हम जो देखते हैं, वही लिखते हैं…

श्रेणी: Politics

स्वार्थ से अटलजी का गुणगान, विरोध दोनों सही नहीं…

इस समय एक पक्ष अटलजी की निंदा में लगा हुआ है तो भाजपा अटलजी को भुनाकर 2019 का चुनाव जीतने के फेर में लगी है। सही बात यह है कि न तो अटलजी की निंदा करने से संघ या भाजपा का कुछ उखड़ जाएगा और न ही उनकी प्रशंसा करने से इनका कुछ बन ही जाएगा। इसलिए राजनीतिक, वैचारिक स्वार्थ सिद्धि से इस महामानव का गुणगान या विरोध दोनों ही सही नहीं है।
    कई वामपंथी, संघ विरोधी, भाजपा विरोधी, हिन्दू विरोधी और यहां तक कि ब्राह्मण, सवर्ण विरोधी… अटलजी को अपने-अपने हिसाब से गालियां दे रहे हैं। वामपंथी है तो संघी समझकर गाली दे रहा है। किसी राजनीतिक दल का अंधभक्त है तो भाजपाई समझकर गरिया रहा है। कोई कट्टर मुस्लिम है तो हिंदूवादी बताकर भला-बुरा कह रहा है। कोई कट्टर हिन्दू है तो सेकुलर कहने में शेखी समझ रहा है। जो दलित चिंतक है वह ब्राह्मण, सवर्ण समझकर रटा-रटाया मनुवादी कहकर ही खुश है…। इनमें से कोई खुद स्वतंत्र नहीं है। सभी वैचारिक, राजनीतिक, धार्मिक, जातीय… किसी न किसी तरह की गुलामी से अभी जकड़े हुए हैं। इस हद तक कि इनके अपने खेमे से कोई हत्यारा भी निकल जाए तो बेगुनाह प्रतीत होता है और सामने वाले खेमे में कोई बेहतर निकल जाए तो कोफ्त से मरे जाते हैं। इनमें से कोई भी अच्छा को अच्छा और बुरा को बुरा कहने के लिए स्वतंत्र नहीं है। ऐसे गुलामों को अब स्वतंत्र होने की सोचना चाहिए और इस तरह की प्रायोजित निंदा से बाज आना चाहिए।
अब स्वार्थवश अटलजी की प्रशंसा की बात। अटलजी को संघी, भाजपाई, ब्राह्मण, सवर्ण आदि-इत्यादि बताकर उनके जरिये इन सभी को महान बताने की होड़ चल रही है। यह भी उतना ही गलत है। अटलजी जो थे, वह बस वही थे। उनका व्यक्तित्व उनकी अपनी कमाई, बनाई पूंजी थी। उसका हिस्सा किसी में नहीं बंट सकता। वे संघ से थे तो क्या सभी संघी उनकी तरह हैं? वे भाजपाई थे तो उनकी तरह अभी कौन है भाजपा में? उन्होंने तो एक वोट से सत्ता गंवा दी लेकिन समझौता न किया। अभी तो वोट बैंक के लिए क्या-क्या नहीं किया जा रहा? कुछ बचा भी है क्या?
    आज मोदी को अटलजी के वारिस के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या कोई राजनीतिक वसीयत लिखी कभी अटलजी ने? और नेता वसीयत से बनता है क्या कोई? मोदीजी के अंतिम यात्रा में पैदल चलने तक को भुनाया जा रहा है। कौन सी नई बात हो गई इसमें? अपनी तो संस्कृति ही यही है। और वैसे भी उस महामानव की अंतिम यात्रा में तो दूर-दराज से आए सैकड़ों छात्र, युवा, बुजुर्ग सभी चल रहे थे जिन्होंने अटलजी के राजनीति से सन्यास लेने के बाद जन्म लिया वे भी, तो कौन सी बड़ी बात हो गई यदि भाजपा सरकार के प्रधानमंत्री चले जिनके लिए अटलजी कमल खिलाकर गए थे। पैदल चले तो मुलायम तक, विपक्षी दलों के भी कई नेता… उनकी कहाँ कोई चर्चा है?
    अटलजी की मौत को एक राजनीतिक अवसर के रूप में बदल देने से यदि भाजपा यह सोचती है कि इससे अटलजी के प्रशंसकों का प्यार उसे भी मिल जाएगा तो गलत सोचती है, उल्टे घृणा हो जाएगी अपने प्रिय नेता की मौत का तमाशा बनता देखकर। इसी तरह यदि वह यह सोच रही है कि अटलजी की अस्थियों से राजनीतिक बज्र बना लेगी और उसका इस्तेमाल चुनाव में विरोधियों पर कर लेगी तो यह भी न भूले कि खराब नीयत से किया मन्त्रजाप भी अनिष्टकारी हो जाता है। अतः यह बज्र कहीं वापस लौटकर उल्टा ही प्रहार न कर दे। अटलजी जिन्होंने राजनीति से काफी पहले संन्यास ले लिया और जो एक दशक तक मरणासन्न स्थिति में रहे, उनकी मृत्यु के बाद उनका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना खेदजनक है।
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यह राहुल का दलित प्रेम है या सवर्ण घृणा…?

