया था कि सौ दिनों के अंदर महंगाई पर लगाम लगेगी, किसानों को राहत मिलेगी, मज़दूरों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत होगी और भ्रष्टाचार खत्म होगा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में महिला आरक्षण विधेयक पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया गया था। इसके साथ-साथ सरकार ने घोषणा की थी कि अगले 5 सालों में झुग्गी-झोपड़ी को ख़त्म कर दिया जाएगा और ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों को हर महीने 3 रुपये किलो की दर से 25 किलो अनाज दिया जाएगा। यूपीए सरकार ने रोज़ाना 20 किलोमीटर और हर साल 700 किलोमीटर सड़क बनाने का भी लक्ष्य रखा था। फिलहाल देश में हर रोज़ दो किलोमीटर से भी कम सड़क बन पा रही है। बिजली के क्षेत्र में 5653 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी फिलहाल अधूरा ही है। सौ दिन का वादा था, पूरा साल बीत गया।
आतंकवाद मुद़दे पर तो जो किरकिरी कांग्रेस की इस बार हुई है वह कभी किसी पार्टी की नहीं हुई। खुद कांग्रेस की भी इससे पहले ऐसी किरकिरी नहीं हुई। वोट बैंक की राजनीति को ले अफजल की फांसी रूकने का मामला हो या फिर मुम्‍बई में आतंकी हमला या फिर आतंकवाद से जुड़ा कोई भी मुद़दा हो, सरकार अपनी इज्‍जत बचाने में विफल रही है।
कांग्रेस पार्टी न तो अपनी पार्टी की मर्यादा कायम रख पायी है और न ही पूर्व में जनता की जिस सेवा भावना के कारण वह जानी जाती रही, उसे ही कायम रख पायी है। पार्टी कार्यकर्ताओं में जहां राहुल गांधी के रोज-रोज की नौटंकी को लेकर रोष है वहीं शासन के दोषों को लेकर जनता में बेहद आक्रोश है। कांग्रेस सरकार ने जनता से जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हो सके हैं। अपने पांच सालों के शासन काल में कांग्रेस ने जनता को हजारों सपने दिखाए लेकिन कितने सपनों को पूरा किया यह जनता भी जानती है और खुद सरकार भी। कांग्रेस को लोगों ने उसकी पुरानी नीतियों, पुरानी कार्यशैली के कारण वोट दिया था लेकिन न तो पार्टी की नीति ही पुरानी रही और न ही कांग्रेस सरकार के वे काम ही रहे जो पहले थे। अब पार्टी की नीति परिवार का लड़का तय कर रहा है तो शासन का कार्य रिमोट के दम पर हो रहा है। पार्टी में कार्यकर्ताओं का सम्‍मान घटा है तो सरकार में जनता से किए वादे झूठे साबित हो रहे हैं। पार्टी और सरकार दोनों ही मोर्चों पर विफल रही इस पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। सरकार को सशक्‍त बनाने के लिए जहां सत्‍ता से पार्टी का अनावश्‍यक दबाव खत्‍म करना होगा वहीं पार्टी को सशक्‍त करने के लिए परिवारवाद की संकीर्ण भावना से उपर सोचना आवश्‍यक है। राहुल को भी वेस्‍टर्न सोच को छोड़कर भारतीय संस्‍कृति की पुरानी मान्‍यताओं, सभ्‍यताओं का आदर करना चाहिए और इसी के अनुसार आचरण भी करना चाहिए। सही मायनों में तभी वे यहां के लोगों के दिलों के राजकुमार-युवराज बन सकते हैं, वरना हमेशा पार्टी में ही युवराज बने रह जाएंगे।
(आंकड़ें : साभार चौथी दुनिया )

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उत्‍तर प्रदेश सरकार को तमाचा है यह इच्‍छामृत्‍यु पत्र

