हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

भाड़ में जाए संविधान, इस्लाम जिंदाबाद!

संविधान में यह देश धर्मनिरपेक्ष है मगर हकीकत में राजनीतिक दल, मीडिया, बुद्धिजीवी और यहां तक कि सरकार भी एक विशेष धर्म की तरफ साफ लुढ़के हुए नजर आते हैं। ठीक है कि धर्म विशेष को खुश करना है लेकिन कितना? किस कीमत पर? किस हद तक? तुष्टीकरण की भी कोई हद होती है कि नहीं? अरे भाई, जब संविधान नहीं, मजहब देखकर ही देश चलाना है तो धर्मनिरपेक्ष देश का यह ढोंग क्यों? सीधे इस्लामिक कंट्री का ही दर्जा क्यों नहीं दे देते? जो दिक्कत है भी वह तो हिंदू राष्ट्र होने में है ना? इस्लामिक कंट्री होने में कहां कोई दिक्कत है जहां देश का सार्वजनिक से लेकर निजी तंत्र तक मुसलमानों का खुशामद करने में लगा हुआ है? एक अधिकारी कर्तव्यनिष्ठा दिखाता है, नियमों का पालन करता है और मुस्लिम महिला के आवेदन में कमियां पाते हुए सुधार के लिए कहता है तो उसकी नौकरी ले ली जाती है और सारे नियम—कानून ताक पर रखकर उस महिला को पासपोर्ट जारी कर दिया जाता है? क्यों भाई? नियम—कानून धर्म देखकर अप्लाई होने लगा है क्या? यदि ऐसा है तो क्यों न संविधान में एक ही बार संशोधन कर साफ—साफ लिख दिया जाए कि देश का ​कानून फलां धर्म पर ही लागू होगा और फलां धर्म वालों की मनमर्जी ही देश का कानून है। कम से कम नियमों का पालन करने के कारण कोई कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी बलि का बकरा तो नहीं बनेगा। तुष्टीकरण ही करनी है तो खुलकर करो, नियम बना दो, संविधान में संशोधन कर दो। कह दो कि भाड़ में जाए संविधान, अब से इस्लाम जिंदाबाद!

तन्वी उर्फ सादिया के मामले में सुषमा स्वराज द्वारा बिना किसी जांच वरिष्ठ अधीक्षक को हटाना और पासपोर्ट विभाग द्वारा सारे नियमों को ताक पर रखकर पासपोर्ट जारी करना यह बताने के लिए काफी है कि इस समय देश में सिर्फ किसी का मुसलमान होनाभर ही काफी है। उसका महज एक ट्वीट कर देना काफी है कि उसके मुसलमान होने के नाते उससे अन्याय हुआ है। फिर तो वह दोषी भी होगा तो अचानक पीड़ित हो जाएगा। फिर उसे हर नियम से छूट है, वह हर जांच से परे है।

अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं पत्रकार असद अशरफ के मामले को। रविवार रात करीब 9 बजे असद अपने घर जामिया नगर जाने के लिए ओला कैब लिए थे। कैब के ड्राइवर ने उन्हें जामिया नगर से पहले ही उतरने के लिए कह दिया। उन्होंने कारण जानना चाहा तो ड्राइवर ने कहा …. जामिया गन्दी लोकलिटी है। वहां अजीब लोग रहते हैं। गौर कीजिए कि ड्राइवर सुरक्षा के लिहाज से वहां नहीं गया था। लिहाजा, होना यह चाहिए था कि जामिया के हालात बदले जाएं ताकि वहां जाने से किसी को कोई डर न हो लेकिन बदल दिया गया वह ड्राइवर। चूंकि असद पत्रकार हैं तो वह इस नाते अच्छी तरह जानते हैं कि पत्रकार होने से भी बड़ी बात है मुसलमान होना। उन्होंने ओला कम्पनी में शिकायत दर्ज कराई कि मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रहने की वजह से उनके साथ यह सब हुआ। बस क्या था? ओला ने असद से माफी मांगी और ड्राइवर अशोक कुमार को बर्खास्त कर दिया। NDtv को भी खुराक मिल गई। ट्विटर पर भी असद को खूब सहानुभूति और ड्राइवर को लानत मिली। खबर का केंद्र हिंदू—मुसलमान हो गया, जामिया की हालत पर कोई चर्चा नहीं हुई…।

