हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

पॉलीथिन बिकता रहेगा जब तक नीति और नीयत दोनों सही नहीं होगी…

नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में शपथपूर्वक कहा था कि गलती मुझसे भी हो सकती है लेकिन गलत नीयत से कोई काम नहीं करूंगा…।
दरअसल, यही नहीं हो पाता। सरकारों से गलतियां तो होती ही हैं, गलत नीयत भी खूब होती है। बल्कि, गलतियों के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार नेताओं या सरकारों की गलत नीति नहीं, बल्कि गलत नीयत ही होती है। यह बात न तो किसी एक नेता पर लागू होती है और न ही किसी एक दल या सरकार पर; हमाम में सभी नंगे हैं…।
बात अभी उत्तर प्रदेश में पॉलीथिन बैन की हो रही है। सरकारी दावा है कि 15 जुलाई से प्रदेश में पॉलीथिन नजर नहीं आएगा। यह दावा नया नहीं है। योगी आदित्यनाथ से पहले ही यह दावा अखिलेश यादव कर चुके हैं। यूपी में वर्ष 2000 से ही पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है लेकिन चूंकि नीयत नहीं है इसलिए सरकार भले बदल गई लेकिन हालात वही हैं…।
हां, तो कैसे जानें कि किसी सरकार या नेता की नीयत है कि नहीं? है तो क्या है? क्योंकि नीति क्या है, यह तो सरकार खुद ही स्पष्ट कर देती है लेकिन नीयत वह छुपा ले जाती है। सवाल है कि नीयत जानें कैसे? हम बताते हैं…। आप अपनी आंख, कान, दिल, दिमाग को धर्म—जाति—नेता—दल आदि के मोह—माया से मुक्त कर सबसे पहले एक नागरिक बन जाइए। एक नागरिक के रूप में नेता की नीति का अध्ययन कीजिए, आपको उसकी नीयत साफ पता चल जाएगी। आपको पता है? जब कोई संपादक किसी पत्रकार की कॉपी पढ़ता है तो उसे सिर्फ खबर ही पता नहीं चलती है, उस खबर को लिखने का उद्देश्य भी पता चल जाता है, पत्रकार की नीयत भी पता चल जाती है…। आप पाठक तो हैं ही, सरकार की नीतियों का संपादक बन जाइए।​ फिर देखिए, आप बड़े आराम से नेता की नीति के जरिये उसकी नीयत तक पहुंच जाएंगे, जैसे कि संपादक खबर के जरिये उसके उद्देश्य तक पहुंच जाता है…।
हां तो पॉलीथिनमुक्त उत्तर प्रदेश की बात। बिल्कुल संभव है लेकिन तब जब नीयत हो। चूंकि नीयत में खोंट है इसलिए पॉलीथिमुक्त प्रदेश की कल्पना अभी बेमानी है।
ठेले—खोमचे पर पॉलीथिन में सब्जी बेचने वाले से पन्नी छीनी जा रही है और वजन देखकर जुर्माना भी ठोंका जा रहा है। इससे क्या होगा? पब्लिक तो तैयार ही नहीं, अपने घर से बैग ले जाने के लिए, बेचारा वह ठेले वाला क्या करे? क्या ठेले वाला वह गरीब आदमी उस पन्नी को बनाता है? यदि वह पन्नी नहीं बने तो? फिर जहां वह पन्नी बनती है, वह फैक्ट्री ही क्यों नहीं सीज कर दी जाती? यदि कर दी गई तो? फिर तो ठेले तक पॉलीथिन पहुंच ही नहीं पाएगा। फिर? फिर सरकार क्या करेगी? इतने अधिकारी बहाल किए हैं, वे क्या करेंगे? जिन अधिकारियों ने, जिन पुलिस वालों ने मूल वेतन के साथ ऊपरी आमदनी का ख्वाब देखकर सरकारी नौकरी ज्वाइन की है, उनका क्या होगा? भाई! यह सबकुछ यूंही चलता रहे, इसके लिए पॉलीथिन हमेशा बिकता रहेगा और जनता को शासन—प्रशासन का कुछ काम भी दिखता रहे, इसलिए प्रदेश को पॉलीथिनमुक्त किए जाने का कथित प्रयास भी चलता रहेगा।
यह सबकुछ साथ—साथ चलता है…। हर सरकार में चलता है। वैसे ही, जैसे दारू दुकानों को लाइसेंस देने का काम और नशामुक्ति का अभियान साथ—साथ चलता रहता है…। जैसे, रेप पर सख्त कानून बनाने और अपनी सरकार, अपने दल के आरोपियों को बचाने का काम साथ—साथ चलता रहता है…। यह समझ जाइएगा तो नीति और नीयत का अंतर भी समझ जाइएगा। यह नीति और नीयत वही दो पटरियां हैं जो दिखने में तो साथ—साथ चलती हैं लेकिन हकीकत में कहीं मिलती नहीं। इन्हीं पटरियों पर भारतीय राजनीति की रेलगाड़ी दौड़ती है…।
पिछले वर्ष 15 जून तक ही उत्तर-प्रदेश की सड़कों के सभी गढ्ढे भर लिए जाने थे, भरे गए? इसी तरह 15 जुलाई तक पॉलीथिन भी बंद नहीं होगा, आगे भी बिकता रहेगा…। यह सबकुछ यूंही चलता रहेगा… तब तक, जबतक कि सही नीति के साथ सही नीयत न हो …।

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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2 thoughts on “पॉलीथिन बिकता रहेगा जब तक नीति और नीयत दोनों सही नहीं होगी…

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