उत्‍तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद के विशुनपुरा थाना क्षेत्र निवासी एक गरीब दम्‍पत्ति ने राष्‍ट्रपति से इच्‍छामृत्‍यु की अनुमति मांगी है। मामला दिल दहला देने वाला है। भारत विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यहां के तंत्र में लोक की यह स्थिति कई सोचों को जन्‍म देती है। केन्‍द्र सरकार से लेकर राज्‍य सरकारें तक के दावों, घोषणाओं पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि देश में गरीबों के लिए सैकड़ों योजनाएं हैं। लेकिन इन योजनाओं का क्‍या फायदा जब ये किसी गरीब का पेट तक नहीं भर सकती। स्थिति यह कि उसे मृत्‍यु का वरण करने की सोचना पड़ता है।
आइए सबसे पहले लोकतंत्रीय व्‍यवस्‍था और शासन की निकम्‍मेपन को दर्शाती इस खबर से अवगत हो लें। कुशीनगर जनपद के पंचायत पडरौन मडूरही में चण्डी वर्मा के पुत्र जगदीश वर्मा कई वर्षों से फाइलेरिया से पीडि़त हैं। इनकी पत्‍नी भी मानसिक रोगी हैं। दोनों की बीमारी से काफी लंबी जंग चली लेकिन अंत में वे हार गए और बीमारी अभी भी उन्‍हे हरा देने को आमादा है। गरीबी के आवरण से ढ़के इस परिवार की यह बीमारी अब शायद उनकी मौत के साथ ही जाए। जगदीश मजदूरी करने की अवस्‍था में नहीं है और पत्‍नी मानसिक रोगी होने के कारण कुछ समझ नहीं पाती। दवा के लिए पैसे नहीं रह गए हैं। इनकी गोला बाजार स्थित मकान दवा कराने के लिए 70 हजार रुपये में पहले ही गिरवी रखी जा चुकी है। ये पैसे भी दवा में खर्च हो चुके हैं लेकिन बीमारी अभी भी वही है। यह तो रही जगदीश की अपने संसाधनों के बूते बीमारी से लड़ने की बात। अब जरा, शासन से मदद लेने की इस परिवार की कोशिशों पर भी गौर करें। इस परिवार ने जिलाधिकारी से लेकर सूबे के बड़े पदाधिकारियों तक गुहार लगाई लेकिन कुछ भी काम नहीं आया। जिलाधिकारी के अनुसार उन्‍होंने शासन को इसकी रिपोर्ट प्रेषित कर दी और रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए लोक शिकायत विभाग के प्रमुख सचिव ने विस्‍तृत रिपोर्ट भी मांगी है। लेकिन विस्‍तृत रिपोर्ट के जाते-जाते शायद कहीं यह दंपत्ति ही इस दुनियां से न चला जाए। अब जबकि यह दंपत्ति सब ओर से थक-हार चुका है, इच्‍छा मृत्‍यु के ऑप्‍शन का रास्‍ता ढूंढा है। दंपत्ति ने राष्‍ट्रपति को पत्र लिखकर इच्‍छामृत्‍यु की अनुमति मांगी है।
बता दें कि अभी उत्‍तर प्रदेश में दलित बेटी के रूप में जानी जाने वाली सुश्री मायावती की सरकार है। वे खुद को गरीबों, असहायों का मसीहा सुनना पसंद करती हैं और चुनावी घोषणाओं में यही अहसास दिलाती हैं कि प्रदेश में उनके अलावा कोई भी गरीबों का हितैषी नेता नहीं। लेकिन उन्‍हीं के शासन में एक गरीब परिवार रोटी को मोहताज है। सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की मौजूदगी के बावजूद इनकी बीमारी दूर नहीं हो रही। एक बार को राज्‍य सरकार की निकम्‍मेपन को भूल जाएं तो देश की वर्तमान सरकार भी कम निकम्‍मी नहीं। कांग्रेस ने चुनाव में बड़े-बड़े पोस्‍टरों के माध्‍यम से लोगों को यह अहसास दिलाया था कि कांग्रेस का हाथ- आम आदमी के साथ। यह आदमी कौन है। क्‍या ये दंपत्ति वे आम आदमी नहीं हैं। आम आदमी के रूप में कांग्रेस किसे मानती है। और यदि ये दंपत्ति