इस समय देश में दलित राजनीति की बयार बह रही है। कभी—कभी तो ऐसा लगता है कि मानो देश में कोई और वर्ग रहता ही न हो। बस दलित—दलित—दलित। आज राहुल गांधी भावुक भी हो गए। हमें तो लगा कि कथित दलितों का कथित दर्द देखकर कहीं रो ही न पड़े। इतने मासूम हैं कि बिना जांच ही सवर्णों की गिरफ्तारी का कानून बनने के बाद भी डरे हुए हैं कि कहीं दलितों का शोषण न हो जाए। इनके हिसाब से यह एक्ट अभी उतना प्रभावी नहीं है। शायद, इसमें फांसी का प्रावधान चाह रहे हों! खैर…।
राहुल गांधी की राजनीतिक सोच और समझ कितनी है, इस पर तो किसी बहस की गुंजाइश ही नहीं रह गई है लेकिन इनकी मंशा क्या है, इस पर चर्चा जरूरी है। खासकर तब जबकि इन्होंने खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर रखा है। ऐसे में जरूरी है जानना कि विपक्ष में होकर भी जो व्यक्ति समस्त देश की चिंता नहीं कर पा रहा; किसी एक खास वर्ग, खास जाति पर ही फिदा हुआ जा रहा है वह प्रधानमंत्री बना तो क्या करेगा!
देश के प्रधानमंत्री के लिए जरूरी है कि वह हर नागरिक को वैसे ही एक समान समझे जैसे कि कोई पिता अपने सभी बच्चों को समझता है। वह आगे बढ़ने वाले बच्चे को प्रोत्साहित करे, गलत करने वाले को डांटे, कमजोर बच्चे को बल प्रदान करे। वह सबको स्कूल भेजे, सबको उसकी क्षमता के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने और उसे प्राप्त करने में मदद करे। प्रधानमंत्री ऐसा हो जो नागरिकों की धर्म—जाति न देखे। उन्हें एक जैसा समझे। खैर…।
राहुल गांधी कल जंतर मंतर पर दलितों और जनजातीय समुदाय द्वारा आयोजित एक रैली में बोल रहे थे। कहा-
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस न्यायाधीश को दोबारा नौकरी देकर सरकार की दलित विरोधी मानसिकता पर मुहर लगा दी है जिन्होंने दलितों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के प्रावधान वाले अधिनियम को कमजोर करने के आदेश पारित किए थे। मोदी दलित विरोधी हैं…।
बस यह बयान काफी है राहुल गांधी की मंशा जाहिर करने के लिए। यदि राहुल गांधी दलितों के दर्द से आहत थे तो उनकी पीड़ा अब तक दूर हो जानी चाहिए थी क्योंकि एससी—एसटी कानून में बिना जांच ही सवर्ण की गिरफ्तारी का प्रावधान कर दिया गया है। अब इससे अधिक क्या होगा? लेकिन नहीं, उन्हें दलितों को आकर्षित करना है तो इसके लिए इससे भी आगे जाकर शायद सवर्णों से बैर साधना चाह रहे हैं। अब उन्हें वह न्यायमूर्ति तक पसंद नहीं, जिन्होंने इस एक्ट के दुरुपयोग की बात कही थी। यानी, एक तरह से सवर्णों को कुछ हद तक राहत दी थी।
न्यायमूर्ति एके गोयल और न्यायमूर्ति यू.यू. ललित ने 20 मार्च को अपने आदेश में एससी—एसटी एक्ट के राजनीतिक या निजी कारणों के लिए दुरुपयोग किए जाने की बात कही थी जो कि बिल्कुल सत्य थी। दोनों न्यायमूर्तियों ने कहा था कि आगे से इस अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज होने पर गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करनी होगी और अग्रिम जमानत भी दी जा सकेगी। इसी के बाद 2 अप्रैल को देशभर में आंदोलन के नाम पर हिंसा की आग भड़की और इस आग में नेताओं ने जमकर दलित राजनीति की रोटियां सेंकीं। इसी हंगामे के बाद भाजपा सरकार ने एक्ट में संशोधन किया ताकि उसका दलित वोट बैंक न खिसके। अब राहुल इस एक्ट को भी निष्प्रभावी बता रहे हैं ताकि इनका वोट बैंक न खिसके।
बता दें कि न्यायमूर्ति एके गोयल 6 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय से सेवानिवृत्त हो गए और उसी दिन राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के चेयरमैन नियुक्त हुए। राहुल गांधी को इसी से दिक्कत है। यह राहुल का कमाल का दलित प्रेम है कि किसी न्यायाधीश ने संविधान प्रदत्त नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बात करते हुए इतना ही कह दिया कि एससी—एसटी एक्ट में बगैर जांच गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए तो वे चाहते हैं कि अब वह भूखो मर जाए, उसे नौकरी से निकाल दी जानी चाहिए या फिर कभी, कहीं नौकरी न दी जाए।
यानी, इनकी चले तो इस देश में सिर्फ सवर्णों की ही नौकरी पर रोक नहीं लगनी चाहिए, बल्कि हर उस शख्स की नौकरी—प्रोन्नति रोक दी जानी चाहिए जो सवर्णों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाए। यह दलित प्रेम है या सवर्णों के प्रति इनकी घृणा? क्या समझें?
राहुल या कोई भी नेता यदि सच में किसी दलित पर हुए जुल्म के खिलाफ खड़ा हो तो स्वागत है। जिस किसी दलित पर कोई भी अत्याचार हो, जांच के बाद दोषी पाए जाने पर उसे जेल भेजा ही जाना चाहिए, इसका स्वागत है। यहां तो यह भी दरियादिली दिखाई गई है कि बिना जांच ही जेल होगी। होना तो यह चाहिए कि धर्म—जाति के आधार पर कानून ही न बने लेकिन वोट बैंक की राजनीति में पड़कर भाजपा ने इतनी दरियादिली दिखा ही दी है तो राहुल की दलितों के प्रति दरियादिली तो इससे आगे बढ़कर सवर्ण घृणा तक पहुंचनी ही चाहिए।
दरअसल, जिस तरह इन नेताओं ने लगातार आरक्षण के जरिये एक समाज को बैसाखी की आदत लगा दी है, ये खुद भी दलितों की बैसाखी के सहारे राजनीति करने के आदी बन चुके हैं। इनकी गंदी राजनीति के चलते विविधताओं का देश, हजारों जातियों का देश, दो-चार जातियों पर सिमट गया है। इस तरह धर्म-जाति के नाम पर देश को बांटने की राजनीति करने वाले राहुल ही नहीं, हर नेता के खिलाफ खड़े होने का वक्त है। चुनाव में बेहतर विकल्प न मिले तो नोटा दबाइए लेकिन किसी जातिवादी नेता के हाथ में देश की तकदीर बिल्कुल न सौंपिए। सबसे पहले राजनीति से जाति को खत्म कीजिए। तभी यह देश भी बचेगा और सम्पूर्ण समाज भी।

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देश से सवर्णों को मिटाने की राजनीति !