हमें याद हैं, जब हम पटना में पढ़ते थे तब की घटना। वहां हम बोरिंग रोड के पीछे शिवपुरी में रहते थे। तब पुनाईचक, राजवंशीनगर, शास्त्रीनगर से सटा शिवपुरी असुरक्षित माना जाता था। रात में उधर बेली रोड और इधर बोरिंग रोड तक तो आने में कभी कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन उसके बाद शिवपुरी में अंदर जाने के लिए हर रिक्शा वाला तैयार नहीं होता था। अलग बात थी कि मेरी इतनी बुद्धि नहीं थी कि हम पूछ सकें कि वह रिक्शा वाला कहीं मुसलमान तो नहीं है? कहीं वह मेरे हिंदू होने के नाते तो ना नहीं कर रहा? खैर, दैनिक जागरण में नौकरी मिल गई तो हम बिहार के छपरा पहुंच गए। हमने रूम की तलाश शुरू की। सोचा, सस्ते में निपट जाए तो अच्छी बात हो। रेलवे ढाला पार प्रभुनाथनगर तरफ कमरे सस्ते मिल रहे थे लेकिन किसी भी रिक्शा वाले से रात में कहते कि चलोगे? तो वह ना कह देता था। इसलिए हम हमेशा नगरपालिका चौक के इर्द—गिर्द ही रह गए। हां, इस दौरान कभी किसी रिक्शे वाले से उसका धर्म नहीं पूछा हमने। अभी यहां दिल्ली—नोएडा में भी हर शहर की तरह कुछ इलाके हैं, जहां की ऐसी ही स्थिति है। आप न अपना धर्म बताइए, न ड्राइवर का धर्म पूछिए लेकिन उससे किसी जगह चलने के लिए कहिए तो तैयार हो जाएगा, किसी जगह चलने के लिए कहिए तो नहीं होगा। जिस जगह के लिए वह ना कर रहा है, इसके पीछे की वजह उससे जरूर जानी जा सकती है। इसके बाद सरकार, प्रशासन, मीडिया सबकी जिम्मेदारी है कि उस जगह को इस लायक बना दे कि कोई ड्राइवर वहां जाने से इनकार न करे लेकिन यह तो बहुत मुश्किल है। आसान तो यही है कि उसके ना की वजह धर्म को बता दिया जाए। हालात बदलने की बजाय, ड्राइवर ही बदल दिया जाए। कभी किसी ने सोचा है कि एक ड्राइवर की नौकरी खा जाने से क्या क्या दूसरे ड्राइवर के लिए हालात बदल जाएंगे? खैर, सोचने की जरूरत ही क्या है? मुसलमान होना ही काफी है…।