आम आदमी है तो फिर सरकार इनके साथ क्‍यों नहीं। दावों और हकीकत में इतना फर्क कैसे। यह लोकतंत्र पर ओछी राजनीति का पलड़ा भारी होने वाली स्थिति का जीता-जागता उदाहरण है। चुनाव के समय कांग्रेस ने प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के माध्‍यम से अतुलनीय भारत का खूब प्रचार-प्रसार किया। क्‍या यह उसी अतुलनीय भारत की झलक है। सरकार कांग्रेस की भी है और सरकार बसपा की भी। लेकिन आदमी तो वहीं खड़ा है जहां वह पहले था। जगदीश के परिवार का यह इच्‍छा मृत्‍यु पत्र भारत की लोकतांत्रिक सरकार को एक बड़ा तमाचा है जिसे वह समझ सके तो शायद आगे की तस्‍वीर इतनी भयावह न हो।

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आ खुशी से खुदकुशी कर लें

किसी गलतफहमी में न पड़ें, हम यह फिल्‍मी गीत गुनगुनाने के मूड में नहीं हैं। वैसे भी हम आधुनिक गानों व फिल्‍मों से दूर ही रहना पसंद करते हैं, एकाध अपवाद हो सकती हैं। फिलवक्‍त, हम इस आधुनिक गाने की तर्ज पर होने वाली घटनाओं की भयावहता से आपको रूबरू कराने जा रहे हैं। यह आधुनिक जमाने का फिल्‍मी गीत है लेकिन अपने जमाने की सुपर हिट फिल्‍म रही एक-दूजे के लिए का गाना भी याद करें- हम बने तुम बने एक-दूजे के लिए-, उसको कसम लगे-2, जो बिछड़ के एक पल भी जिए…। एक-दूसरे से बिछड़कर एक पल भी न जीने की यह चाह आज के किशोरों-युवाओं को मौत की दहलीज पर ले जा रही है। यूं तो आए दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, लेकिन महानगरों से चलकर गांवों तक पहुंची आत्‍महत्‍या की इस भयानक बीमारी से अब भारतीय संस्‍कृति संकट में नजर आ रही है। एक नया उदाहरण देखने को मिला है बिहार के छपरा जनपद स्थित दौलतगंज मुहल्‍ले में। आइए सबसे पहले हम आपको एक-दूसरे के साथ जीने की ख्‍वाहिश के बाद, एक-दूसरे के साथ मरने के अंजाम वाली इस पूरी घटना से रूबरू कराते हैं।
छपरा शहर के पश्चिमी भाग में एक काफी पुराना मुहल्‍ला है। नाम है- दौलतगंज। इसी मुहल्‍ले के एक छोटे से हिस्‍से फीदरबाजार में 3 अप्रैल 10 को दो प्रेमियों ने पुरानी प्रेम कहानियों का इतिहास दोहराया। इतिहास- एक दूसरे के साथ जीने-मरने के किए वादे को निभाने का है। दरअसल, मुहल्‍ले में मुहम्‍मद शाहिद उर्फ मुन्‍ना ठाकुर और डा. बैतुल्‍लाह का कुछ ही दूरी पर घर है। दोनों घरों की आपसी पहचान तो नहीं थी, लेकिन इन दोनों घरों के लाडलों के रिश्‍ते बन गए। मुन्‍ना ठाकुर के 22 वर्षीय पुत्र अशरफ अली और डा. बैतुल्‍लाह की 16 वर्षीय पुत्री तबस्‍सुम एक-दूसरे को पसंद करने लगे। घर आस-पास होने के कारण मिलने में कोई कठिनाई नहीं थी, सो मिलना गाजे-बगाहे आसानी से हुआ करता था। लेकिन इस लव स्‍टोरी में तब भयानक टिव‍स्‍ट आ गई जब इन दोनों ने एक दूसरे को अपना जीवन-साथी बनाने का निर्णय लिया। चुपके-चुपके मिलने और छुप-छुप कर प्‍यार करने वाले तथा शादी को ही प्रेम का मंजिल समझने वाले इन दोनों प्रेमियों की हरकतों ने उनकी मंशा को आखिरकार उनके परिवार वालों तक पहुंचा ही दिया। जब इनकी प्रेम कहानी की खबर घर वालों को मिली तो जैसे उनके घरों में तूफान आ गया। लेकिन प्‍यार झूकता नहीं की तर्ज पर ये भी अपने परिवार वालों के सामने नहीं झुके