उत्तर प्रदेश में मायावती ने नारा दिया था— तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। तिलक माने कि ब्राह्मण। तराजू माने कि बनिया और तलवार यानी कि क्षत्रिय। इन सभी को जूते मारो!
क्या बात है! इतनी नफरत? एक दलित नेता साफ तौर पर सवर्णों को जूते मारने के लिए कह रही है और सभा में दलित तालियां बजा रहे हैं। बजाएं भी क्यों नहीं इन्हें बताया गया है कि 1000 वर्षों तक सवर्णों ने इनका शोषण किया है। कमाल की बात है कि दलितों के मन में सवर्णों के प्रति नफरत भरकर, सवर्णों को जूते मारने की बात कहकर ये नेता कहते हैं कि दोनों एक थाली में क्यों नहीं खाते?
हम मानते हैं कि कभी धर्म की खामियों के कारण दलितों को नुकसान हुआ था, किंतु अब भी यदि सवर्ण और दलित एक थाली में नहीं खा पा रहे तो उसकी असली वजह यह दलित राजनीति ही है…।
अच्छा! कमाल की बात यह भी है कि जो मायावती दलितों की ब्रांडेड नेता हैं, वह सवर्णों को जूते मार सकती हैं। फिर भी दबंग कौन? शोषक कौन जूते खाने वाला सवर्ण ही न! और शोषित कौन? जूते मारने वाली मायावती न!
जिस तरह खुलेआम सवर्णों को जूते मारने की बात की जाती है, यदि दलितों को कह दी जाए तो? बवाल मच जाएगा न? गाली पर ही गिरफ्तारी है, जूते पर क्या होगा? लेकिन, कितना आसान है सवर्णों को जूते मारना…।
यह कुछ जातियों को खुलेआम जूते मारने की बात कहना— क्या इससे बड़ा भी कोई मनुवाद हो सकता है? क्या मायावती से बड़ा कोई मनुवादी है? इसके बाद भी मनुवादी कौन है— सवर्ण! कितनी अजीब बात है कि इस तरह के मनुवादी नेता खुद को ​दलित, शोषित, पिछड़ा बताते हैं और देश का संविधान तक मान लेता है? सिर्फ जाति के कारण। इतनी दुर्भावना! ओह! 1000 वर्षों का शोषित, सताया समाज है, यह तो जूते मार ही सकता है…।
बिहार में लालू प्रसाद ने कहा था— भूरा बाल साफ करो। भू यानी भूमिहार, रा यानी राजपूत, बा यानी ब्राह्मण और ल यानी लाला—कायस्थ। भूरा बाल साफ करो यानी कि सवर्णों को साफ कर दो। इस तरह किसी और जाति को साफ करने की बात कभी किसी नेता ने कही है? कही जा सकती है? कह दे तो? बवाल मच जाएगा न? लेकिन, सवर्णों को साफ करने की बात कोई भी कह सकता है! और गजब की बात है कि फिर भी दबंग कौन है? शोषक कौन है? सवर्ण!
सवर्णों को सीधे साफ करने, मार देने की बातें मंचों से हो रही है लेकिन कहीं कोई एफआईआर नहीं! कोई गिरफ्तारी नहीं! कोई हो-हल्ला नहीं! सवर्ण मारा भी जाए तो कोई बात नहीं क्योंकि यह समाज 1000 वर्षों का ऐतिहासिक शोषक है। सवर्ण तो कहे भी कि उसे किसी ने गाली दी है तो नहीं माना जाएगा। उसे कोई गाली कैसे दे सकता है? और गाली दे भी दे तो उसे लग कैसे सकता है? गाली तो सिर्फ कथित दलित, पिछड़ों को आहत करती है…।
दलित, पिछड़ी राजनीति के नाम पर इस समय देश में सवर्णों के खिलाफ खुलेआम जहर बांटा जा रहा है। कभी सीधे—सीधे सवर्णों को साफ करने की बात कहकर तो कभी दलितों को खुश करने के लिए उन्हें जातीय आधार पर आरक्षण, नौकरी, प्रोन्नति देकर। देश में सवर्णों को साफ करने की बात ही नहीं कही जा रही, इसके लिए बकायदा इंतजाम किए जा रहे हैं। धीरे—धीरे सबकुछ सवर्णों से छीना जा रहा है। पहचान के लिए बस अब मताधिकार ही रह गया है जो बताता है कि सवर्ण इस देश का नागरिक है। इसके बाद भी उसके लिए कहीं कोई आवाज नहीं उठती क्योंकि सबको बताया गया है कि सवर्ण 1000 वर्षों का शोषक समाज है।

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यह सवर्ण 1000 वर्षों का हिसाब चुकाने के लिए तैयार है !

