निष्पक्ष

हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

कहां गुम हो गयी पी की आवाज?


जैसा कि आपको बता चुके हैं अभी हम सारण में हैं। बिहार का यह जिला बहुत प्रमुख है। यहां के एक विधानसभा क्षेत्र सोनपुर से प्रदेश की पूर्व मुख्‍यमंत्री राबड़ी देवी खड़ी हैं तो एक अन्‍य विधानसभा क्षेत्र परसा से चन्द्रिका राय हैं। चन्द्रिका राय पूर्व मुख्‍यमंत्री दरोगा राय के पुत्र हैं। दो विधानसभा चुनावों को छोड़कर परसा विस क्षेत्र में 1955 के बाद सिर्फ इन्‍हीं के परिवार के लोग विधायक बनते आए हैं, इसलिए इनकी राजनीतिक और सामाजिक रसूख का अंदाजा लगाया जा सकता है। अन्‍य कई दिग्‍गज भी सारण के विस क्षेत्रों में अपना भाग्‍य आजमाने के लिए हाजिर हुए हैं। पर, सबकुछ होने के बावजूद यहां जो उल्‍लास दिखना चाहिए, वहीं कही खो गया। सुबह हुई और लोगों ने जब मतदान करना शुरू किया तो लगा जैसे यह चुनाव अभूतपूर्व रहेगा लेकिन आशाओं पर अब तक पानी फिर चुका है। जिन मतदान केन्‍द्रों पर वोट के लिए लंबी लाइनें लगती थीं, आज मीडिया के छायाकार कतार की फोटो के लिए बूथों पर भटकते रहे पर कहीं कतार नजर नहीं आ रही थी। एकाध बूथों पर अवश्‍य मतदाताओं की संख्‍या प्रशंसनीय रही लेकिन ज्‍यादातर बूथ मतदाताओं की उदासी के गवाह बने। कुछ ही देर बाद यानी 5 बजे तक वोटिंग समाप्‍त हो जाएगा लेकिन अब तक जो वोटों का प्रतिशत देखने को मिला है, वह काफी निराशाजनक है। मीडिया के लोगों से लेकर आम लोग तक चौक-चौराहों पर इस बात की चिंता में मशगूल हैं कि आखिर क्‍यों मतदाता बूथों तक जाने से कतरा रहे हैं? लोकतंत्र के इस महापर्व में मुख्‍य भूमिका निभाने वाली जनता की इस उदासीनता ने इस महापर्व को फीका-सा कर दिया। प्रत्‍याशी भी पेशोपेश में पड़ गए हैं। हर बूथ पर उम्‍मीद से कम वोटिंग हुयी है। लोग कारणों के विमर्श में लगे हैं, पर स्‍पष्‍ट नहीं हो पा रहा कि इसके पीछे कारण क्‍या है? जहां तक पिछले चुनावों तक दहशत के कारण बूथों तक नहीं पहुंचने की बात थी, उसे इस चुनाव में नहीं माना जा सकता। क्‍योंकि दहशत जैसी कोई बात नहीं इस चुनाव में। हर जगह सुरक्षा की चाक-चौबंद व्‍यवस्‍था है और लोग पूरी तरह खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसके साथ ही अशिक्षा को भी इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं माना जा सकता। क्‍योंकि पिछले चुनाव की अपेक्षा इस चुनाव में, यानी पिछले पांच वर्षों में शिक्षा व्‍यवस्‍था कहीं अधिक सुदृढ हुई है। जो छात्राएं कभी आठवीं से अधिक नहीं पढ़ पाती थीं, उन्‍होंने हाईस्‍कूल, इंटरमीडिएट कर अब बीए में भी नामांकन लिया है। पोशाक योजना, साइकिल योजना और विभिन्‍न तरह की छात्रवृत्तियों के कारण पढ़ाई काफी आसान हुयी है, और सस्‍ती भी। इसके बावजूद, लोग बूथों तक नहीं पहुंचे, आखिर क्‍यों? आंकड़े कह रहे हैं कि बिहार से पलायन भी बहुत हद तक कम हुआ है, यानी यहां के लोग यही हैं, कहीं गए नहीं, फिर वोट की संख्‍या तो बढ़नी चाहिए थी, कम क्‍यों? सारण के ही कुछ क्षेत्रों में वोट की प्रतिशत कम होने की बात स्‍वीकारी जा सकती हैं, जैसे- मकेर में चुनाव के दो ही दिन पूर्व नक्‍सलियों ने वहां के प्रखंड प्रमुख का घर डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया। यहां की पुलिस थाने में जमी रही और जाने की जहमत तक नहीं उठायी। बेखौफ सशस्‍त्र नक्‍सली सैकड़ों की संख्‍या में शाम में ही घंटों तांडव मचाते रहे और लाल सलाम के नारे के साथ चले गए लेकिन पुलिस अपनी बिल में छुपी रही। ऐसे में यहां के लोगों का दहशत में होना स्‍वाभाविक है। जहां विस्‍फोट हो और पुलिस जानते हुए भी ना पहुंचे तो वहां के लोग तो असुरक्षित महसूस करेंगे ही। हो सकता है कि वहां के मतदाताओं ने ऐसा सोच लिया हो कि यदि चुनाव के दिन ही नक्‍सली कोई वारदात कर दें तो फिर आज उनकी सुरक्षा करने में नाकाम रही पुलिस, उस दिन क्‍या सुरक्षा करेगी? नक्‍सलियों ने यहां लोगों को चुनाव बहिष्‍कार की धमकी भी दी थी। इसलिए यहां के वोट प्रतिशत में आयी कमी को नक्‍सलियों का खौफ करार दिया जा सकता है। लेकिन यदि वोटिंग में आयी कमी का कारण नक्‍सली खौफ है तब भी इसके लिए प्रशासन ही जिम्‍मेदार होगा। क्‍योंकि उसी की कार्यशैली के कारण लोगों में खौफ पैदा हुआ। खैर, यहां के लिए हम नक्‍सली कारणों को वोटिंग में कमी के लिए जिम्‍मेदार ठहराकर मुक्ति पा सकते हैं, लेकिन अन्‍य विधानसभा क्षेत्रों में? वहां क्‍यों नहीं पहुंचे मतदाता बूथों तक? वहां तो ऐसी कोई वारदात नहीं हुई? निश्चित ही पूरे जिले में मतदाताओं की निराशा का कारण कुछ और है नक्‍सली खौफ नहीं..। इसलिए हमें अन्‍य बातों की ओर भी गौर करना होगा। जिले के मुख्‍यालय शहर छपरा में अभी-अभी आधे घंटे पहले नगरपालिका चौक पर खड़े हुए। वहां चाय पीते समय लोगों की बातें सुनीं। हर एक की चिंता इसी बात की थी कि वोट कम क्‍यों? हमें जानकर सुखद अनुभूति हुई कि लोग वोटिंग के कम प्रतिशत पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। खास बात यह कि इसमें चाय बेचने वाले से लेकर चाय पीने वाले तक सभी शामिल थे। कुछ चाय पीने वाले रिक्‍शा चालक आदि जैसे अशिक्षित और ग्रामीण परिवेश के लोग भी थे, लेकिन इनकी भी चिंता अन्‍य लोगों की चिंताओं से इतर नहीं थी। इसे देखकर तो यही लगा कि जनता वोट के लिए जागरूक है। फिर भी वोट में कमी क्‍यों आ गयी? एक रिक्‍शा वाला कह रहा था- वोट में कमी क्‍यों नहीं आएगी। मेरे बगल के डाक्‍टर साहब आज सोये रहे, लेकिन वोट देने नहीं गए। तभी दूसरे ने- सही कहते हो, मेरे यहां भी यही स्थिति है। बगल में एक प्रोफेसर साहब रहते हैं। उनके परिवार से कोई भी सदस्‍य वोट डालने नहीं गया। यहां, मेरे साथ दैनिक जागरण के पत्रकार कुमार धीरज, प्रभात खबर के ब्‍यूरो चीफ ठाकुर संग्राम सिंह, द ट्रिब्‍यून के राकेश कुमार सिंह, कौमी तंजीम के नदीम अहमद आदि भी चाय की चुस्किया ले रहे थे। हमारी भी चिंता यही थी कि आज अखबार में खबर क्‍या होगी। कहीं कुछ नहीं, मतदाताओं के उत्‍साह वाली कोई तस्‍वीर नहीं…। हम सबने उस रिक्‍शे वाले व उसके साथ आए एक अन्‍य की वह बातें सुनीं। तब हमने भी ध्‍यान देना शुरू किया। सबने पाया कि सबसे अधिक उदासीन सबसे अधिक पढ़े-लिखे लोग हैं। ये वैसे लोग हैं जो अपने आसपास रहने वाले लोगों को अपने समाज का हिस्‍सा नहीं मानते। इनकी दोस्‍ती इंटरनेट पर इंग्‍लैंड, अमेरिका के लोगों से हैं। या फिर मुम्‍बई और दिल्‍ली में बैठे अपने दोस्‍तों से चैट करने वाले हैं। फिर चर्चा हुई कि आखिर ऐसे लोग मतदान करने क्‍यूं नहीं जाते, क्‍यों नहीं गए..? प्रभात खबर के ठाकुर संग्राम सिंह ने कुछ यूं अपनी राय रखी- दरअसल ऐसे लोगों को यह स्‍वीकार नहीं कि वे लल्‍लू के पीछे खड़े हों। यहां उन्‍होंने लल्‍लू के रूप में एक काल्‍पनिक नाम का सहारा लिया जो छोटे तबके के लोगों के लिए था। वे आगे जारी रहे.. मान लीजिए कोई डाक्‍टर साहब वोट डालने गए और वहां उनसे पहले कतार में लल्‍लू खड़ा है, तो यही वह जगह है जहां लल्‍लू उनसे पहले वोट करेगा और डाक्‍टर साहब को उसके पीछे लाइन में खड़ा होना ही पड़ेगा। यह वह लल्‍लू है जो घंटों डाक्‍टर साहब के क्लिनिक में लाइन में खड़े होकर अपना इलाज कराता है, वही लल्‍लू आज एक कतार में डाक. साहब के आगे खड़ा है। भला डाक्‍टर साहब यह कैसे स्‍वीकार कर लेंगे? यहां उपस्थित अधिकतर पत्रकार व अन्‍य लोग भी श्री सिंह की बातों से सहमत नजर आए। क्‍या हम अब भी ऐसी मानसिकता से घिरे हैं कि वोट देने के समय भी उच-नीच से उबर नहीं पाते? और सिर्फ इसलिए कि हमें लाइन में खड़ा होना पड़ेगा या फिर हमें अपने से निम्‍न लोगों के साथ खड़ा होना होगा, क्‍या हम अपने सबसे बड़े अधिकार से चूक जाएंगे? वह भी तब जबकि हम इस समाज के सबसे प्रबुद़ध्‍ा लोगों में गिने जाते हैं? हम वोट करने नहीं जाएंगे और जब सरकारें बन जाएंगी तो हम उसे भला-बुरा कहेंगे? यानी, हम जो भी करेंगे अपनी बातों में, अपनी लेखनी में, धरातल पर कुछ नहीं? कोई दायित्‍व नहीं बनता हमारा? क्‍या हमारा दायित्‍व नहीं बनता कि यदि कम पढ़े-लिखे लोग किसी गलत प्रतिनिधि का चुनाव कर रहे हैं तो उन्‍हें समझायें? यदि नहीं भी समझाते हैं तो कम से कम हम सही प्रतिनिधि को अपना वोट दें ताकि गलत प्रतिनिधि को आगे चलकर समाज के प्रतिनिधित्‍व का मौका न मिल जाए..? नहीं- हम तो बुदिधमान वर्ग के लोग हैं। हम कहीं नहीं जाते। जो करते हैं बस बैठे-बैठे। यदि बिहार में इस चुनाव में घटे वोट प्रतिशत का यही कारण है तो फिर शर्म आनी चाहिए ऐसे पढ़े-लिखे लोगों को। बहरहाल, लेकिन इतना अवश्‍य कहना चाहेंगे कि यदि चुनाव परिणाम आए और फिर कोई गलत, दबंग या अनपढ़ प्रतिनिधि चुन लिया जाये तो ऐसे लोग बैठे-बैठे बयानबाजी करने के हकदार नहीं हैं..। वे यदि हकदार हैं तो सिर्फ दण्‍ड के, लोकतंत्र की व्‍यवस्‍था को बिगड़ाने के अपराधी हैं ऐसे लोग। हां, लोकतंत्र में मिली स्‍वतंत्रता में इनकी भी स्‍वतंत्रता है इसलिए इसके लिए इन्‍हें कोई दण्‍ड नहीं दिया जा सकता, लेकिन हकदार तो वे इसी के हैं…।