और जब भी समय मिला, एक दूजे से मिलते रहे। जैसे-जैसे इनका प्‍यार बढ़ता गया, वैसे-वैसे इन पर परिवार वालों की बंदिशें भी बढ़ने लगी। जब भी दोनों मिलते परिवार वालों की सख्‍ती के बारे में बात करते और अपने दोस्‍तों से इस संबंध में राय लेते। घर वालों से रोज प्रताडि़त होने व उनकी लाख कोशिशों के बाद भी दोनों एक-दूसरे को भूलने को तैयार नहीं थे। आखिरकार दोनों ने मिलकर इन झंझटों से हमेशा के लिए निजात पाने और सदा-सदा के लिए एक-दूजे का होने का उपाय ढूंढ निकाला। उपाय कुछ यह रहा कि इस दुनियां में भले ही लोग नहीं मिलने दें, लेकिन उस दुनियां में जाने के बाद कौन रोक सकेगा। एक-दूजे से जो लोग मिलने नहीं दे रहे, वे एक-दूजे के साथ मरने से नहीं रोक सकते। साथ जी नहीं सकते तो साथ मर तो सकते हैं…। और फिर दोनों ने 3 मई को अंतिम मुलाकात की। दोनों जीभरकर मिलें, बातें की और फिर जहर खा लिया। जहर खाने के बाद दोनों अपने घ्‍ार को रूखसत हो गए। घर जाकर दोनों की स्थिति खराब हो गयी। परिवारों वालों को तुरंत पता चल गया कि उन्‍होंने जहर खाया है। प्रेम कहानी की बात तो पहले से ही दोनों के परिवार वालों को मालूम थी, जहर खाने की बात पर वे गंभीर हो गए और तुरंत सदर अस्‍पताल छपरा में एडमिट कराया। संयोग देखिए, दोनों के परिवार वालों दोनों को अचेतावस्‍था में लेकर करीब-करीब एक ही साथ एक ही अस्‍पताल में पहुंच गए। यहां भी चिकित्‍सकों ने दोनों को एक-दूसरे के बगल में बेड पर लिटाया और उपचार शुरू हो गया। तरह-तरह के उपाय कर उल्टियां करायी जाने लगी। इस दौरान वे कभी होश में आते और कभी बेहोश होते। जब भी आंखें खुलती एक-दूसरे को देख लेते। लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद चिकित्‍सकीय प्रणाली हार गई और दोनों ने ही दम तोड़ दिया। इसके बाद फिर वहीं, जो अक्‍सर होता है- पोस्‍टमार्टम, एफआईआर, जांच, कार्रवाई…। हम पूरी कहानी का लेखा-जोखा नहीं रख रहे। हम बस इस मुद़दे पर हैं कि क्‍या ऐसे कदम सही हैं।
पहले प्‍यार और फिर प्‍यार को अंजाम तक पहुंचाने के लिए खुदकुशी का रास्‍ता अपनाने वालों की संख्‍या में लगातार इजाफा हो रहा है। प्रेमी युगल शादी को ही प्‍यार की मंजिल मान रहे हैं। क्‍या एक-दूसरे को दैहिक रूप से प्राप्‍त कर लेना ही प्‍यार है। प्रेम तो राधा ने भी श्रीकृष्‍ण से किया था, लेकिन उनकी न तो शादी ही हुई और न ही उन्‍होंने इसके लिए खुदकुशी की। मीरा ने कृष्‍ण से किया, लाख प्रताड़नाएं सही लेकिन खुदकुशी तो उन्‍होंने भी नहीं की। प्रेम दो आत्‍माओं का मिलना है न कि दो शरीरों का। अगर प्‍यार है तो वह तब भी रहेगा जब प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से दूर हों। उनकी नजदीकियां-दूरियां उन्‍हें तड़पा सकती हैं लेकिन उनके प्‍यार को मिटा नहीं सकती। प्‍यार समर्पण का नाम है, प्‍यार त्‍याग का पर्याय है, प्‍यार शक्ति का नाम है और प्‍यार ईश्‍वर का दिया हुआ परम वरदान है जो किसी-किसी को प्राप्‍त होता है। प्‍यार तो प्‍यार है, इसमें मंजिल क्‍या और रास्‍ते क्‍या। प्‍यार की मंजिल भी प्‍यार है और प्‍यार का रास्‍ता भी प्‍यार। प्‍यार की मंजिल कभी शादी नहीं हो सकती और खुदकुशी कर कोई प्‍यार नहीं पा सकता। दो