हम जन्म से हिंदू हैं। यह मेरा धर्म है, मेरी संस्कृति है किंतु हमें किसी अन्य के मुस्लिम, इसाई होने से भी कोई दिक्कत नहीं है।
हम ब्राह्मण हैं। यह मेरी जाति है, इससे मेरा संस्कार है​ किंतु हम जातिवादी नहीं हैं। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं कि अन्य किस जाति के हैं। किंतु, क्या इसका कोई अर्थ है? इस भाव के बाद भी मेरी पहचान क्या है? सवर्ण ही न! समाज के लिए भी, संविधान के लिए भी, सरकार के लिए भी!
हमने तो एक चीटी भी नहीं मारी लेकिन इसके बाद भी हमपर 1000 वर्षों के शोषण का इल्जाम आता है तो हम तो बन गए न बैठे—बिठाए गुनहगार! और सवर्ण होने की सजा देखिए- हमारा राशन बंद, स्कॉलरशिप बंद, एडमिशन बंद। नौकरी बंद। प्रोन्नति बंद। और जेल भी भेजा जाना तय! बेगुनाही साबित करने तक का मौका नहीं! माने मानवाधिकार भी गए तेल लेने! इतना जुल्म! क्यों? अच्छा समझे! 1000 वर्षों तक हमने जुल्म जो ढ़ाया है …! सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यदि बेहयाई से यह दलील रख ही दी है कि कुछ जातियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए आंकड़े की जरूरत नहीं है क्योंकि ये 1000 वर्षों से सताए हुए हैं तो क्या आश्चर्य है यदि आगे कभी एससी-एसटी एक्ट पर चर्चा हो तो यह दलील भी प्रस्तुत कर दे कि सवर्णों को सजा देने के लिए किसी जांच की जरूरत नहीं क्योंकि इनके जुल्म का इतिहास 1000 वर्ष पुराना है? यह एक्ट बना भी तो इसी भाव से है!
…तो यदि सवर्ण का भाव न होकर भी हमारी पहचान यही है और इसी के कारण निर्दोष होकर भी हम दंड के भागी हैं तो कब तक सफाई देते रहेंगे कि हम वैसे सवर्ण नहीं हैं जैसा सरकार बता रही। यदि समाज को एक अच्छा इंसान नहीं चाहिए, देश—सरकार को एक अच्छा नागरिक नहीं चाहिए तो देते हैं न वही, जो चाहिए। सरकार ने तो हमें सवर्ण मान ही लिया है, तो चलो सरकार को हम भी सवर्ण बनकर दिखलाते हैं। इन सरकारों से बहुत चोट खा चुके भाई, अबकी सबक हम भी सिखलाते हैं।
आश्चर्य न कीजिए! हमने तो हमेशा यही चाहा है कि मेरा धर्म, मेरी जाति मेरी निजी आस्था, पहचान तक ही रहे। देश के लिए मेरी पहचान उसके एक नागरिक के रूप में हो। किंतु इस देश को नागरिक चाहिए क्या? सरकार हमें नागरिक मानती है क्या? सरकार ने तो हमें या किसी को भी नागरिक के रूप में कभी देखा ही नहीं। उसने तो हमारे धर्म, जाति को ही हमारी मौलिक पहचान घोषित कर रखी है। हमने तो यही चाहा कि यह वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था धीरे—धीरे समाज से भी खत्म हो, इसका भाव खत्म हो किंतु यदि इसे संविधान से लेकर सरकार तक में जगह मिल गई तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? समाज में जाति व्यवस्था के लिए यदि हम दोषी हैं तो इस जातिवादी संविधान के लिए कौन दोषी है जो सबकी जाति देखता है? इस जातिवादी सरकार के लिए कौन दोषी है, जो हर फैसले जाति देखकर लेती है? यह तो किसी को गरीब भी मानते हैं तो धन नहीं, जाति देखकर। सवर्ण भी मानते हैं, तो कर्म नहीं वर्ण देखकर। इसके लिए दोषी कौन है? क्या इसके लिए भी सवर्ण? हमें तो यह समझ में नहीं आता कि आखिर यह बात इस देश के संविधान, सरकार को किसने बताई कि हम सवर्ण हैं? हम तो सर्टिफिकेट लेकर आए नहीं थे? किसी को दिखाए भी नहीं थे? जातियों का सर्टिफिकेट भी तो संविधान, सरकार ने ही मिलकर बांटा लेकिन दोषी कौन? सवर्ण! इस समय हर जाति के पास उसका सर्टिफिकेट है इसके बाद भी जातिवादी कौन है? सवर्ण! तो चलो न जब यही पहचान गई तो इसी के साथ कुछ वक्त बिताते हैं, सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनकर दिखाते हैं!
संविधान ने सबको एक समान माना है किंतु क्या वह अभी कहीं लागू है? यह बात देश के संविधान और सरकार को किसने बताई कि किन जातियों को गाली दी जाए तो उनकी भावना आहत हो जाती है और किनको दी जाए तो उनका सम्मान बढ़ जाता है? गाली तो गाली है न! फिर, बभना, ठकुरा गाली क्यों नहीं और बाकी गाली क्यों है? यह परिभाषा किसने गढ़ी? कैसे? सरकार की कोई समिति बनी थी? यह एससी—एक्ट बनाने वाली सरकार जातिवादी नहीं है जो जाति देखकर गाली को गाली परिभाषित कर रही है? जाति देखकर जेल भेज रही है? तो जातिवादी कौन है? सवर्ण? यानी, संविधान से लेकर सरकार तक दुर्भावना से ग्रसित किंतु निर्लज्जता ऐसी कि दुर्भावनाग्रस्त भी बताया जाएगा सवर्ण ही!
1000 वर्षों का शोषण है! किसने किया, किससे किया? उसमें जीवित कौन है? यह सब कौन पूछता है? कौन जवाब भी देता है? बस शोषण हुआ है! और इस शोषण का बदला तो लिया जाएगा! यह संविधान, यह सरकार हिसाब चुकता करेगी। किससे बदला लेंगे? कोई तो होना चाहिए? 1000 वर्षों के शोषण का हिसाब सवर्ण चुकाएगा! संविधान, सरकार दोनों ने मान लिया है कि देश का यह वर्ग स्वभाव से आततायी है, जुल्मी है। इसे सजा देनी है, बराबर देनी है। तब तक जब तक कि यह घुटने पर न आ जाए। रेंगने न लग जाए। दोनों ने यह भी मान लिया है कि देश का एक वर्ग शोषित है, उसके साथ सदियों तक शोषण हुआ है। उसे इंसाफ दिलाना है, बराबर दिलाना है। तब तक जब तक कि वह खुद शोषक न बन जाए। इसलिए एक बच्चे के अयोग्य होने पर भी उसे स्कूल में प्रवेश दिलाना है, धनी होते हुए भी स्कॉलरशिप दिलानी है, अयोग्य होते हुए भी नौकरी दिलानी है और प्रोन्नति भी। क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषित है! एक और बच्चा है। वह गरीब है किंतु स्कॉलरशिप नहीं देनी, वह योग्य है किंतु स्कूल में प्रवेश नहीं देना, नौकरी भी नहीं देनी और नौकरी नहीं तो प्रोन्नति कैसी? क्यों? क्योंकि वह 1000 वर्षों से शोषण करता आ रहा है!