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वे कत्‍ल भी करें तो चर्चा नहीं होती…

पुरानी शायरी है। टूटी-फूटी लाइनें ही स्‍मृति में हैं। हम सांस भी लेते हैं तो खबर बन जाती है, वे कत्‍ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती…। यह शायरी कब, किसने और क्‍यों कही, इस बारे में हमें कुछ भी नहीं मालूम बल्कि जो लाईन हमने लिखी है वह भी पूरी तरह ठीक है कि नहीं- नहीं कह सकते, बावजूद इसके हम इसका उपयोग करने जा रहे हैं। यह शायरी हम चुनाव आयोग के लिए चुने हैं। चुनाव आयोग की गलती के कारण एक आम आदमी विधायक बनने-बनते रह गया। एक ऐसा व्‍यक्ति अब कम से कम इस चुनाव में विधायक नहीं बन सकेगा जिसमें एक विधायक बनने के सारे गुण हैं। वह सिर्फ इसलिए चुनाव के लिए अपना नामांकन नहीं कर सका क्‍योंकि मतदाता सूची में उसका नाम ही गलत प्रकाशित कर दिया गया है।
आपने आम लोगों के नाम गलत हो जाने से वोट देने में हुई परेशानी तो कई बार सुनी होगी, पढ़ा भी होगा पर ऐसा शायद ही सुना हो कि कोई व्‍यक्ति नामांकन करने गया हो और निर्वाचन कार्यालय ने अपनी गलती की ही सजा उसे दे डाली हो। सीधी सी बात है सूची ठीक किया अधिकारियों ने, नाम चढ़ाया अधिकारियों ने और फिर नामांकन भी ले रहे हैं अधिकारी। तो इसमें उस व्‍यक्ति की क्‍या गलती जिसे नामांकन से वंचित कर दिया गया? यह तो वही बात हुई उल्‍टे चोर कोतवाल को डांटे।
आज हमारे कार्यालय में डा. वर्मा अपनी व्‍यथा लेकर पहुंचे थे। उनके कागजातों, बचनों और साक्ष्‍यों से जो कहानी बनी वह आपको हम सुनाते हैं। डा. विनोद कुमार वर्मा लोकतांत्रिक सर्वजन समाज पार्टी के प्रदेश उपाध्‍यक्ष हैं। जाहिर सी बात है कि अपने पार्टी में तो उनका कद बड़ा है ही, नेतागिरी भी अभी-अभी शुरू नहीं की है। क्षेत्र का विधायक बनने और जनता का प्रतिनिधित्‍व करने की चाह में उन्‍होंने भी चुनाव लड़ने का फैसला लिया। हालांकि उनके शब्‍दों में जनता के दबाव और अपनों के कहने पर वे चुनाव लड़ने को तैयार हुए। डा. वर्मा ने सारी तैयारी कर ली। जमकर पोस्‍टर, बैनर लगवाए। क्षेत्र में दौरा किया। आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद पोस्‍टर, बैनर हटवाए और जनसंपर्क में लगातार जुटे रहे। वे तो वे, उनके कई कमासुत सगे-संबंधी भी छुट़टी लेकर उन्‍हें जिताने के लिए मैंदान में आ डटे। सभी अपने धन और तन से उनके साथ्‍ा लग गए। (मन से भी लगे होंगे, पर यह हम नहीं कह सकते क्‍योंकि मन की बात तो वे ही जानते होंगे, हमने धन और तन से लगे हुए उन्‍हें देखा है, इसलिए कह रहे हैं।)
ज्‍योतिष, पंडितों से वह तिथि भी निकलवा ली, जिस दिन नामांकन करने पर विजयश्री मिलने की अधिक उम्‍मीद रहेगी। निर्धारित तिथि- 7 अक्‍टूबर को डा. विनोद कुमार वर्मा पार्टी का सिम्‍बल लेकर स्‍थानीय निर्वाचन कार्यालय में नामांकन करने पहुंचे। वे अपने साथ सोनपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली 2008 भाग संख्‍या 130 और निर्वाचक नामावली 2010 भाग संख्‍या 43 की मतदाता सूची भी अपने साथ ले गए। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी पहचान पत्र संख्‍या डीक्‍यूवी 5249263 भी साथ ले जाना नहीं भूले। विभिन्‍न जरूरी दस्‍तावेजों के साथ जब डा. वर्मा नामांकन के लिए पहुंचे तो आरओ ने गौर से कागजों का निरीक्षण किया। आरओ ने पाया कि 08 की मतदाता सूची में उनका नाम डा. विनोद कुमार वर्मा है जबकि वर्ष 10 की मतदाता सूची में उनका नाम डा. बिलेन्‍द्र कुमार वर्मा हो गया है। बस फिर क्‍या था, आरओ ने नामांकन करने से डा. वर्मा को मना कर दिया। (दरअसल, निर्वाचन आयोग ने बिहार में इस वर्ष फोटोयुक्‍त मतदाता सूची जारी की है। यह मतदाता सूची पिछली सूची से इस बात में भिन्‍न है कि इसमें मतदाताओं के नाम के साथ उनकी तस्‍वीर भी लगी है। आयोग का तर्क है कि इससे जाली वोटरों को पकड़ने में आसानी होगी। लेकिन, इस नयी फोटो युक्‍त मतदाता सूची बनाने के चक्‍कर में अधिकारियों-कर्मचारियों के कितने के नाम बदल दिए, कितनों के पिता बदल गए हैं। किसी की पत्‍नी किसी और के साथ दिखा दी गयी है तो किसी के पति का नाम पड़ोस वाली औरत के साथ जुटा है। यही नहीं फोटो किसी और का नाम किसी और का है। कही-कही तो हद ही कर दी गयी है। नाम है सुनीता कुमारी और फोटो राजीव रंजन का है। गलतियों की इसी लंबी फेहरिस्‍त में डा. वर्मा का भी नाम शामिल है। जिसमें विनोद को बलिन्‍द्र बना दिया गया है।) डा. वर्मा को तो मानो काटो तो खून नहीं, बेचारे इतने दिनों से जिस चुनाव की खातिर लगे रहे, एक पल में लड़ने से ही वंचित कर दिए गए।
आदर्श आचार संहिता का उल्‍लंघन न हो, इसलिए रात-दिन सावधानी बरतते हुए जनसंपर्क किए, फिर भी…? पर डा. वर्मा को क्‍या मालूम कि वे अपनी गलतियां रोक सकते हैं, लेकिन वर्षों से चली आ रही सरकारी प्रणाली अपने ही ढर्रे पर चलती है। क्‍या नजीर पेश हुआ है- जिन्‍होंने गलती की, वही सजा सुना रहे हैं? आयोग की गड़बड़ी और खुद वही कह रहा है कि आप नामांकन नहीं कर सकते? जबकि उसी आयोग के द्वारा जारी वर्ष 08 की मतदाता सूची में उनका नाम सही है। पर, क्‍या हो सकता है? लोकतंत्र है यहां तो? जैसा कि नि:सहाय आम जनता करती है, डा. वर्मा ने भी किया। तुरंत उसी क्षण शिकायत लेकर, अपने दस्‍तावेजों के साथ सारण के जिलाधिकारी सह जिला निर्वाचन पदाधिकारी कुलदीप नारायण के पास पहुंचे। तुरंत नाम सुधार का आवेदन भी भरा और मतदाता सूची में नाम सुधारने का पुरजोर अनुरोध किया। पर, क्‍या आप मान सकते हैं कि हमारे देश की इतनी बड़ी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में कोई बगैर किसी पावर के किसी अधिकारी से कुछ अनुरोध करे और वह तुरंत कार्रवाई कर दे? जवाब आपका हां हो या ना, पर सच्‍चाई तो यही है कि बगैर पावर या मनी के यहां एक बार में कुछ भी नहीं होता। जिला निर्वाचन पदाधिकारी जैसे बड़े अधिकारी ने भी डा. वर्मा की पीड़ा नहीं सुनी। पुन: 9 अक्‍टूबर को डा. वर्मा ने जिलाधिकारी को स्‍मारित किया। पर, जिस व्‍यवस्‍था में कनीय अधिकारी बगैर किसी पैरवी के आम जनता की बात अनसुना करते हों, यहां तो ब्‍यूरोक्रेट़स की बात थी? लिहाजा, मतदाता सूची न सुधरनी थी, नहीं सुधरी। 11 अक्‍टूबर को नामांकन की अंतिम तिथि के साथ ही डा. विनोद की अंतिम आस भी जाती रही।
हमें मालूम है कि निर्वाचन आयोग को इस समय बेशुमार पावर मिला है। इसलिए, उस पर अंगुली उठाने की  अपनी धृष्‍टता के लिए हम माफी मांग रहे हैं। यह माफी इसलिए नहीं मांग रहे क्‍योंकि हम उस पर अंगुली उठाकर कोई गुनाह कर दिए है, माफी तो सिर्फ इसलिए मांग रहे हैं कि आयोगजी इस समय पावर में हैं। और पावर को तो हमारा लोकतंत्र सदा से सलाम करता आया है। आखिर, डा. वर्मा इस जैसे ही किसी पावर का शिकार तो हुए हैं? हम आयोग के अधिकारियों से बिना टीका-टिप्‍पणी के एक ही सवाल पूछ रहे हैं, यदि जवाब देना मुनासिब समझें तो हम उनके जवाब के इंतजार में हैं- देश का एक नागरिक विधायक बनते-बनते रह गया, इसमें गलती किसकी है? क्‍या यह एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? जो लोग इसके लिए दोषी हैं, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?… (कार्रवाई तो उसी पर हो गई जो निर्दोष था, कार्रवाई भी उन्‍हीं लोगों ने कर दी जिन्‍होंने गलतियां की थीं। बहुत खूब, हमारा लोकतंत्र वाकई विश्‍व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सबके लिए बहुत गुंजाइश है, पर आम जनता के लिए कोई गुंजाइश शेष नहीं रहती…।)
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अयोध्‍या के बहाने…

