हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

हिंदू तो नियम पहले, मुस्लिम तो कैसा नियम? वाह तुष्टीकरण!

कल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में ठीक वैसी ही घटना हुई, जैसी परसो नोएडा में हुई थी। अंतर बस इतना है कि नोएडा वाले मामले की पात्र सादिया मुस्लिम हैं, एएमयू मामले के पात्र सत्यवीर हिन्दू हैं। लेकिन, देखिए कि कैसे हिन्दू होने पर नियम ही बड़े रहते हैं, धर्म नहीं। स्पष्ट है कि यह सहूलियत तो नेताओं, सरकार ने अभी बस इस्लाम अपना लेने वालों को दी हुई है। इसे सनातन धर्म छोड़ इस्लाम अपनाने वालों के लिए अघोषित मगर लागू प्रोत्साहन योजना समझ लीजिए…।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में एलएलएम में दाखिला के लिए कल इगलास के गांव तेहरा मुंज निवासी सत्यवीर सिंह पुत्र स्व. वेदराम परीक्षा देने पहुंचे। उन्हें परीक्षा देने से रोक दिया गया। सत्यवीर का आरोप है कि हाथ में कलावा एवं हिंदू धर्म का होने के कारण उन्हें परीक्षा से रोका गया है। सत्यवीर ने विधि विभाग के कर्मचारियों पर अभद्रता एवं अपशब्दों का प्रयोग करने का भी आरोप लगाया है। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री से भी शिकायत की है…।

अब जानिए हुआ क्या! सादिया ने भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाते हुए सुषमा स्वराज को ट्वीट किया तो नियम न होते हुए भी उनके हाथ में पासपोर्ट आ गया था। सत्यवीर ने भी कल मानव संसाधन विकास विकास मंत्री से शिकायत की मगर कुछ न हुआ…। वह परीक्षा नहीं दे पाए। क्यों? क्योंकि सादिया मामले में सादिया का मुसलमान होना महत्वपूर्ण है, सत्यवीर मामले में नियम महत्वपूर्ण हैं…।

एएमयू पीआरओ ऑफिस के एमआईसी प्रो. शाफे किदवई ने का कहना है कि गाइड लाइन के अनुसार, एलएलएम की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए एलएलबी/बीएएलएलबी में 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य है। सत्यवीर सिंह ने डॉ. भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी आगरा से वर्ष 2016 में एलएलबी की डिग्री ली है। परीक्षा में उन्होंने 2800 में 1446 अंक यानी 51.64 प्रतिशत अंक हासिल किया था। ऐसे में वह परीक्षा के लिए पात्र नहीं हैं…।

अब फिर गौर कीजिए! सादिया के पासपोर्ट मामले में विकास मिश्रा ने भी नियमों का हवाला दिया था और कहा था कि वह तन्वी नाम से पासपोर्ट लेने की पात्र नहीं हैं लेकिन विकास की किसने सुनी? सबने सादिया की सुनी। लेकिन, यहां उल्टा है। एएमयू में सत्यवीर की कोई नहीं सुन रहा… यानी, अब फिर एक बार देश में नियम ही सर्वोपरि हैं। तब सादिया को नियम का पाठ पढ़ाने वाले विकास का ट्रांसफर हो गया था, उस हिसाब से तो अब सत्यवीर को नियम बताने वाले शाफे का भी ट्रांसफर हो जाना चाहिए न…। लेकिन, नहीं होगा क्योंकि ऐसा करना गलत है। क्योंकि हिन्दू संविधान से ऊपर थोड़े है, वह तो सिर्फ…।

एएमयू विधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. जावेद तालिब एवं कंट्रोलर मुजीब उल्लाह जुबैरी ने कहा कि सत्यवीर सिंह का आरोप दूषित मानसिकता से प्रेरित है। एएमयू में छात्रों के साथ भेदभाव नहीं किया जाता है।

अच्छा! और सादिया का आरोप? वह किस मानसिकता से प्रेरित था? अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जिसके नाम में ही मुस्लिम है, जिसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा मिला हुआ है, वहां हिन्दू युवक से कोई भेदभाव नहीं किया गया; लेकिन एक पासपोर्ट दफ्तर जो न तो कोई बहुसंख्यक टाइप संस्थान है और न ही नाम में हिन्दू लगा है, वहां मुस्लिम महिला से भेदभाव हो गया था?
गजब…!

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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One thought on “हिंदू तो नियम पहले, मुस्लिम तो कैसा नियम? वाह तुष्टीकरण!

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