सवाल है कि यह सवर्ण कौन है? इससे इतना डर क्यों है? क्या यह समाज—देश के लिए विलेन है? बॉलीवुड की किसी फिल्म से भी बड़ा? किस निर्देशक ने यह चरित्र गढ़ा है कि संविधान से लेकर सरकार और यहां तक कि समाज तक सभी डरे सहमे हुए हैं? डरना तो होगा क्योंकि निर्देशक ने यह भी बताया है कि सवर्ण जातियों के शोषण का इतिहास 1000 वर्षों का है! और कितने पर्यायवाची, परिभाषाएं भी गढ़े हैं! मनुवादी, जातिवादी, अगड़ी जाति, सवर्ण! क्या गजब का विरोधाभास है कि जिनके साथ सबसे अधिक असामान्य व्यवहार होता है, वह सामान्य जातियां कहलाती हैं— सवर्ण। संविधान, सरकार के लिए जो स्पेशल नहीं है, वह​ जनरल है— सवर्ण। सरकार हर नीचता जिनके साथ करे, वह उंची जातियां हैं— सवर्ण। जो जातियां बैकवर्ड भी हैं तो संविधान में फारवर्ड हैं, वह हैं सवर्ण। लोवर भी हैं तो अपर हैं माने सवर्ण। पिछड़ी भी हैं तो अगड़ी हैं तो सवर्ण। जो अनारक्षित हैं, वह सवर्ण। जो डिज्वर्ड हैं तो भी अनरिजव्र्ड हैं, वह है सवर्ण! अब यदि सवर्ण ठहराने के लिए इतना कुछ गढ़ा है तो मेहनत जाया क्यों जाने दें? यदि सरकार की इतनी जिद है तो क्यों न अपनी भी जिद दिखलाएं। सवर्ण कहलाएं ही क्यों, चलो सवर्ण बन भी जाएं!
सवर्ण! सरकार के लिए वह पुतला जिस पर हर तरह के टेस्ट किए जा सकें। जो खेत में खड़ा होकर फसल की रखवाली करे किंतु उस पर हक न जताए। देश में रहकर राष्ट्रभक्ति से आगे निकल सरकार भक्ति दिखलाए किंतु देश के संसाधनों पर उसका हक न हो। हिन्दू खतरे में तो सवर्ण आगे आए, समाज खतरे में तो सवर्ण आगे आए, राष्ट्र खतरे में तो उसे आवाज दी जाए, बस वह पहरेदार बना रहे हिंदुत्व का, धर्म का, राष्ट्र का… वह संसाधनों की रखवाली करता रहे क्योंकि उसके उपभोग का पहला, दूसरा, तीसरा सारा हक किसी और के पास है। सवर्ण माने कि बिना जांच दोषी मान लिया जाए, गिरफ्तार हो जाए। जो देश में 131 लोकसभा सीटों से सांसद बनने का ख्वाब भी न देख सके, वह सवर्ण। जिसे 1225 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार न हो, वह सवर्ण। जिसे सजा देने के लिए अलग से न्यायालय, थाने खोले जाएं, वह सवर्ण। जो योग्य होकर भी देश के 50 फीसदी सरकारी पदों के लिए कोशिश करने से भी वंचित कर दिया जाए, वह सवर्ण। कुछ राज्यों में तो जो सरकारी नौकरियों से प्रायः पूरी तरह वंचित कर दिया जाए वही सवर्ण!
सवर्ण! सवर्ण! सवर्ण! अब जब हमारी सरकारी पहचान सवर्ण ही है और हिसाब भी 1000 वर्षों का है तो हम हिसाब चुकाने के लिए तैयार हैं! कोई सफाई नहीं, हम सवर्ण कहलाएं ही क्यों, बनने को भी तैयार हैं! अभी तक देश—समाज ने माना है, आज हम स्वयं को सवर्ण घोषित करते हैं! साथ ही यदि इतनी सरकारी प्रताड़ना के बाद भी किसी भाई का कुछ हिसाब रह गया है तो हम चुकता करने के लिए तैयार बैठे हैं। जिस किसी भाई का हमसे सिर्फ इसलिए दुराव है कि हम सवर्ण हैं तो वह अपने दस-बीस पुश्त का इतिहास लेकर सामने आएं और बताएं कि मेरे किस दादा या परदादा ने उनके किस दादा या परदादा से काम कराया लेकिन पारिश्रमिक नहीं दिया। जब पैसे मांगे तब किसने किसको कोड़े बरसाए। किस कुएं में पानी पीने गए थे तो किसने रोक दिया था? पहले हिसाब दें, फिर चुकता करने के लिए भी हम तैयार हैं! हम तैयार हैं उस सरकार, व्यवस्था से भी हिसाब चुकता करने के लिए जो 1000 वर्षों का बदला ले रही है। हम आज, अभी उस चुनाव का बहिष्कार करते हैं जिसके जरिये देश के लिए नहीं, कुछ जातियों के लिए सरकार चुनी जाती है। सरकार ने जिन्हें सवर्ण घोषित किया है, हम उन सभी जातियों के लोगों का भी आवाह्न करते हैं कि स्वयं भी अपने को सवर्ण घोषित करें और उस चुनाव का बहिष्कार कर दें जिसमें आपके लिए कुछ भी नहीं है। आप किसी को भी चुनें लेकिन यदि वह आपसे 1000 वर्षों की दुर्भावना लिए बैठा है तो वह आपके साथ न्याय नहीं कर सकता। चूंकि सब यही करते हैं इसलिए जरूरी है कि एक चुनाव ऐसा जाने दीजिए जिसमें किसी को न चुनिए। बस एक चुनाव शांत हो जाइए, यह शांति तूफान का काम करेगी और बहुत कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार कोई भी हो, उसका रवैया सवर्णों के साथ एक जैसा है। ऐसे में कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके वोट न देने से सरकार किसकी बनेगी। हां, जिनकी नहीं बनेगी उन्हें सबक मिलेगा और जिनकी बनेगी उन्हें यह संदेश कि अब और ज्यादती कि तो उनकी भी सरकार जानी तय है। साथ ही चुप न रहें। देश-समाज विरोधी जातिवादी कानून, व्यवस्था, सरकार सबके खिलाफ आवाज उठाएं। लिखें, बोलें, शेयर करें। अंदर के गुस्से को इतना फैलाएं कि वह संसद तक पहुंच पाए। अस्तित्व रक्षा का अब बस यही एक उपाय है! करो या मरो!