राजनीति से बुरी कोई चीज नहीं होती। चाणक्‍य ने राजनीति की जो परिभाषा दी है वह अब पुरानी हो चली है। नई परिभाषा तो बस कुछ ऐसी है जैसे कि राजनीति कोई गाली हो। लोग बोलचाल की भाषा में बोल ही पड़ते हैं- अब राजनीति मत करने लगो। मतलब साफ है कि राजनीति से आशय लोग हमेशा बुरी चीज का ही लगाते हैं। लगाएं भी क्‍यों नहीं, यह राजनीति बुरी बला है ही। तभी तो न्‍याय प्रणाली में भी राजनीति अपनी दस्‍तक देने से नहीं चुकती, राजनेता अपनी चाल चलने से बाज नहीं आते। पिछले 60 सालों से एक मुकदमा चला आ रहा है। तारीखें दर तारीखें मुकदमा किसी तरह जब फैसले के नजदीक पहुंचा तो फिर राजनीति का शिकार हो गया। न्‍यायालय पर पहले से ही मुकदमों का बोझ है। इतना ही नहीं, लोग भी बेसब्री से फैसले के इंतजार में हैं। ऐसी घडी में फैसले को लटकाकर रखना कहां जायज है। लेकिन फैसले में देर करने के पीछे राजनीतिक मंशा साफ झलक जाती है।
जब पहली बार हाईकोर्ट अयोध्‍या मसले पर फैसला सुनाने जा रहा था तो उस समय इतनी तनाव की स्थिति नहीं थी। लोग आसानी से फैसले सुनने का इंतजार कर रहे थे। साथ ही हिंदू व मुसलमान दोनों ही न्‍याय पर भरोसा कर फैसला मानने के लिए मन बना चुके थे। लेकिन ऐन वक्‍त पर फैसले में रोड़ा लगाकर एक नया माहौल बनाने की कोशिश की गयी। शांत से इलाकों में फलैग मार्च कराये जाने लगे। पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी गयी। उन लोगों से बेवजह शांति की अपील की जाने लगी, जो पहले से ही शांति के पक्ष में थे। यह सब कर एक तरह से लोगों को उकसाने की भरसक कोशिश की गयी। हुआ वही जो राजनेता चाहते थे। अब स्थिति पहले की अपेक्षा काफी तनावपूर्ण है। लोग रोज अखबारों के पन्‍ने पलट रहे हैं, ताबड़तोड़ न्‍यूज चैनल बदल रहे हैं। कहीं कोई नई खबर मिल जाये। हिंदू हो या मुसलमान, पूरी तरह सशंकित हो चले हैं। अभी बिहार में चुनाव का समय है लेकिन लोग चर्चा अयोध्‍या मसले पर अधिक कर रहे हैं। इन सबका क्‍या मतलब है। सोची-समझी रणनीति के तहत एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया गया कि इसे भुनाया जा सके। पहली बार जो तिथि निर्धारित हुयी थी, उसी तिथि को यदि फैसला सुना दिया जाता तो ऐसी स्थिति शायद नहीं बनती। लेकिन, फैसले में रोड़ा लगाकर इसे लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। बेवजह लोगों की शांति की अपीलें दुहरायी जा रही है। जैसे लोगों ने दंगा कर दिया हो और वे मान नहीं रहे हों। एक तरह से लगातार भड़काउ बयानों के माध्‍यम से राजनेताओं द्वारा एक बार फिर पिछले वाले अयोध्‍या का इतिहास दोहराने की यह नाकाम कोशिश की जा रही है। मीडिया वाले भी इस मुद़दे को काफी उछाल रहे हैं। रोज अखबारों के प्रथम पेज की प्रथम खबर अयोध्‍या फैसले से जुड़ी मिल रही है। जबकि चैनल वालों ने तो हद ही कर दी है। लेकिन, हम सलाम करते हैं देश के हिंदू मुसलमानों को जो राजनीति के इस कुचक्र में न पड़ शांति बनाए हुए हैं। वरना, राजनीति ने तो अपना हर रंग इस मसले में दिखाया है। एक खबर तो यह भी कहती है कि जिस रिटायर आईएएस ने हाईकोर्ट को फैसला टालने की अपील की, वह कांग्रेस का एक मोहरा था। भला कांग्रेस को फैसला टालने से क्‍या फायदा हो सकता है। हां, हो भी सकता है। यदि फैसला आने से भाजपा को कुछ फायदा हो सकता है तो फैसला टलने से कांग्रेस को फायदा क्‍यों नहीं हो सकता। फिलवक्‍त जनता को चाहिए कि इन भ्रमजाल में न पड़ अपनी चेतना से काम करे।
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वे कहते हैं, बिहार बदल रहा है