पत्रकार असद अशरफ का यह मामला ताजा ही था कि सादिया का मामला आ गया। सादिया ने भी असद का ही फॉर्मूला अपनाया… असद ने आरोप लगाया था कि ड्राइवर ने इसलिए पहले उतार दिया क्योंकि वे मुसलमान बहुल क्षेत्र में रहते हैं, सादिया ने आरोप लगाया कि इसलिए पासपोर्ट नहीं मिला, क्योंकि उन्होंने अंतरजातीय विवाह किया है, अब वह मुसलमान हैं…। और मुसलमान होना मतलब… देश के संविधान से उपर हो जाना है। भला कोई क्यों न हर बात में कहे खुद को मुसलमान? निर्दोष होने के बाद भी कोई पुलिस से पिट रहा हो तो क्या वह कभी आरोप लगा सकता है कि इसलिए पिट रहा है कि वह हिंदू है? सवर्ण है? ब्राह्मण है? लेकिन, गलत करने पर, गलत होने पर भी बड़े आराम से कहा जा सकता है कि मैं मुसलमान हूं, मैं दलित हूं इसलिए मुझे पुलिस ने पीटा या ‘दबंगों’ ने पीटा। पुलिस की लाठियां धर्म, जाति देखकर नहीं बरसतीं लेकिन कभी किसी अखबार में हेडिंग लगी है— ब्राह्मणों या राजपूतों, कायस्थों को दौड़ा—दौड़ाकर पीटा? ‘दलितों को पीटा’ ऐसी हेडिंग अक्सर लगती है। बलात्कार करने वाले भी भला धर्म, जाति देखते हैं क्या? कभी ‘ब्राह्मण महिला से बलात्कार’ हेडिंग देखी है? लेकिन ‘दलित से बलात्कार’, ‘मुसलमान युवती से बलात्कार’ जैसी हेडिंग अखबारों की पठनीयता पढ़ाती हैं। दलित, मुसलमान हो जाने का मतलब है सत्ता, विपक्ष, बुद्धिजीवी, मीडिया, सरकार सबका केंद्रबिंदु हो जाना। यह फॉर्मूला हिट है, इसलिए इसे हर कोई आजमा रहा है। सादिया ने भी आजमाया। दस्तावेज गलत और अपूर्ण होने पर जब उनका पासपोर्ट न बना तो उन्होंने इसे हिंदू—मुस्लिम का रंग दे डाला। ट्वीट कीं तो सहानुभूतियों की बाढ़ आ गई। सुषमा स्वराज जैसी सुलझी नेत्री भी भाव विह्वल हो गईं। तत्काल नोटिस देकर उस अधिकारी का तबादला कर दिया, जिसने एक मुसलमान महिला से नियम—कायदे पूरा करने की गुस्ताखी कर डाली। कुछ ही देर में अधिकारी के हाथ में तबादले का पत्र था, सादिया के हाथ में पासपोर्ट था…। न एलआईयू जांच, न पुलिस वेरीफिकेशन, न स्थल निरीक्षण, कुछ नहीं। नियम तो यह भी है कि पासपोर्ट सिर्फ डाक से ही भेजा जाता है, लेकिन सादिया को तो हाथों-हाथ मिला। यहां तक कि कुछ दिन पहले जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का पता बदला था तो उन्हें भी नया पासपोर्ट नियमानुसार डाक से ही ​भेजा गया था। यानी, जो नियम सीएम के लिए भी नहीं टूटा था वह सादिया के लिए टूटा…। कह सकते हैं कि मुसलमान होना; पत्रकार ही नहीं, सीएम होने से भी बड़ा होता है…।

सादिया और पति मोहम्मद अनस सिदृदीकी नोएडा में रहते हैं और दोनों नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं। सादिया, शादी से पहले तन्वी सेठ थीं। तन्वी सेठ और मोहम्मद अनस सिद्दीकी ने 2007 में शादी कर ली और अब उनकी छह साल की एक बेटी भी है। अनस ने इसी 19 जून को अपने पासपोर्ट रिन्युअल और तन्वी सेठ ने नए पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। बुधवार को दोनों को दस्तावेज के साथ रतन स्क्वायर स्थित पासपोर्ट सेवा केंद्र बुलाया गया था। सादिया ने पासपोर्ट के लिए अपना आवेदन तन्वी सेठ के नाम से दिया था। आवेदन में आवेदक का नाम तन्वी सेठ और पति का नाम मोहम्मद अनस सिदृदीकी पहली बार किसी को भी चौकाएगा। वरिष्ठ अधीक्षक विकास मिश्र ने भी कुछ सवाल पूछ डाले। तन्वी का आरोप है कि विकास ने उनसे नाम बदलने के लिए कहा। राजी नहीं होने पर पति से हिंदू रीति के अनुसार सात फेरे लेने को कहा। कहा कि तभी यह शादी वैध मानी जाएगी और पासपोर्ट बन सकेगा। विकास मिश्र ने तन्वी की फाइल सहायक पासपोर्ट अधिकारी (एपीओ) विजय द्विवेदी के पास भेज दी। इसके बाद तन्वी ने ट्वीट किया और देश में सूनामी आ गई। तुरंत विकास के हाथ में तबादले का लेटर और सादिया के हाथ में पासपोर्ट। न तो विकास को सजा देने के लिए कोई जांच हुई और न ही सादिया को पासपोर्ट देने के लिए। यानी, फॉर्मूला हिट रहा…।