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पाकिस्तान में इमरान तो भारत में…?

पाकिस्तान में कल हुए आम चुनाव का आज परिणाम आ रहा है। क्रिकेट खिलाड़ी से राजनीति के खिलाड़ी बने इमरान खान की पार्टी तहरीक—ए—इंसाफ (पीटीआई) देश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती हुई साफ नजर आ रही है वहीं जेल में बंद नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएलएम-एन) दूसरे नंबर पर चल रही है। चुनाव परिणाम इससे थोड़ा ही इधर—उधर होगा। पीटीआई को पूर्ण बहुमत न मिला तो भी गठबंधन कर इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने में कामयाब हो ही जाएंगे…।
यूं तो इमरान पाकिस्तान की जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए नेता हैं लेकिन वह खुद कितने लोकतांत्रिक हैं, इस पर किसी बहस की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में, यदि अलोकतांत्रिक विचारों वाले इमरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो भारत—पाक में शांति वार्ता जैसी कोई चीज रह जाएगी, इसकी कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। युद्ध की संभावना न हो तो भी सीमा पर घुसपैठ बढ़नी तय है क्योंकि पाकिस्तान में सेना की सत्ता नहीं होगी तो भी इमरान के रूप में कमोबेश उसका ही नेतृत्व होगा।
अब ऐसे में, 2019 में होने वाले चुनाव में भारत को ऐसा प्रधानमंत्री देना होगा जो पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देना जानता हो। जो इतना उतावला न हो कि देश को बेमतलब युद्ध की आग में झोंक दे लेकिन इतना कायर भी न हो कि घुसपैठ बर्दाश्त करता रहे, आतंकी गतिविधियों को रोकने में नाकाम रहे।
भारत में वर्तमान में प्रधानमंत्री पद के लिए दो ही उम्मीदवार सामने हैं। एक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे राहुल गांधी।
नरेंद्र मोदी अपने वादे पर काफी हद तक खरे नहीं उतर पाए हैं। आतंक के मुद्दे पर बात करें तो सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक ही दिखता है। खासकर, कश्मीर मुद्दे पर तो मोदी अपना कोई वादा नहीं निभा पाए। न कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने का और न ही धारा 370 हटाने का। इतना ही नहीं, रमजान में मुस्लिम तुष्टीकरण व वोट बैंक के लिए मोदी सरकार ने ऐसा निर्णय लिया जिससे सैनिकों को बिना लड़े ही मौत के मुंह में समा जाना पड़ा। सरकार ने देशद्रोहियों से केस वापस लिए और जिन पर केस चल रहे हैं, उनमें अधिकतर मामले में अभी तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं करा पाई। राफेल डील में विपक्ष के कुतर्कों को छोड़ दें तो सही सवालों का भी जवाब दे पाने में मोदी असफल रहे हैं। वह नहीं बता पा रहे कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ऐसी कंपनी से करार किया जा रहा, जो अनुभवहीन है। कई मसले हैं, जिनसे पता चलता है कि यह सरकार देश विरोधी ताकतों के खिलाफ कठोरता से कार्रवाई करने में नाकाम है…।
राहुल गांधी की बात करें तो नरेंद्र मोदी से तुलना करने के लिए उनका कोई कार्यकाल तो नहीं है, लेकिन उनके विचार और व्यवहार सामने हैं जिसे देखकर कतई नहीं लगता कि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो आतंक का करारा जवाब दे पाएंगे। यह मोदी सरकार की नाकामी है कि जेएनयू में देशविरोधी नारों की सच्चाई अभी भी पूरी तरह सामने नहीं आ सकी है लेकिन देशद्रोह का आरोप लगने के साथ ही आरोपितों के बचाव में उतर जाना बताता है कि राहुल गांधी कभी—कभी किस हद तक गिर सकते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही था, जैसे कठुआ में कुछ लोग दुष्कर्म के आरोपितों के पक्ष में खड़े हो गए थे। यह सही है कि जब तक कोई न्यायालय से दोषी करार न ​दे दिया जाए, वह दोषी नहीं है लेकिन यदि वह आरोपित भी है तो संदिग्ध तो है ही। ऐसे व्यक्ति का बचाव, उसके गुनाह पर पर्दा डालना ही है। इस तरह आतंकियों, देश द्रोहियों से मुकाबले के मामले में मोदी की अपेक्षा राहुल का व्यवहार अधिक संदिग्ध दिखता है।
बात सच्चाई की करें तो मोदी और राहुल दोनों ही कई बार झूठ बोल चुके हैं। मोदी चुनावी सभाओं में झूठ बोलते हैं लेकिन राहुल ने तो पिछले दिनों राफेल डील मुद्दे पर भरी संसद में ही झूठ बोला, वह भी तब जबकि यह डील कांग्रेस ने ही की थी।
अब बात यदि व्यवहारिक समझ, ज्ञान की करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी मोदी के सामने दूर—दूर तक नहीं टिकते। डिग्री किसकी सही है, यह तो जांच में ही सामने आएगा लेकिन पढ़ार्इ ठीक से नहीं की है राहुल ने यह बार—बार वह खुद साबित कर चुके हैं। मोदी का तो इतिहास ज्ञान ही अनूठा है लेकिन राहुल का व्यवहारिक ज्ञान भी। पिछले दिनों वे नहीं बता पाए कि एनसीसी क्या है? हद है, इस देश में रहकर राहुल एनसीसी नहीं जानते। ऐसा कई बार हुआ है, जब राहुल की अज्ञानता साफ झलकी है और ताज्जुब है कि इसे दूर करने के लिए वह कोई प्रयास भी नहीं करते हैं। शायद, इसकी उन्हें जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि उन्हें आगे बढ़ाने वाली उनकी प्रतिभा नहीं, बल्कि परिवारवाद की राजनीति है।
अब बात यदि राजनीतिक अनुभव की करें तो कुछ कहना ही नहीं है…। जितनी उम्र है राहुल की, कमोबेश उतना अनुभव है मोदी का। राहुल में यही खूबी हैं कि वह युवा है लेकिन कार्य करने की उर्जा मोदी में उनसे भी अधिक है।
भ्रष्टाचार की बात करें तो न तो स्पष्ट रूप से मोदी के बारे में ही ऐसा कहा जा सकता है और न ही राहुल के बारे में ही लेकिन यदि देखा जाए तो दोनों पर ही कई आरोप लग चुके हैं। बड़ी बात है कि राहुल गांधी हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं और उसकी सुनवाई चल रही है जबकि मोदी पर अभी तक अधिकतर आरोप, आरोप ही हैं। जिस दंगे के लिए उनकी छवि खराब की गई या जिसकी बदौलत वह इतने बड़े नेता बने, उस मामले में भी वह बरी हो चुके हैं।
इस तरह मेरा निजी विचार है कि 2019 में यदि दोनों में से किसी को न चुनना पड़े तो सबसे अच्छा लेकिन यदि कोई तीसरा चेहरा सामने नहीं आता है, और चुनाव राहुल व मोदी में से ही किसी का करना पड़ता है तो मौका नरेंद्र मोदी को ही देना चाहिए। जहां तक मेरा सवाल है तो हम ऐसी स्थिति में नोटा ही दबाएंगे क्योंकि राहुल से हमें कोई उम्मीद नहीं और मोदी ने उम्मीदों को तोड़ा है।

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रेपिस्तान… फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

यह सही है कि रेप की कुछ घटनाओं के कारण देश वैसे ही रेपिस्तान नहीं कहा जा सकता जिस तरह कुछ ही अच्छी चीजों का उदाहरण प्रस्तुत कर इसे देवलोक नहीं कहा जा सकता, इसे रामराज की संज्ञा नहीं दी जा सकती…। जम्मू-कश्मीर के आइएएस शाह फैजल को रेपिस्तान जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था लेकिन यदि उन्होंने कहा है तो सरकार को भी इतना बुरा नहीं मानना चाहिए जबकि वह रेप की घटनाएं रोकने में ही नहीं, दोषियों को सजा देने तक में विफल है।
फैजल का ट्वीट है- 

“आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने रेपिस्तान पैदा कर दिया है।”