मैं आजकल मुम्‍बई और दिल्‍ली से अधिक तरक्‍की बिहार की सूनता हूं। बड़ा आश्‍चर्य होता है। हो भी क्‍यों नहीं, मैं बिहार में पिछले छह सालों से हूं लेकिन यह अनुभूति मुझे उतनी तेजी से नहीं हो रही जितनी तेजी से इस प्रदेश से बाहर रह रहे लोगों को हो रही है। जब भी अपने गृह प्रदेश- उत्‍तर प्रदेश स्थित अपने गृह जिले कुशीनगर के अपने छोटे से गांव- नरहवॉडीह में प्रवेश करता हूं, पहुंचते-पहुंचते बिहार की प्रशंसा सुनने को मिलती है। कोई कहता है कि आजकल तो उधर रोजगार की बाढ़ है, शिक्षक नियोजन में लाखों लोगों को शिक्षक के रूप में रोजगार मिल गया है। किसी की जुबान होती है कि बिहार अब उत्‍तर प्रदेश से भी अच्‍छा हो गया है। इस तरह की अनेक प्रशंसा जो मेरे दिल पर चोट करती प्रतीत होती हैं। इस चोट की वजह यह है कि बिहार के जिस हिस्‍से में मैं अभी हूं, वह बिहार के सर्वाधिक पुराने जिलों में से एक है। छपरा कई मायनों में बिहार का बेहतर जिला माना जाता है। यह देश का कितना पुराना जिला है, यह मात्र इसी बात से समझा जा सकता है कि अब तक इस बारे में खुद सरकार भी नहीं जानती। बताते हैं कि छपरा बंगाल, बिहार आदि राज्‍य एक साथ थे तब भी छपरा (सारण) जिला हुआ करता था। सारण का गजेटियर भी इसकी स्‍थापना का काल नहीं बता पाता। इस जिले के बारे में यह बेहद आश्‍चर्यजनक तथ्‍य है कि जिला प्रशासन इसलिए इसका स्‍थापना दिवस नहीं मना पाता क्‍योंकि उसे पता ही नहीं कि सारण जिले की स्‍थापना कब हुई। दूसरी खास बात छपरा के बारे में यह है कि यह बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री व पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद का संसदीय क्षेत्र है। अभी भी श्री प्रसाद ही इस क्षेत्र के सांसद है। छपरा को ख्‍याति देने वाले और भी कई कारण हैं। यानी कि कुल मिलाकर बिहार में छपरा अपना विशेष स्‍थान रखता है लेकिन यहां की जो हालत है उसे देखकर मैं यकीन नहीं कर सकता कि बिहार वाकई बदल गया है। मैं तो यह भी बड़ी मुश्किल से यकीन कर पाता हूं कि बिहार बदल रहा है। लोग तो पूरी तरह बदल जाने की बात करते हैं मैं इस बदलाव की प्रक्रियागत होने की बात से भी पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता। हां, रोज अखबारों और टीवी पर आ रही खबरें जरूरत मेरी सोच को थोड़ी देर के लिए भटकने पर विवश करती हैं। बिहार के बारे में कुछ कड़वी सच्‍चाईयां बताना चाहता हूं। जिस शिक्षक नियोजन के चलते बिहार की ख्‍याति बढ़ गयी है और सरकार शिक्षकों को रोजगार देकर वाहवाही लूट रही है उसकी सच्‍चाई यह है कि एक-एक अभ्‍यर्थी से इस पद के लिए 80-80 हजार रुपये तक लिए गए हैं। इस बाबत मैंने एक खबर भी लिखी थी। छपरा जिले के रिविलगंज प्रखंड के सिताबदियारा पंचायत में एक ऐसी महिला अथ्‍यर्थी को शिक्षक बना दिया गया जिसका नाम मेधा सूची में कई अभ्‍यर्थियों से नीचे था। जिन अभ्‍यर्थियों का नाम मेधा सूची में ऊपर दिया गया था, उनका नियोजन मात्र इसलिए नहीं किया गया था क्‍योंकि उन्‍हें रिश्‍वत का चढ़ावा नहीं दिया था। और मेधा सूची में सबसे नीचे नाम होने के बावजूद मात्र इसलिए उस महिला अभ्‍यर्थी का नियोजन कर लिया क्‍योंकि उसने नियोजन में लगे अधिकारियों की जेब गर्म कर दी थी। हालांकि, खबर प्रका‍शित होने के बाद उस महिला शिक्षक ने खुद ही अपनी गलती स्‍वीकार करते हुए इस्‍तीफा दे दिया था। यह तो बिहार में हो रही शिक्षक नियोजन में भ्रष्‍टाचार का एक नमूना मात्र है। मैं सिर्फ एक ही उदाहरण इसलिए प्रस्‍तुत कर पा रहा हूं कि इसका साक्ष्‍य अखबार के रूप में मेरे पास है। लेकिन जितना मैं जानता हूं, यदि उस आधार पर कहूं तो एक भी ऐसा अभ्‍यर्थी नहीं जिसने बिना चढ़ावा दिये नौकरी पा ली हो। इस चढ़ावा का ही असर था कि दक्षता परीक्षा में कुछ ही शिक्षक फेल हो पाए थे। यह संभवत: ऐसा पहला मामला होगा जिसमें शिक्षक जैसे महत्‍वपूर्ण पद की बहाली के लिए साक्षात्‍कार नहीं लिया गया। सभी जानते हैं कि बिहार की शिक्षा व्‍यवस्‍था कैसी है और यहां उत्‍तीर्णता की सच्‍चाई क्‍या है! वैसे बिहार में मार्क्‍स को आधार बनाकर लोगों को शिक्षक बना दिया गया? खैर, भ्रष्‍टाचार के अनेक उदाहरण हैं। एसी-डीसी बिल के मार्फत हाईकोर्ट भी सरकार को लताड़ चुकी है, ऐसे में मुझे अधिक कुछ कहने की आवश्‍यकता नहीं है। अब आता हूं सरकार के उस काम पर, जिसका जिक्र कर वह बार-बार वाहवाही लूट रहा है। सड़कों को बिहार के विकास का पैमाना बताया जा रहा है। मुख्‍य मार्गों को ठीक कर सरकार अपनी पीठ खुद ही थपथपा रही है। बाहर से आने वाले लोग भी इन्‍हीं मार्गों तक सिमट कर रह जाते हैं और समझते हैं कि बिहार की सारी सड़कें बन गयी हैं। बाहर के लोगों को हुयी गलतफहमी का भी एक उदाहरण देना चाहूंगा। एनडीटीवी के एक पत्रकार जो कि ब्‍लॉग लेखन में काफी चर्चित हैं, उन्‍होंने इस पखबारे में अपनी बिहार यात्रा की फोटो ब्‍लॉग पर डाली है। इन तस्‍वीरों के माध्‍यम से उन्‍हें दिखाया है कि बिहार कितना बदल गया है। कई कमेंट़स भी आए हैं जिनमें लोग बिहार के इस विकास पर वाह-वाह करते दिखे हैं। लेकिन, उक्‍त महोदय की इन तस्‍वीरों में पटना जैसे महानगर की तस्‍वीरें शामिल हैं, किसी गांव की कोई तस्‍वीर नजर नहीं आयी। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ विकास ही पैमाना माना जाएगा, शहर की सड़कें पहले भी बहुत खराब नहीं थी। वह चाहे लालू प्रसाद का शासन काल रहा हो, या फिर राबड़ी का या जगन्‍नाथ मिश्र या फिर किसी भी और का- पटना की सड़कें कभी भी इतनी खराब नहीं थी जिसके लिए बिहार की निंदा की जाए। हां, जलजमाव वहां की समस्‍या रही है, लेकिन यह अब भी है। जिन सड़कों को चमकाकर नीतीश कुमार अपनी राजनीति चमका रहे हैं उनकी सच्‍चाई से भी मैं रूबरू कराना चाहूंगा। बिहार के कई जिले इस समय सूखाग्रस्‍त घोषित हैं। इसमें से एक छपरा जिला भी शामिल है। लेकिन पिछले दो दिनों तक हुयी बारिश की कुछ बूंदों ने छपरा की तस्‍वीर बदल कर रख दी है। जिन सड़कों की प्रशंसा करते सरकार अघा नहीं रही है उन पर घुटने-घुटने भर पानी लगा है। सिर्फ सडकें ही नहीं, विभागीय कार्यालयों की स्थिति भी नहीं सुधरी है। कार्यशैली कितनी सुधरी है, फिर कभी बात करेंगे लेकिन विभागों की बाहरी स्थिति में भी कोई बदलाव मुझे नजर नहीं आया है। जब छह साल पूर्व यहां आया था तब भी जीर्ण-शीर्ण भवनों में विभागीय कार्यालय चल रहे थे, आज भी चल रहे हैं। इन्‍द्र भगवान ने नीतीश सरकार की कार्यशैली की पोल खोलने में थोड़ी मदद की है। जिले के सबसे बड़े कार्यालय यानी समाहरणालय के परिसर में घुटने भर पानी भरा है। व्‍यवहार न्‍यायालय में लबालब पानी है तो बच्‍चों के जिले की योजनाओं को मूर्त रूप देने में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले कार्यालय- जिला परिषद का परिसर भी जलजमाव से ग्रस्‍त है। कार्यालयों से कर्मचारी पानी से जैसे-तैसे बचते हुए फाइले इधर-उधर लेकर भाग रहे थे। शहर का सबसे प्रमुख नाला- खनुआ नाला की सफाई कई वर्षों से नहीं हुयी है। जब भी बारिश होती है नाले का पानी सड़क पर फैल जाता है। मैं यह नहीं कह रहा कि जलजमाव हो ही नहीं सकता लेकिन हल्‍की बारिश में ही यह हाल होना व्‍यवस्‍था की सच्‍चाई बयां करने के लिए काफी है। छोटे बच्‍चे सड़कों पर लगे पानी में डूबकर-पारकर स्‍कूल पहुंच रहे हैं और लौट रहे हैं। कुछ तस्‍वीरें प्रस्‍तुत हैं-

जिला परिषद कैम्‍पस में लबालब भरा पानी
समाहरणालय परिसर में भरे पानी के बीच गुजरते लोग
कोर्ट के पीछे सरकारी कार्यालयों के सामने लगा जलजमाव
पानी से होकर विभागीय फाइलें ले जाने की जद़दोजहद
सड़क पर फैले नाले व बरसात के पानी से होकर गुजरते विद्यालय के छोटे-छोटे बच्‍चे

मैं नीतीश सरकार का कोई विरोधी नहीं, बस यही बताना चाहता हूं कि बिहार के विकास के बारे में जितना ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वस्‍तुत: उतना विकास हुआ नहीं है। इसे आप सब भी समझ जाएं। यही बात गांव जाने पर अपने दोस्‍तों को मैं अक्‍सर समझाता हूं। एक पिछड़े राज्‍य के बारे में हम सभी एक बड़े भ्रम की स्थिति में हैं।

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चुनाव में क्‍यों गरीब हो जाते हैं नेताजी?