धर्म—जाति की राजनीति करने वालों या किसी खास धर्म के लिए सहानुभूति और अन्य के लिए विद्वेष रखने वालों के लिए यह मामला यहीं खत्म हो गया लेकिन इससे अलग, सही और गलत देखने वाले हम जैसों के लिए कहानी अभी बाकी है…। कहानी में विकास मिश्र का पक्ष क्या जरूरी नहीं है? क्योंकि वह हिंदू हैं? क्योंकि वह ब्राह्मण हैं? क्योंकि वह नियमों का पालन कर रहे थे? सुनना तो होगा, क्योंकि न सुनेंगे, न जानेंगे तो भी सच नहीं बदल जाएगा…। विकास का कहना है कि पहली बात तो यह कि आवेदन में तन्वी सेठ का पता नोएडा का था। इस लिहाज से उन्हें गाजियाबाद पासपोर्ट सेवा केंद्र में अप्लाई करना चाहिए था। दूसरी बात यह कि अंतरजातीय विवाह करने पर पासपोर्ट मैन्युअल 2016 के तहत आवेदक को एक घोषणा पत्र देना होता है जिस पर लिखना होता है कि उसने जिससे शादी की है उसका नाम और पता यह है। तीसरा यह कि पासपोर्ट एक्ट 1967 के तहत नाम बदलने पर पासपोर्ट के आवेदन में एक बॉक्स में सही का निशान लगाकर दूसरा नाम भी जोड़ना पड़ता है। यहां तक कि घर का नाम भी बताया जाता है जिससे एक ही आदमी के अलग-अलग नाम से पासपोर्ट न बन सके। तन्वी के पति का नाम मुस्लिम होने पर विकास ने यह कहा था कि यदि अंतरजातीय विवाह है तो उन्हें दूसरा नाम भी बताना चाहिए। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि तन्वी निकाह के बाद धर्म परिवर्तन कर चुकी हैं। निकाहनामा में उनका नाम सादिया असद है। आवेदन तन्वी नाम से, दस्तावेज सादिया नाम के? पासपोर्ट कैसे जारी कर देते? आवेदन की त्रुटियों पर विचार करने के लिए विकास ने उसे एपीओ विजय के पास भेज दिया। विकास ने कहा कि यदि एपीओ स्वीकृति दे देंगे तो वे आवेदन की प्रक्रिया को इसी तरह मंजूर कर लेंगे। पासपोर्ट अधिकारी पीयूष वर्मा खुद कहते हैं कि विकास मिश्र पर इसके पहले किसी भी पासपोर्ट आवेदक के साथ अभद्रता की शिकायत नहीं है। वहां के कर्मचारी भी किसी अभद्रता से इनकार कर रहे हैं। सभी का यही कहना है कि विकास ने नियम के अनुसार ही पासपोर्ट प्रक्रिया के लिए तन्वी से उनके मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद नए नाम सादिया हसन की जानकारी भी फॉर्म में भरने के लिए कहा था। लेकिन, नियम—कानून भी कुछ होता है क्या? इस देश में मुसलमान होने से भी बड़ा कुछ होता है क्या?

नोट— हम किसी भी धर्म—जाति के खिलाफ नहीं हैं लेकिन धर्म—जाति के नाम पर भेद—भाव करने वालों के खिलाफ हैं। धर्म—जाति के नाम पर किसी को भी विशेष सुविधा देने या किसी को भी प्रताड़ित किए जाने के खिलाफ हैं। हम इसके खिलाफ थे, हैं और हमेशा रहेंगे…।

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मृत्युंजय त्रिपाठी

http://www.unbiasedindia.com

क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कहता है? फर्क पड़ता है कि मेरा जमीर क्या कहता है...!

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