इस ट्वीट में यदि रेपिस्तान शब्द पर आपत्ति को छोड़ दें तो बाकी गलत क्या है, यह मेरी समझ से बाहर है। और यदि यह सारे कारण मिलते हैं तो इनसे रेपिस्तान का निर्माण हो रहा है, तो यह तर्क भी कहां गलत है? हो सकता है कि एक लोकसेवक होने के कारण फैजल को ऐसा ट्वीट नहीं करना चाहिए था लेकिन एक नागरिक के नाते तो वह कर ही सकते हैं न! क्या लोकसेवक एक नागरिक नहीं होता? क्या देश में अभिव्यक्ति की आजादी जैसा कुछ नहीं होता! क्या यह संविधानप्रदत्त अधिकार नहीं है? सरकार ने महज एक ट्वीट पर नोटिस भेज दिया है कि लोकसेवक को यह व्यवहार शोभा नहीं देता पर क्या सरकार को लोकसेवक के प्रति, देश के नागरिक के प्रति यह व्यवहार शोभा देता है? सबसे बड़ी बात तो यह कि फैजल के ट्वीट में कहीं भी सरकार का जिक्र नहीं है। फैजल ने सरकार की निंदा नहीं की है, बल्कि रसातल में जा रहे भारतीय समाज की चिंता की है। फैजल ने रेप के लिए जो कारण दिए हैं, उसके लिए भी सरकार से अधिक समाज ही कठघरे में है। इस तरह यह कहीं से भी सरकारविरोधी ट्वीट नहीं है लेकिन चूंकि सरकार अपनी नाकामियों के कारण हीन भावना से ग्रसित है इसलिए उसे कहीं से भी उठती कोई आवाज अपने विरुद्ध ही प्रतीत हो रही है। यदि सरकार अपना दिल बड़ा करे और रेप रोकने की दिशा में कुछ काम करे तो फैजल ने तो उसकी राह आसान ही की है। रेपमुक्त भारत ही नहीं, अपराधमुक्त भारत बनाने की राह। खुद मेरी नजर में भी रेप या अपराध के बड़े कारणों में सबसे उल्लेखनीय कारण यही हैं जो फैजल ने बताए हैं। इस ट्वीट के लिए फैजल को दंडित करने की बजाय, इनके सुझाए गए कारणों पर चिंतन कर इस दिशा में सरकारी और सामाजिक स्तर पर प्रयत्न किए जाने की जरूरत है।
फैजल ने सबसे पहले आबादी का जिक्र किया है। सोचकर देखिए, बढ़ती आबादी रेप ही नहीं, हर समस्या के लिए जिम्मेदार है; किसी के लिए कम तो किसी के लिए ज्यादा। यदि परिवार में पांच-छह बच्चे हों तो सबपर माता-पिता ठीक से ध्यान नहीं रख पाते, उन्हें शिक्षित, संस्कारित नहीं कर पाते। शिक्षाविहीन, संस्कारहीन नागरिक कैसा होगा? परिवार से आगे निकल यदि हम देश की बात करें तो सरकार खुद भी अक्सर बढ़ती आबादी का रोना रोती रहती है कि ‘इतने बड़े देश में सभी को रोजगार दे पाना मेरी तो क्या, किसी के वश की बात नहीं है।’ अब यदि सरकार के बूते में हर व्यक्ति को रोजगार देना नहीं है तो बेरोजगार आदमी करेगा क्या? अपराध ही तो करेगा?
सवाल उठता है कि जब सरकार को भी अच्छी तरह पता है कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में वह सबको आवास, शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार आदि मुहैया नहीं करा सकती तो वह इस देश की बढ़ती आबादी को रोकने के लिए ही क्या प्रयास कर रही है? 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की आबादी एक अरब 21 करोड़ है, जो कि चीन से महज 10 करोड़ ही कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि विश्व की कुल आबादी में अकेले भारत की हिस्सेदारी 17 फीसदी है, जबकि हमारे पास दुनिया का केवल चार फीसदी पानी और 2.5 फीसदी ही जमीन है। जाहिर है कि सच में इतनी बड़ी आबादी की जरूरतें कैसे पूरी की जा सकती है? और यदि नहीं की जा सकती तो इस आबादी को बढ़ने क्यों दिया जा रहा है? अब जबकि जनसंख्या विस्फोटक स्तर पर पहुंच चुकी है, सरकार “हम दो— हमारे दो” से आगे बढ़कर “हम दो— हमारे एक” का नारा क्यों नहीं देती? नारा छोड़िए, यह अध्यादेश क्यों नहीं लाती कि जिन वर्तमान कपल की एक से अधिक संतान होगी, उन संतानों को हर तरह के सरकारी लाभ से महरूम कर दिया जाएगा? हर साल करोड़ों की आबादी पैदा करने से अच्छा है कि जो देश की आबादी है, उसी के भरण—पोषण का सही इंतजाम हो। यह कब होगा? आबादी को नियंत्रित करने के उपाय करने की बजाय, आबादी को एक समस्या के रूप में सामने रखने वाले आइएएस अधिकारी का उपाय करना कितना सही है? क्या सरकार को यह मिर्ची इसलिए लगी है कि वह बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल है?
पितृसत्तात्मक समाज। यह दूसरा कारण बताया है फैजल ने। क्या गलत कहा है? देश में अभी 1000 पुरुषों पर 940 महिलाएं हैं। अभी भी बेटियों की भ्रूण हत्या हो रही है। कोई नहीं चाहता कि उसके घर बेटी हो। हो गई तो बेटे का इंतजार। यूं किसी को एक भी बेटी नहीं चाहिए लेकिन बेटे के इंतजार में दो—चार भी हो जाए तो क्रम नहीं रोका जाता जब​तक कि बेटा न हो जाए। अब बेटे के इंतजार में हुई बेटियों की क्या कद्र होगी? शुरू से ही भेदभाव…। पालन—पोषण से लेकर पढ़ाई तक में। बेटी थोड़ी बड़ी हुई तो परिवार पर उसकी इज्जत बचा लेने की चुनौती। और बड़ी हुई तो शादी की चुनौती। क्या बेटे—बेटी के मोर्चे पर समाज में दोहराव नहीं है? क्या पितृसत्तात्मक समाज नहीं है? और यदि है तो गलत क्या कहा है फैजल ने?