यह एक सवाल है जो बचपन में अक्‍सर मेरे दिमाग के नसों को ढ़ीला करने में लगा रहता था। जब बच्‍चा था तो चुनाव मेरे लिए या फिर मेरे जैसे और भी मेरे साथी बच्‍चों के लिए एक पर्व सरीखा था। यह पर्व केवल शाब्दिक नहीं था, पर्व वाली भावनाएं भी थीं। तब मैं नहीं जानता था कि यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है, अब जानता हूं। लेकिन पहले का न जानना ही अच्‍छा था, अब जानकर भी पर्व का अनुभव नहीं कर पाता। तब मैं अक्‍सर यह सवाल सोचा करता था कि आखिर इस पर्व में नेताजी इतने गरीब क्‍यों हो जाते हैं? बहुत सोचा, पर कभी समझ नहीं सका था। बचपन के सवाल का जवाब अब जवानी में जाकर पा सका हूं। यह जवाब भी पूर्ण नहीं है, संदेहास्‍पद है। जवाब तो तब पूर्ण मिले जब मेरा सवाल पूरी तरह सही हो। दरअसल, अपना सवाल भी मैं अब जाकर समझ सका हूं। वस्‍तुत: यह तो कोई सवाल ही नहीं है कि नेताजी गरीब क्‍यों हो जाते हैं? नेताजी भला गरीब होते ही कब हैं? वे तो मात्र दिखावा करते हैं- अब जाकर समझ में आयी है यह बात। एक तरह से देखा जाए तो मेरे बचपन का यह सवाल भी मेरी अन्‍य ना‍दानियों की तरह ही है! पर सवाल कैसे भी हों, कभी के भी हों, जवाब तो उन्‍हें चाहिए ही। मुझे अपूर्ण ही सही, मेरे सवालों का जवाब मिल गया है।
अभी मैं बिहार के छपरा में हूं। विधानसभा चुनाव सिर पर है और प्रशासन के साथ ही साथ हमें भी खबरों संबंधी रोज कुछेक मेल मिल रहे हैं। जिले में इस समय नेताओं की बाढ़-सी आ गयी है। हालांकि, सचमुच का बाढ़ भी आने की संभावना बनी हुयी है। सारण के पानापुर स्थित सारण तटबंध पर घाघरा के पानी का दबाव है तो गोपालगंज में बतरदेह बांध पर गंडक के पानी का जबरदस्‍त दबाव उसे तोड़ने पर आमादा है। जिला प्रशासन जिले को बाढ़ के खतरे से बचाने के लिए तमाम कार्रवाईयों में जुटा है। लेकिन, इस बाढ़ से नेताओं की बाढ़ अभी अलग चल रही है। यह सब आदर्श आचार संहिता का असर है। वरना, पानी की बाढ़ और नेताओं की बाढ़ एक साथ देखने को मिलती। अभी संभावित बाढ़ से प्रभावित गांवों में नेता पहुंच चुके होते और राहत सामग्रियां भी बंटवा दी गयी होती। लेकिन, अभी उन्‍हें प्राथमिकी का डर सता रहा है- लिहाजा, ऐसी करतूतों से बचने का प्रयास कर रहे हैं। पर, इस समय सभी नेताओं का एक दायित्‍व अवश्‍य पूर्ण हो रहा है, जो अक्‍सर चुनाव में ही होता है। सभी नेता अपने कार्य क्षेत्र-चुनाव क्षेत्र में विद्यमान हैं। ऐसा बहुत कम होता है। यदि चुनाव न हो तो ये नेता या तो पटना दिखते हैं या फिर दिल्‍ली। इससे भी मन भर गया तो वे कुल्‍लू-मनाली में सैर कर रहे होते हैं। लेकिन अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों का दु:ख-दर्द बांटने में अपना समय कतई जाया नहीं करते। उस समय नहीं करते, क्‍योंकि उस समय क्षेत्र में समय देना उनके लिए समय जाया करने जैसा होता है। इस समय वे अपना समय दे रहे हैं, क्‍योंकि इस समय अपने क्षेत्र में समय देना उनके लिए एक इन्‍वेस्‍टमेंट सरीखा है।
खैर, मैं अपने विषय से भटक रहा हूं। मुद़दे पर आते हैं। चुनाव जीतने के बाद लक्‍जरी गाडि़यों के काफिले के साथ आने वाले नेताजी अभी बोलेरो से चलना अधिक पसंद कर रहे हैं। अपनी स्‍कार्पियो शायद भाड़े पर चला रहे होंगे। या फिर किसी से अदला-बदली कर ली होगी। बोलेरो थोड़ी गरीब टाइप गाड़ी लगती है, जनता का ध्‍यान जल्‍दी आकृष्‍ट करेगी। नेताजी के साथ रायफल लेकर चलने वाले उनके भतीजे-भांजे भी नजर नहीं आ रहे। यदि कभी-कभी उनके साथ दिख भी गए तो कुछ अधिक ही शरीफ दिखते हैं। नेताजी तो बिल्‍कुल ही बदल गए हैं। लकदक कुर्ता-पाजामा पहने वाले नेताजी अब बस हमेशा एक ही कुर्ते-पाजामे में नजर आ रहे हैं। कुर्ता की सिलाई बांह के पास से छूट गयी है। उनकी गाड़ी के पीछे चलने वाली गाडि़यां गायब हो गई हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह है कि हमेशा गाड़ी से संजय दत्‍त स्‍टाइल में उतरने और चलने वाले नेताजी अब ऐसे दिखते हैं जैसे सुदामा कृष्‍ण से मिलने जा रहे हों। शक्‍ल से निहायत ही शरीफ दिख रहे नेताजी गाड़ी से उतरने से पहले ही हाथ जोड़ लेते हैं। हाथ जोड़े ही गाड़ी से उतरते हैं और जब तक गाड़ी लोगों की नजर से ओझल नहीं हो जाती, हाथ जोड़े बैठे रहते हैं। अजीब परिवर्तन है इस पर्व में, इन नेताओं में। कभी-कभी तो इनकी अदाकारी देखकर मुझे लगता है कि ये नेता चुनाव में अभिनेता बन गए हैं, इनके सलाहकार निर्देशक की भूमिका में है और कोई एक्‍सपर्ट इनकी फिल्‍म का संपादन कर रहा है। नेताजी तो बस वही कर रहे हैं जो उन्‍हें रोल मिला है। छपरा जिले में ही एक गांव है- सड़कें काफी बेकार हैं। इस गांव में प्रवेश करते यहां के एक स्‍थानीय नेताजी अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ा लिया करते थे। अब हालांकि सड़क की स्थिति पहले से अच्‍छी हो गयी है लेकिन बारिश होने के कारण सड़क कीचड़ से सन गयी है। पर, वही नेताजी जिन्‍हें इस सड़क की धूल परेशान करती थी, आज कीचड़ से भी नहीं डरते। दूर चौराहे पर ही गाड़ी खड़ी कर देते हैं और वहां से पैदल हाथ जोड़े घर-घर घूम रहे हैं। यह नजारा मुछे कभी-कभी काफी आनंदित कर देता है, यह सोचकर कि यह लोकतंत्र में ही संभव है। लेकिन जैसे ही चुनाव बाद की नेताजी की भूमिका की कल्‍पना करता हूं, इस लोकतंत्र की इस खासियत को इसकी कमी मानने लग जाता हूं। जिले में इस समय जितने भी टिकट के दावेदार नेता हैं, सब एक ही भूमिका में नजर आ रहे हैं। चुनाव के बाद या चुनाव के पहले इनमें से कई रंगदार सरीखे दिखते थे तो कई की गिनती दबंग में होती थी। कुछेक अपने क्षेत्र में जब भी आते तो वे किसी नई गाड़ी में होते थे। पर अब न रंगदार रहे, न दबंग, न धनी- न गरीब, सब एक रंग में रंग गए हैं। सभी याचक हैं। और याचक तो दया के पात्र होते हैं, हमें भी इनपर अभी दया आ रही है। बाद में जैसा आचरण करेंगे, उस अनुसार इनके प्रति मेरी भी सोच बदलेगी। लेकिन, अभी तो ये लोकतंत्र के सबसे अच्‍छी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, अपनी जनता से उनके घर जाकर मिल रहे हैं। ऐसे में इन पर फिलवक्‍त ज्‍यादा टीका-टिप्‍पणी करनी की मेरी इच्‍छा नहीं हो रही। यद्यपि जानता हूं कि नेताजी की यह भूमिका स्‍थायी नहीं है तथापि उनकी वर्तमान शैली मुझे लुभा रही है और मैं सम्‍मोहित-सा उनपर कुछ कटाक्ष नहीं कर पा रहा हूं। जितना कह दिया, वह इसलिए कि कुछ पुरानी यादें भी ताजा हो गई थीं। अब वर्तमान में लौट आया हूं, इसलिए अब बस।
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हलो, हाय के बाद खामोशी

