हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

आपको आदमी बनना है? इन पिशाचों से सीखिए…

महोबा की घटना है। कुछ सालों पूर्व पिता की मौत हो गई तो किशोरी परिवार के भरण-पोषण के लिए दुकानों में काम करने लगी। 13 दिसंबर 2017 को मकनियापुरा निवासी फारुख बहला-फुसला कर किशोरी को अपने साथ लेकर गया और सात दिन तक साथ रखकर दुष्कर्म किया। इसके बाद उसके साथियों ने भी सामूहिक दुष्कर्म किया। फिर किशोरी को कांशीराम कॉलोनी निवासी आॅटो चालक रियाज को बेच दिया। रियाज ने बजरिया में पांच दिन रखकर किशोरी से दुष्कर्म किया और फिर उसे ननौरा गांव निवासी अवनीश को बेच दिया।
अब यहां गौर करो पीड़ित या गुनहगार में हिंदू—मुसलमान ढूंढने वालो, देखो कि उनमें आपस में कोई भेदभाव नहीं है। पहले मुसलमान ने दुष्कर्म किया और फिर हिंदू ने। अब आगे सुनो।
अवनीश ने किशोरी को 15 दिन रखकर दुष्कर्म किया और फिर इकरार निवासी बेलाताल व बुधौरा निवासी देव साह को बेच दिया। इन दोनों ने भी किशोरी से दुष्कर्म किया और कई अन्य लोगों से कराया भी। किशोरी को फिर से अवनीश ने खरीद लिया। इसके बाद अवनिश ने किशोरी के सौदा बबलेश तिवारी निवासी सोनकपुरा लहचूरा झांसी से किया। उसने किशोरी को उसके हवाले कर दिया।
यहां फिर गौर करो पीड़ित की पीड़ा देखने से पहले ब्राह्मण—दलित करने वालो…। गुनहगारों में ऐसा कोई भेदभाव नहीं है। वे एक हैं। पहले मुस्लिम ने दुष्कर्म किया, फिर हिंदू ने, फिर दलित ने, फिर ब्राह्मण ने…। दुष्कर्मियों की आपस में क्या गजब की एकता है! सीखो इन पिशाचों से।
परसो पुलिस ने छापा मारा और किशोरी बबलेश तिवारी के घर से बरामद हुई।
अब जरा सोचो। गत वर्ष दिसंबर से इस वर्ष की जुलाई तक एक किशोरी का वास्ता हर धर्म, हर जाति के लोगों से पड़ा और वह हर धर्म—हर जाति वालों से रौंदी जाती रही…। दुष्कर्मियों ने उसमें बस अपनी हवस देखी, आपकी तरह पीड़ित को पीड़ित और गुनहगार को गुनहगार कहने के लिए भी उसकी धर्म—जाति नहीं देखी। उस लड़की को तो खुदा का बंदा भी मिला तो न छोड़ा और ईश्वर की संतान भी लील गई। मनुवादी भी मिला, जय भीम—जय मीम कहने वाला भी लेकिन बचाया किसी ने भी नहीं, बल्कि रौंदा, जीभर रौंदा। इस सफर में उस लड़की को तलाश थी एक इंसान की जो उसे भी अपनी तरह एक इंसान समझे, लेकिन वह कहीं न मिला। अब इंसान बचा ही कहां है?
अब भी वक्त है। हम अपना मानवीय धर्म भूल बैठे हैं तो इन पिशाचों से ही सीख लें जो अपना कुकर्म नहीं भूले हैं। यदि हम पीड़ित का बचाव करने के लिए धर्म—जाति देखने लगे हैं तो इन पिशाचों से ही सीख लें जो साथ—साथ गुनाह करते हैं। यदि हम सबसे बड़े धर्म मानवता को भुलाकर मजहबों में बंट गए हैं तो इन पिशाचों से सीख लें जिनका एक ही धर्म है— आतंक, जुल्म। इस तरह एकजुट इन पिशाचों का मुकाबला यदि हम मानव बनकर नहीं बल्कि बल्कि धर्म—जाति का होकर करेंगे तो मानवता की रक्षा कहां संभव है? फिर तो एक दिन सब या तो शिकारी होंगे या शिकार। कोई बचाने वाला कहां होगा? पिशाचों की इस भीड़ में कोई मानव कहां होगा?

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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