शराब। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की सबसे ताज़ा रिपोर्ट (2016) के अनुसार, 95 प्रतिशत अपराधी पीड़िता के जानने वाले होते हैं। मां से, ​बहन से, रिश्तेदार से, बच्ची से, बुजुर्ग से बलात्कार करने वाले अक्सर नशे में ही होते हैं। हवस में डूबा आदमी जब शराब में डूब जाता है तो वह आदमी से आदमखोर बन जाता है, और इसलिए उसे किसी की चीख में भी आनंद मिल रहा होता है। यदि नशे में दुष्कर्म का आंकड़ा जुटाया जाए तो मेरा दावा है कि यह साबित हो जाएगा कि रेप की अधिकतर घटनाएं नशे में अंजाम दी जाती हैं और शराब रेप का एक बड़ा कारण है; यह बात तो साबित हो ही चुकी है कि घरेलू हिंसा का सबसे बड़ा कारण शराब ही है। आप कुछ न कीजिए। आप एक सप्ताह के अखबार से रेप की घटनाएं एकत्रित कीजिए। फिर देखिए कि नशे में कितनी वारदात हुई और होश में कितनी। आंकड़ा सामने होगा। शराब या कोई भी नशा सिर्फ रेप ही नहीं, अधिकतर अपराध की वजह है। जब यह कोई छुपी हुई बात नहीं है तो इसे फैजल ने सार्वजनिक कह दिया तो क्या गलत कह दिया?
अश्लीलता…। इस पर चर्चा करते ही कथित प्रगतिशील पुरुष और नारियां बिदकने लगते हैं क्योंकि उन्हें डर लगने लगता है कि जिस अश्लीलता को उन्होंने प्रगति का आवरण देकर ढंका है, कहीं वह सामने न आ जाए। वह भी अश्लील ही हैं, कहीं समाज यह भी न जान जाए। अश्लील का मतलब है जो नैतिक व सामाजिक आदर्शों से च्युत है। जो गंदा है। अश्लील बातें हो सकती हैं, अश्लील दृश्य हो सकता है, अश्लील शब्द हो सकते हैं, अश्लील पहनावा हो सकता है, अश्लील आचरण हो सकता है…। अश्लीलता किसी व्यक्ति के अंदर की वह गंदगी है, जो दूसरे व्यक्ति के अंदर की गंदगी को हवा देती है, शह देती है, उसे भड़काती है…। सोचकर भी नहीं बताया जा सकता कि कौन—सा क्षेत्र ऐसा बचा है, जहां अश्लीलता नहीं है, जहां अश्लील लोग नहीं हैं। मीडिया, साहित्य, संगीत, फिल्म, टीवी, राजनीति, सरकार से लेकर समाज तक…। यह अश्लीलता इस हद तक फैल चुकी है कि अब तो कुछ भी अश्लील नहीं लगता। सबकुछ यह कहकर स्वीकार कर लिया जाता है कि अब इतना तो चलता ही है! ऐसे माहौल में जहां अश्लीलता समय की मांग लगने लगी है, अश्लील लोग मॉडर्न और प्रगतिशील समझे जाने लगे हैं, वहां एक और अश्लीलता— रेप और एक और अश्लील— रेपिस्ट की उत्पत्ति पर क्या आश्चर्य है?
तकनीक। यौन इच्छाएं अपनी पूर्ति के लिए हर युग में मौजूद संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल करती हैं। जब तकनीक नहीं थी, तब मस्तराम किसने नहीं पढ़ा? जिसने नहीं पढ़ा, उसने रसभरी कहानियां पढ़ लीं। कुछ न मिला तो सरस सलील ही खरीद ली। लेकिन बस। इससे अधिक कुछ भी चारा नहीं था। जिसने छुपकर कुछ अश्लील पढ़ा भी तो यहीं तक, देखा भी तो यहीं तक, सीखा भी तो यहीं तक। और अब? अश्लीलता तक किसकी पहुंच नहीं है? अश्लीलता की कौन—सी हद बाकी है? कोई सीमा है? यह तो पूरी तरह बच्चे के विवेक पर है न कि वह मोबाइल का डाटा क्या देखने, क्या पढ़ने पर खर्च कर रहा है? कोई रोक—टोक है? किसी भी स्तर पर? माहौल का व्यापक असर पड़ता है लेकिन कैसा माहौल है यह? व्यक्ति जो सोचता है, धीरे—धीरे वही बन जाता है लेकिन कौन जानता है कि मोबाइल पर पोर्न देखने वाले किसी बच्चे से लेकर कोई बुजुर्ग तक क्या सोचता है? फेसबुक के जरिये तो किशोरों के आतंकी तक बन जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लगातार रेप के क्लिप देख—देखकर यदि वे रेपिस्ट बन रहे हैं तो क्या आश्चर्य है? इस पर क्या नियंत्रण जरूरी नहीं है? तो क्या गलत कह दिया है फैजल ने?
अराजकता। अभी हाल ही में दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल में अधिकारों को लेकर चल रही खींचतान पर उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यहां अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं है। जाहिर है कि अराजकता अच्छी बात नहीं है। सवाल है कि अराजकता है क्या? अराजकता से आशय है, देश में सरकार का न होना या होते हुए भी न होने जैसी स्थिति हो जाना। एक ऐसी स्थिति जिसमें कोई व्यवस्था न रह जाए। अनार्की। … तो कुछ हद तक इसमें भी क्या गलत है? रेप हो जाने के बाद किस पीड़िता को किसी व्यवस्था के होने का अहसास होगा? जो सरकार किसी लड़की की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती; उसके होने या न होने का क्या मतलब है? क्या यह अराजकता नहीं है? सबसे चर्चित निर्भया मामले में भी अभी तक दोषियों को उनके कुकर्म की सजा सुनाई भर गई है, उस पर अमल नहीं हुआ है। यह कौन—सी स्थिति है? न्याय में देरी भी एक अन्याय है तो क्या अन्याय अराजकता नहीं है? एक लड़की सिर्फ इसलिए सड़कों पर न निकल पाए क्योंकि वह लड़की है तो क्या यह अराजकता नहीं है? ऐसी व्यवस्था जिसमें न तो रेप करने से पहले ही रेपिस्ट डरता है और न ही किसी की इज्जत व जिंदगी छीन लेने के बाद ही उसके कृत्य के अनुरूप उसे सजा हो पाती है, फांसी हो पाती है तो यह कौन—सी स्थिति है? क्या यह अराजकता नहीं है?क्या यह अराजकता रेप के लिए किसी भी हद तक जिम्मेदार नहीं है?
रेपिस्तान। यानी वह दुनिया, जिसकी पहचान ही रेप है। फैजल के अनुसार, वह दुनिया जिसे आबादी, पितृसत्तात्मक समाज, शराब, अश्लीलता, तकनीक और अराजकता ने गढ़ा है। अब जबकि अराजकता ही है तो रेपिस्तान पर भी क्या आपत्ति है? इस देश में जहां हर 20 मिनट पर एक बलात्कार होता है, यह रेपिस्तान नहीं तो और क्या है? फैजल ने गलत क्या कह दिया है?

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