पिछले करीब एक पखवारे से अखबार के लोकल पन्‍नों में हमें ऐसी खबरें पढ़ने को मिल रही है। फलां जगह फलां लड़की ने फोन रिसिव किया, और जोर आवाज हुयी, लड़की बेहोश। कहीं किसी के मोबाइल पर 15 अंकों से कॉल आता है तो किसी को 16 अंकों से। कहा जा रहा है कि ऐसे नंबरों से कॉल आने पर आदमी को करंट लगता है और वह बेहोश हो जाता है। एक खबर में बताया गया था कि उसके मोबाइल में जो नंबर डिस्‍प्‍ले किया था उसमें से 5 नंबर हरे और 5 लाल रंग के थे। ऐसे नंबरों को रिसिव करने पर शामत है। एक अन्‍य खबर के मुताबिक एक लड़की ने फोन रि‍सीव भी नहीं किया। उसके मोबाइल पर कोई मैसेज आया था जब उसने मैसेज खोला तो मोबाइल में जोर से वाइव्रेशन हुआ और वह झटका खाकर बेहोश हो गयी। स्थिति यह है कि अखबार में रोज ऐसी एकाध खबरें अवश्‍य रहती हैं। इन खबरों में न तो कोई आधिकारिक पुष्‍टी रहती है और न ही इसका कोई स्‍पष्‍ट कारण बताया जाता है। ये खबरें कम, अफवाहें अधिक लगती हैं। इस कारण मोबाइल धारकों में अजीब बेचैनी है। बिहार के सारण जिले में यह संकट कुछ ज्‍यादा ही है। लेकिन, खबरें पूरी तरह निराधार भी नहीं मानी जा सकती। क्‍योंकि खबरों में कुछ और हो या न हो, पीडि़त मोबाइल धारकों के बयान अवश्‍य देखने को मिल रहे हैं। जिसमें वह खुद स्‍वीकार करता है कि उसने जब कॉल रिसीव किया तो उसे बिजली जैसी कुछ करंट लगी और वह बेहोश हो गया। कारण चाहे जो हो, लेकिन इस संबंध में न तो प्रशासन कोई पहल कर रहा है और न ही सरकार। रोज एकाध लोगों के बेहोश होने की खबरों से अन्‍य लोगों का क्‍या हाल है, यह तो हमें नहीं पता पर हमारा बुरा हाल है। जब भी हमारा मोबाइल बजता है, रिसीव करने में डर लगता है। एक खबर तो और भी डराने वाली थी। इसमें बताया गया था कि एक महिला ने जब फोन रिसीव किया तो उसके साथ उसका एक बेटा और बेटी भी थी। तीनों एक साथ बेहोश हो गए। एक खबर तो मेन पृष्‍ठ पर ही प्रकाशित हुई थी जिसके मुताबिक एक व्‍यक्ति अपनी भैस चराने गया था। वहां उसका मोबाइल फट गया और उसकी मौत हो गयी। उसके कान के पास जले के निशान और मोबाइल की फटी बैट्री, बिखरे मोबाइल के पुर्जों से यह अंदाजा लगाया गया कि उसकी मौत मोबाइल विस्‍फोट के कारण ही हुई है। यदि यह सब खबरें सत्‍य हैं, तो फिर सरकार इस बारे में अब तक चुप क्‍यों है, यह समझ से परे है। और यदि, सारीं खबरें यूं ही हैं, तो प्रकाशित क्‍यों हो रही हैं। सरकार को शीघ्र ही इसके कारणों का पता लगाना चाहिए। साथ ही मोबाइल कंपनियों पर भी नकेल कसना चाहिए। यदि केवल कॉल रिसीव करने से ही आदमी बेहोश हो जाए, तो यह एक गंभीर बात है। यही नहीं, यदि ऐसा सचमुच हो रहा है तो फिर किसी दिन कोई सरकार भी बेहोश हो सकती है। मुख्‍यमंत्री, प्रधानमंत्री कोई भी तो इसका शिकार हो सकता है। या, सिर्फ आम आदमी के मोबाइल ही लोगों को बेहोश करते हैं। क्‍या कारण है कि ऐसी खबरें जहां से भी आ रही हैं, जिन लोगों के साथ घटनाएं हो रही हैं, वे छोटे तबके से संबंधित हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि कम दाम के मोबाइल में ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं। कारण चाहे जो हो, हमारी सरकार से प्रार्थना है कि शीघ्र इस पर कार्रवाई की जानी चाहिए। वरना, हलो… हाय के बाद की खामोशी ठीक बात नहीं है।

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इसीलिए तो मुंह काला है झूठ का…

मैंने कुछ महीनों पहले गोविंदा की एक फिल्‍म देखी थी। फिल्‍म का नाम था- क्‍योंकि मैं झूठ नहीं बोलता। इसमें गोविंदा ने एक वकील का किरदार निभाया था। फिल्‍म में दिखाया गया है कि जब तक गोविंदा झूठ बोलता है तब तक उसकी वकालत की दुकान खूब चलती है। वह सिर्फ अपने धंधे में ही झूठ नहीं बोलता बल्कि निजी जिंदगी में भी सिर्फ झूठ ही बोलता है। उसकी इस आदत से उसका नन्‍हा बेटा बड़ा परेशान है। वह रात में टूटते तारे को देखकर मन्‍नत मांगता है कि ईश्‍वर कुछ ऐसा करिश्‍मा कर दें कि उसके पिता सिर्फ सच ही बोलें। ईश्‍वर नन्‍हें बालक की गुहार सुन लेते हैं और गोविंदा चाहकर भी झूठ नहीं बोल पाता। इसके बाद उसके कैरियर में तो भूचाल आता ही है उसकी निजी जिंदगी भी तबाह हो जाती है। पत्‍नी बनीं सुस्मिता सेन घर छोड़कर चली जाती हैं। उसका असिस्‍टेंट उसे छोड़ जाता है। वह उन्‍हीं लोगों के खिलाफ अदालत में जहर उगलने लगता है जिनका कि वह वकील होता है और जिनसे उसने पैसे लिए होते हैं। इस तरह
वह कई परेशानियों से घिर जाता है। मैंने यह फिल्‍म देखकर यही जाना कि झूठ ही वकालत है। वकील का हथियार झूठ ही है। यदि वह झूठ बोलना छोड़ दे तो ख्‍याति तो अर्जित कर सकता है लेकिन धन कभी नहीं। लेकिन बगैर आजकल तो धन ही चाहिए, ख्‍याति तो इसके बाद मिल ही जाती है। वकालत पहले की तरह समाजसेवा का मार्ग नहीं बल्कि जेब भरने का रास्‍ता बनकर रह गया है। उस फिल्‍म की यह सच्‍चाई अखबारों में पिछले दिनों आयी एक खबर ने साबित कर दिया। हम जानकर हैरान रह गए कि न्‍यायालय पर मुकदमों के बोझ को कम करने वाले जज को शाबाशी की बजाय वकीलों ने उनसे धीमी गति से न्‍याय करने की गुहार लगा डाली।
हो सकता है कि आपने खबर न पढ़ी हो या आपको ध्‍यान न आ रही हो। दरअसल, आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के सिविल न्यायालय में पिछले दिनों एक न्यायाधीश जे. वी. वी. सत्यनारायण मूर्ति ने एक दिन में रिकॉर्ड 111 मामलों का निपटारा किया। लगभग साढे़ तीन महीने के कार्यकाल के भीतर ही उक्‍त न्यायाधीश मूर्ति ने लगभग 500 मामलों का निपटारा कर दिया है। उनकी अदालत में अभी 1,000 और मामले लंबित हैं। न्‍यायाधीश के इस काम से पूरे देश के लोग खुश हुए, सिवाय वकीलों के। हालत यह है कि मंगलागिरी शहर के सिविल न्यायालय के वकीलों का एक वर्ग न्‍यायाधीश के इस अंदाज से खफा हो गया है। वकीलों ने बड़ी ही बेशर्मी से लोगों के हितों को ताक पर रखते हुए यह तक कह डाला कि यदि न्‍यायाधीश ने इसी तरह फैसले दिए तो वे बेरोजगार हो जाएंगे। मंगलागिरी बार एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष ए. संजीव रेड्डी ने कहा है कि वकीलों ने न्यायाधीश से कहा है कि यदि वह मुकदमों का निपटारा इसी गति से करते रहेंगे तो उनके फाके करने की नौबत आ जाएगी।
उल्लेखनीय है कि पूरे देश की अदालतों में तकरीबन तीन करोड़ मामले लंबित हैं। रोज आम आदमी न्‍यायालय की दौड़ लगा रहा है। कई-कई मुकदमों में तो जिन लोगों पर मुकदमा हुआ है उनमें से अधिकतर की मौत तक हो चुकी है। अभी कुछ दिनों पहले हिंदी दैनिक पत्र दैनिक जागरण द्वारा इस सिलसिले में चलाए गए जन जागरण अभियान से न्‍यायालयों में बढ़े भ्रष्‍टाचार व न्‍यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं तथा आम आदमी के न्‍याय मिलने में हो रही अत्‍यधिक देरी से परिचित होने का मौका मिला। बहुत पहले न्‍यायालय की इस तारीख पर एक फिल्‍म तक बन चुकी है। फिल्‍म दामिनी का एक डॉयलॉग कोई नहीं भूलता- सन्‍नी देयोल न्‍यायालय में चिल्‍ला रहे है। आदमी न्‍यायालय जाता है न्‍याय लेने, लेकिन उसे मिलती है तो तारीख। और अगली तारीख को फिर मिल जाती है एक तारीख। न्‍याय तो कभी नहीं मिलता बस मिलती रहती है तारीख…। सच ही तो है, न्‍यायालय में न्‍याय तो किसी-किसी को ही मिलता है, तारीखें सबकों मिल जाती हैं। बहुत कम ऐसा होता है कि बगैर तारीख के किसी मुकदमे का फैसला हो जाए। और जब किसी न्‍यायाधीश ने ऐसा प्रेरणादायक कदम उठाने की कोशिश की तो उसका उत्‍साह बढ़ाने के बजाय न्‍याय के सिपाही-वकील उनके पैर खींच रहे हैं। अपने स्‍वार्थों के लिए आम आदमी की जेब काटने वालों से ऐसी ही उम्‍मीद की जा सकती है। वाकई वकीलों ने साबित कर दिया कि उनका जन्‍म आम आदमी का खून चूसने और झूठ का साम्राज्‍य कायम करने के लिए ही हुआ है। यह कोई मेरी व्‍यक्तिगत राय नहीं है, यह तो न्‍यायाधीश के अच्‍छे कदम पर अपनी गलत प्रतिक्रिया देकर वकीलों ने खुद ही साबित किया है।
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तिरंगे की शान में केन्‍द्र की गुस्‍ताखी