लोग तब भी आजीवन प्रेम कर सकते हैं जबकि उनकी एक-दूसरे से शादियों न हों, बशर्तें कि उनके प्‍यार में दैहिक भूख न हों, उनके प्‍यार में एक-दूसरे के लिए समर्पण और त्‍याग का भाव हो। खुदकुशी और एक-दूसरे के साथ घर वालों को छोडकर भाग जाने वाले कभी प्रेम नहीं कर सकते। क्‍योंकि खुदकुशी के रास्‍ते सिर्फ वे ही चुनते हैं जिनमें इच्‍छाशक्ति की कमी होती है, जो कमजोर होते हैं और जो खुद से प्‍यार नहीं करते। जो खुद से प्‍यार नहीं करते वे एक-दूसरे से क्‍या प्‍यार करेंगे। प्‍यार शक्ति देता है, फिर उसका अंजाम खुदकुशी कैसे हो सकता है। और खुदकुशी कर खुद को खत्‍म किया जा सकता है, प्‍यार तो नहीं पाया जा सकता। हां, प्‍यार खत्‍म जरूर हो जाता है। क्‍योंकि कोई भी प्‍यार तभी तक कर सकता है जब तक कि वह खुद जीवित हो, जब वह ही नहीं रहेगा तो प्‍यार कौन करेगा। और जब उसका साथी नहीं रहेगा तो वह प्‍यार किसे करेगा। खुदकुशी कभी प्‍यार का विकल्‍प नहीं है और बन भी नहीं सकता। एक बार को कल्‍पना करें कि आप किसी से प्‍यार करते हैं और फिर दोनों साथ मरने का निर्णय लेते हैं। लेकिन यह क्‍या सही है। जहां तक मैं प्‍यार की बात जनता हूं तो मुझे यही मालूम है कि हम जिसे प्‍यार करते हैं उसे खरोंच भी आए तो खुद की जान निकल जाती है। फिर हम उसे मरने का सुझाव कैसे दे सकते हैं। हम खुद चाहे मरे या जीए, लेकिन उसे तो नहीं मरने दे सकते ना। हम यदि उसे प्‍यार करते हैं तो उसके लिए मिट तो सकते हैं, लेकिन ऐसा कोई भी काम नहीं करते सकते जिससे कि उसे चोट पहुंचे। और उसके मरने की बात तो हम सोच ही नहीं सकते। प्‍यार करने वाले तो अपनी उम्र अपने प्‍यार के नाम कर देने की ईश्‍वर से दुआ करते हैं फिर उसके मिटने की बात वे कैसे कर सकते हैं। अब जरा एक बार को यह मान भी लें कि हम एक-दूसरे से प्‍यार करते हैं, और दोनों मरने का निर्णय ले लेते हैं, लेकिन क्‍या इस दुनियां में केवल हम ही दोनों हैं। हमें प्‍यार करने वाले हमारे परिवार वाले नहीं, रिश्‍तेदार नहीं, कोई और नहीं। यकीनन दुनियां में हमें सबसे अधिक हमारे माता-पिता प्‍यार करते हैं और हम उन्‍हें ही ठुकरा देते हैं। हमारे मरने के बाद उनका क्‍या होगा यह सोचे बगैर खुदकुशी कर बैठते हैं। जो बेइंतहा प्‍यार करने वाले अपने माता-पिता का सुख-दुख नहीं सोच सकते वे किसी के बारे भी नहीं सोच सकते। और वे कभी प्‍यार करने वाले या प्‍यार की समझ रखने वाले भी नहीं हो सकते। प्‍यार में एक-दूसरे के साथ घर से भाग जाना कुछ हद तक सही भी हो सकता है, लेकिन प्‍यार में खुदकुशी न सिर्फ प्‍यार को मिटा देना है बल्कि अपने पीछे अपने परिवार वालों को दुखों और बदनामी का परिणाम छोड़ जाना है। प्‍यार में खुदकुशी से पहले एक बार को हमें अवश्‍य सोच लेना चाहिए कि इस दुनियां में केवल हम ही दो नहीं हैं, हमारे अलावे भी और लोग हैं जो हमें प्‍यार करते हैं। इसलिए केवल एक के लिए सारे लोगों की खुशियां मिटा देना कभी भी सही नहीं है। जब भी ऐसे विचार आयें तो एक बार उनके बारे में भी सोच लो जो आपको प्‍यार करते हैं, सिर्फ उसके बारे सोचना जिसे हम प्‍यार करते हैं, स्‍वार्थ है प्‍यार नहीं!
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