क्‍या आपको पता है कि लालकिले पर पहली बार राष्‍ट्रध्‍वज कब फहराया गया? निश्चित ही आपको मालूम होगा, आपने अपने शैक्षणिक शुरूआत में ही इसका अध्‍ययन अवश्‍य किया होगा। कक्षा 3 से लेकर 5 तक की किताबों में इसका उल्‍लेख है। लेकिन, क्‍या आप यह भी जानते हैं कि केन्‍द्र को इस बारे में न तो कोई जानकारी है और न ही इस संबंध में उसके पास कोई साक्ष्‍य ही मौजूद है? आश्‍चर्य की भी बात है और काफी शर्मनाक भी, लेकिन सत्‍य यही है। आरटीआई के तहत बिहार के छपरा स्थित एक मध्‍य विद्यालय के शिक्षक को मिली सूचना तो यही बताती है। एक बार आप भी पूरे मामले से अवगत हो लीजिए, फिर आपको भी पूर्व में पढ़ी किताबी जानकारी पर संशय उत्‍पन्‍न हो जाएगा। जहां केन्‍द्र की पुस्‍तकें कहती हैं कि 15 अगस्‍त को पहली पर तिरंगा फहराया गया वहीं केन्‍द्र सरकार से जब सूचना मांगी जाती है तो वह इस संबंध में कोई साक्ष्‍य उपलब्‍ध नहीं होने की बात करता है। फिर किस आधार पर पुस्‍तकों में तिरंगा फहराने की इस तिथि की घोषणा कर दी गयी? क्‍या यह तिथि एक काल्‍पनिक तिथि है? क्‍या तिरंगा इसके पहले भी कहीं फहराया गया था? और यदि हां, तो कब, कहां, किसने फहराया? तमाम सवाल जेहन में आते-जाते हैं। इन सवालों को जन्‍म केन्‍द्र की एक भ्रामक सूचना ने दी है, तो निराकरण भी उसे ही करना होगा।
पूरा मामला यह है कि बिहार के छपरा जिला मुख्‍यालय के नबीगंज मुहल्‍ला स्थित बापू कन्‍या मध्‍य विद्यालय के सहायक शिक्षक नित्‍यानंद मिश्र बच्‍चों को बीटीसी की पुस्‍तकें पढ़ा रहे थे। इसमें 15 अगस्‍त को पहली बार तिरंगा फहराने की बात कही गयी थी। उन्‍हें अपनी तमाम जानकारियों के कारण एकबारगी इस बात पर पूर्ण विश्‍वास नहीं हो सका। इसके लिए उन्‍होंने अन्‍य कई पुस्‍तकें भी पढ़ी लेकिन संतोष नहीं हो सका। फिर, आखिरी रास्‍ते के रूप में आरटीआई के तहत सांस्‍कृतिक मंत्रालय से जवाब मांगा। सांस्‍कृतिक मंत्रालय ने पत्र संख्‍या 27-17/2010 के माध्‍यम से 29 अप्रैल 2010 को अपना जवाब श्री मिश्र को भेजा। लेकिन पत्र में जवाब की बजाय सलाह दी गयी थी। मंत्रालय ने बताया कि यह मामला केन्‍द्रीय गृह मंत्रालय से संबंधित है और इसकी जानकारी वही दे सकता है। इसके बाद श्री मिश्र ने यही सवाल केन्‍द्रीय गृह मंत्रालय से किया। केन्‍द्र ने पत्र संख्‍या 24/79/2010 के जरिए जून 2010 में जवाब प्रस्‍तुत किया। केन्‍द्र से मिले जवाब से शिक्षक को बड़ा झटका लगा। दरअसल, केन्‍द्र ने अपने जवाब में सीधे तौर पर लिखा था कि मंत्रालय में उपलब्‍ध अभिलेखों के अनुसार इस संबंध में कोई निविर्दिष्‍ट सूचना उपलब्‍ध नहीं है। पत्र के सबसे नीचे केन्‍द्रीय गृह मंत्रालय के उपसचिव व सह केन्‍द्रीय सूचना अधिकारी एसके भटनागर का हस्‍ताक्षर था। यानी, यह जवाब केन्‍द्रीय सूचना अधिकारी की तरफ से दी गयी थी। केन्‍द्र द्वारा अपने जवाब में कही गयी यह एक लाईन कई सवालों को जन्‍म देती हैं, वहीं केन्‍द्र को भी कठघरे में खड़ा करती है। क्‍या सचमुच मंत्रालय को नहीं पता कि तिरंगा पहली बार कब फहरा, और यदि नहीं पता तो फिर किताबों में लिखकर बच्‍चों को गलत जानकारी क्‍यों दी जा रही है? केन्‍द्र को इस सवाल का जवाब देना ही होगा।

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सलमान जी! बातें तो खूब रहीं आपकी, अब कुछ काम भी कीजिए

सलमान जी, इस सप्‍ताह आपके टि़वटर की खूब चर्चा रही। आपने जो अतुल्‍य भारत पर कमेंट किया था, वह दिल को छू गया। क्‍या लाइनें थीं आपकी- एम्‍बुलेंस पहुंचने से पहले पिज्‍जा पहुंच जाता है, सिम फ्री में मिलता है और चावल 40 रुपये किलो… वगैरह-वगैरह। पर्दे पर तो आपको अदाकारी करते बहुत देखा था पहली बार आपके शब्‍दों की कलाकारी देखी। एकबारगी यकीन नहीं आया, लेकिन दूसरे ही दिन जब अखबारों में आपकी लाइनें प्रकाशित हुईं तो यकीन करना ही पड़ा। लेकिन यह हमारी समझ में अब तक नहीं आ सका कि क्‍या फर्क है हमारे देश के नेताओं और देश के अभिनेताओं में? आपने भी तो वहीं किया जो हमारे देश के नेता करते रहे हैं। आपने भी उन्‍हीं लाइनों को भुना लिया जो लाइनें सदा से चुनाव में भुनायी जाती रही हैं। आपके इस कमेंट से गरीबों का क्‍या भला हुआ, नहीं पता लेकिन आप तो मुफ़त में ही समाचार पत्रों में पूरे दिन छाये रहे। खैर, आपके सवाल यदि हमारी देश के नेताओं की समझ में आ जाए, तो क्‍या कहने? लेकिन कुछ सवाल हमारे भी हैं, आपके लिए। क्‍या आप बताएंगे कि जिन-जिन उत्‍पादों का आप प्रचार-प्रसार करते हैं, उनके बारे में जो लंबी-चौड़ी तारीफें करते हैं, उससे खुद आप पूरी तरह संतुष्‍ट होते हैं? पहले खुद सुधरिए फिर भारत को सुधरने की नसीहत दीजिएगा। क्‍या कभी आपने लोगों को एम्‍बुलेंस के लिए रास्‍ता छोड़ने के लिए प्रोत्‍साहित करने का प्रयास किया है? फिर इस सवाल को पूछने का अधिकार ही कहां है कि एम्‍बुलेंस पहुंचने से पहले पिज्‍जा पहुंच जाता है। यदि आप कभी जन-सरोकार से जुड़ी चीजों के लिए लोगों को प्रोत्‍साहित करते दिखे भी हैं, तो एक व्‍यवसायी के तौर पर न कि एक नागरिक और समाजसेवी के रूप में। क्‍या अपने अब तक कोई ऐसी फिल्‍म की है जो आम लोगों की समस्‍याओं से जुड़ी हो? यदि ऐसी फिल्‍में आपने की है, तो आप बता सकेंगे कि उसके लिए कितने रुपये लिए? जिनको आप शब्‍दों के माध्‍यम से भरमा रहे हैं, उनकी खातिर आपके संदेश कहां हैं? जनाब टिवर पर मुफत के शब्‍द चिपकाने से एम्‍बुलेंस पिज्‍जा से पहले नहीं पहुंचने लगेंगे, और इसके लिए केवल भारत सरकार ही दोषी नहीं है। भारत के बारे में कटाक्ष करने से पहले आपको यह तो सोचना ही चाहिए था कि इसके लिए आपने कितनी कोशिश की? जहां तक हमने देखा है कि बड़े-बड़े पोस्‍टरों के माध्‍यम से आप विभिन्‍न उत्‍पादों के प्रचार करते ही दिखे हैं, कभी किसी चौराहे पर लगे बड़े पोस्‍टर में सलमान यह कहते कभी नजर नहीं आते कि एम्‍बुलेंस जा रहा है, किसी के जीवन का सवाल है, प्‍लीज रास्‍ता दे दीजिए। आप ऐसा करेंगे भी क्‍यों? आप भी तो उसी भारत के तथाकथित नागरिक हैं, जिस भारत की तस्‍वीर आपने दिखायी है। जनाब, कटाक्ष करने से पहले यह अवश्‍य सोच लीजिए कि देश में रहने वाला हर देशवासी अपने भारत के बारे में ऐसी ओछी बातें नहीं सुन सकता। और हां, पिज्‍जा की डिमांड करने वाले भी आप जैसे बड़े लोग ही हैं, हम जैसे ही सामान्‍य लोग हैं जिनके घर एम्‍बुलेंस पहुंचने में दिक्‍कत हो जाती है और वह भी इसलिए क्‍योंकि उस एम्‍बुलेंस को ओवरटेक करके आपकी पिज्‍जा गाड़ी निकल जाती है या फिर उसे साइड ही नहीं देती। हमारा मतलब सिर्फ आपसे नहीं बल्कि सभी उच्‍च वर्गीय लोगों से है। हां, आपकी शिकायत अवश्‍य ठीक है लेकिन तब जब आप इसके लिए धरातलीय प्रयास करें और सरकार आपका साथ न दे। नाचते-गाते सरकार पर आरोप लगाना और अपने ही देश को नीचा दिखाने से आप हीरो नहीं बन जाएंगे। लेकिन यदि आपने सचमुच अपने ही सवालों का जवाब बनने का प्रयास किया तो फिर पर्दे से निकलकर आप देश के आम लोगों के नायक साबित होंगे, और फिर आज आपकी बात का बुरा मानने वाले हम जैसे लाखों लोग भी कहेंगे- वाह सलमान जी, आपने बता दिया कि आप वाकई हीरो हैं।
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पोर्निस्‍तान : यह बंद तालों का असर लगता है

बचपन में बुजुर्गों से एक बात जानी थी। यदि किसी चीज के प्रति लोगों के मन आशंका और उत्‍सुकता पैदा करनी हो तो बस कुछ मत करो, उस चीज को उन लोगों के सामने ही उनकी नजरों से बचाना शुरू कर दो। यानी, कुछ इस तरह कि लोगों को यह पता भी चले कि इस चीज को उनकी नजर से बचाने का प्रयास किया जा रहा है। फिर देखना, वे इसे देखने के लिए, इसकी तह तक जाने के लिए कैसे कुलबुलाते हैं, कितनी हदें पार करते हैं। एक खाली बाक्‍स में भी ताला लगाकर उसे चोरों की नजर में लाया जा सकता है। वैसे, तो कईयों बार बचपन में सुनी यह बात सच साबित हुयी है लेकिन एक बार फिर हमने इसे खरा पाया है। पाकिस्‍तान के पोर्निस्‍तान बनने के मामले में हमें लगता है यह भी एक कारण है। हो सकता है कि आपमें से कई पोर्निस्‍तान नाम से परिचित न हो। दरअसल, सर्च इंजन गुगल के एक सर्वे के अनुसार पाकिस्‍तानी इंटरनेट पर पोर्न साइट देखने में दुनियां में अव्‍वल हैं। इसी के आधार पर पाकिस्‍तान को पोर्निस्‍तान कहा जाने लगा है। अब तो पोर्निस्‍तान नामकरण के पीछे का मतलब समझ में आ गया? लेकिन जरा सोचिए कि जिस देश में बुर्का की प्रथा को जारी रखने के लिए मुल्‍ला टकराते रहते हों, सरकार इसकी पैरवी करती हो, इसको जारी रखने के लिए धर्म ग्रंथों को बीच में लाया जाता रहा हो, उस देश का नाता पोर्न साइटों से कैसे जुड़ गया? हमें तो यह वही बंद तालों का असर लगता है। यानी, देश के लोगों को इन सब चीजों से जितना ही अधिक दूर करने का प्रयास किया गया, उनकी इनसबके प्रति उत्‍सुकता, चाहत उतनी ही अधिक बढ़ती चली गयी। एक उदाहरण दे रहा हूं। अपने घर में दो बॉक्‍स लेकर आइए, एक बॉक्‍स में ढ़ेर सारी चीजें रख दीजिए लेकिन ताला न लगाइए और एक बॉक्‍स में कुछ भी भर दीजिए पर ताला लगाना न भूलिए। हमारा दावा है कि आपके अलावा हर शख्‍स उस बंद ताले वाले बॉक्‍स पर ही अपनी नजर गड़ाएगा। और चोर तो सबसे पहले उसे ही लेकर भागेंगे। बस यही पाकिस्‍तान में हुआ है। गुगल के मुताबिक विश्‍व में पोर्न सामग्री देखने में पाकिस्‍तान के लोग सबको पीछे छोड़ दिए हैं। हालांकि गुगल की इस रिपोर्ट को झुठलाने के लिए एक बार फिर वे ही लोग जो कि ऐसी रिपोर्टों के निर्माण के लिए जिम्‍मेवार है, कोशिश में लग गये हैं। पाकिस्‍तान को पोर्निस्‍तान कहा जाना यहां के धर्मगुरुओं, नेताओं के गले नहीं उतर रहा और वे इसका लगातार खंडन कर रहे हैं। गुगल की सर्वे रिपोर्ट को झुठलाने की पूरी कोशिश की जा रही है- इसके समानांतर मगर विपरीत तर्क देकर, तथ्‍य देकर। हो सकता है कि इसके लिए पाकिस्‍तान सरकार कोई दूसरा सर्वे करा डाले और उसमें अपने देश के लोगों को धर्म चैनल देखने में नंबर वन बना दे। यहां के अखबार ‘डॉन’ ने इस्लामाबाद, लाहौर, कराची, पेशावर और क्वेटा के लोगों से बातचीत कर यह निष्कर्ष दिया है कि गुगल की रिपोर्ट सत्‍य नहीं है। पाकिस्तान की इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स एसोसिएशन भी अपने देश के बचाव में उतर आई है। उसने कहा है कि पाकिस्तानियों द्वारा देखी जाने वाली शीर्ष 40 साइटों में एक भी पोर्न वेबसाइट नहीं है। संस्था के प्रवक्ता वहाज-उस-सिरास ने कहा है- ‘दुनिया भर में करीब डेढ़ से दो अरब लोग इंटरनेट पर सर्च करते हैं। उनमें से हमारे देश में इंटरनेट के उपभोक्ता महज 50 से 80 लाख हैं। जो कि पूरी दुनिया के उपभोक्ताओं का केवल 0.5 फीसदी है। पाकिस्तान की जनसंख्या के पांच प्रतिशत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में देश पोर्न सामग्री देखने के मामले में कैसे अव्वल हो सकता है?’ फिलहाल, यहां की सरकार और धर्म गुरु चाहे जितना भी हल्‍ला कर ले लेकिन आम पाकिस्‍तानी पाकिस्‍तान को पोर्निस्‍तान कहने पर कुछ अलग सोच नहीं रखते। जो पाकिस्‍तान के एक अखबार डॉन में छपे उनके बयानों से स्‍पष्‍ट होता है। डॉन में एक उम्रदराज मुल्‍ला ने कहा है- ‘हां, मैं पोर्न साइट देखता हूं। हो सकता है गूगल का सर्वे सही हो। वैसे इसमें हर्ज क्या है? अगर पोर्न साइट बनाई जाती हैं, तो जाहिर सी बात है, लोगों के देखने के लिए।’ एक पाकिस्तानी ने अपने ब्लॉग पर लिखा है, ‘मुझे समझ नहीं आता कि क्यों पाकिस्तान के लोग सच्चाई स्वीकारने में संकोच कर रहे हैं? इन लोगों को यह मानने में शर्म क्यों महसूस हो रही है।’ पोर्न सामग्रियों को देखने में देश को मिले खिताब पर इसी देश के नागरिकों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं हैं, लेकिन हमारा तो बस इतना ही कहना है कि जब धुआं उठा है तो कहीं न कहीं आग तो होगी ही। ना सही कि गुगल की रिपोर्ट पूरी तरह सत्‍य व निर्विवाद है, लेकिन इससे भी तो इनकार नहीं किया जा सकता कि रिपोर्ट में कुछ न कुछ सच्‍चाई अवश्‍य है। ना सही कि पाकिस्‍तान की जनसंख्‍या बहुत अधिक है लेकिन जितनी है उसमें उतने अधिक लोगों का पोर्न साइटों पर अपनी आंखें जमाना आश्‍चर्यजनक तो है ही। बताते हैं कि पाकिस्‍तान में इंटरनेट के मात्र 50 से 80 लाख तक ही उपभोक्‍ता हैं लेकिन यदि इतने उपभोक्‍ताओं में से ही अधिकतर पोर्न सामग्रियां देख रहे हों तो आखिर ऐसी रिपोर्ट क्‍यों नहीं आएगी। बहरहाल, ऐसी रिपोर्ट आगे न आए और ऐसी चीजों में देश का नाम फिर ना उछले इसके लिए रिपोर्ट के पीछे के कारणों पर सरकार को भी और पाकिस्‍तान के धर्म गुरुओं को भी सोचना होगा। हमारी सोच में तो यह बंद तालों का असर लगता है…।

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